अष्टादश बेताल: माता-पुत्री और पिता-पुत्र का कुल-बंधन
The Intricate Knot of Royal Kinship
अठारहवीं चढ़ाई और विंध्याचल का रहस्य
The Eighteenth Retrieval & The Vindhya Forest
अठारहवीं बार महाराज विक्रमादित्य ने श्मशान भूमि में शीशम के वृक्ष से बेताल को नीचे उतारा और दृढ़ संकल्प के साथ कंधे पर लादकर मौन यात्रा प्रारंभ की। बेताल ने एक विचित्र और अद्वितीय पहेली का आख्यान आरंभ किया।
राजन! संसार में धर्म, संबंध और वंशावली के गणित को चकरा देने वाली यह विचित्र गाथा सुनो—राजा चंद्रसिंह, राजकुमार सिंहविक्रम और दो राजकुमारियों के अद्भुत विवाह की कथा!

मालवा राज्य पर शत्रुओं के आकस्मिक आक्रमण के पश्चात, रानी चंद्रावती और उनकी अति-रूपवती कन्या राजकुमारी लावण्यवती राजमहल से बच निकलकर विंध्याचल के बीहड़ वनों में भटकने लगीं।
माताजी! हमारे कोमल चरण कांटों से छलनी हो गए हैं! हम इस बीहड़ वन में कहाँ शरण पाएंगी?

रानी चंद्रावती ने अपनी पुत्री को ढांढस बंधाया: 'पुत्री! धर्म और ईश्वर पर विश्वास रखो। विधाता ने यदि प्राण बचाए हैं, तो वह आगे का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।'
मृगया पर निकले पिता-पुत्र और पदचिह्न
The Royal Hunters & The Forest Footprints
उसी वन में निकटवर्ती राज्य के प्रतापी राजा चंद्रसिंह और उनके पराक्रमी पुत्र राजकुमार सिंहविक्रम अश्वों पर सवार होकर मृगया कर रहे थे।
पुत्र सिंहविक्रम! देखो, नदी के गीले रेतीले तट पर दो स्त्रियों के ताजे पदचिह्न अंकित हैं!

रेत पर दो स्पष्ट पदचिह्न थे—एक बड़े और सुगठित चरणचिह्न, तथा दूसरा अत्यंत सूक्ष्म, सुकुमार और नन्हें चरणचिह्न!

राजा चंद्रसिंह ने स्वाभाविक अनुमान लगाया कि बड़े पैर माता के होंगे और छोटे पैर सुकुमारी पुत्री के। उन्होंने राजकुमार से एक प्रतिज्ञा की।
पुत्र! यह निश्चित रूप से माता और पुत्री हैं। मैं बड़े पैरों वाली (माता) से विवाह करूँगा, और तुम छोटे सुकुमार पैरों वाली (पुत्री) का पाणिग्रहण करोगे!

राजकुमार सिंहविक्रम ने पिता की आज्ञा को सहर्ष स्वीकार किया और दोनों ने पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए अपने अश्व आगे बढ़ाए।
जैसी आपकी आज्ञा, पिताजी! आपकी यह प्रतिज्ञा हम दोनों के लिए बंधनकारी है!
अशोक वृक्ष के नीचे मिलन और अद्भुत उलटफेर
The Discovery & The Inverted Footprints
घने वन के मध्य, एक विशाल रक्त-अशोक वृक्ष की छाया में उन्हें दोनों राजसी स्त्रियां विश्राम करती हुई मिलीं। उनका तेज और कुलीन सौंदर्य वन में भी दमक रहा था।

किंतु जब राजा और राजकुमार ने उनके चरणों को देखा, तो वे स्तब्ध रह गए! माता चंद्रावती के चरण स्वभाव से ही अत्यंत छोटे, सुकुमार और नन्हें थे; जबकि लंबी-छरहरी पुत्री लावण्यवती के चरण बड़े और सुगठित थे!

प्रतिज्ञा के अनुसार: राजा को बड़े पैरों वाली से (अर्थात पुत्री लावण्यवती से) और राजकुमार को छोटे पैरों वाली से (अर्थात माता चंद्रावती से) विवाह करना था!
पिताजी! विधाता ने हमारे वचनों की कैसी विचित्र परीक्षा ली है! क्या हम अपनी प्रतिज्ञा का पालन करेंगे?

राजा चंद्रसिंह ने दृढ़ता से कहा: 'क्षत्रिय का वचन कभी झूठा नहीं हो सकता। जो वचन हमने दिया है, उसका अक्षरशः पालन होगा!'
वचन ही क्षत्रिय का प्राण है! मैं पुत्री लावण्यवती का और तुम माता चंद्रावती का पाणिग्रहण करोगे!
राजधानी में दोहरे पावन परिणय का उत्सव
The Double Royal Wedding
राजधानी में दोनों दंपतियों का भव्य वैदिक विवाह संपन्न हुआ। राजा चंद्रसिंह ने बड़े पैरों वाली सुंदरी राजकुमारी लावण्यवती से विवाह किया।

वहीं राजकुमार सिंहविक्रम ने छोटे सुकुमार पैरों वाली महारानी चंद्रावती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।

इस प्रकार, पिता की पत्नी (लावण्यवती) पुत्र की पत्नी की पुत्री थी! और पुत्र की पत्नी (चंद्रावती) पिता की पत्नी की माता थी! चारों अत्यंत प्रेम और सम्मान से रहने लगे।

कालान्तर में, दोनों रानियों ने सुंदर और तेजस्वी संतानों को जन्म दिया—राजा और लावण्यवती से पुत्र-पुत्रियां उत्पन्न हुईं, तथा राजकुमार और चंद्रावती से भी कई तेजस्वी संतानें हुईं!
वंशावली का महा-भ्रम और दरबारियों का असमंजस
The Kinship Singularity & The Confounded Scholars
जब नामकरण और वंशावली लिखने की बारी आई, तो राज्य के प्रधान धर्माचार्य, ज्योतिषी और मंत्री सिर पकड़कर बैठ गए! कोई यह स्पष्ट नहीं कर सका कि इन दोनों परिवारों के बच्चे आपस में क्या कहलाएंगे!
हे ईश्वर! राजा की संतान और राजकुमार की संतान के बीच क्या नाता माना जाए?! वे एक साथ भाई, भतीजे, मामा और पौत्र सब कुछ बन रहे हैं!

बच्चे तो आनंद से साथ खेलते थे, किंतु उनके आपसी संबंध का कोई निश्चित नाम संसार की किसी स्मृति या व्याकरण में नहीं मिल रहा था!

राजा के बच्चे: राजकुमार के बच्चों के 'मामा' भी हैं (क्योंकि उनकी नानी चंद्रावती राजकुमार की पत्नी हैं) और 'सौतेले भाई' भी हैं (क्योंकि दोनों के पिता एक ही रक्त के हैं)!

इस प्रकार विंध्य वन के दो पदचिह्नों ने मानव संबंधों का ऐसा अटूट और अनसुलझा ताना-बाना बुन दिया, जिसे कोई भी विद्वान एक शब्द में परिभाषित नहीं कर सकता था!
शीशम वृक्ष पर अंतिम पहेली और विक्रम का अमर निर्णय
The Midnight Shinshapa Riddle & King Vikram
कथा समाप्त कर बेताल ने श्मशान भूमि के सन्नाटे में तीखे स्वर में अपना सबसे जटिल प्रश्न पूछा।
राजन! अब तुम्हारे ज्ञान की सबसे कठिन परीक्षा है! राजा चंद्रसिंह की संतानों और राजकुमार सिंहविक्रम की संतानों का आपस में वास्तविक रिश्ता क्या कहलाएगा? यदि जानते हुए भी मौन रहे, तो तुम्हारा मस्तक तड़पकर चूर-चूर हो जाएगा!

महाराज विक्रमादित्य ने मुस्कुराते हुए पूर्ण धीरता और शास्त्रीय तर्क के साथ उत्तर दिया।
बेताल! यह संबंध किसी एक नाम में नहीं बांधा जा सकता; यह संबंध-शास्त्र की एक 'अद्वितीय द्वैत-संधि' (Kinship Singularity) है!

राजा के पुत्र, राजकुमार के पुत्रों के 'मामा' (Maternal Uncles) हैं क्योंकि वे उनकी माता (लावण्यवती) के भाई हैं; और साथ ही वे उनके 'सौतेले चाचा/भाई' भी हैं! उसी प्रकार राजकुमार के पुत्र, राजा के पुत्रों के 'भांजे' भी हैं और 'भतीजे' भी! यह रक्त और विवाह का पूर्ण चक्र है!

जैसे ही राजा के मुख से सत्य का समाधान निकला, उनका मौन-व्रत पुनः भंग हो गया! बेताल ने कान फाड़ देने वाला अट्टहास किया और राजा के कंधे से उड़कर पुनः शीशम के वृक्ष की शाखाओं में जा बैठा!
अद्भुत मेधा, राजन! कोई अन्य इस चक्रव्यूह को नहीं सुलझा सकता था! किंतु तुम्हारा मौन टूट गया—और मैं चला पुनः अपने वृक्ष पर! खे-खे-खे!

महाराज विक्रमादित्य के मुख पर तनिक भी निराशा न थी। उन्होंने पुनः अपनी तलवार खींची, अपनी कमर कसी और बेताल को पुनः वृक्ष से उतारने के लिए श्मशान के घोर अंधकार में आगे बढ़ गए!
बेताल! तुम्हारी हर पहेली का उत्तर मेरे पास है, और मेरा यह पुरुषार्थ तुम्हें तांत्रिक शांतिशील के पास ले जाकर ही दम लेगा!