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षष्ठ बेताल: मदनसुन्दरी और सिरों की अदला-बदली

बेताल पच्चीसी (सोमदेव भट्ट कृत)• katha

षष्ठ बेताल: मदनसुन्दरी और सिरों की अदला-बदली

The Mystery of the Transposed Heads

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दृश्य 1

छठी चढ़ाई और शुभ विवाह

The Sixth Retrieval & The Auspicious Wedding
King Vikramaditya climbing down the gnarled Shinshapa tree carrying Betal on his back
Betal
राजन! मनुष्य की वास्तविक पहचान कहाँ बसती है—मस्तक में या देह में? सुनो गौरी मंदिर की यह अद्भुत कथा!

छठी बार महाराज विक्रमादित्य ने श्मशान भूमि में शीशम के वृक्ष से बेताल को उतारा और कंधे पर लादकर चल पड़े। बेताल ने एक नया धर्मसंकट प्रस्तुत किया।

Betal

राजन! मनुष्य की वास्तविक पहचान कहाँ बसती है—मस्तक में या देह में? सुनो गौरी मंदिर की यह अद्भुत कथा!

Panel 1
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Dhavala and Madanasundari taking the sacred pheras around the Agni fire in Shobhavati
धवल
मदनसुन्दरी! तुम्हारे आगमन से मेरा जीवन धन्य और पूर्ण हो गया है।

शोभावती नगरी के सुशील युवक धवल का विवाह रूपवती और गुणवती कन्या मदनसुन्दरी से वैदिक विधि-विधान से संपन्न हुआ।

धवल

मदनसुन्दरी! तुम्हारे आगमन से मेरा जीवन धन्य और पूर्ण हो गया है।

Panel 2
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Shreedhara arriving with festive trays to invite Dhavala and Madanasundari
श्रीधर
भ्राता धवल! हमारे माता-पिता आप दोनों के आगमन की अत्यंत उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं!

कुछ समय पश्चात मदनसुन्दरी का भाई श्रीधर ससुराल आया और अपनी बहन तथा बहनोई को वार्षिक कुलोत्सव हेतु अपने घर आमंत्रित किया।

श्रीधर

भ्राता धवल! हमारे माता-पिता आप दोनों के आगमन की अत्यंत उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं!

Panel 3
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The party traveling by covered cart through scenic ancient forest road
मदनसुन्दरी
अपने पति और स्नेही भाई के साथ यह यात्रा मेरे हृदय को अत्यंत आनंद दे रही है।

तीनों प्रसन्नचित्त होकर यात्रा पर निकल पड़े। मार्ग में वन की सुंदरता और परस्पर वार्तालाप से मार्ग सुगम हो गया।

मदनसुन्दरी

अपने पति और स्नेही भाई के साथ यह यात्रा मेरे हृदय को अत्यंत आनंद दे रही है।

Panel 4
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दृश्य 2

माता गौरी का धाम और भावावेश

The Shrine of Devi Gauri & The Ecstatic Devotion
Sighting the ancient stone temple of Goddess Gauri enfolded in sprawling banyan roots
धवल
देखो! यह माता गौरी का पावन धाम है। नगर में प्रवेश से पूर्व हमें माँ के चरणों में शीश नवाना चाहिए।

मार्ग में उन्हें विशाल बरगद के वृक्षों से घिरा हुआ माता गौरी का एक अत्यंत प्राचीन और भव्य मंदिर दिखाई दिया।

धवल

देखो! यह माता गौरी का पावन धाम है। नगर में प्रवेश से पूर्व हमें माँ के चरणों में शीश नवाना चाहिए।

Panel 5
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Dhavala standing alone inside the lamp-lit basalt inner sanctum bowing before Goddess Gauri
धवल
हे जगदम्बे! हे कल्याणी! इस संसार का कल्याण करने वाली माँ, इस दास की भक्ति स्वीकार करो!

पत्नी और साले को बाहर रथ के पास छोड़कर धवल अकेला मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर गया।

धवल

हे जगदम्बे! हे कल्याणी! इस संसार का कल्याण करने वाली माँ, इस दास की भक्ति स्वीकार करो!

Panel 6
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Dhavala gazing at the heavy ceremonial sacrifice sword on the temple altar
धवल
माँ! मैं किसी निरीह पशु की नहीं, अपने ही प्राणों की आहुति आपके श्रीचरणों में अर्पित करता हूँ!

अगाध भक्ति के भावातिरेक में धवल ने सोचा: 'लोग पशुओं की तुच्छ बलि देते हैं, किंतु मैं अपना यह नश्वर शरीर ही माँ के चरणों में समर्पित क्यों न कर दूँ?'

धवल

माँ! मैं किसी निरीह पशु की नहीं, अपने ही प्राणों की आहुति आपके श्रीचरणों में अर्पित करता हूँ!

Panel 7
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Dhavala swinging the heavy sacrificial sword severing his own neck before Goddess Gauri
धवल
जय माँ भवानी! मेरी यह अंतिम आहुति स्वीकार हो!

दृढ़ संकल्प के साथ धवल ने मंदिर के खड्ग से एक ही झटके में अपना मस्तक काटकर देवी के चरणों में अर्पित कर दिया और निष्प्राण होकर गिर पड़ा।

धवल

जय माँ भवानी! मेरी यह अंतिम आहुति स्वीकार हो!

Panel 8
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दृश्य 3

शोक और दूसरा आत्मबलिदान

The Chain of Sacrifice & The Descent of Grief
Shreedhara pacing anxiously outside before stepping into the temple
श्रीधर
बहन, तुम यहीं ठहरो। मैं देखकर आता हूँ कि भाई धवल को इतनी देर क्यों हो रही है।

जब बहुत देर तक धवल बाहर नहीं लौटा, तो चिंतित होकर श्रीधर उसे देखने के लिए मंदिर के भीतर गया।

श्रीधर

बहन, तुम यहीं ठहरो। मैं देखकर आता हूँ कि भाई धवल को इतनी देर क्यों हो रही है।

Panel 9
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Shreedhara recoiling in utter horror discovering Dhavala's headless body in pools of blood
श्रीधर
हे ईश्वर! यह क्या अनर्थ हो गया! भाई धवल ने अपने ही हाथों यह क्या कर डाला?!

गर्भगृह में प्रवेश करते ही श्रीधर सन्न रह गया—उसने अपने प्रिय बहनोई का कटा हुआ मस्तक और लहूलुहान देह वेदी पर पड़े देखे।

श्रीधर

हे ईश्वर! यह क्या अनर्थ हो गया! भाई धवल ने अपने ही हाथों यह क्या कर डाला?!

Panel 10
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Shreedhara kneeling with the bloody sword in tears terrified of disgrace and grief
श्रीधर
मैं अपनी विधवा बहन और संसार को क्या मुँह दिखाऊँगा?! भाई, मैं भी तुम्हारे पीछे आता हूँ!

गहन शोक और इस लोक-लाज के भय से कि लोग उस पर धन के लिए बहनोई की हत्या का कलंक लगाएंगे, श्रीधर ने भी प्राण त्यागने का निश्चय किया।

श्रीधर

मैं अपनी विधवा बहन और संसार को क्या मुँह दिखाऊँगा?! भाई, मैं भी तुम्हारे पीछे आता हूँ!

Panel 11
•
Shreedhara severing his own neck falling beside Dhavala before the altar

उसी खड्ग से श्रीधर ने भी अपना मस्तक काट लिया और उसका शरीर भी धवल के शरीर के समीप वेदी पर निष्प्राण गिर पड़ा।

Panel 12
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दृश्य 4

मदनसुन्दरी का विलाप और देवी का प्राकट्य

Madanasundari
Madanasundari stepping into the dim incense-filled sanctum clutching her veil in dread
मदनसुन्दरी
स्वामी? भैया? आप दोनों इतनी देर से मौन क्यों हैं...?

अत्यधिक विलंब और सन्नाटे से भयभीत होकर मदनसुन्दरी काँपते चरणों से मंदिर के भीतर पहुँची।

मदनसुन्दरी

स्वामी? भैया? आप दोनों इतनी देर से मौन क्यों हैं...?

Panel 13
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Madanasundari collapsing between the two decapitated corpses in agonizing tears
मदनसुन्दरी
हा विधाता! एक ही पल में मेरा सर्वस्व लुट गया! मेरे किस पाप का यह भयानक दंड है?!

सामने का भयानक दृश्य देखकर उसका कलेजा फट गया—पति और सहोदर भाई दोनों के कटे हुए सिर रक्त में डूबे पड़े थे।

मदनसुन्दरी

हा विधाता! एक ही पल में मेरा सर्वस्व लुट गया! मेरे किस पाप का यह भयानक दंड है?!

Panel 14
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Madanasundari tying her silk saree to the banyan branch preparing to hang herself
मदनसुन्दरी
हे माता! यदि इस लोक में मुझे इनका साथ न मिला, तो परलोक में मेरी आत्मा को इनसे मिला दो!

असहनीय शोक से व्याकुल होकर पतिव्रता मदनसुन्दरी ने अपनी रेशमी साड़ी से फंदा बनाया और अपने प्राण त्यागने को तत्पर हुई।

मदनसुन्दरी

हे माता! यदि इस लोक में मुझे इनका साथ न मिला, तो परलोक में मेरी आत्मा को इनसे मिला दो!

Panel 15
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Goddess Gauri manifesting in divine four-armed golden radiance halting the noose
भगवती गौरी
रुक जा पुत्री! मैं तेरे सतीत्व और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। इन दोनों के कटे मस्तक धड़ों से जोड़, ये पुनः जीवित हो उठेंगे!

मदनसुन्दरी के अटूट पातिव्रत्य और भक्ति से प्रसन्न होकर साक्षात् भगवती गौरी दिव्य ज्योतिर्मय रूप में प्रकट हुईं।

भगवती गौरी

रुक जा पुत्री! मैं तेरे सतीत्व और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। इन दोनों के कटे मस्तक धड़ों से जोड़, ये पुनः जीवित हो उठेंगे!

Panel 16
•
दृश्य 5

सिरों की अदला-बदली और पुनर्जीवन

The Fateful Transposition & The Awakening
In frantic trembling haste Madanasundari attaches the severed heads to the wrong necks
मदनसुन्दरी
हे दयामयी माँ! अपनी कृपा से इनके प्राण लौटा दीजिए!

अत्यधिक घबराहट, हड़बड़ाहट और आँसुओं के धुंधलके में मदनसुन्दरी से भारी भूल हो गई—उसने पति का सिर भाई के धड़ पर और भाई का सिर पति के धड़ पर रख दिया!

मदनसुन्दरी

हे दयामयी माँ! अपनी कृपा से इनके प्राण लौटा दीजिए!

Panel 17
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Both bodies awaken in golden light sitting up whole and unharmed
पुनर्जीवित युवक
माँ भवानी की असीम कृपा से हम पुनः जीवित हो गए!

भगवती के वरदान से दोनों शरीरों में प्राणों का संचार हुआ। घाव मिट गए और दोनों युवक ऐसे उठ खड़े हुए जैसे किसी गहरी नींद से जागे हों!

पुनर्जीवित युवक

माँ भवानी की असीम कृपा से हम पुनः जीवित हो गए!

Panel 18
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The two men looking at their own hands and bodies in utter bewilderment at their transposed heads
पति का मस्तक
मेरा मस्तिष्क, स्मृति और चेतना धवल की है—किंतु यह शरीर तो मेरे साले श्रीधर का है!

किंतु होश आते ही वे दोनों और मदनसुन्दरी स्तब्ध रह गए—सिरों की अदला-बदली हो चुकी थी! मदनसुन्दरी अपनी भूल पर काँप उठी।

पति का मस्तक

मेरा मस्तिष्क, स्मृति और चेतना धवल की है—किंतु यह शरीर तो मेरे साले श्रीधर का है!

Panel 19
•
दृश्य 6

पहचान का महाविवाद और महाराज विक्रम का अमर निर्णय

The Conundrum of Identity & Vikram
Both hybrid men claiming Madanasundari's hand with equal conviction before elders
दोनों युवक
धवल का सिर: 'मेरी आत्मा और बुद्धि ने तुमसे विवाह किया है!' • धवल का धड़: 'मेरी इस देह और हाथ ने अग्नि के सात फेरे लिए हैं!'

दोनों में भीषण धर्मसंकट छिड़ गया—मस्तक वाला बोला 'मैं धवल हूँ क्योंकि मेरी चेतना धवल की है', जबकि धड़ वाला बोला 'मैं धवल हूँ क्योंकि यह देह धवल की है!'

दोनों युवक

धवल का सिर: 'मेरी आत्मा और बुद्धि ने तुमसे विवाह किया है!' • धवल का धड़: 'मेरी इस देह और हाथ ने अग्नि के सात फेरे लिए हैं!'

Panel 20
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In the midnight forest Betal leaning close to Vikramaditya's ear posing the profound riddle
Betal
बताओ राजन! इन दोनों में से मदनसुन्दरी का वास्तविक और धर्मसम्मत पति कौन है? उत्तर जानते हुए भी मौन रहे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा!

श्मशान के अंधकार में बेताल ने कथा रोककर न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य से यह गूढ़ यक्ष-प्रश्न पूछा।

Betal

बताओ राजन! इन दोनों में से मदनसुन्दरी का वास्तविक और धर्मसम्मत पति कौन है? उत्तर जानते हुए भी मौन रहे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा!

Panel 21
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Heroic close-up of Emperor Vikramaditya declaring the head as the supreme ruler of the body
King Vikramaditya
शास्त्रों में मस्तक को 'उत्तमांग' अर्थात् समस्त अंगों में प्रधान और स्वामी माना गया है। बुद्धि, ज्ञान, संस्कार और चेतना का वास मस्तक में ही होता है। धड़ तो केवल उसका आज्ञाकारी साधन है। अतः जिस शरीर पर पति का मस्तक लगा है, वही मदनसुन्दरी का सच्चा और धर्मसम्मत पति है!

धर्म और न्याय से बंधे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने अपने मौन को तोड़कर शास्त्रों के आधार पर अकाट्य निर्णय दिया।

King Vikramaditya

शास्त्रों में मस्तक को 'उत्तमांग' अर्थात् समस्त अंगों में प्रधान और स्वामी माना गया है। बुद्धि, ज्ञान, संस्कार और चेतना का वास मस्तक में ही होता है। धड़ तो केवल उसका आज्ञाकारी साधन है। अतः जिस शरीर पर पति का मस्तक लगा है, वही मदनसुन्दरी का सच्चा और धर्मसम्मत पति है!

Panel 22
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Betal laughing with spectral glee dissolving into smoke soaring back to the Shinshapa tree
Betal
अद्भुत न्याय, राजन! मस्तक ही देह का स्वामी है! किंतु तुम्हारा मौन टूट गया—और मैं चला पुनः अपने पेड़ पर! खे-खे-खे!

निर्णय सुनते ही राजा का मौन पुनः भंग हो गया! बेताल विकराल ठहाका लगाते हुए धुएँ की भांति उड़कर पुनः शीशम के पेड़ पर जा लटका।

Betal

अद्भुत न्याय, राजन! मस्तक ही देह का स्वामी है! किंतु तुम्हारा मौन टूट गया—और मैं चला पुनः अपने पेड़ पर! खे-खे-खे!

Panel 23
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Emperor Vikramaditya standing resolute in the dark moonless Amavasya jungle turning back to retrieve Betal
King Vikramaditya
तुम जितनी बार भागोगे बेताल, मैं उतनी बार आऊँगा—क्षत्रिय अपना वचन कभी नहीं छोड़ता!

अमावस की घोर अंधियारी रात में, बीहड़ और भयानक श्मशान वन में महाराज विक्रमादित्य बिना थके, दृढ़ संकल्प के साथ पुनः बेताल को पकड़ने चल पड़े।

King Vikramaditya

तुम जितनी बार भागोगे बेताल, मैं उतनी बार आऊँगा—क्षत्रिय अपना वचन कभी नहीं छोड़ता!

Panel 24
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