सप्तम बेताल: सत्त्वशील और जलमग्न स्वर्ण-नगरी
Sattvasheel & The Sunken Ocean Palace
सातवीं चढ़ाई और निष्ठावान वीर
The Seventh Retrieval & The Noble Warrior
सातवीं बार महाराज विक्रमादित्य ने घोर अंधकार में शीशम के वृक्ष से बेताल को उतारा और कंधे पर लादकर चल पड़े। बेताल ने एक नई गाथा आरंभ की।
राजन! त्याग और स्वामिभक्ति की पराकाष्ठा क्या होती है, सुनो सत्त्वशील की यह अद्भुत गाथा!

राजा श्रीभट्ट के दरबार में सत्त्वशील नाम का एक निर्धन किंतु परम पराक्रमी और निष्ठावान क्षत्रिय वीर सेवा में उपस्थित रहता था।
महाराज! मेरे बाहुबल और निष्ठा पर आपका पूर्ण अधिकार है।

एक बार राजा के कार्य से वह दक्षिण समुद्र के तट पर पहुंचा, जहाँ भयंकर लहरों के बीच एक स्वर्णिम पताका जल के भीतर उठती दिखाई देती थी।
इस अथाह समुद्र के भीतर कौन सा रहस्यमयी संसार छिपा है? मुझे इसका पता लगाना ही होगा!
अथाह सागर में छलांग और स्वर्ण-नगरी
The Fearless Dive & The Sunken City
बिना किसी भय के, सत्त्वशील ने ऊंची चट्टान से गर्जना करते हुए अथाह समुद्र में छलांग लगा दी!
साहसी पुरुष के लिए समुद्र की गहराइयां भी मार्ग बन जाती हैं!

जल के भीतर प्रवेश करते ही समुद्र का जल अमृत के समान शांत और पारदर्शी हो गया। वह गहराई में उतरता चला गया।

समुद्र के तल में उसे एक अलौकिक स्वर्ण-नगरी दिखाई दी, जिसके महल मोतियों, मणियों और मूंगों से जगमगा रहे थे।
यह तो साक्षात् अमरावती से भी अधिक वैभवशाली जलमग्न साम्राज्य है!

वह विस्मय से भरकर मणिमय राजप्रासाद में प्रविष्ट हुआ, जहाँ सुवासित चंदन और दिव्य संगीत गूंज रहा था।
विद्याधरी राजकुमारी और निषिद्ध कक्ष
The Celestial Maiden & The Forbidden Chamber
सिंहासन पर बैठी अलौकिक सुंदरी विद्याधरी राजकुमारी ने सत्त्वशील के अद्वितीय साहस से मुग्ध होकर उसका स्वागत किया।
हे वीर! तुम्हारे इस अद्वितीय साहस ने मुझे वशीभूत कर लिया है। यह साम्राज्य अब तुम्हारा है!

सत्त्वशील उस जलमग्न साम्राज्य का स्वामी बनकर अलौकिक सुख और वैभव का आनंद लेने लगा। राजकुमारी उससे अगाध प्रेम करने लगी।

राजकुमारी ने उसे सावधान किया: 'स्वामी! इस महल के सभी कक्ष आपके हैं, किंतु उस पूर्वी दालान के मायावी चित्र को कभी मत छूना!'
उस चित्र में एक मायावी रहस्य बंधा है, उसे छूते ही हमारा वियोग हो जाएगा!

एक दिन उत्सुकतावश सत्त्वशील उस निषिद्ध कक्ष में गया। उस जीवंत चित्र के सौंदर्य को देखकर जैसे ही उसने उसे स्पर्श किया, चित्र से एक तीव्र प्रकाश फूटा!
यह कैसा अद्भुत चित्र है... आह! यह क्या खिंचाव है?!
तट पर वापसी और राजा का विरह
The Awakening on Shore & The King
क्षण भर में सत्त्वशील उछलकर समुद्र से बाहर उसी रेतीले तट पर आ गिरा! जलमग्न नगरी और राजकुमारी सब ओझल हो चुके थे।
हाय! एक क्षण की भूल ने मुझे उस अलौकिक स्वर्ग से दूर कर दिया!

वह लौटकर अपनी राजधानी आया और उसने बिना कुछ छिपाए अपने राजा श्रीभट्ट को जलमग्न नगरी और विद्याधरी राजकुमारी का सारा वृत्तांत सुनाया।
महाराज! समुद्र के तल में ऐसी दिव्य सुंदरी है जिसके समक्ष देवलोक की अप्सराएं भी फीकी पड़ जाएं!

राजकुमारी के रूप का वर्णन सुनते ही राजा श्रीभट्ट उसके प्रेम में व्याकुल हो उठे और उन्होंने उस कन्या को पाने की तीव्र इच्छा प्रकट की।
सत्त्वशील! यदि मैं उस राजकुमारी के दर्शन न कर सका, तो मेरे इस जीवन का कोई अर्थ नहीं रहेगा!
पुनः समुद्र-यात्रा और सर्वोच्च त्याग
The Second Dive & The Supreme Sacrifice
स्वामी की आज्ञा शिरोधार्य कर, सत्त्वशील राजा को लेकर समुद्र-तट पर पहुंचा और दोनों ने एक साथ गहरे जल में छलांग लगा दी।
महाराज! निर्भय रहिए, मैं आपको साक्षात् जलमग्न स्वर्ण-प्रासाद तक ले चलूंगा!

वे पुनः उसी जगमगाती स्वर्ण-नगरी में पहुंचे। अपने प्रेमी सत्त्वशील को लौट आया देखकर राजकुमारी अत्यंत प्रसन्न हुई।
हे प्राणनाथ! आप पुनः लौट आए! और आपके साथ यह तेजस्वी पुरुष कौन हैं?

राजकुमारी के साक्षात् दर्शन करते ही राजा श्रीभट्ट सुध-बुध खो बैठे और विरह की अग्नि में जलने लगे।

सत्त्वशील ने अपने स्वामी के हृदय का भाव ताड़ लिया। बिना एक क्षण सोचे, उसने अपने ही प्रेम और साम्राज्य का त्याग कर दिया!
राजकुमारी! ये मेरे पूज्य स्वामी राजा श्रीभट्ट हैं। आप इन्हीं के वरमाला पहनाकर इस साम्राज्य को धन्य करें!

सत्त्वशील ने स्वयं खड़े होकर दोनों का विधिपूर्वक विवाह संपन्न कराया और अपने राजा को वह अलौकिक साम्राज्य सौंपकर स्वयं निष्काम भाव से अलग हो गया।
बेताल का यक्ष-प्रश्न और महाराज विक्रम का अमर निर्णय
The Moral Conundrum & Vikram
राजा को सुख और साम्राज्य देकर सत्त्वशील पुनः अपने साधारण जीवन में लौट आया, उसके मन में लेशमात्र भी पश्चाताप या लोभ नहीं था।

कथा रोककर श्मशान के सन्नाटे में बेताल ने राजा विक्रमादित्य से यह गूढ़ यक्ष-प्रश्न पूछा।
बताओ राजन! राजा श्रीभट्ट और वीर सत्त्वशील में से किसका त्याग और बड़प्पन अधिक महान था? उत्तर जानते हुए भी मौन रहे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा!

महाराज विक्रमादित्य ने उत्तर दिया: 'सत्त्वशील का त्याग कहीं अधिक श्रेष्ठ और अद्वितीय था! राजा तो प्रजा और सेवकों से दान-उपहार लेने के अभ्यस्त होते हैं। किंतु एक निर्धन सेवक ने अपने बाहुबल और प्राणों की बाजी लगाकर जो स्वर्ग-तुल्य साम्राज्य और सुंदरी पाई थी, उसे सहर्ष अपने स्वामी को समर्पित कर देना ही सर्वोच्च क्षत्रिय धर्म और निष्कामता की पराकाष्ठा है!'
स्वयं अर्जित सर्वोच्च सुख का सहर्ष और निःस्वार्थ त्याग ही मनुष्य को देवतुल्य बनाता है!

निर्णय सुनते ही राजा का मौन पुनः भंग हो गया! बेताल ठहाका लगाते हुए धुएँ की भांति उड़कर पुनः शीशम के पेड़ पर जा लटका।
अचूक न्याय राजन! सत्त्वशील ही सर्वोच्च वीर है! किंतु तुम्हारा मौन टूटा—और मैं चला! खे-खे-खे!

अमावस की घोर अंधियारी रात में, बीहड़ और भयानक श्मशान वन में महाराज विक्रमादित्य बिना थके, दृढ़ संकल्प के साथ पुनः बेताल को पकड़ने चल पड़े।
तुम जितनी बार भागोगे बेताल, मैं उतनी बार आऊँगा—क्षत्रिय अपना वचन कभी नहीं छोड़ता!