षष्ठ बेताल: मदनसुन्दरी और सिरों की अदला-बदली
The Mystery of the Transposed Heads
छठी चढ़ाई और शुभ विवाह
The Sixth Retrieval & The Auspicious Wedding
छठी बार महाराज विक्रमादित्य ने श्मशान भूमि में शीशम के वृक्ष से बेताल को उतारा और कंधे पर लादकर चल पड़े। बेताल ने एक नया धर्मसंकट प्रस्तुत किया।
राजन! मनुष्य की वास्तविक पहचान कहाँ बसती है—मस्तक में या देह में? सुनो गौरी मंदिर की यह अद्भुत कथा!

शोभावती नगरी के सुशील युवक धवल का विवाह रूपवती और गुणवती कन्या मदनसुन्दरी से वैदिक विधि-विधान से संपन्न हुआ।
मदनसुन्दरी! तुम्हारे आगमन से मेरा जीवन धन्य और पूर्ण हो गया है।

कुछ समय पश्चात मदनसुन्दरी का भाई श्रीधर ससुराल आया और अपनी बहन तथा बहनोई को वार्षिक कुलोत्सव हेतु अपने घर आमंत्रित किया।
भ्राता धवल! हमारे माता-पिता आप दोनों के आगमन की अत्यंत उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं!

तीनों प्रसन्नचित्त होकर यात्रा पर निकल पड़े। मार्ग में वन की सुंदरता और परस्पर वार्तालाप से मार्ग सुगम हो गया।
अपने पति और स्नेही भाई के साथ यह यात्रा मेरे हृदय को अत्यंत आनंद दे रही है।
माता गौरी का धाम और भावावेश
The Shrine of Devi Gauri & The Ecstatic Devotion
मार्ग में उन्हें विशाल बरगद के वृक्षों से घिरा हुआ माता गौरी का एक अत्यंत प्राचीन और भव्य मंदिर दिखाई दिया।
देखो! यह माता गौरी का पावन धाम है। नगर में प्रवेश से पूर्व हमें माँ के चरणों में शीश नवाना चाहिए।

पत्नी और साले को बाहर रथ के पास छोड़कर धवल अकेला मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर गया।
हे जगदम्बे! हे कल्याणी! इस संसार का कल्याण करने वाली माँ, इस दास की भक्ति स्वीकार करो!

अगाध भक्ति के भावातिरेक में धवल ने सोचा: 'लोग पशुओं की तुच्छ बलि देते हैं, किंतु मैं अपना यह नश्वर शरीर ही माँ के चरणों में समर्पित क्यों न कर दूँ?'
माँ! मैं किसी निरीह पशु की नहीं, अपने ही प्राणों की आहुति आपके श्रीचरणों में अर्पित करता हूँ!

दृढ़ संकल्प के साथ धवल ने मंदिर के खड्ग से एक ही झटके में अपना मस्तक काटकर देवी के चरणों में अर्पित कर दिया और निष्प्राण होकर गिर पड़ा।
जय माँ भवानी! मेरी यह अंतिम आहुति स्वीकार हो!
शोक और दूसरा आत्मबलिदान
The Chain of Sacrifice & The Descent of Grief
जब बहुत देर तक धवल बाहर नहीं लौटा, तो चिंतित होकर श्रीधर उसे देखने के लिए मंदिर के भीतर गया।
बहन, तुम यहीं ठहरो। मैं देखकर आता हूँ कि भाई धवल को इतनी देर क्यों हो रही है।

गर्भगृह में प्रवेश करते ही श्रीधर सन्न रह गया—उसने अपने प्रिय बहनोई का कटा हुआ मस्तक और लहूलुहान देह वेदी पर पड़े देखे।
हे ईश्वर! यह क्या अनर्थ हो गया! भाई धवल ने अपने ही हाथों यह क्या कर डाला?!

गहन शोक और इस लोक-लाज के भय से कि लोग उस पर धन के लिए बहनोई की हत्या का कलंक लगाएंगे, श्रीधर ने भी प्राण त्यागने का निश्चय किया।
मैं अपनी विधवा बहन और संसार को क्या मुँह दिखाऊँगा?! भाई, मैं भी तुम्हारे पीछे आता हूँ!

उसी खड्ग से श्रीधर ने भी अपना मस्तक काट लिया और उसका शरीर भी धवल के शरीर के समीप वेदी पर निष्प्राण गिर पड़ा।
मदनसुन्दरी का विलाप और देवी का प्राकट्य
Madanasundari
अत्यधिक विलंब और सन्नाटे से भयभीत होकर मदनसुन्दरी काँपते चरणों से मंदिर के भीतर पहुँची।
स्वामी? भैया? आप दोनों इतनी देर से मौन क्यों हैं...?

सामने का भयानक दृश्य देखकर उसका कलेजा फट गया—पति और सहोदर भाई दोनों के कटे हुए सिर रक्त में डूबे पड़े थे।
हा विधाता! एक ही पल में मेरा सर्वस्व लुट गया! मेरे किस पाप का यह भयानक दंड है?!

असहनीय शोक से व्याकुल होकर पतिव्रता मदनसुन्दरी ने अपनी रेशमी साड़ी से फंदा बनाया और अपने प्राण त्यागने को तत्पर हुई।
हे माता! यदि इस लोक में मुझे इनका साथ न मिला, तो परलोक में मेरी आत्मा को इनसे मिला दो!

मदनसुन्दरी के अटूट पातिव्रत्य और भक्ति से प्रसन्न होकर साक्षात् भगवती गौरी दिव्य ज्योतिर्मय रूप में प्रकट हुईं।
रुक जा पुत्री! मैं तेरे सतीत्व और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। इन दोनों के कटे मस्तक धड़ों से जोड़, ये पुनः जीवित हो उठेंगे!
सिरों की अदला-बदली और पुनर्जीवन
The Fateful Transposition & The Awakening
अत्यधिक घबराहट, हड़बड़ाहट और आँसुओं के धुंधलके में मदनसुन्दरी से भारी भूल हो गई—उसने पति का सिर भाई के धड़ पर और भाई का सिर पति के धड़ पर रख दिया!
हे दयामयी माँ! अपनी कृपा से इनके प्राण लौटा दीजिए!

भगवती के वरदान से दोनों शरीरों में प्राणों का संचार हुआ। घाव मिट गए और दोनों युवक ऐसे उठ खड़े हुए जैसे किसी गहरी नींद से जागे हों!
माँ भवानी की असीम कृपा से हम पुनः जीवित हो गए!

किंतु होश आते ही वे दोनों और मदनसुन्दरी स्तब्ध रह गए—सिरों की अदला-बदली हो चुकी थी! मदनसुन्दरी अपनी भूल पर काँप उठी।
मेरा मस्तिष्क, स्मृति और चेतना धवल की है—किंतु यह शरीर तो मेरे साले श्रीधर का है!
पहचान का महाविवाद और महाराज विक्रम का अमर निर्णय
The Conundrum of Identity & Vikram
दोनों में भीषण धर्मसंकट छिड़ गया—मस्तक वाला बोला 'मैं धवल हूँ क्योंकि मेरी चेतना धवल की है', जबकि धड़ वाला बोला 'मैं धवल हूँ क्योंकि यह देह धवल की है!'
धवल का सिर: 'मेरी आत्मा और बुद्धि ने तुमसे विवाह किया है!' • धवल का धड़: 'मेरी इस देह और हाथ ने अग्नि के सात फेरे लिए हैं!'

श्मशान के अंधकार में बेताल ने कथा रोककर न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य से यह गूढ़ यक्ष-प्रश्न पूछा।
बताओ राजन! इन दोनों में से मदनसुन्दरी का वास्तविक और धर्मसम्मत पति कौन है? उत्तर जानते हुए भी मौन रहे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा!

धर्म और न्याय से बंधे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने अपने मौन को तोड़कर शास्त्रों के आधार पर अकाट्य निर्णय दिया।
शास्त्रों में मस्तक को 'उत्तमांग' अर्थात् समस्त अंगों में प्रधान और स्वामी माना गया है। बुद्धि, ज्ञान, संस्कार और चेतना का वास मस्तक में ही होता है। धड़ तो केवल उसका आज्ञाकारी साधन है। अतः जिस शरीर पर पति का मस्तक लगा है, वही मदनसुन्दरी का सच्चा और धर्मसम्मत पति है!

निर्णय सुनते ही राजा का मौन पुनः भंग हो गया! बेताल विकराल ठहाका लगाते हुए धुएँ की भांति उड़कर पुनः शीशम के पेड़ पर जा लटका।
अद्भुत न्याय, राजन! मस्तक ही देह का स्वामी है! किंतु तुम्हारा मौन टूट गया—और मैं चला पुनः अपने पेड़ पर! खे-खे-खे!

अमावस की घोर अंधियारी रात में, बीहड़ और भयानक श्मशान वन में महाराज विक्रमादित्य बिना थके, दृढ़ संकल्प के साथ पुनः बेताल को पकड़ने चल पड़े।
तुम जितनी बार भागोगे बेताल, मैं उतनी बार आऊँगा—क्षत्रिय अपना वचन कभी नहीं छोड़ता!