कबीर साहिब और जगन्नाथ स्थापना: सागर का स्तम्भन एवं द्वारका-समर्पण
The Foundation of Jagannath Puri & The Taming of the Ocean
दृश्य १: त्रेतायुग — समुद्र का संताप और प्रतिशोध की ज्वाला
Scene 1: The Boiling Wrath of the Ocean
त्रेतायुग में जब समुद्र ने लंका जाने का मार्ग न दिया, तब श्री राम ने आग्नेयास्त्र साधा। अभिमानी उदधि थर-थर काँपते हुए शरणागत हुआ।
मार्ग दो उदधि, अन्यथा यह बाण तुम्हारे अगाध जल को भस्म कर मरुस्थल बना देगा!
त्राहिमाम रघुपति! नल और नील को आज्ञा दें, वे सेतु रचें; मैं पत्थरों को डूबने नहीं दूँगा!

सेतु बंध गया, वानर सेना पार उतर गई; किंतु अगाध जल के भीतर समुद्र का संताप धधकता रहा—एक ऐसा प्रतिशोध जो सहस्रों वर्षों तक प्रतिशोध की अग्नि में खौलता रहा।
तुमने बलपूर्वक मेरा मान मर्दन किया है राम! मैं यह अपमान नहीं भूलूँगा। एक दिन मैं अपना बदला अवश्य लूँगा!

'राम ने शस्त्र बल से मुझे झुकाया था,' युगों-युगों तक समुद्र गरजता रहा। 'कलियुग में जब उस प्रभु का धाम बनेगा, तो मैं उसका एक-एक पाषाण लील जाऊँगा!'
युग बीत जाएँ, किंतु मेरी छाती की ज्वाला नहीं बुझेगी। मेरे तट पर बना कोई भी मंदिर बच नहीं सकेगा!
दृश्य २: षट बार बनायी, उदधि दौर डुवाई — राजा इन्द्रदमन का विलाप
Scene 2: The Six Ruins of Utkal
कलियुग में उड़ीसा के धर्मात्मा राजा इन्द्रदमन ने नीलांचल तट पर भगवान जगन्नाथ का गगनचुंबी भव्य मंदिर निर्माण कराने का महान संकल्प लिया।
एक-एक शिला को भक्ति से तराशो शिल्पियों! जग के नाथ का यह धाम गगनचुंबी और अमर होना चाहिए!

षट बार बनायी, उदधि दौर तिहि लेत डुवाई! जब-जब मंदिर पूर्णता की ओर बढ़ता, क्रुद्ध समुद्र की गगनचुंबी लहरें आतीं और सब कुछ डुबोकर लील जातीं।
कड़कड़! गगनभेदी गर्जना के साथ समुद्र की विकराल लहरों ने मंदिर के विशाल पाषाणों को खंड-खंड कर निगल लिया!

छह बार राजा ने राज्य का कोष और प्रजा का श्रम झोंककर मंदिर बनाया, और छह बार समुद्र ने उसे धूल-धूसरित कर दिया। राजा का हृदय चकनाचूर हो गया।
हमारा सारा कोष, शिल्पियों का सारा परिश्रम... सब समुद्र के उदर में समा गया! हे प्रभु, क्या मेरी सेवा आपको स्वीकार नहीं?!

हताश राजा इन्द्रदमन ने राज-वैभव त्याग दिया और गीली बालू पर बैठकर संकल्प किया कि जब तक प्रभु का धाम सुरक्षित न होगा, वे अन्न-जल त्यागकर प्राण दे देंगे।
ये लहरें मुझे भी निगल लें! जब तक ठाकुर जी स्वयं इस मंदिर की रक्षा नहीं करते, मैं इस तट पर अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा!
दृश्य ३: कबीर साहिब का स्मरण और उत्कल गमन
Scene 3: The Cosmic Promise of Kabir Sahib
सृष्टि के आदि में निरंजन ने कबीर साहिब से करबद्ध याचना की थी: 'कलियुग में जब समुद्र जगन्नाथ जी के मंदिर को छह बार डुबोएगा, तब आपके अतिरिक्त कोई इसकी रक्षा न कर सकेगा!'
हे परम पुरुष! कलियुग में जब समुद्र मेरे पुरी धाम पर प्रतिशोध का प्रलय लाएगा, तब आप कृपा कर मेरे मंदिर की स्थापना की रक्षा कीजिएगा!

सत्य के शाश्वत स्वरूप, दयानिधि कबीर साहिब ने उस अनादि वचन का स्मरण किया। कलियुगी जीवों की निष्काम भक्ति की रक्षा का समय आ चुका था।
राजा ने तट पर बहुत आँसू बहाए हैं। अब समुद्र के संताप का शमन कर न्याय का विधान स्थापित करना होगा।

शांत, तेजोमय रूप धारण कर कबीर साहिब उत्कल देश के नीलांचल तट पर पधारे। उनके पावन चरणों के स्पर्श से समुद्र की तप्त बालू शीतल हो उठी।
उफनती लहरों के किनारे शांत भाव से चलते हुए, सतगुरु उस विलाप करते राजा के निकट पहुँचे।
दृश्य ४: नीलांचल तट पर कबीर चौरा और पवित्र आसा
Scene 4: The Chabutara and the Sacred Aasa
विलाप करते राजा इन्द्रदमन ने जब सिर उठाया, तो सामने साक्षात शांति और करुणा के सागर कबीर साहिब को मुस्कुराते देखा। उनका सारा शोक सहसा तिरोहित हो गया।
आप कौन हैं दिव्य महात्मा? मेरा हृदय विदीर्ण हो गया है—समुद्र ने छह बार मेरे प्रभु का मंदिर डुबो दिया!
धैर्य रखो राजन्, आँसू पोंछो। परम पिता ने इस पावन भूमि को त्यागा नहीं है।

'उठो राजन्! धीरज धरो,' कबीर साहिब ने अमृतमयी वाणी में कहा। 'शिल्पियों को पुनः बुलाओ। इस बार समुद्र मंदिर की एक ईंट को भी छू नहीं सकेगा।'
कारीगरों को निर्माण पूर्ण करने की आज्ञा दो। मैं समुद्र और मंदिर के मध्य बैठूँगा; लहरें मेरी सीमा लाँघने का साहस नहीं करेंगी।
आपके पावन वचनों पर मेरा सर्वस्व न्योछावर है भगवन! शिल्पियों की छेनी-हथौड़े अभी इसी क्षण फिर गूँज उठेंगे!

कबीर साहिब ने स्वयं अपने कर-कमलों से समुद्र के तट पर एक साधारण ईंटों का चबूतरा (कबीर चौरा) निर्मित किया—समुद्र की सीमा बांधने के लिए।
यह साधारण चौरा समुद्र के अहंकार और सत्य के धाम के बीच शाश्वत साक्षी बनकर रहेगा।

अपने सम्मुख अपना पवित्र योगदण्ड (आसा) गाड़कर कबीर साहिब समुद्र के सम्मुख निश्चल ध्यानस्थ होकर बैठ गए। उधर शिल्पी हर्षित होकर गगनचुंबी मंदिर के निर्माण में जुट गए।
पवित्र 'आसा' एक अमिट दिव्य सीमा रेखा बन गया—समुद्र की लहरें उसकी नोक से आगे बढ़ने का साहस न कर सकीं।
दृश्य ५: विप्र रूप में समुद्र और त्रेतायुग का न्याय
Scene 5: The Frozen Surge & The Vipra's Plea
जब श्री जगन्नाथ जी का भव्य मंदिर सुदर्शन चक्र और ध्वजा सहित पूर्ण हुआ, तब समुद्र का प्राचीन प्रतिशोध उफन पड़ा। आकाश छूती जल की प्रलयंकारी दीवार उठ खड़ी हुई!
गंभीर महागर्जना! सहस्रों फनों वाले काल की भांति समुद्र की काली लहरें पूरी पुरी नगरी को डुबोने के लिए लपकीं!

किंतु जैसे ही वह विकराल लहर कबीर साहिब के 'आसा' की सीमा तक पहुँची, मानो सृष्टि स्तब्ध हो गई! जल की महादीवार हवा में ही काँपते हुए ठहर गई!
काष्ठ की छड़ी के आगे विराट समुद्र की एक बूँद भी न बढ़ सकी। सतगुरु के तेज के सम्मुख उद्दंड उदधि थर-थर काँप उठा!

समुद्र ने अपना रौद्र जल-रूप त्यागकर एक वृद्ध, कांतिमान विप्र (ब्राह्मण) का वेष धारण किया और करबद्ध होकर काँपते हुए कबीर साहिब के चबूतरे की ओर बढ़ा।
हे सत्य पुरुष! हे सर्वेश्वर! मेरे जल को जड़ न कीजिए! मुझे अपनी शरण में न्याय दीजिए, मैं भिक्षा माँगता हूँ!

'त्रेता में राम ने बाणों से बाँधकर मेरी छाती पर पत्थर रखवाए थे!' विप्र रूपी समुद्र ने रोते हुए कहा। 'मेरी छाती का संताप सहस्रों वर्षों से जल रहा है—मुझे न्याय चाहिए!'
न्याय, हे सतगुरु! राम ने मुझे बलपूर्वक अपमानित किया था। यदि इस अवतार का मंदिर यहाँ बनेगा, तो मेरे हृदय के संताप का प्रतिशोध कहाँ पूरा होगा?!
उठो समुद्र। सत्य के दरबार में किसी के साथ अन्याय नहीं होता। सुनो मेरा न्याय-विधान।
दृश्य ६: कबीर साहिब का न्याय: द्वारिका अर्पण और जगन्नाथ अमर
Scene 6: The Divine Justice & Submersion of Dwarka
कबीर साहिब ने न्याय का तराजू साधते हुए कहा: 'कलियुग में यह जगन्नाथ पुरी जीवों के कल्याण का अमर धाम रहेगी। इसके बदले, मैं तुम्हें भगवान की स्वर्णिम द्वारिका पुरी देता हूँ—जाओ, उसे लील लो!'
जब कृष्ण अपनी लीला संवरण करें, तब तुम पश्चिम की ओर मुड़ना। अपने संताप को शांत करने के लिए द्वारिका को जलमग्न कर लेना। किंतु यह पुरी सदा अभय रहेगी!

यह न्याय सुनकर समुद्र अतीव प्रसन्न हुआ। उसने कबीर साहिब के चरणों में बारंबार शीश नवाया और पूरी संतुष्टि के साथ पुरी की सीमा से सदा के लिए पीछे हट गया।
धन्य है आपका न्याय, हे सतगुरु! मेरा सदियों का संताप शांत हुआ। मैं वचन देता हूँ, यह समुद्र कभी कबीर चौरा को पार नहीं करेगा!

पश्चिम में समुद्र ने स्वर्णिम द्वारिका को अपनी गोद में समेटकर प्रतिशोध शांत किया, और पूर्व में कबीर साहिब की छत्रछाया तले श्री जगन्नाथ का पावन धाम अमर हो गया।
द्वारिका जल में समाई; जगन्नाथ पुरी का मंदिर अमर हुआ। कबीर साहिब का न्याय युग-युगांतर के लिए अटल हो गया।
दृश्य ७: पंडे का स्वप्न और जाति-अहंकार का विष
Scene 7: The Priest's Dream and Caste Arrogance
भोर की वेला में जगन्नाथ मंदिर के प्रधान पंडे को स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण के तेजोमय दर्शन हुए, जिन्होंने गंभीर स्वर में आदेश दिया।
जागो पंडे! मेरा यह मंदिर आज केवल इसलिए सुरक्षित खड़ा है क्योंकि कबीर साहिब ने तट पर समुद्र को मर्यादा में बाँध दिया है!

'जिस कबीर साहिब ने मेरे मंदिर को प्रलय से बचाया है, वे तट पर विराजमान हैं। जाकर सर्वप्रथम उनकी पूजा करो, फिर मेरी पूजा करना!'
अपनी पूजा की थाली लेकर पहले समुद्र तट पर जाओ। उनकी पूजा ही मेरी सच्ची पूजा है!
स्वयं ठाकुर जी का साक्षात आदेश! मुझे तुरंत पूजा की थाली लेकर समुद्र तट पर जाना होगा!

सुगंधित पुष्प और चंदन से सजा चांदी का थाल लिए पंडा समुद्र तट पर पहुँचा, किंतु उसका मन जन्मजात जाति-श्रेष्ठता के मद से भरा हुआ था।
ठाकुर जी ने जिस महात्मा की इतनी प्रशंसा की, वे अवश्य ही किसी उच्च कुल के महान वेदमूर्ति त्रिदंडी संन्यासी होंगे!

कबीर साहिब को जिंदा (सादे फकीरी/जुलाहा) वेष में देखकर पंडा घृणा से नाक-भौं सिकोड़ने लगा: 'हाय! ठाकुर जी के दर्शन से पूर्व आज प्रातःकाल इस जुलाहे का मुख देखना पड़ा! मेरा धर्म भ्रष्ट हो गया!'
कैसा अपशकुन है! ठाकुर के दर्शन से पहले इस शूद्र जुलाहे का मुंह देखना पड़ा! मैं एक नीच कुल के फकीर की पूजा कभी नहीं करूँगा!
दृश्य ८: रत्नवेदी पर अलौकिक कौतुक — अहंकार का विनाश
Scene 8: The Miracle of the Ratnavedi
कबीर साहिब की उपेक्षा कर, पंडा क्रोध में बड़बड़ाता हुआ मंदिर के गर्भगृह में भागा, ताकि ठाकुर जी की पूजा कर अपने कथित 'दोष' को धो सके।
हे जगन्नाथ! अपनी पावन छवि से मेरी आँखों को शुद्ध कीजिए; आज भोर में मुझे एक शूद्र जुलाहे का मुख देखना पड़ा!

किंतु यह क्या अलौकिक कौतुक! रत्नवेदी पर न जगन्नाथ थे, न बलभद्र, न सुभद्रा! तीनों सिंहासनों पर साक्षात कबीर साहिब के ही तीन तेजोमय रूप मुस्कुराते हुए विराजमान थे!
हे भगवान! मेरे ठाकुर कहाँ गए?! मैं जहाँ देखता हूँ... तीनों सिंहासनों पर वही जुलाहा मुस्कुरा रहा है?!

चांदी का पूजा-थाल हाथ से छूटकर पत्थरों पर खनखनाते हुए गिर पड़ा। पुष्प और अक्षत बिखर गए। भय और पश्चाताप से काँपता पंडा सिर पकड़कर भूमि पर गिर पड़ा।
त्राहिमाम! क्षमा करो प्रभु, क्षमा करो! मैंने सांसारिक जाति और वस्त्र देखकर आपको ठुकराया, जबकि आप ही चराचर के स्वामी हैं!

कबीर साहिब ने दयापूर्वक रोते हुए पंडे के सिर पर अपना कर-कमल रखा। कौतुक शांत हुआ और रत्नवेदी पर श्री जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूरतें पुनः प्रकट हो गईं।
उठो पंडे। परमात्मा न जाति में है, न बाह्य पाखंड में। वह तो उस निर्मल हृदय में है जो सब जीवों को एक समान देखता है।
आप ही साक्षात पूर्ण ब्रह्म हैं सतगुरु! आज से मेरे कुल और जाति का सारा अभिमान आपके चरणों में भस्म हो गया!
दृश्य ९: महाप्रसाद में समरसता — छुआछूत का समूल नाश
Scene 9: The Eternal Law of Equality
आनंदबाजार के विशाल प्रांगण में राजा इन्द्रदमन, समस्त राज-सभा, पुरोहित और जन-साधारण कबीर साहिब के समक्ष श्रद्धा से नतमस्तक होकर खड़े हुए।
आज्ञा दीजिए सतगुरु! आप जो मर्यादा स्थापित करेंगे, वह इस जगन्नाथ पुरी का युगों-युगों तक शाश्वत विधान बनेगी!

'आज से इस पावन धाम में,' कबीर साहिब ने सिंहनाद किया, 'छुआछूत और जाति-पाँति का भेद तनिक भी नहीं रहेगा! यहाँ सब प्रभु की एक समान संतान हैं!'
जाति-पाँति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई! इस पुरी में महाप्रसाद का कोई छुआछूत न रहेगा; सब एक पंगत में बैठकर बिना संकोच भोजन करेंगे!

जन्मजात ऊँच-नीच की सदियों पुरानी दीवारें ढह गईं। प्रकांड विद्वान और निर्धन अंत्यज एक ही पंक्ति में बैठकर, एक ही मिट्टी के पात्र से प्रेमपूर्वक महाप्रसाद ग्रहण करने लगे।
और लो मेरे भाई! प्रभु के धाम में हमारा देह-भेद कैसा—आत्मा ही एकमात्र सत्य है!
कबीर साहिब की जय! उन्होंने आज हमें जन्म-जन्मांतर के अपमान और बेड़ियों से सदा के लिए मुक्त कर दिया!

समरसता का अमर विधान स्थापित कर, कबीर साहिब दिव्य प्रकाशपुंज में अंतर्ध्यान हो गए। समुद्र तट पर उनका पावन चौरा आज भी उनकी अमर लीला का साक्षी है।
सतगुरु कबीर साहिब की जय! जगन्नाथ धाम के रक्षक! समरसता के आदि पुरुष की जय!
दृश्य १०: श्रीरामानुजाचार्य जी का आचार-हठ और श्रीरंगम में प्रबोधन
Scene 10: Epilogue — The Miracle of Swami Ramanuja
कालांतर में महान वैष्णवाचार्य श्रीरामानुजाचार्य जी पुरी पधारे। सभी जातियों को एक साथ महाप्रसाद खाते देख उन्होंने यहाँ भी परंपरागत वैदिक आचार-नियम लागू करने का हठ किया।
यह कैसा आचार-भ्रंश! कल प्रातःकाल से मैं इस मंदिर में भी वैदिक शुद्धि और वर्ण-व्यवस्था के कठोर नियम लागू करवाऊँगा!

ठाकुर जी ने स्वप्न में चेताया था: 'मेरी पुरी में तुम्हारा आचार नहीं चलेगा।' किंतु जब आचार्य न माने, तो रात्रि में शयन के समय भगवान ने उन्हें शय्या सहित आकाश-मार्ग से उठा लिया!
पुरी में कबीर साहिब का समरसता विधान ही सर्वोपरि है। जहाँ भेद-बुद्धि न छूटे, वहाँ ठाकुर स्वयं मार्ग बदल देते हैं!

प्रातः जब आचार्य की आँख खुली, तो वे स्वयं को पुरी से सैकड़ों कोस दूर श्रीरंगम में कावेरी तट पर पाकर स्तब्ध रह गए! उन्होंने करबद्ध होकर उत्तर दिशा में पुरी की ओर साष्टांग प्रणाम किया और कबीर साहिब के समरसता विधान को शिरोधार्य किया।
प्रभु, मेरी अज्ञानता क्षमा करें! आपकी पुरी केवल अहैतुकी प्रेम और समरसता की भूमि है। जहाँ कबीर साहिब ने समता की नींव रखी, वहाँ भेद का कोई स्थान नहीं!