विंशति बेताल: मृत्यु-वेदी पर हंसने वाला ब्राह्मण बालक
The Brahman Boy Who Laughed at Death
बीसवीं चढ़ाई और वेदी की छाया
The Twentieth Retrieval & The Shadow of the Altar
बीसवीं बार महाराज विक्रमादित्य ने श्मशान भूमि में शीशम के वृक्ष से बेताल को नीचे उतारा और दृढ़तापूर्वक कंधे पर लादकर मौन रूप से आगे बढ़े। बेताल ने अत्यंत मार्मिक और गूढ़ दार्शनिक पहेली आरंभ की।
राजन! संसार के समस्त संबंधों की नश्वरता और आत्म-ज्ञान के चरम रहस्य को प्रकट करने वाली यह कथा सुनो—बलि-वेदी पर मृत्यु के मुख में हंसने वाले उस नन्हें ब्राह्मण बालक की अमर गाथा!

प्राचीन काल में राजा चंद्रप्रभ के राज्य में एक भयानक महामारी और अकाल फैल गया। सहस्रों निर्दोष प्रजाजन काल के गाल में समाने लगे।

जब राजा ने वन में महाकाली के मंदिर में प्रार्थना की, तो एक क्रूर वन-राक्षस ने प्रकट होकर कहा कि यदि सात वर्ष के एक कुलीन ब्राह्मण बालक की स्वेच्छा से बलि दी जाए, तो यह महामारी शांत होगी!
यदि किसी ब्राह्मण बालक की बलि दी जाए जिसे उसके माता-पिता और राजा दोनों ने वेदी पर पकड़ा हो, तभी यह राज्य विनाश से बचेगा!
स्वर्ण का लोभ और माता-पिता का सौदा
The Price of Gold & The Greed of Parents
राजा ने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया: जो माता-पिता राज्य की रक्षा के लिए अपने सात वर्षीय पुत्र को बलि के लिए समर्पित करेंगे, उन्हें सौ समृद्ध गांव और अपार स्वर्ण-मुद्राएं दी जाएंगी।

एक दरिद्र ब्राह्मण और उसकी पत्नी अपार धन के लोभ में अंधा हो गए। उन्होंने अपने तेजस्वी, मासूम और परम निष्पाप सात वर्षीय पुत्र गुणकर को राजा के हाथों बेच दिया!
हमारे पास अन्य संतानें हैं! इस एक बालक के बदले हमारी सात पीढ़ियां राजाओं की भांति राज करेंगी!

बालक गुणकर अत्यंत कोमल, निर्दोष और अलौकिक रूप से शांत था। उसने अपने माता-पिता के इस निर्णय का कोई विरोध नहीं किया, मानो वह नियति के खेल को पहले से जानता हो।
पिताजी, यदि मेरे शरीर से आपका दारिद्र्य मिटता है और राज्य के प्राण बचते हैं, तो मैं सहर्ष चलूंगा।

राजा ने भारी मन से किंतु अपने साम्राज्य की रक्षा के नाम पर उस निर्दोष बालक को स्वीकार कर लिया और मध्यरात्रि में बलि की तैयारी का आदेश दिया।
मध्यरात्रि की भयानक बलि-वेदी
The Midnight Altar of Chandika
मध्यरात्रि की काली निशा में, वन के भीतर स्थित मां चंडिका के प्राचीन मंदिर में रक्त-चंदन और मसान की धूप से बलि-वेदी सजाई गई।

राजपुरोहित ने लाल वस्त्र धारण कर महाभैरव और चंडिका का आह्वान किया और बलि के लिए चमचमाती महा-खड्ग को मंत्रों से अभिमंत्रित किया।
हे देवी! इस पवित्र बालक के रक्त से अपनी तृष्णा शांत करो और राज्य को महामारी से मुक्त करो!

शर्त के अनुसार, बालक के माता-पिता ने आगे बढ़कर अपने ही नन्हें पुत्र के दोनों हाथ और मस्तक को पत्थर की वेदी पर मजबूती से जकड़ लिया ताकि वह हिल न सके!

महाराज चंद्रप्रभ ने आगे बढ़कर बालक के दोनों चरणों को कसकर पकड़ लिया। रक्षक ही भक्षक की भूमिका में उपस्थित थे।
खड्ग की धार पर बालक का दिव्य अट्टहास
The Radiant Laughter at the Edge of the Blade
पुरोहित ने अपनी दोनों भुजाओं से भारी खड्ग को आकाश में उठाया। रक्तपिपासु राक्षस अंधकार में अपनी लाल आंखें चमकाते हुए ग्रास की प्रतीक्षा कर रहा था।

मृत्यु के उस अंतिम क्षण में, जब खड्ग नीचे गिरने ही वाला था, बालक गुणकर ने पहले अपने माता-पिता को देखा, फिर राजा को देखा, और फिर आकाश की ओर देखकर खिलखिलाकर हंस पड़ा!

उसकी हंसी कोई पागलपन की चीख नहीं थी; वह वीणा के मधुर स्वर जैसी, निर्मल, दिव्य और परमानंद से भरी हंसी थी! उस हंसी की गूंज से मंदिर का अंधकार कांप उठा!
हा-हा-हा! अहा! विधाता की कैसी अद्भुत माया है! कितना विचित्र है यह संसार!

उस अलौकिक हंसी को सुनकर पुरोहित के हाथ से खड्ग छूटकर जमीन पर गिर पड़ा! माता-पिता की पकड़ ढीली हो गई और राजा चंद्रप्रभ स्तब्ध होकर बालक के सामने घुटनों पर बैठ गए!
बलि का स्थगन और राजा की व्याकुलता
The Miracle & The Halting of the Sacrifice
राजा चंद्रप्रभ ने दोनों हाथ जोड़कर बालक के चरणों में मस्तक रख दिया और व्याकुल होकर पूछा।
हे दिव्य बालक! तुम कोई साधारण मनुष्य नहीं हो! मृत्यु के इस दारुण क्षण में तुम्हारे हंसने का क्या रहस्य था? कृपया मुझे ज्ञान दो!

बालक गुणकर ने मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया: 'राजन! जब संकट आता है, तो बालक माता-पिता की शरण में जाता है। यदि माता-पिता विपत्ति डालें, तो वह राजा के पास न्याय के लिए जाता है। और यदि राजा भी प्राण लेने लगे, तो मनुष्य ईश्वर और देवताओं की शरण लेता है!'

'किंतु आज यहाँ देखो! मेरे माता-पिता ने स्वर्ण के लोभ में मुझे बेचकर स्वयं मेरे हाथ पकड़ लिए! रक्षा करने वाले राजा ने अपनी शक्ति के लिए मेरे पैर जकड़ लिए! और जिस देवी की मूर्ति है, वह मेरा मांस खाने की प्रतीक्षा कर रही है! जब सब रक्षक ही भक्षक बन गए, तो मुझे संसार की इस खोखली माया और विधाता की लीला पर हंसी आ गई!'

बालक के इस ज्ञान-वचन को सुनकर राक्षस भयभीत होकर भाग गया और उसकी छाया विलीन हो गई। राजा ने बलि तुरंत रोक दी, राज्य की महामारी स्वतः समाप्त हो गई और बालक को गुरु का सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ।
अमावस्या की पहेली और विक्रम का अमर निर्णय
The Midnight Riddle & King Vikramaditya
कथा समाप्त कर बेताल ने श्मशान के सन्नाटे में अपना सबसे गंभीर और गूढ़ प्रश्न पूछा।
राजन! अब तुम्हारे तत्व-ज्ञान की परीक्षा है! मृत्यु के मुंह में खड़े होकर उस नन्हें बालक के हंसने का वास्तविक, गूढ़ कारण क्या था? उसने मृत्यु के भय को कैसे जीत लिया? यदि जानते हुए भी मौन रहे, तो तुम्हारा मस्तक तड़पकर शत-खंड हो जाएगा!

महाराज विक्रमादित्य ने परम शांत और गंभीर वाणी में अपना अमर निर्णय सुनाया।
बेताल! वह बालक इसलिए हंसा क्योंकि उस क्षण उसे संसार की संपूर्ण 'माया' और संबंधों के झूठेपन का प्रत्यक्ष साक्षात्कार हो गया!

जब मनुष्य के सारे सांसारिक सहारे—माता-पिता का स्नेह, राजा का न्याय और देवताओं की कृपा—एक साथ स्वार्थ और रक्तपिपासा में विलीन हो गए, तो बालक समझ गया कि यह संसार केवल स्वार्थ का रंगमंच है। उसने जान लिया कि देह नश्वर है किंतु आत्मा अमर और अजर है! विधाता की इस विचित्र विडंबना और आत्म-मुक्ति के आनंद में ही वह अट्टहास कर उठा!

जैसे ही राजा के मुख से यह परम सत्य निर्णय निकला, उनका मौन पुनः भंग हो गया! बेताल ने कान फाड़ देने वाला अट्टहास किया और राजा के कंधे से उड़कर पुनः शीशम के वृक्ष की शाखाओं में जा लटका!
परम ज्ञानी राजन! तुम्हारे विवेक की कोई तुलना नहीं! किंतु मौन टूटते ही मैं मुक्त हुआ—और मैं चला पुनः अपने वृक्ष पर! पकड़ सको तो पकड़ो! खे-खे-खे!

महाराज विक्रमादित्य के मुख पर तनिक भी थकान या क्षोभ नहीं था। उन्होंने अपनी चमचमाती तलवार खींची, अपनी कटार कसी और इक्कीसवीं बार बेताल को वश में करने के लिए श्मशान के घने अंधकार में आगे बढ़ गए!
बेताल! सत्य का मार्ग कठिन हो सकता है, किंतु मेरा संकल्प मृत्यु से भी परे है!