एकोनविंशति बेताल: चतुर चोर और निडर राजकुमारी
The Master Thief & The Fearless Princess
उन्नीसवीं चढ़ाई और उज्जयिनी का चतुर चोर
The Nineteenth Retrieval & The Shadow of the Citadel
उन्नीसवीं बार महाराज विक्रमादित्य ने श्मशान भूमि में शीशम के वृक्ष से बेताल को नीचे उतारा और दृढ़ता से अपने कंधे पर लादकर मौन यात्रा पर चल पड़े। बेताल ने एक नई रोमांचक और नैतिक पहेली आरंभ की।
राजन! शौर्य, प्रेम और स्वाभिमान का एक अद्वितीय उदाहरण सुनो—उज्जयिनी के चतुर चोर चंडक और स्वाभिमानी राजकुमारी शशिप्रभा की यह अद्भुत गाथा!

उज्जयिनी नगरी में चंडक नाम का एक असाधारण रूप से निपुण, बुद्धिमान और साहसी चोर रहता था। वह चौंसठ कलाओं और सुरंग-विद्या में निष्णात था।
जो धनी और भ्रष्ट अधिकारी अकाल में प्रजा का अन्न और धन दबाकर बैठे हैं, उनका खजाना रिक्त करना कोई पाप नहीं, बल्कि जन-कल्याण है!

चंडक कभी किसी निर्धन या असहाय को नहीं लूटता था; वह भ्रष्ट सामंतों के तहखानों में सेंध लगाकर सारा धन रात के अंधेरे में भूखी प्रजा की झोपड़ियों में बांट देता था।
राजकोष में सेंध और विश्वासघात
The Citadel Vault Heist & The Treachery
जब राज्य में अकाल का संकट गहराया, तो चंडक ने एक भ्रष्ट राजकोषाध्यक्ष के गुप्त तहखाने में सेंध लगाई और अभेद्य सुरक्षा को धता बताते हुए राजसी तिजोरी खोल दी।

किंतु एक लालची आढ़ती ने सोने के पुरस्कार के लालच में चंडक के गुप्त ठिकाने की सूचना राजसी सैनिकों को दे दी।

सैकड़ों सैनिकों ने चंडक को घेर लिया। उसने अद्भुत वीरता से युद्ध किया, किंतु अंततः लोहे के भारी जालों और शृंखलाओं में जकड़कर उसे बंदी बना लिया गया।

राजा वीरदेव के दरबार में चंडक को प्रस्तुत किया गया। राजा ने उसे राज्य की सुरक्षा में सेंध लगाने के अपराध में सूली पर चढ़ाकर मृत्युदंड देने का कठोर आदेश दिया।
जिसने राजसी दुर्ग की अभेद्यता को तोड़ा, उसे कल प्रातः सूर्योदय के साथ सूली पर चढ़ा दिया जाए!
राजमहल का झरोखा और राजकुमारी का अनुराग
The Royal Balcony & The Princess
जब चंडक को भारी जंजीरों में बांधकर राजमार्ग से कारागार की ओर ले जाया जा रहा था, उसके चेहरे पर भय की एक भी रेखा नहीं थी। वह निर्भय होकर मुस्कुरा रहा था।

राजमहल के ऊंचे झरोखे से राजा की रूपवती कन्या राजकुमारी शशिप्रभा ने उस बंदी को देखा। उसकी निर्भीकता, तेजस्वी नैन और आत्मसम्मान देखकर राजकुमारी का हृदय मुग्ध हो उठा!
जो मृत्यु के साए में भी इतना निर्भय और तेजस्वी है, वह कोई साधारण चोर नहीं हो सकता! ऐसे शूरवीर को मैं सूली पर नहीं मरने दूंगी!

राजकुमारी ने जान लिया कि चंडक ने केवल भूखी प्रजा के लिए यह जोखिम उठाया था। उसने अपनी राजसी पदवी और जीवन की परवाह किए बिना उसे कारागार से मुक्त कराने का प्रण ले लिया।

आधी रात को, राजकुमारी ने एक राजसी पहरेदार का वेश धारण किया, कटार और कारागार की गुप्त कुंजियां लेकर अंधेरे रास्तों से काल-कोठरी की ओर बढ़ गई।
काल-कोठरी में प्रवेश और चोर का स्वाभिमान
The Midnight Dungeon Infiltration & The Code of Honor
राजकुमारी ने चुपके से पहरेदारों को निद्रामग्न कर दिया और चंडक की काल-कोठरी का भारी ताला खोलकर भीतर प्रवेश किया।

शशिप्रभा ने अपना शिरस्त्राण हटाया। उसके स्वर्णिम सौंदर्य और राजसी गरिमा को देखकर चंडक स्तब्ध रह गया!
चंडक! उठो! मैंने बाहर दो तीव्रगामी अश्व तैयार रखे हैं। मैं तुम्हारे साथ इस राज्य की सीमा से दूर भागने के लिए तैयार हूँ!

चंडक ने राजकुमारी के चरणों का स्पर्श किया, किंतु उसने भागने से स्पष्ट इनकार कर दिया!
राजकुमारी! आपके इस दिव्य प्रेम और साहस ने मुझे अमर कर दिया। किंतु यदि मैं आपके साथ भागा, तो संसार आपको एक चोर की संगिनी कहेगा और महाराज का गौरव धूल में मिल जाएगा!

चंडक ने पुनः अपनी बेड़ियों को अपने हाथों में धारण कर लिया। उसने कहा कि वह सूली पर हंसते-हंसते चढ़ जाएगा, किंतु राजकुमारी के पावन चरित्र पर कलंक का एक बिंदु भी नहीं लगने देगा।
मेरा शरीर नश्वर है, किंतु आपका यश और कुल की मर्यादा शाश्वत है! लौट जाइए, देवी!
राज-दरबार में सत्य का प्रकटीकरण और क्षमादान
The King
प्रातःकाल, राजकुमारी शशिप्रभा स्वयं राजा वीरदेव के सम्मुख उपस्थित हुईं और उन्होंने बीती रात की संपूर्ण घटना राजा के समक्ष सत्य-सत्य कह सुनाई।
पिताजी! यदि दंड देना है तो मुझे दीजिए, क्योंकि मैं राजद्रोही बनकर कारागार गई थी! किंतु चंडक ने मुझे ससम्मान लौटाकर आपके कुल के गौरव की रक्षा की है!

राजा वीरदेव यह सुनकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने देखा कि मृत्यु के सम्मुख खड़ा चोर किसी भी कुलीन राजकुमार से अधिक उच्च चरित्र और मर्यादा का धनी था।

राजा वीरदेव ने तुरंत चंडक की बेड़ियां काटने का आदेश दिया। उन्होंने उसका मृत्युदंड रद्द कर दिया और उसके अद्भुत चरित्र के सम्मान में उसे राज्य का प्रमुख रक्षक नियुक्त किया।
जो मृत्यु से नहीं डरा और जिसने मेरी पुत्री की मर्यादा के लिए अपने प्राण दांव पर लगा दिए, वह दंड का नहीं, सर्वोच्च सम्मान का अधिकारी है!

पूरे राज्य में हर्ष की लहर दौड़ गई। चोर कुल में जन्म लेकर भी चंडक ने सिद्ध कर दिया कि मनुष्य का चरित्र उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म और त्याग से महान होता है।
शीशम वृक्ष की पहेली और विक्रम का अमर निर्णय
The Midnight Riddle & King Vikramaditya
कथा समाप्त कर बेताल ने श्मशान की अंधियारी में तीखा प्रश्न उछाला।
राजन! अब न्याय करो! इस कथा में तीनों पात्रों में सबसे अधिक उदात्त और कठिन त्याग किसका था—कारागार में घुसकर राजद्रोह करने वाली राजकुमारी का, मृत्यु के मुंह में रहकर भी राजकुमारी का मान बचाने वाले चोर का, या एक अपराधी को क्षमा कर सम्मान देने वाले राजा का? यदि जानते हुए भी मौन रहे, तो तुम्हारा शीश टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा!

महाराज विक्रमादित्य ने गंभीर वाणी में निष्पक्ष निर्णय सुनाया।
बेताल! इस प्रसंग में निसंदेह चोर चंडक का चरित्र और त्याग सबसे अधिक महान और अद्वितीय था!

राजकुमारी प्रेम और दया के वशीभूत थी; राजा का क्षमादान न्याय और औदार्य था। किंतु चंडक तो मृत्यु के द्वार पर खड़ा था! जीवन की अंतिम आशा और एक सुंदर राजकुमारी का साथ पाकर भी, केवल उस कन्या के सम्मान की रक्षा के लिए मृत्यु का वरण कर लेना—ऐसा त्याग केवल एक महापुरुष ही कर सकता है!

जैसे ही राजा के मुख से सत्य वाणी निकली, उनका मौन टूट गया! बेताल ने भयंकर अट्टहास किया और राजा के कंधे से उड़कर पुनः शीशम के वृक्ष की शाखाओं में जा लटका!
अचूक न्याय, राजन! किंतु वाणी का प्रयोग करते ही तुम्हारा मौन समाप्त हुआ—और मैं चला पुनः अपने वृक्ष पर! पकड़ सको तो पकड़ो! खे-खे-खे!

महाराज विक्रमादित्य ने एक पल भी व्यर्थ नहीं गंवाया। उन्होंने पुनः अपनी तलवार खींची और बेताल को बीसवीं बार नीचे उतारने के लिए दृढ़ कदमों से वृक्ष की ओर बढ़ चले!
बेताल! धर्म और सत्य की विजय होकर रहेगी, और मेरा यह प्रयास निष्फल नहीं जाएगा!