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कबीर साहिब और जगन्नाथ स्थापना: सागर का स्तम्भन एवं द्वारका-समर्पण

संत कबीर साहिब: अलौकिक लीला एवं चमत्कार• katha

कबीर साहिब और जगन्नाथ स्थापना: सागर का स्तम्भन एवं द्वारका-समर्पण

The Foundation of Jagannath Puri & The Taming of the Ocean

दृश्य 1

दृश्य १: त्रेतायुग — समुद्र का संताप और प्रतिशोध की ज्वाला

Scene 1: The Boiling Wrath of the Ocean
Comic Panel
श्री राम
मार्ग दो उदधि, अन्यथा यह बाण तुम्हारे अगाध जल को भस्म कर मरुस्थल बना देगा!
समुद्र देव
त्राहिमाम रघुपति! नल और नील को आज्ञा दें, वे सेतु रचें; मैं पत्थरों को डूबने नहीं दूँगा!

त्रेतायुग में जब समुद्र ने लंका जाने का मार्ग न दिया, तब श्री राम ने आग्नेयास्त्र साधा। अभिमानी उदधि थर-थर काँपते हुए शरणागत हुआ।

श्री राम

मार्ग दो उदधि, अन्यथा यह बाण तुम्हारे अगाध जल को भस्म कर मरुस्थल बना देगा!

समुद्र देव

त्राहिमाम रघुपति! नल और नील को आज्ञा दें, वे सेतु रचें; मैं पत्थरों को डूबने नहीं दूँगा!

Panel 1
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Comic Panel
समुद्र देव
तुमने बलपूर्वक मेरा मान मर्दन किया है राम! मैं यह अपमान नहीं भूलूँगा। एक दिन मैं अपना बदला अवश्य लूँगा!

सेतु बंध गया, वानर सेना पार उतर गई; किंतु अगाध जल के भीतर समुद्र का संताप धधकता रहा—एक ऐसा प्रतिशोध जो सहस्रों वर्षों तक प्रतिशोध की अग्नि में खौलता रहा।

समुद्र देव

तुमने बलपूर्वक मेरा मान मर्दन किया है राम! मैं यह अपमान नहीं भूलूँगा। एक दिन मैं अपना बदला अवश्य लूँगा!

Panel 2
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Comic Panel
समुद्र का संकल्प
युग बीत जाएँ, किंतु मेरी छाती की ज्वाला नहीं बुझेगी। मेरे तट पर बना कोई भी मंदिर बच नहीं सकेगा!

'राम ने शस्त्र बल से मुझे झुकाया था,' युगों-युगों तक समुद्र गरजता रहा। 'कलियुग में जब उस प्रभु का धाम बनेगा, तो मैं उसका एक-एक पाषाण लील जाऊँगा!'

समुद्र का संकल्प

युग बीत जाएँ, किंतु मेरी छाती की ज्वाला नहीं बुझेगी। मेरे तट पर बना कोई भी मंदिर बच नहीं सकेगा!

Panel 3
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दृश्य 2

दृश्य २: षट बार बनायी, उदधि दौर डुवाई — राजा इन्द्रदमन का विलाप

Scene 2: The Six Ruins of Utkal
Comic Panel
राजा इन्द्रदमन
एक-एक शिला को भक्ति से तराशो शिल्पियों! जग के नाथ का यह धाम गगनचुंबी और अमर होना चाहिए!

कलियुग में उड़ीसा के धर्मात्मा राजा इन्द्रदमन ने नीलांचल तट पर भगवान जगन्नाथ का गगनचुंबी भव्य मंदिर निर्माण कराने का महान संकल्प लिया।

राजा इन्द्रदमन

एक-एक शिला को भक्ति से तराशो शिल्पियों! जग के नाथ का यह धाम गगनचुंबी और अमर होना चाहिए!

Panel 4
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Comic Panel
समुद्र का अट्टहास
कड़कड़! गगनभेदी गर्जना के साथ समुद्र की विकराल लहरों ने मंदिर के विशाल पाषाणों को खंड-खंड कर निगल लिया!

षट बार बनायी, उदधि दौर तिहि लेत डुवाई! जब-जब मंदिर पूर्णता की ओर बढ़ता, क्रुद्ध समुद्र की गगनचुंबी लहरें आतीं और सब कुछ डुबोकर लील जातीं।

समुद्र का अट्टहास

कड़कड़! गगनभेदी गर्जना के साथ समुद्र की विकराल लहरों ने मंदिर के विशाल पाषाणों को खंड-खंड कर निगल लिया!

Panel 5
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Comic Panel
राजा इन्द्रदमन
हमारा सारा कोष, शिल्पियों का सारा परिश्रम... सब समुद्र के उदर में समा गया! हे प्रभु, क्या मेरी सेवा आपको स्वीकार नहीं?!

छह बार राजा ने राज्य का कोष और प्रजा का श्रम झोंककर मंदिर बनाया, और छह बार समुद्र ने उसे धूल-धूसरित कर दिया। राजा का हृदय चकनाचूर हो गया।

राजा इन्द्रदमन

हमारा सारा कोष, शिल्पियों का सारा परिश्रम... सब समुद्र के उदर में समा गया! हे प्रभु, क्या मेरी सेवा आपको स्वीकार नहीं?!

Panel 6
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Comic Panel
राजा इन्द्रदमन
ये लहरें मुझे भी निगल लें! जब तक ठाकुर जी स्वयं इस मंदिर की रक्षा नहीं करते, मैं इस तट पर अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा!

हताश राजा इन्द्रदमन ने राज-वैभव त्याग दिया और गीली बालू पर बैठकर संकल्प किया कि जब तक प्रभु का धाम सुरक्षित न होगा, वे अन्न-जल त्यागकर प्राण दे देंगे।

राजा इन्द्रदमन

ये लहरें मुझे भी निगल लें! जब तक ठाकुर जी स्वयं इस मंदिर की रक्षा नहीं करते, मैं इस तट पर अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा!

Panel 7
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दृश्य 3

दृश्य ३: कबीर साहिब का स्मरण और उत्कल गमन

Scene 3: The Cosmic Promise of Kabir Sahib
Comic Panel
अलख निरंजन
हे परम पुरुष! कलियुग में जब समुद्र मेरे पुरी धाम पर प्रतिशोध का प्रलय लाएगा, तब आप कृपा कर मेरे मंदिर की स्थापना की रक्षा कीजिएगा!

सृष्टि के आदि में निरंजन ने कबीर साहिब से करबद्ध याचना की थी: 'कलियुग में जब समुद्र जगन्नाथ जी के मंदिर को छह बार डुबोएगा, तब आपके अतिरिक्त कोई इसकी रक्षा न कर सकेगा!'

अलख निरंजन

हे परम पुरुष! कलियुग में जब समुद्र मेरे पुरी धाम पर प्रतिशोध का प्रलय लाएगा, तब आप कृपा कर मेरे मंदिर की स्थापना की रक्षा कीजिएगा!

Panel 8
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Comic Panel
कबीर साहिब
राजा ने तट पर बहुत आँसू बहाए हैं। अब समुद्र के संताप का शमन कर न्याय का विधान स्थापित करना होगा।

सत्य के शाश्वत स्वरूप, दयानिधि कबीर साहिब ने उस अनादि वचन का स्मरण किया। कलियुगी जीवों की निष्काम भक्ति की रक्षा का समय आ चुका था।

कबीर साहिब

राजा ने तट पर बहुत आँसू बहाए हैं। अब समुद्र के संताप का शमन कर न्याय का विधान स्थापित करना होगा।

Panel 9
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Comic Panel
कबीर साहिब
उफनती लहरों के किनारे शांत भाव से चलते हुए, सतगुरु उस विलाप करते राजा के निकट पहुँचे।

शांत, तेजोमय रूप धारण कर कबीर साहिब उत्कल देश के नीलांचल तट पर पधारे। उनके पावन चरणों के स्पर्श से समुद्र की तप्त बालू शीतल हो उठी।

कबीर साहिब

उफनती लहरों के किनारे शांत भाव से चलते हुए, सतगुरु उस विलाप करते राजा के निकट पहुँचे।

Panel 10
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दृश्य 4

दृश्य ४: नीलांचल तट पर कबीर चौरा और पवित्र आसा

Scene 4: The Chabutara and the Sacred Aasa
Comic Panel
राजा इन्द्रदमन
आप कौन हैं दिव्य महात्मा? मेरा हृदय विदीर्ण हो गया है—समुद्र ने छह बार मेरे प्रभु का मंदिर डुबो दिया!
कबीर साहिब
धैर्य रखो राजन्, आँसू पोंछो। परम पिता ने इस पावन भूमि को त्यागा नहीं है।

विलाप करते राजा इन्द्रदमन ने जब सिर उठाया, तो सामने साक्षात शांति और करुणा के सागर कबीर साहिब को मुस्कुराते देखा। उनका सारा शोक सहसा तिरोहित हो गया।

राजा इन्द्रदमन

आप कौन हैं दिव्य महात्मा? मेरा हृदय विदीर्ण हो गया है—समुद्र ने छह बार मेरे प्रभु का मंदिर डुबो दिया!

कबीर साहिब

धैर्य रखो राजन्, आँसू पोंछो। परम पिता ने इस पावन भूमि को त्यागा नहीं है।

Panel 11
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Comic Panel
कबीर साहिब
कारीगरों को निर्माण पूर्ण करने की आज्ञा दो। मैं समुद्र और मंदिर के मध्य बैठूँगा; लहरें मेरी सीमा लाँघने का साहस नहीं करेंगी।
राजा इन्द्रदमन
आपके पावन वचनों पर मेरा सर्वस्व न्योछावर है भगवन! शिल्पियों की छेनी-हथौड़े अभी इसी क्षण फिर गूँज उठेंगे!

'उठो राजन्! धीरज धरो,' कबीर साहिब ने अमृतमयी वाणी में कहा। 'शिल्पियों को पुनः बुलाओ। इस बार समुद्र मंदिर की एक ईंट को भी छू नहीं सकेगा।'

कबीर साहिब

कारीगरों को निर्माण पूर्ण करने की आज्ञा दो। मैं समुद्र और मंदिर के मध्य बैठूँगा; लहरें मेरी सीमा लाँघने का साहस नहीं करेंगी।

राजा इन्द्रदमन

आपके पावन वचनों पर मेरा सर्वस्व न्योछावर है भगवन! शिल्पियों की छेनी-हथौड़े अभी इसी क्षण फिर गूँज उठेंगे!

Panel 12
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Comic Panel
कबीर साहिब
यह साधारण चौरा समुद्र के अहंकार और सत्य के धाम के बीच शाश्वत साक्षी बनकर रहेगा।

कबीर साहिब ने स्वयं अपने कर-कमलों से समुद्र के तट पर एक साधारण ईंटों का चबूतरा (कबीर चौरा) निर्मित किया—समुद्र की सीमा बांधने के लिए।

कबीर साहिब

यह साधारण चौरा समुद्र के अहंकार और सत्य के धाम के बीच शाश्वत साक्षी बनकर रहेगा।

Panel 13
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Comic Panel
दिव्य मर्यादा
पवित्र 'आसा' एक अमिट दिव्य सीमा रेखा बन गया—समुद्र की लहरें उसकी नोक से आगे बढ़ने का साहस न कर सकीं।

अपने सम्मुख अपना पवित्र योगदण्ड (आसा) गाड़कर कबीर साहिब समुद्र के सम्मुख निश्चल ध्यानस्थ होकर बैठ गए। उधर शिल्पी हर्षित होकर गगनचुंबी मंदिर के निर्माण में जुट गए।

दिव्य मर्यादा

पवित्र 'आसा' एक अमिट दिव्य सीमा रेखा बन गया—समुद्र की लहरें उसकी नोक से आगे बढ़ने का साहस न कर सकीं।

Panel 14
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दृश्य 5

दृश्य ५: विप्र रूप में समुद्र और त्रेतायुग का न्याय

Scene 5: The Frozen Surge & The Vipra's Plea
Comic Panel
समुद्र का गर्जन
गंभीर महागर्जना! सहस्रों फनों वाले काल की भांति समुद्र की काली लहरें पूरी पुरी नगरी को डुबोने के लिए लपकीं!

जब श्री जगन्नाथ जी का भव्य मंदिर सुदर्शन चक्र और ध्वजा सहित पूर्ण हुआ, तब समुद्र का प्राचीन प्रतिशोध उफन पड़ा। आकाश छूती जल की प्रलयंकारी दीवार उठ खड़ी हुई!

समुद्र का गर्जन

गंभीर महागर्जना! सहस्रों फनों वाले काल की भांति समुद्र की काली लहरें पूरी पुरी नगरी को डुबोने के लिए लपकीं!

Panel 15
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Comic Panel
स्तब्ध जल
काष्ठ की छड़ी के आगे विराट समुद्र की एक बूँद भी न बढ़ सकी। सतगुरु के तेज के सम्मुख उद्दंड उदधि थर-थर काँप उठा!

किंतु जैसे ही वह विकराल लहर कबीर साहिब के 'आसा' की सीमा तक पहुँची, मानो सृष्टि स्तब्ध हो गई! जल की महादीवार हवा में ही काँपते हुए ठहर गई!

स्तब्ध जल

काष्ठ की छड़ी के आगे विराट समुद्र की एक बूँद भी न बढ़ सकी। सतगुरु के तेज के सम्मुख उद्दंड उदधि थर-थर काँप उठा!

Panel 16
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Comic Panel
विप्र रूपी समुद्र
हे सत्य पुरुष! हे सर्वेश्वर! मेरे जल को जड़ न कीजिए! मुझे अपनी शरण में न्याय दीजिए, मैं भिक्षा माँगता हूँ!

समुद्र ने अपना रौद्र जल-रूप त्यागकर एक वृद्ध, कांतिमान विप्र (ब्राह्मण) का वेष धारण किया और करबद्ध होकर काँपते हुए कबीर साहिब के चबूतरे की ओर बढ़ा।

विप्र रूपी समुद्र

हे सत्य पुरुष! हे सर्वेश्वर! मेरे जल को जड़ न कीजिए! मुझे अपनी शरण में न्याय दीजिए, मैं भिक्षा माँगता हूँ!

Panel 17
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Comic Panel
विप्र रूपी समुद्र
न्याय, हे सतगुरु! राम ने मुझे बलपूर्वक अपमानित किया था। यदि इस अवतार का मंदिर यहाँ बनेगा, तो मेरे हृदय के संताप का प्रतिशोध कहाँ पूरा होगा?!
कबीर साहिब
उठो समुद्र। सत्य के दरबार में किसी के साथ अन्याय नहीं होता। सुनो मेरा न्याय-विधान।

'त्रेता में राम ने बाणों से बाँधकर मेरी छाती पर पत्थर रखवाए थे!' विप्र रूपी समुद्र ने रोते हुए कहा। 'मेरी छाती का संताप सहस्रों वर्षों से जल रहा है—मुझे न्याय चाहिए!'

विप्र रूपी समुद्र

न्याय, हे सतगुरु! राम ने मुझे बलपूर्वक अपमानित किया था। यदि इस अवतार का मंदिर यहाँ बनेगा, तो मेरे हृदय के संताप का प्रतिशोध कहाँ पूरा होगा?!

कबीर साहिब

उठो समुद्र। सत्य के दरबार में किसी के साथ अन्याय नहीं होता। सुनो मेरा न्याय-विधान।

Panel 18
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दृश्य 6

दृश्य ६: कबीर साहिब का न्याय: द्वारिका अर्पण और जगन्नाथ अमर

Scene 6: The Divine Justice & Submersion of Dwarka
Comic Panel
कबीर साहिब
जब कृष्ण अपनी लीला संवरण करें, तब तुम पश्चिम की ओर मुड़ना। अपने संताप को शांत करने के लिए द्वारिका को जलमग्न कर लेना। किंतु यह पुरी सदा अभय रहेगी!

कबीर साहिब ने न्याय का तराजू साधते हुए कहा: 'कलियुग में यह जगन्नाथ पुरी जीवों के कल्याण का अमर धाम रहेगी। इसके बदले, मैं तुम्हें भगवान की स्वर्णिम द्वारिका पुरी देता हूँ—जाओ, उसे लील लो!'

कबीर साहिब

जब कृष्ण अपनी लीला संवरण करें, तब तुम पश्चिम की ओर मुड़ना। अपने संताप को शांत करने के लिए द्वारिका को जलमग्न कर लेना। किंतु यह पुरी सदा अभय रहेगी!

Panel 19
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Comic Panel
विप्र रूपी समुद्र
धन्य है आपका न्याय, हे सतगुरु! मेरा सदियों का संताप शांत हुआ। मैं वचन देता हूँ, यह समुद्र कभी कबीर चौरा को पार नहीं करेगा!

यह न्याय सुनकर समुद्र अतीव प्रसन्न हुआ। उसने कबीर साहिब के चरणों में बारंबार शीश नवाया और पूरी संतुष्टि के साथ पुरी की सीमा से सदा के लिए पीछे हट गया।

विप्र रूपी समुद्र

धन्य है आपका न्याय, हे सतगुरु! मेरा सदियों का संताप शांत हुआ। मैं वचन देता हूँ, यह समुद्र कभी कबीर चौरा को पार नहीं करेगा!

Panel 20
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Comic Panel
न्याय का संतुलन
द्वारिका जल में समाई; जगन्नाथ पुरी का मंदिर अमर हुआ। कबीर साहिब का न्याय युग-युगांतर के लिए अटल हो गया।

पश्चिम में समुद्र ने स्वर्णिम द्वारिका को अपनी गोद में समेटकर प्रतिशोध शांत किया, और पूर्व में कबीर साहिब की छत्रछाया तले श्री जगन्नाथ का पावन धाम अमर हो गया।

न्याय का संतुलन

द्वारिका जल में समाई; जगन्नाथ पुरी का मंदिर अमर हुआ। कबीर साहिब का न्याय युग-युगांतर के लिए अटल हो गया।

Panel 21
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दृश्य 7

दृश्य ७: पंडे का स्वप्न और जाति-अहंकार का विष

Scene 7: The Priest's Dream and Caste Arrogance
Comic Panel
भगवान श्री कृष्ण
जागो पंडे! मेरा यह मंदिर आज केवल इसलिए सुरक्षित खड़ा है क्योंकि कबीर साहिब ने तट पर समुद्र को मर्यादा में बाँध दिया है!

भोर की वेला में जगन्नाथ मंदिर के प्रधान पंडे को स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण के तेजोमय दर्शन हुए, जिन्होंने गंभीर स्वर में आदेश दिया।

भगवान श्री कृष्ण

जागो पंडे! मेरा यह मंदिर आज केवल इसलिए सुरक्षित खड़ा है क्योंकि कबीर साहिब ने तट पर समुद्र को मर्यादा में बाँध दिया है!

Panel 22
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Comic Panel
भगवान श्री कृष्ण
अपनी पूजा की थाली लेकर पहले समुद्र तट पर जाओ। उनकी पूजा ही मेरी सच्ची पूजा है!
प्रधान पंडा
स्वयं ठाकुर जी का साक्षात आदेश! मुझे तुरंत पूजा की थाली लेकर समुद्र तट पर जाना होगा!

'जिस कबीर साहिब ने मेरे मंदिर को प्रलय से बचाया है, वे तट पर विराजमान हैं। जाकर सर्वप्रथम उनकी पूजा करो, फिर मेरी पूजा करना!'

भगवान श्री कृष्ण

अपनी पूजा की थाली लेकर पहले समुद्र तट पर जाओ। उनकी पूजा ही मेरी सच्ची पूजा है!

प्रधान पंडा

स्वयं ठाकुर जी का साक्षात आदेश! मुझे तुरंत पूजा की थाली लेकर समुद्र तट पर जाना होगा!

Panel 23
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Comic Panel
प्रधान पंडा
ठाकुर जी ने जिस महात्मा की इतनी प्रशंसा की, वे अवश्य ही किसी उच्च कुल के महान वेदमूर्ति त्रिदंडी संन्यासी होंगे!

सुगंधित पुष्प और चंदन से सजा चांदी का थाल लिए पंडा समुद्र तट पर पहुँचा, किंतु उसका मन जन्मजात जाति-श्रेष्ठता के मद से भरा हुआ था।

प्रधान पंडा

ठाकुर जी ने जिस महात्मा की इतनी प्रशंसा की, वे अवश्य ही किसी उच्च कुल के महान वेदमूर्ति त्रिदंडी संन्यासी होंगे!

Panel 24
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Comic Panel
प्रधान पंडा
कैसा अपशकुन है! ठाकुर के दर्शन से पहले इस शूद्र जुलाहे का मुंह देखना पड़ा! मैं एक नीच कुल के फकीर की पूजा कभी नहीं करूँगा!

कबीर साहिब को जिंदा (सादे फकीरी/जुलाहा) वेष में देखकर पंडा घृणा से नाक-भौं सिकोड़ने लगा: 'हाय! ठाकुर जी के दर्शन से पूर्व आज प्रातःकाल इस जुलाहे का मुख देखना पड़ा! मेरा धर्म भ्रष्ट हो गया!'

प्रधान पंडा

कैसा अपशकुन है! ठाकुर के दर्शन से पहले इस शूद्र जुलाहे का मुंह देखना पड़ा! मैं एक नीच कुल के फकीर की पूजा कभी नहीं करूँगा!

Panel 25
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दृश्य 8

दृश्य ८: रत्नवेदी पर अलौकिक कौतुक — अहंकार का विनाश

Scene 8: The Miracle of the Ratnavedi
Comic Panel
प्रधान पंडा
हे जगन्नाथ! अपनी पावन छवि से मेरी आँखों को शुद्ध कीजिए; आज भोर में मुझे एक शूद्र जुलाहे का मुख देखना पड़ा!

कबीर साहिब की उपेक्षा कर, पंडा क्रोध में बड़बड़ाता हुआ मंदिर के गर्भगृह में भागा, ताकि ठाकुर जी की पूजा कर अपने कथित 'दोष' को धो सके।

प्रधान पंडा

हे जगन्नाथ! अपनी पावन छवि से मेरी आँखों को शुद्ध कीजिए; आज भोर में मुझे एक शूद्र जुलाहे का मुख देखना पड़ा!

Panel 26
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Comic Panel
प्रधान पंडा
हे भगवान! मेरे ठाकुर कहाँ गए?! मैं जहाँ देखता हूँ... तीनों सिंहासनों पर वही जुलाहा मुस्कुरा रहा है?!

किंतु यह क्या अलौकिक कौतुक! रत्नवेदी पर न जगन्नाथ थे, न बलभद्र, न सुभद्रा! तीनों सिंहासनों पर साक्षात कबीर साहिब के ही तीन तेजोमय रूप मुस्कुराते हुए विराजमान थे!

प्रधान पंडा

हे भगवान! मेरे ठाकुर कहाँ गए?! मैं जहाँ देखता हूँ... तीनों सिंहासनों पर वही जुलाहा मुस्कुरा रहा है?!

Panel 27
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Comic Panel
प्रधान पंडा
त्राहिमाम! क्षमा करो प्रभु, क्षमा करो! मैंने सांसारिक जाति और वस्त्र देखकर आपको ठुकराया, जबकि आप ही चराचर के स्वामी हैं!

चांदी का पूजा-थाल हाथ से छूटकर पत्थरों पर खनखनाते हुए गिर पड़ा। पुष्प और अक्षत बिखर गए। भय और पश्चाताप से काँपता पंडा सिर पकड़कर भूमि पर गिर पड़ा।

प्रधान पंडा

त्राहिमाम! क्षमा करो प्रभु, क्षमा करो! मैंने सांसारिक जाति और वस्त्र देखकर आपको ठुकराया, जबकि आप ही चराचर के स्वामी हैं!

Panel 28
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Comic Panel
कबीर साहिब
उठो पंडे। परमात्मा न जाति में है, न बाह्य पाखंड में। वह तो उस निर्मल हृदय में है जो सब जीवों को एक समान देखता है।
प्रधान पंडा
आप ही साक्षात पूर्ण ब्रह्म हैं सतगुरु! आज से मेरे कुल और जाति का सारा अभिमान आपके चरणों में भस्म हो गया!

कबीर साहिब ने दयापूर्वक रोते हुए पंडे के सिर पर अपना कर-कमल रखा। कौतुक शांत हुआ और रत्नवेदी पर श्री जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूरतें पुनः प्रकट हो गईं।

कबीर साहिब

उठो पंडे। परमात्मा न जाति में है, न बाह्य पाखंड में। वह तो उस निर्मल हृदय में है जो सब जीवों को एक समान देखता है।

प्रधान पंडा

आप ही साक्षात पूर्ण ब्रह्म हैं सतगुरु! आज से मेरे कुल और जाति का सारा अभिमान आपके चरणों में भस्म हो गया!

Panel 29
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दृश्य 9

दृश्य ९: महाप्रसाद में समरसता — छुआछूत का समूल नाश

Scene 9: The Eternal Law of Equality
Comic Panel
राजा इन्द्रदमन
आज्ञा दीजिए सतगुरु! आप जो मर्यादा स्थापित करेंगे, वह इस जगन्नाथ पुरी का युगों-युगों तक शाश्वत विधान बनेगी!

आनंदबाजार के विशाल प्रांगण में राजा इन्द्रदमन, समस्त राज-सभा, पुरोहित और जन-साधारण कबीर साहिब के समक्ष श्रद्धा से नतमस्तक होकर खड़े हुए।

राजा इन्द्रदमन

आज्ञा दीजिए सतगुरु! आप जो मर्यादा स्थापित करेंगे, वह इस जगन्नाथ पुरी का युगों-युगों तक शाश्वत विधान बनेगी!

Panel 30
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Comic Panel
कबीर साहिब
जाति-पाँति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई! इस पुरी में महाप्रसाद का कोई छुआछूत न रहेगा; सब एक पंगत में बैठकर बिना संकोच भोजन करेंगे!

'आज से इस पावन धाम में,' कबीर साहिब ने सिंहनाद किया, 'छुआछूत और जाति-पाँति का भेद तनिक भी नहीं रहेगा! यहाँ सब प्रभु की एक समान संतान हैं!'

कबीर साहिब

जाति-पाँति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई! इस पुरी में महाप्रसाद का कोई छुआछूत न रहेगा; सब एक पंगत में बैठकर बिना संकोच भोजन करेंगे!

Panel 31
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Comic Panel
विद्वान विप्र
और लो मेरे भाई! प्रभु के धाम में हमारा देह-भेद कैसा—आत्मा ही एकमात्र सत्य है!
श्रद्धालु भक्त
कबीर साहिब की जय! उन्होंने आज हमें जन्म-जन्मांतर के अपमान और बेड़ियों से सदा के लिए मुक्त कर दिया!

जन्मजात ऊँच-नीच की सदियों पुरानी दीवारें ढह गईं। प्रकांड विद्वान और निर्धन अंत्यज एक ही पंक्ति में बैठकर, एक ही मिट्टी के पात्र से प्रेमपूर्वक महाप्रसाद ग्रहण करने लगे।

विद्वान विप्र

और लो मेरे भाई! प्रभु के धाम में हमारा देह-भेद कैसा—आत्मा ही एकमात्र सत्य है!

श्रद्धालु भक्त

कबीर साहिब की जय! उन्होंने आज हमें जन्म-जन्मांतर के अपमान और बेड़ियों से सदा के लिए मुक्त कर दिया!

Panel 32
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Comic Panel
भक्त समुदाय
सतगुरु कबीर साहिब की जय! जगन्नाथ धाम के रक्षक! समरसता के आदि पुरुष की जय!

समरसता का अमर विधान स्थापित कर, कबीर साहिब दिव्य प्रकाशपुंज में अंतर्ध्यान हो गए। समुद्र तट पर उनका पावन चौरा आज भी उनकी अमर लीला का साक्षी है।

भक्त समुदाय

सतगुरु कबीर साहिब की जय! जगन्नाथ धाम के रक्षक! समरसता के आदि पुरुष की जय!

Panel 33
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दृश्य 10

दृश्य १०: श्रीरामानुजाचार्य जी का आचार-हठ और श्रीरंगम में प्रबोधन

Scene 10: Epilogue — The Miracle of Swami Ramanuja
Comic Panel
स्वामी रामानुजाचार्य
यह कैसा आचार-भ्रंश! कल प्रातःकाल से मैं इस मंदिर में भी वैदिक शुद्धि और वर्ण-व्यवस्था के कठोर नियम लागू करवाऊँगा!

कालांतर में महान वैष्णवाचार्य श्रीरामानुजाचार्य जी पुरी पधारे। सभी जातियों को एक साथ महाप्रसाद खाते देख उन्होंने यहाँ भी परंपरागत वैदिक आचार-नियम लागू करने का हठ किया।

स्वामी रामानुजाचार्य

यह कैसा आचार-भ्रंश! कल प्रातःकाल से मैं इस मंदिर में भी वैदिक शुद्धि और वर्ण-व्यवस्था के कठोर नियम लागू करवाऊँगा!

Panel 34
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Comic Panel
जगन्नाथ जी की वाणी
पुरी में कबीर साहिब का समरसता विधान ही सर्वोपरि है। जहाँ भेद-बुद्धि न छूटे, वहाँ ठाकुर स्वयं मार्ग बदल देते हैं!

ठाकुर जी ने स्वप्न में चेताया था: 'मेरी पुरी में तुम्हारा आचार नहीं चलेगा।' किंतु जब आचार्य न माने, तो रात्रि में शयन के समय भगवान ने उन्हें शय्या सहित आकाश-मार्ग से उठा लिया!

जगन्नाथ जी की वाणी

पुरी में कबीर साहिब का समरसता विधान ही सर्वोपरि है। जहाँ भेद-बुद्धि न छूटे, वहाँ ठाकुर स्वयं मार्ग बदल देते हैं!

Panel 35
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Comic Panel
स्वामी रामानुजाचार्य
प्रभु, मेरी अज्ञानता क्षमा करें! आपकी पुरी केवल अहैतुकी प्रेम और समरसता की भूमि है। जहाँ कबीर साहिब ने समता की नींव रखी, वहाँ भेद का कोई स्थान नहीं!

प्रातः जब आचार्य की आँख खुली, तो वे स्वयं को पुरी से सैकड़ों कोस दूर श्रीरंगम में कावेरी तट पर पाकर स्तब्ध रह गए! उन्होंने करबद्ध होकर उत्तर दिशा में पुरी की ओर साष्टांग प्रणाम किया और कबीर साहिब के समरसता विधान को शिरोधार्य किया।

स्वामी रामानुजाचार्य

प्रभु, मेरी अज्ञानता क्षमा करें! आपकी पुरी केवल अहैतुकी प्रेम और समरसता की भूमि है। जहाँ कबीर साहिब ने समता की नींव रखी, वहाँ भेद का कोई स्थान नहीं!

Panel 36
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