तृतीय बेताल: शुक-सारिका का द्युत और कटी नाक का रहस्य
The Battle of Sexes: The Scholar Parrot & The Wise Myna
तीसरी चढ़ाई और राज-पिंजरे की शर्त
The Third Retrieval & The Royal Aviary Wager
महाराज विक्रमादित्य ने पुनः उसी भयानक श्मशान में जाकर शीशम के वृक्ष से बेताल के शव को उतारा और कंधे पर लादकर चल पड़े। बेताल ने कहा: 'राजन! मार्ग-विनोद के लिए पाटलीपुत्र के शुक-सारिका की यह ज्ञानवर्धक कथा सुनो!'
राजन! पुरुष और स्त्री में अधिक कपटी कौन है, यह इस कथा से सिद्ध होगा!

पाटलीपुत्र के राजमहल में दो श्रापग्रस्त दिव्य पक्षी रहते थे—शास्त्रवेत्ता शुक 'विदग्धचूड़ामणि' और समस्त विज्ञान-पारंगत मैना 'सोमिका'। जब तोते ने प्रेम-प्रस्ताव रखा, तो मैना ने पुरुष जाति को पापी और कृतघ्न कहकर ठुकरा दिया!
तुम्हारा कथन सर्वथा मिथ्या है! पुरुष तो त्यागी और निष्ठावान होते हैं, स्त्रियां ही कुटिल और पापिनी होती हैं!

दोनों में विवाद बढ़ गया और उन्होंने युवराज के समक्ष शर्त रखी: जो अपनी बात प्रमाणित नहीं कर सका, वह जीवन भर दूसरे का दास बनेगा!
तो सुनो पुरुष के कपट की यह साक्षात कथा!
मैना की कथा: धनदत्त का पाखंड और खड्ड में धकेलना
The Myna
मैना ने कथा सुनाई: कामंदिका नगरी के विख्यात कुलीन महासेठ अर्थदत्त का पुत्र था धनदत्त। वह उच्च कुल और अकूत वैभव में पला-बढ़ा था।

पिता के देहांत के बाद दुष्ट मित्रों ने उसे जुए के दुर्व्यसन में डाल दिया। कुछ ही दिनों में धनदत्त ने अपने पिता का सारा अकूत धन जुए में लुटा दिया और लज्जावश विदेश भाग निकला!

भटकते हुए वह चंदनपुर पहुँचा, जहाँ महासेठ धर्मदत्त उसके उच्च कुल और सुसंस्कृत वाणी से प्रभावित हो गए।

सेठ धर्मदत्त ने अपनी गुणवती और रूपवती कन्या 'रत्नावती' का विवाह धनदत्त से कर दिया और उसे अपार स्वर्ण और आभूषणों से लाद दिया।

रत्नावती को विदा कराकर धनदत्त अपने नगर की ओर चला। मार्ग में एक अत्यंत निर्जन, बीहड़ पहाड़ी खड्ड और खाई आई।

लोभी धनदत्त ने स्वर्ण के लालच में अपनी पतिव्रता पत्नी रत्नावती को गहरी खाई में धक्का दे दिया और उसके सारे आभूषण लूटकर भाग खड़ा हुआ!
स्वामी! यह आपने क्या किया?!
रत्नावती की निष्ठा और पति का दूसरा कुकर्म
The Pure Forgiveness & The Midnight Betrayal
सौभाग्यवश रत्नावती पहाड़ी झाड़ियों में उलझकर जीवित बच गई और रक्तरंजित अवस्था में खाई से बाहर निकली।

जब राहगीरों ने पूछा, तो उसने पति का नाम छिपाकर कहा: 'डाकुओं ने लूट लिया और मेरे पति जान बचाकर भागे।' उसने अपने पापी पति को कलंक से बचाया!
मेरे पति निर्दोष हैं, डाकुओं ने हमारा सर्वस्व लूट लिया।

वह पिता के घर लौट आई और पतिव्रता नारी की भांति पति की प्रतीक्षा करने लगी।

वर्षों बाद जब जुए में लुटकर धनदत्त पुनः भिखारी बनकर उसी नगर में आया, तो रत्नावती ने उसे पहचानकर गले लगाया और पिता के घर में आश्रय दिया!

किंतु दुष्ट धनदत्त का हृदय नहीं बदला! आधी रात को उसने सोती हुई रत्नावती का गला दबाकर हत्या करने का प्रयास किया, उसके गहने चुराए और पुनः भाग गया! मैना बोली: 'बताओ, क्या पुरुष से बढ़कर कोई कृतघ्न है?!'
शुक की कथा: वासुदत्ता का कुकर्म और कटी नाक का रहस्य
The Parrot
अब तोते ने उत्तर दिया: 'हर्षवती नगरी के धर्मात्मा सेठ समुद्रदत्त की पत्नी थी वासुदत्ता। वह बाहर से पतिव्रता दिखती थी, किंतु भीतर से अत्यंत कुटिल थी!'
अब सुनो स्त्री के भयानक छल और षड्यंत्र की यह सच्ची गाथा!

वासुदत्ता का नगर के एक दुराचारी लंपट युवक से गुप्त प्रेम-प्रसंग था, जिससे वह नित्य रात को छिपकर मिला करती थी।

एक रात वह अपने प्रेमी से मिलने राजोद्यान में पहुँची। उसी समय पेड़ पर छिपा एक सत्यवादी चोर उसे देख रहा था।

किंतु उद्यान में उसने देखा कि उसके प्रेमी को राज-रक्षकों ने चोरी के अपराध में फांसी पर लटका दिया था और उसका शव झूल रहा था!
शव का दंश, झूठा आरोप और सत्यवादी चोर
The Ghoul
शोक में पागल होकर वासुदत्ता ज्योंही शव के होंठ चूमने लगी, शव में प्रविष्ट बेताल ने अचानक अपने दांतों से उसकी नाक काट ली! वासुदत्ता चीखती हुई भागी!
आह्ह्ह! मेरी नाक काट ली इस प्रेत ने!

घर पहुँचकर उसने रो-रोकर झूठा आरोप लगाया: 'सोते में मेरे इस दुष्ट पति ने मेरी नाक काट ली!' राजा ने बिना जांच किए निर्दोष समुद्रदत्त को फांसी का हुक्म दे दिया!

निर्दोष पति वधस्थल पर ले जाया गया। वह ईश्वर से न्याय की गुहार लगा रहा था।
मैंने तो स्वप्न में भी पत्नी का अहित नहीं सोचा! हे ईश्वर, सत्य की रक्षा करो!

तभी उसी चोर ने आगे आकर राजा को रोका: 'महाराज! उद्यान के फांसी लगे शव का मुंह देखिए, कटी हुई नाक अब भी उसके दांतों में दबी है!'

सत्य प्रमाणित हुआ! राजा ने निर्दोष पति को रिहा किया, दुष्ट वासुदत्ता को देश-निकाला दिया और सत्यवादी चोर को नगर का धर्माधिकारी बना दिया! तोता बोला: 'बताओ, क्या स्त्री से बढ़कर कोई कपटी है?!'
बेताल का यक्ष-प्रश्न और महाराज विक्रम का अमर निर्णय
The Moral Conundrum & Vikram
श्मशान के सन्नाटे में बेताल ने कथा रोककर राजा विक्रमादित्य से प्रश्न किया।
बताओ विक्रमादित्य! शुक और सारिका के इस विवाद में किसकी विजय हुई? पुरुष और स्त्री में अधिक पापी और कुटिल कौन है? उत्तर जानते हुए मौन रहे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा!

महाराज विक्रमादित्य ने उत्तर दिया: 'गुण और दोष किसी लिंग के अधीन नहीं होते, वे व्यक्ति के अंतःकरण और आचरण पर निर्भर करते हैं! किंतु पुरुष का दुराचार व्यसन और लोभ के वशीभूत होकर प्रकट होता है, जबकि जो स्त्री पतिव्रता का ढोंग करके अपने निर्दोष रक्षक को ही सूली पर चढ़ाने का षड्यंत्र रचे, उसका कपट कहीं अधिक विनाशकारी है!'
आत्मा के सदाचार में ही धर्म है, लिंग में नहीं!

अमावस की घोर अंधियारी रात में, बीहड़ और भयानक श्मशान वन में महाराज विक्रमादित्य बिना थके, दृढ़ संकल्प के साथ पुनः बेताल को पकड़ने चल पड़े।
तुम जितनी बार भागोगे बेताल, मैं उतनी बार आऊँगा—क्षत्रिय अपना वचन कभी नहीं छोड़ता!