दशम बेताल: मदनसेना और चोर का धर्म
Madansena & The Robber's Honor
दसवीं चढ़ाई और सत्य-वचन
The Tenth Retrieval & The Vow of Truth
दसवीं बार महाराज विक्रमादित्य ने श्मशान भूमि में शीशम के वृक्ष से बेताल को उतारा और कंधे पर लादकर मौन भाव से चल पड़े। बेताल ने एक नई अमर गाथा आरंभ की।
राजन! सत्य, त्याग और शील की अनोखी परीक्षा इस कथा में है, सुनो मदनसेना और चोर के धर्म की यह गाथा!

वर्धमान नगरी के एक श्रेष्ठि की रूपवती और सुशील कन्या थी—मदनसेना। वह अपनी सुंदरता के साथ-साथ सत्यनिष्ठा और पावन चरित्र के लिए जानी जाती थी।

विवाह से पूर्व, नगर के एक धनी युवक धर्मदत्त ने मदनसेना से अपने अगाध प्रेम का निवेदन किया और उसके बिना जीवित न रहने की बात कही।
मदनसेना! यदि तुम मेरी न हुई, तो मैं विरह में अपने प्राण त्याग दूँगा!

मदनसेना ने उसके प्राण बचाने के लिए वचन दिया: 'मेरा विवाह समुद्रदत्त से तय हो चुका है, किंतु मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि विवाह की पहली रात, पति से मिलने से पूर्व मैं तुमसे मिलने अवश्य आऊँगी।' धर्मदत्त शांत हो गया।
मेरा यह सत्य-वचन है—विवाह की प्रथम रात्रि मैं तुमसे मिलने आऊँगी, तब तक धैर्य धरो!
शुभ विवाह और सुहागरात का सत्य-कथन
The Wedding & The Midnight Confession
यथासमय मदनसेना का विवाह कुलीन और सदाचारी सेठ समुद्रदत्त के साथ बड़े धूमधाम से संपन्न हुआ।

सुहागरात को फूलों से सजे कक्ष में जब पति समुद्रदत्त पास आया, तो मदनसेना कांपते हुए फूट-फूट कर रोने लगी और दूर हट गई।
प्रिये! इस शुभ रात्रि में तुम्हारे इन आंसुओं का क्या कारण है?

मदनसेना ने हाथ जोड़कर विवाह से पूर्व धर्मदत्त को दिए गए सत्य-वचन की पूरी बात निष्कपट भाव से कह सुनाई: 'स्वामी! यदि आप आज्ञा दें, तो मैं अपना वचन पूरा कर आऊँ!'
स्वामी! सत्य की रक्षा के लिए मुझे अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने की आज्ञा दीजिए!

पति समुद्रदत्त ने मन के संकोच और ईर्ष्या को जीतकर उदारतापूर्वक कहा: 'सत्य ही धर्म का मूल है। यदि तुमने वचन दिया है, तो जाओ और अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करो!'
सत्य-वचन कभी भंग नहीं होना चाहिए। जाओ प्रिये, अपना प्रण पूरा कर सकुशल लौटो!
घोर वन की यात्रा और डाकू का सामना
The Midnight Forest & The Robber
गहरी अमावस की रात, दुल्हन के संपूर्ण स्वर्णाभूषणों और लाल रेशमी जोड़े में सजी मदनसेना अकेली घने अंधकारमय जंगल के मार्ग से चल पड़ी।

अचानक एक खूंखार डाकू हाथ में कटार लिए झाड़ियों से कूदा और मदनसेना की बांह पकड़कर उसके आभूषण लूटने और उस पर कुदृष्टि डालने लगा।
अहा! आधी रात को यह स्वर्णिम अप्सरा इस निर्जन वन में कहां जा रही है?! सब आभूषण मुझे दे!

मदनसेना बिना भयभीत हुए बोली: 'भ्राता! मुझे मत रोको। मैं अपने दिए वचन को निभाने धर्मदत्त के पास जा रही हूँ। वचन पूरा कर मैं स्वयं तुम्हारे पास लौट आऊँगी, तब तुम मेरे आभूषण और शरीर जो चाहो ले लेना!'
मैं सत्य की शपथ लेती हूँ—धर्मदत्त से मिलकर मैं स्वयं लौटकर तुम्हारे पास आऊँगी!

एक अबला स्त्री की ऐसी अलौकिक सत्यनिष्ठा और निर्भीकता देखकर डाकू का कठोर हृदय पिघल गया। उसने कटार नीची कर ली और उसे जाने दिया।
तेरी सत्यनिष्ठा देखकर मेरा पाषाण हृदय भी झुक गया! जा बहन, अपना वचन पूरा कर!
धर्मदत्त का पश्चाताप और वासना-त्याग
Dharmadatta
मदनसेना आधी रात को धर्मदत्त के भवन में पहुँची और उसके सामने खड़ी हो गई: 'धर्मदत्त! मैं अपने दिए वचन के अनुसार तुम्हारे समक्ष उपस्थित हूँ।'

धर्मदत्त ने जब सुना कि उसके पति ने सत्य की रक्षा हेतु स्वयं उसे भेजा है, तो वह लज्जा और पश्चाताप की अग्नि में जलने लगा।
तुम्हारे पति का त्याग और तुम्हारी सत्यनिष्ठा देखकर मेरी वासना भस्म हो गई है देवी!

धर्मदत्त ने हाथ जोड़कर मदनसेना के चरण स्पर्श किए और उसे अपनी धर्म-बहन मानकर ससम्मान विदा किया।
हे सती! तुम साक्षात् देवी हो! अपने पति के घर ससम्मान लौट जाओ!

मदनसेना ने धर्मदत्त को धन्यवाद दिया और अपने दूसरे वचन की रक्षा के लिए पुनः उसी भयानक जंगल की ओर मुड़ गई जहाँ डाकू प्रतीक्षा कर रहा था।
डाकू का हृदय-परिवर्तन और पावन मिलन
The Robber
मदनसेना उसी पेड़ के नीचे लौटी और डाकू से कहा: 'भाई! मैंने अपना वचन पूरा कर लिया है। अब तुम मुझे लूट सकते हो या मार सकते हो!'
मैं अपनी प्रतिज्ञा अनुसार तुम्हारे समक्ष उपस्थित हूँ!

डाकू की आँखों से अश्रु बहने लगे। उसने मदनसेना के एक भी आभूषण को नहीं छुआ, अपनी पापी वृत्ति त्याग दी और स्वयं तलवार लेकर पहरा देते हुए मदनसेना को उसके पति के घर तक सुरक्षित पहुँचाया!
बहन! तेरे सत्य ने मुझे पाप से मुक्त कर दिया! मैं तुझे सुरक्षित तेरे घर पहुँचाऊँगा!

घर लौटकर जब मदनसेना ने पति को सारी गाथा सुनाई, तो समुद्रदत्त ने गर्व और असीम प्रेम से अपनी सत्यव्रती पत्नी को गले लगा लिया।

तीनों पुरुषों ने अद्वितीय त्याग का परिचय दिया था—पति ने पत्नी को जाने दिया, प्रेमी ने वासना त्यागी, और डाकू ने धन और काम का लोभ छोड़ दिया।
बेताल का यक्ष-प्रश्न और महाराज विक्रम का अमर निर्णय
The Moral Conundrum & Vikram
कथा समाप्त कर बेताल ने श्मशान के सन्नाटे में राजा विक्रमादित्य से प्रश्न किया।
बताओ राजन! पति, प्रेमी और चोर—इन तीनों में सबसे बड़ा और सच्चा त्याग किसका था? उत्तर जानते हुए मौन रहे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा!

महाराज विक्रमादित्य ने उत्तर दिया: 'चोर का त्याग ही संसार में सर्वश्रेष्ठ और महानतम था! पति समुद्रदत्त और प्रेमी धर्मदत्त दोनों कुलीन, सुसंस्कृत और समाज में प्रतिष्ठित थे—उनका आचरण उनकी कुलीन मर्यादा और लोक-लाज के अनुकूल था। किंतु चोर की तो आजीविका और स्वभाव ही पाप, लूट और काम-वासना था! उस पापी डाकू ने सुनसान जंगल में अकेले मिली सुंदरी और उसके स्वर्ण का लोभ केवल 'सत्य' के प्रति श्रद्धा के कारण त्याग दिया—अतः अपनी स्वाभाविक दुष्ट प्रवृत्ति को जीतकर सत्य के आगे झुकना ही संसार का सर्वोच्च त्याग है!'
अपनी जन्मजात पापी और क्रूर वृत्ति को जीतकर सत्य के सम्मुख नतमस्तक होना ही सर्वोच्च नैतिक विजय है!

निर्णय सुनते ही राजा का मौन पुनः भंग हो गया! बेताल ठहाका लगाते हुए धुएँ की भांति उड़कर पुनः शीशम के पेड़ पर जा लटका।
अचूक न्याय, राजन! चोर का त्याग ही महानतम है! किंतु तुम्हारा मौन टूटा—और मैं चला! खे-खे-खे!

अमावस की घोर अंधियारी रात में, बीहड़ और भयानक श्मशान वन में महाराज विक्रमादित्य बिना थके, दृढ़ संकल्प के साथ पुनः बेताल को पकड़ने चल पड़े।
तुम जितनी बार भागोगे बेताल, मैं उतनी बार आऊँगा—क्षत्रिय अपना वचन कभी नहीं छोड़ता!