चतुर्दश बेताल: सेठ की कन्या और शूली पर चढ़ा चोर
The Merchant's Daughter & The Condemned Thief
चौदहवीं चढ़ाई और शूली की ओर बढ़ता चोर
The Fourteenth Retrieval & The Defiant Thief
चौदहवीं बार महाराज विक्रमादित्य श्मशान के विकराल सन्नाटे में शीशम के वृक्ष पर चढ़े, बेताल को नीचे उतारा और अपने कंधे पर लादकर मौन भाव से चल पड़े।
राजन! तुम्हारी निष्ठा अडिग है! सुनो, प्रेम, नियति के विचित्र रहस्य और मृत्यु-शय्या पर हँसने-रोने की यह अद्भुत गाथा!

अयोध्या नगरी में रत्नदत्त नामक एक महाधनी श्रेष्ठि की रूपवती कन्या चंद्रावती रहती थी। वह अत्यंत स्वाभिमानी थी और उसने नगर के सभी धनी और सुकुमार युवकों के विवाह-प्रस्तावों को ठुकरा दिया था।

एक दिन राजकोष लूटने वाले एक दुस्साहसी और महाबली चोर को सैनिकों ने बंदी बना लिया और उसे शूली पर चढ़ाने के लिए नगर के मुख्य मार्ग से ले जाने लगे।

झरोखे से देखते ही चंद्रावती उस शृंखलाबद्ध चोर के निर्भीक तेज और अडिग पौरुष पर मोहित हो गई। मृत्यु के सम्मुख भी उसके मुख पर तनिक भय न था। चंद्रावती ने उसी क्षण उसे अपना पति स्वीकार कर लिया।
जो मृत्यु के सामने भी सिंह की भांति सिर उठाकर चलता है, वही मेरा पति बनने योग्य है!
पिता का विलाप और राजा का कठोर न्याय
The Father
चंद्रावती ने पिता के चरणों में गिरकर हठ किया कि यदि उसका विवाह उस चोर से न हुआ, तो वह अपने प्राण त्याग देगी। सेठ रत्नदत्त कन्या के इस विचित्र हठ से व्याकुल हो उठा।
पिताजी! या तो उस वीर पुरुष के प्राण बचाइए, अन्यथा मेरी चिता की तैयारी कीजिए!

सेठ रत्नदत्त ने राजदरबार में जाकर राजा के चरणों में अपना सारा धन, स्वर्ण और मणियों के संदूक उड़ेल दिए और चोर के प्राणों की क्षमा मांगी।
महाराज! मेरी सारी संपत्ति ले लीजिए, किंतु उस चोर को मृत्युदंड से मुक्त कर मेरी कन्या के प्राण बचा लीजिए!

राजा ने धन का प्रलोभन ठुकराते हुए कहा कि राजधर्म और कानून स्वर्ण से नहीं खरीदा जा सकता। महाअपराधी को दंड मिलना ही चाहिए।
श्रेष्ठि! राजधर्म बिकाऊ नहीं है! इस दुष्ट चोर ने राजकोष को लूटा है, इसे शूली पर चढ़ना ही होगा!

सैनिकों ने नगर के बाहर श्मशान के निकट उस चोर को तीक्ष्ण शूली पर चढ़ा दिया। असह्य शारीरिक यंत्रणा सहते हुए भी वह चोर मौन रहा और मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगा।
अमावस की रात और चोर का अश्रु-हास्य
The Midnight Visit & The Mysterious Tears
मध्यरात्रि के घोर अंधकार में, चंद्रावती दुल्हन के लाल जोड़े और स्वर्णाभूषणों से सुसज्जित होकर, हाथ में जल का पात्र लिए निर्भय होकर शूली स्थल पर पहुंची।

चंद्रावती ने शूली पर लटके मरणासन्न चोर के चरणों को छुआ, उसके घावों को धोया और उसे जल पिलाकर घोषणा की कि वह उसे अपना पति मान चुकी है और उसके साथ ही सती होगी।
हे वीर! मैंने तुम्हें मन से अपना पति वरण किया है! मैं तुम्हारे साथ ही इस लोक से परलोक की यात्रा करूँगी!

शूली पर टंगे चोर ने जब उस अनुपम सुंदरी के निष्कलंक प्रेम और अगाध समर्पण को देखा, तो उसकी आंखों से गर्म आंसुओं की धारा बह निकली। वह फूट-फूटकर रोने लगा।

किंतु अश्रु बहाने के ठीक अगले ही क्षण, चोर के मुख पर एक अद्भुत, रहस्यमयी मुस्कान उभरी और वह ठहाका मारकर जोर से हंसा! इसके तुरंत बाद उसने अपने अंतिम प्राण त्याग दिए।
हा... हा... हा! विधाता! तेरी इस लीला का क्या पार है!
सती की चिता और भगवती दुर्गा का वरदान
The Sati Pyre & The Divine Blessing
पति के प्राण त्यागते ही चंद्रावती ने चंदन की लकड़ियों से एक विशाल चिता सजवाई। उसने चोर के शव को शूली से उतरवाया और अंतिम संस्कार की तैयारी की।

दुल्हन के वेश में सजी चंद्रावती चोर के सिर को अपनी गोद में रखकर चिता पर बैठ गई और अग्नि प्रज्वलित करने का आदेश दिया।
हे अग्निदेव! इस नश्वर शरीर को भस्म कर मुझे परलोक में मेरे स्वामी से मिलाओ!

उस कन्या के अद्वितीय प्रेम, अदम्य साहस और पातिव्रत्य से प्रसन्न होकर साक्षात भगवती दुर्गा ज्वालाओं के बीच प्रकट हो गईं और उन्होंने चिता की अग्नि को शांत कर दिया!
पुत्री! तेरे निष्काम प्रेम और अपूर्व साहस ने मुझे प्रसन्न किया! कोई वरदान मांग!

चंद्रावती ने प्रार्थना की कि उसके पति को सदाचारी जीवन के साथ पुनर्जीवन मिले और पिता को पुत्र-रत्न प्राप्त हो। देवी ने तथास्तु कहा और चोर जीवित होकर धर्मात्मा पुरुष बन गया!
भाग्य का खेल और श्मशान की पहेली
The Irony of Fate & The Midnight Riddle
देवी के वरदान से नवजीवन पाकर वह चोर पाप-कर्म त्यागकर एक धर्मनिष्ठ और यशस्वी गृहस्थ बना और दोनों ने सुखपूर्वक धर्म का पालन किया।

संसार में कर्म और नियति का चक्र अद्भुत है—जहां समस्त सांसारिक प्रयास व्यर्थ हो गए, वहां केवल निस्वार्थ प्रेम ने मृत्यु के मुख से जीवन खींच लिया।

श्मशान के घोर सन्नाटे में कथा समाप्त कर बेताल ने राजा विक्रमादित्य से उस रहस्यमयी घटना का गूढ़ मर्म पूछा।

बेताल ने राजा की न्यायबुद्धि को ललकारते हुए प्रश्न किया।
राजन! अब बताओ, शूली पर लटके मरणासन्न चोर ने पहले अश्रु क्यों बहाए और फिर वह अचानक ठहाका मारकर क्यों हंसा?
बेताल का प्रश्न, विक्रम का अमर निर्णय और पलायन
The Riddle, The Verdict, & The Flight
बेताल ने राजा को चेतावनी देते हुए प्रश्न दोहराया।
मृत्यु की घड़ी में उस चोर के रोने और हंसने का वास्तविक कारण क्या था? यदि जानते हुए भी नहीं बताया, तो तुम्हारा सिर फटकर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा!

महाराज विक्रमादित्य ने उत्तर दिया: 'चोर के रोने और हंसने के पीछे मानव-मन और नियति का परम गूढ़ दर्शन छिपा था!'
चोर पहले इसलिए रोया क्योंकि उसने देखा कि यह निष्पाप, रूपवती श्रेष्ठि-कन्या उसके जैसे पापी और मरणासन्न व्यक्ति पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर रही है—किंतु वह शूली पर बंधा हुआ इतना असहाय और निर्धन था कि इस अपूर्व उपकार और असीम प्रेम के बदले में उस कन्या को देने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं था! इस कृतज्ञता और विवशता के भारी दुख से उसकी आंखों में आंसू आ गए! और वह हंसा इसलिए क्योंकि उसने विधि (भाग्य) की विचित्र लीला का अनुभव किया—उसने जीवन भर सुख, धन और प्रेम पाने के लिए चोरी और अपराध किए, जिसके बदले उसे केवल शूली की भयंकर मृत्यु मिली; जबकि मृत्यु के अंतिम क्षण में, बिना किसी प्रयास या छल के, उसे संसार का सबसे पवित्र, दुर्लभ और निष्काम प्रेम अनायास प्राप्त हो गया! भाग्य की इस अद्भुत विडंबना और लीला को देखकर वह हंस पड़ा!

सत्य और मर्मभेदी उत्तर सुनते ही राजा का मौन पुनः भंग हो गया! बेताल गूंजते ठहाके के साथ उड़ा और पुनः शीशम के पेड़ पर जा लटका।
अचूक और मर्मस्पर्शी न्याय, राजन! नियति की विडंबना को तुमने यथार्थ समझा! किंतु तुम्हारा मौन टूटा—और मैं चला! खे-खे-खे!

अमावस की घोर अंधियारी रात में, श्मशान की भयानक शक्तियों की परवाह किए बिना महाराज विक्रमादित्य ने तलवार निकाली और पुनः बेताल को लाने चल पड़े।
बेताल! तुम जितने रहस्य खोलोगे, मैं उतने हल करूँगा—किंतु तुम्हें लेकर ही जाऊँगा!