प्रारंभ: भिक्षु का गुप्त रत्न, तांत्रिक षड्यंत्र और महाश्मशान का वचन
The Origin: The Monk's Secret Ruby & The Midnight Oath
दस वर्ष का रहस्य और भिक्षु की भेंट
The Ten-Year Mystery of the Daily Fruit
प्राचीन काल में उज्जयिनी नगरी में चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य राज्य करते थे, जिनका यश, सत्यनिष्ठा और न्याय तीनों लोकों में प्रसिद्ध था।
उज्जयिनी के राजदरबार में प्रजा के प्रत्येक दुख का निवारण धर्मपूर्वक किया जाएगा।

प्रतिदिन प्रातःकाल 'शांतिशील' नाम का एक संन्यासी राजसभा में आता, मौन भाव से राजा को एक फल भेंट करता और बिना कुछ मांगे चुपचाप लौट जाता।
चक्रवर्ती सम्राट का यश युगों-युगों तक अमर रहे।

महाराज विक्रम उस फल को एक साधारण साधु की भेंट समझकर अपने कोषाध्यक्ष मालव्य को सौंप देते, जो उसे भूमिगत कोशागार में रखवा देता।
कोषाध्यक्ष! इस साधु की भेंट को आदरपूर्वक भंडारगृह में सुरक्षित रख दो।

इस प्रकार दिन, महीने और ऋतुएं बीतती गईं। पूरे दस वर्ष (3,650 दिन) तक वह संन्यासी बिना एक दिन चूके नित्य राजदरबार में फल भेंट करता रहा!
वानर का कौतुक और चमत्कारी माणिक्य
The Monkey
एक दिन महाराज विक्रम प्रासाद के झरोखे पर खड़े संन्यासी की भेंट स्वीकार कर रहे थे। तभी एक दरबारी का पालतू वानर रस्सी छुड़ाकर छलांग लगा गया।

वानर ने झपटकर राजा के हाथ से फल छीन लिया और मुंडेर पर बैठकर उसे अपने दांतों से फोड़ डाला!

फल के फटते ही उसमें से एक अत्यंत दुर्लभ, देदीप्यमान रक्त-लाल माणिक्य (रत्न) निकलकर फर्श पर गिरा, जिसकी दिव्य चमक से पूरा प्रासाद जगमगा उठा!
यह क्या विस्मय है! एक साधारण फल के भीतर ऐसा अमूल्य दिव्य रत्न?!

दरबार के जोहरी ने जब उस माणिक्य की परीक्षा की, तो उसने हाथ जोड़कर कहा: 'महाराज! यह तीनों लोकों में दुर्लभ ऐसा महामणिरत्न है जिसका मूल्य संसार का सारा कोष भी नहीं चुका सकता!'
भूमिगत तहखाना और मणियों का पर्वत
The Subterranean Vault & The Mountain of Gems
राजा ने तुरंत कोषाध्यक्ष से पूछा: 'मालव्य! पिछले दस वर्षों में उस संन्यासी द्वारा दिए गए सारे फल कहाँ हैं?'
महाराज! मैंने उन्हें बिना खोले तहखाने के गड्ढे में डाल दिया था। चलिए, चलकर देखते हैं!

महाराज और कोषाध्यक्ष मशालें लेकर राजमहल के सबसे गहरे भूमिगत कोशागार की सीढ़ियाँ उतरे।

तहखाना खोलते ही सबकी आँखें चौंधिया गईं! 3,650 फलों का गूदा सड़कर समाप्त हो चुका था और वहां हज़ारों दिव्य माणिक्यों का जगमगाता हुआ विशाल पर्वत खड़ा था!

कोषाध्यक्ष की निष्कलंक ईमानदारी से प्रसन्न होकर, महाराज विक्रमादित्य ने वह समूचा रत्नों का पर्वत उसी कोषाध्यक्ष को उपहार में दे दिया!
मालव्य! तुम्हारी सत्यनिष्ठा अद्वितीय है। यह सारा रत्न-भंडार तुम्हारा हुआ!
तांत्रिक का गुप्त रहस्य और महाश्मशान का वचन
The Monk
अगले दिन जब संन्यासी पुनः फल लेकर आया, तो विक्रम ने उसका हाथ पकड़ लिया: 'जब तक आप यह नहीं बताएंगे कि एक राजा को ऐसा अपार धन क्यों दे रहे हैं, मैं यह फल स्वीकार नहीं करूँगा!'
संन्यासी! अपना वास्तविक प्रयोजन प्रकट करो!

संन्यासी राजा को एकांत दालान में ले गया और हाथ जोड़कर बोला: 'राजन! मैं शांतिशील नाम का तांत्रिक साधक हूँ। मुझे एक महान सिद्धि प्राप्त करनी है।'

'आने वाली भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी (अमावस) की घोर रात्रि में मैं महाश्मशान में एक महान तांत्रिक अनुष्ठान कर रहा हूँ। उस सिद्धि की रक्षा के लिए मुझे संसार के सबसे निर्भीक चक्रवर्ती वीर की सहायता चाहिए!'
राजन! उस रात्रि यदि आप मेरी वेदी के रक्षक बनेंगे, तो मेरी सिद्धि पूर्ण होगी!

शरणागत और याचक की सहायता करना क्षत्रिय का परम धर्म मानकर, महाराज विक्रमादित्य ने अमावस की आधी रात श्मशान पहुँचने का पवित्र वचन दे दिया!
जाओ संन्यासी! चक्रवर्ती विक्रमादित्य का वचन है—अमावस की मध्यरात्रि मैं अकेला तुम्हारी वेदी पर उपस्थित रहूँगा!
महाश्मशान का भयानक दृश्य और तांत्रिक की आज्ञा
The Horrors of Mahashmashana & The Sorcerer
अमावस की घोर अंधियारी रात आई। मूसलाधार वर्षा, चमकती बिजली, सियारों की डरावनी चीखें और जलती चिताओं की नीली लपटों से महाश्मशान काँप रहा था।

महाराज विक्रमादित्य काले वस्त्र धारण कर, नंगी तलवार हाथ में लिए, बिना किसी भय के अकेले उस पिशाचों से भरे श्मशान में जा पहुँचे।

श्मशान के मध्य, शांतिशील एक नरमुंडों से घिरे रक्त-मंडप में बैठा आहुतियां दे रहा था। राजा को देखकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ।
अहा चक्रवर्ती! आपने अपना वचन निभाया! अब केवल एक अंतिम कार्य शेष है!

तांत्रिक ने दक्षिण दिशा की ओर संकेत किया: 'यहाँ से दो कोस दूर एक विशाल शीशम का वृक्ष है, जिस पर एक शव उल्टा लटक रहा है। उस शव को उतारकर यहाँ मेरी वेदी पर ले आओ!'
शीशम का वृक्ष और बेताल का बंधन
The Gnarled Shinshapa Tree & The Capture of Betal
विक्रम बिना झिझक के घने जंगलों, काँटों और भूत-पिशाचों के भयानक अट्टहासों को चीरते हुए दक्षिण दिशा की ओर बढ़ चले।

सामने शीशम का विशाल प्राचीन वृक्ष दिखा। उसकी एक शाखा से एक भयानक शव रस्सी से उल्टा लटक रहा था, जिसमें एक चालाक बेताल का वास था!

विक्रम ने फुर्ती से वृक्ष पर चढ़कर तलवार के एक ही वार से रस्सी काट दी। शव धड़ाम से ज़मीन पर गिरा और कराहने लगा।

ज्योंही राजा ने उसे उठाना चाहा, शव ज़ोर-ज़ोर से ठहाके मार कर हँसा और बिजली की गति से पुनः पेड़ की शाखा पर जा लटका!
खे-खे-खे! मुझे पकड़ना इतना सरल नहीं है, राजन!
अडिग सम्राट और पच्चीस पहेलियों का चक्रव्यूह
The Unyielding Emperor & The Twenty-Five Riddles Trap
धैर्य के धनी विक्रमादित्य पुनः वृक्ष पर चढ़े, बेताल के केश कसकर पकड़े और उसे खींचकर नीचे ज़मीन पर ले आए।
चाहे तुम सौ बार भागो, मैं तुम्हें तांत्रिक की वेदी तक ले जाकर ही रहूँगा!

राजा ने शव को अपनी चादर से कसकर अपने कंधे पर लाद लिया और बिना एक शब्द बोले शांतिशील की वेदी की ओर कदम बढ़ा दिए।

शव में प्रविष्ट बेताल ने राजा के कान में फुसफुसाया: 'राजन! मार्ग लंबा है। यदि तुमने मार्ग में एक भी शब्द बोला, तो मैं उड़कर पुनः पेड़ पर चला जाऊँगा; और यदि मेरे पूछे प्रश्न का उत्तर जानते हुए भी तुमने मौन साधा, तो तुम्हारा सिर खंड-खंड हो जाएगा!'
सुनो राजन! मार्ग का श्रम मिटाने के लिए यह प्रथम पहेली!

अमावस की घोर अंधियारी रात में, बीहड़ और भयानक श्मशान वन में महाराज विक्रमादित्य बिना थके, दृढ़ संकल्प के साथ पुनः बेताल को पकड़ने चल पड़े।
तुम जितनी बार भागोगे बेताल, मैं उतनी बार आऊँगा—क्षत्रिय अपना वचन कभी नहीं छोड़ता!