प्राचीन भारत का कथा-भूगोल एवं वंश-परम्परा
भारत के अमर कथा-साहित्य, पावन तपोवनों, समृद्ध व्यापारिक राजधानियों और धर्म-रक्षकों का सचित्र परिचय।
अमर कथा-साम्राज्य एवं तपोवन
चन्द्रावती नगरी
मध्य भारत (मालवा)Gupta & Classical Era (~2000 Years BP)
समृद्ध वणिक-राजधानी जहाँ श्रेष्ठि त्रिविक्रम और मदनविनोद का व्यापारिक साम्राज्य स्थापित था, और जहाँ शुक ने प्रभावती को ७० नीति-कथाएँ सुनाईं।
शुक सप्तति के मुख्य पात्र एवं आध्यात्मिक भूमिका
पातिव्रत्य, विवेक, व्यापारिक पुरुषार्थ और दैवी कृपा के शाश्वत प्रतीक।
पारिवारिक एवं दैवी सम्बन्ध संरचना

श्रेष्ठि त्रिविक्रम
चन्द्रावती वणिक-वंश प्रमुख


मदनविनोद एवं प्रभावती
७० रात्रियों का अखण्ड पातिव्रत्य

दिव्य शुक (गन्धर्व)
७० नीति-कथाओं के प्रवर्तक

शुक (दिव्य शुक / गन्धर्व देव)
धर्म-रक्षक एवं ७० नीति-कथाओं के दिव्य प्रवर्तक
दिव्य गन्धर्व जो पातिव्रत्य-रक्षा के ७० रात्रियों के व्रत से शाप-मुक्त हुए
मानव-वाणी, वैदिक मेधा और सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक समझ से सम्पन्न। मदनविनोद के गृह-रक्षण का भार वहन करते हुए, शुक ने ७० रातों तक रोचक नीति-कथाओं से प्रभावती के पातिव्रत्य की रक्षा की।

प्रभावती
चन्द्रावती की कुलीन वणिक-वधू
मदनविनोद की धर्मपत्नी, श्रेष्ठि त्रिविक्रम की कुल-वधू
सौन्दर्य, कुलीनता और विवेक की साक्षात् मूर्ति। पति के विदेश प्रवास काल में प्रलोभनों से घिरे होने पर भी शुक की ज्ञान-कथाओं से प्रेरित होकर पातिव्रत्य धर्म के शिखर पर प्रतिष्ठित हुईं।

मदनविनोद
प्रधान सार्थवाह एवं सामुद्रिक व्यापार-प्रमुख
चन्द्रावती के प्रधान श्रेष्ठि त्रिविक्रम के सुपुत्र
साहसी एवं धर्मनिष्ठ सार्थवाह जिन्होंने अपने कुल की कीर्ति और समृद्धि के लिए ७० रात्रियों की दुर्गम समुद्र-यात्रा सम्पन्न की और अपार विजय के साथ लौटे।

त्रिविक्रम
चन्द्रावती वणिक-मण्डल के कुलवृद्ध
प्राचीन त्रिविक्रम वणिक-वंश के अधिष्ठाता
परम ज्ञानी एवं धर्मात्मा श्रेष्ठि जिन्होंने दिव्य शुक को प्राप्त कर अपने पुत्र को सौंपा, यह जानकर कि सत्संगति और विवेक ही कुल की वास्तविक धरोहर हैं।
