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सप्तदश बेताल: चंद्रस्वामी और गुरु का मायाजाल

बेताल पच्चीसी (सोमदेव भट्ट कृत)• katha

सप्तदश बेताल: चंद्रस्वामी और गुरु का मायाजाल

Chandraswami & The Guru's Grand Illusion

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दृश्य 1

सत्रहवीं चढ़ाई और विद्या-पिपासु चंद्रस्वामी

The Seventeenth Retrieval & The Seeker of Vidyas
King Vikramaditya carrying Betal across the haunted cremation ground under a midnight storm
बेताल
राजन! सांसारिक माया और मनुष्य के अंतर्मन के भ्रम को उजागर करने वाली यह अद्भुत कथा सुनो—चंद्रस्वामी और सिद्ध गुरु के मायाजाल की कहानी!

सत्रहवीं बार महाराज विक्रमादित्य ने श्मशान भूमि में शीशम के वृक्ष से बेताल को नीचे उतारा और दृढ़तापूर्वक कंधे पर लादकर आगे बढ़े। बेताल ने व्यंग्यभरी मुस्कान के साथ सत्रहवीं पहेली आरंभ की।

बेताल

राजन! सांसारिक माया और मनुष्य के अंतर्मन के भ्रम को उजागर करने वाली यह अद्भुत कथा सुनो—चंद्रस्वामी और सिद्ध गुरु के मायाजाल की कहानी!

Panel 1
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Young scholar Chandraswami studying occult diagrams with intense intellectual pride and ambition
चंद्रस्वामी
पुस्तकीय ज्ञान तो साधारण जन के लिए है! मुझे वह गूढ़ विद्या चाहिए जिससे मैं त्रिकालदर्शी और अजेय बन सकूं!

प्राचीन काल में चंद्रस्वामी नाम का एक असाधारण रूप से कुशाग्र और महत्वाकांक्षी ब्राह्मण विद्वान था। उसने समस्त शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था, किंतु उसका मन अलौकिक तांत्रिक सिद्धियों के लिए व्याकुल था।

चंद्रस्वामी

पुस्तकीय ज्ञान तो साधारण जन के लिए है! मुझे वह गूढ़ विद्या चाहिए जिससे मैं त्रिकालदर्शी और अजेय बन सकूं!

Panel 2
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Chandraswami journeying through the high snowbound Himalayas toward the legendary master's hermitage

सिद्धियों की खोज में चंद्रस्वामी ने अपना सुखद गृह-संसार त्याग दिया और उच्च हिमालयी शिखरों की दुर्गम कंदराओं की ओर यात्रा आरंभ कर दी।

Panel 3
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दृश्य 2

सिद्ध योगी क्षेमेश्वर की कुटिया और परीक्षा

The Hermitage of Guru Kshemeshvara
Guru Kshemeshvara seated in majestic meditation surrounded by glowing mystic flames
गुरु क्षेमेश्वर
वत्स चंद्रस्वामी! तुम विद्या के खोजी बनकर आए हो, किंतु क्या तुम्हारा हृदय वासनाओं और अहंकार के भार से मुक्त है?

शिखरों के पार उसे महासिद्ध योगी क्षेमेश्वर का पावन आश्रम मिला, जिनकी दृष्टि से ही भूत, भविष्य और वर्तमान के रहस्य प्रकट होते थे।

गुरु क्षेमेश्वर

वत्स चंद्रस्वामी! तुम विद्या के खोजी बनकर आए हो, किंतु क्या तुम्हारा हृदय वासनाओं और अहंकार के भार से मुक्त है?

Panel 4
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Chandraswami prostrating before the master, pleading for immediate initiation into the Vidyas
चंद्रस्वामी
हे गुरुदेव! मैंने काम, क्रोध और मोह को जीत लिया है! मुझे सर्वोच्च सिद्धि का अधिकारी बनाकर कृतार्थ करें!

चंद्रस्वामी ने गुरु के चरणों में मस्तक रखकर हठपूर्वक विद्या की दीक्षा मांगी। उसने दावा किया कि वह हर प्रकार की परीक्षा और वैराग्य के लिए सिद्ध है।

चंद्रस्वामी

हे गुरुदेव! मैंने काम, क्रोध और मोह को जीत लिया है! मुझे सर्वोच्च सिद्धि का अधिकारी बनाकर कृतार्थ करें!

Panel 5
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Guru Kshemeshvara smiling gently as he leads the disciple toward the sacred mountain pool
गुरु क्षेमेश्वर
यदि ऐसा है, तो इस पावन अमृत-कुंड के जल में केवल एक डुबकी लगाओ। जल से बाहर आते ही तुम्हें सिद्धि का रहस्य ज्ञात होगा।

गुरु क्षेमेश्वर मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने शिष्य के अहंकार और अव्यक्त वासनाओं को एक ही क्षण में भांप लिया।

गुरु क्षेमेश्वर

यदि ऐसा है, तो इस पावन अमृत-कुंड के जल में केवल एक डुबकी लगाओ। जल से बाहर आते ही तुम्हें सिद्धि का रहस्य ज्ञात होगा।

Panel 6
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Chandraswami stepping into the sacred mountain waters, unaware of the cosmic vortex awaiting him

बिना किसी संकोच के चंद्रस्वामी कुंड के शीतल जल में उतरा और उसने अपनी आंखें मूंदकर जल के भीतर एक ही गोता लगाया।

Panel 7
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दृश्य 3

माया का अथाह सागर और राजसी वैभव

The Cosmic Plunge & The Life of Splendor
The swirling vortex of Maya transporting Chandraswami's consciousness into a grand royal life

जैसे ही उसका शीश जल में डूबा, काल और दिक् की सीमाएं विलीन हो गईं! चंद्रस्वामी ने आंखें खोलीं तो उसने स्वयं को कंचनपुर के राजमहल के रेशमी शैय्यागार में एक पराक्रमी राजकुमार के रूप में पाया!

Panel 8
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Chandraswami marrying the enchanting Princess Padmavati with grand Vedic ceremonies
राजकुमारी पद्मावती
प्राणनाथ! आपके चरणों में ही मेरा संपूर्ण संसार और आनंद है!

उसने कंचनपुर की अनुपम सुंदरी राजकुमारी पद्मावती का वरण किया। वैदिक मंत्रोच्चार, शहनाई और उत्सव के बीच दोनों का पावन परिणय हुआ।

राजकुमारी पद्मावती

प्राणनाथ! आपके चरणों में ही मेरा संपूर्ण संसार और आनंद है!

Panel 9
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Chandraswami ascending the golden throne as supreme monarch of a vast prosperous empire
राजा चंद्रस्वामी (माया में)
यह साम्राज्य, यह सेना और यह अपार संपदा मेरी अपनी है! यही जीवन की सार्थकता है!

वृद्ध राजा के देहांत के पश्चात चंद्रस्वामी का राज्याभिषेक हुआ। उसने बीस वर्षों तक असीम ऐश्वर्य, शक्ति और प्रजा के आदर के साथ अखंड शासन किया।

राजा चंद्रस्वामी (माया में)

यह साम्राज्य, यह सेना और यह अपार संपदा मेरी अपनी है! यही जीवन की सार्थकता है!

Panel 10
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Chandraswami holding his radiant young son Prince Harshavardhana in the royal gardens

उन्हें एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ—हर्षवर्धन। चंद्रस्वामी का रोम-रोम अपने उस बालक के स्नेह और वात्सल्य में डूब गया। उसका पूरा अस्तित्व उसी बालक में सिमट गया।

Panel 11
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दृश्य 4

विनाश का तांडव और चिता की लपटें

The Catastrophe of Loss & The Blazing Pyre
The young prince falling fatally ill as physicians despair and the Queen weeps
चंद्रस्वामी
पुत्र! मेरी आंखें खोलो! मेरा सारा साम्राज्य ले लो, परंतु मुझे अकेला छोड़कर मत जाओ!

किंतु काल की गति क्रूर थी। बालक हर्षवर्धन एक असाध्य महामारी का ग्रास बन गया। राज्य के बड़े-बड़े वैद्य और तांत्रिक उसके प्राणों की रक्षा न कर सके।

चंद्रस्वामी

पुत्र! मेरी आंखें खोलो! मेरा सारा साम्राज्य ले लो, परंतु मुझे अकेला छोड़कर मत जाओ!

Panel 12
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Queen Padmavati collapsing of a broken heart beside the body of her beloved son

पुत्र के विरह को न सह पाने के कारण महारानी पद्मावती का हृदय भी फट गया और उन्होंने उसी क्षण अपने प्राण त्याग दिए।

Panel 13
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The towering funeral pyre consuming both queen and son on the desolate riverbank

श्मशान के तट पर चंदन की विशाल चिता धधक उठी, जिसमें चंद्रस्वामी की पत्नी और पुत्र दोनों का पार्थिव शरीर भस्म हो रहा था।

Panel 14
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Chandraswami in supreme grief leaping toward the roaring fire to end his life
चंद्रस्वामी
हे अग्निदेव! मुझे भी भस्म कर लो! मेरा जीवन यहीं समाप्त होता है!

असह्य वियोग और दारुण दुख से विक्षिप्त होकर चंद्रस्वामी चिल्लाया: 'जब मेरा सर्वस्व ही नष्ट हो गया, तो मैं जीकर क्या करूँगा!' और उसने धधकती चिता में छलांग लगा दी!

चंद्रस्वामी

हे अग्निदेव! मुझे भी भस्म कर लो! मेरा जीवन यहीं समाप्त होता है!

Panel 15
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दृश्य 5

माया-निद्रा से जागरण और गुरु का हाथ

The Awakening from the Depths of Maya
Guru Kshemeshvara's hand gripping Chandraswami's wet hair and pulling him out of the mountain pool

जैसे ही उसने चिता की ज्वाला का स्पर्श किया, अचानक एक शक्तिशाली हाथ ने उसके गीले बालों को पकड़कर जल से बाहर खींच लिया!

Panel 16
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Chandraswami gasping for breath on the rocky bank of the serene mountain pond, disoriented and trembling
चंद्रस्वामी
कहाँ गया मेरा कंचनपुर? कहाँ है मेरी रानी पद्मावती और मेरा नन्हा हर्षवर्धन?! क्या वे सब भस्म हो गए?!

चंद्रस्वामी हांफता हुआ जल से बाहर आया। उसने देखा कि वह उसी हिमालयी आश्रम के अमृत-कुंड के तट पर खड़ा था। धूप ज्यों की त्यों खिली थी और पक्षी उसी डाली पर गा रहे थे!

चंद्रस्वामी

कहाँ गया मेरा कंचनपुर? कहाँ है मेरी रानी पद्मावती और मेरा नन्हा हर्षवर्धन?! क्या वे सब भस्म हो गए?!

Panel 17
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Guru Kshemeshvara calmly explaining the nature of time and mind to the stunned scholar
गुरु क्षेमेश्वर
जिस बीस वर्ष के साम्राज्य, सुख और दारुण शोक को तुमने अभी भोगा, वह तुम्हारे अपने मन की ही सृष्टि थी!

गुरु क्षेमेश्वर ने दयालु स्वर में कहा: 'वत्स! जल में केवल तीन पल (क्षण) बीते हैं। न कोई कंचनपुर था, न कोई रानी और न कोई पुत्र! यह सब केवल तुम्हारे एक सांस की डुबकी का खेल था।'

गुरु क्षेमेश्वर

जिस बीस वर्ष के साम्राज्य, सुख और दारुण शोक को तुमने अभी भोगा, वह तुम्हारे अपने मन की ही सृष्टि थी!

Panel 18
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Chandraswami falling to his knees in profound spiritual humility and true detachment

चंद्रस्वामी का समस्त बौद्धिक अहंकार चूर-चूर हो गया। उसने जान लिया कि संसार की समस्त उपलब्धियां और संबंध केवल मन की वासनाओं का एक स्वप्न हैं। उसने गुरु के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया।

Panel 19
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दृश्य 6

शीशम की पहेली और महाराज विक्रम का अमर निर्णय

The Shinshapa Riddle & The Anatomy of Maya
King Vikramaditya carrying Betal near the haunted Shinshapa tree as Betal poses the subtle philosophical riddle
बेताल
राजन! अब विचार करो! चंद्रस्वामी द्वारा जल में भोगे गए बीस वर्षों के सुख, साम्राज्य और शोक का वह विशाल मायाजाल—क्या वह गुरु के मंत्र-बल का प्रभाव था या स्वयं चंद्रस्वामी की दमित वासनाओं और संस्कारों का प्रकटीकरण? यदि जानकर भी नहीं बोले, तो तुम्हारा शीश खंड-खंड हो जाएगा!

कथा समाप्त कर बेताल ने श्मशान के भयावह अंधकार में अट्टहास करते हुए प्रश्न पूछा।

बेताल

राजन! अब विचार करो! चंद्रस्वामी द्वारा जल में भोगे गए बीस वर्षों के सुख, साम्राज्य और शोक का वह विशाल मायाजाल—क्या वह गुरु के मंत्र-बल का प्रभाव था या स्वयं चंद्रस्वामी की दमित वासनाओं और संस्कारों का प्रकटीकरण? यदि जानकर भी नहीं बोले, तो तुम्हारा शीश खंड-खंड हो जाएगा!

Panel 20
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King Vikramaditya delivering his discerning philosophical judgment with utter clarity
महाराज विक्रमादित्य
बेताल! वह मायाजाल पूर्णतः चंद्रस्वामी की अपनी ही दमित वासनाओं, अहंकार और संस्कारों की रचना था!

महाराज विक्रमादित्य ने बिना किसी भय के अत्यंत स्पष्ट और तत्वदर्शी उत्तर दिया।

महाराज विक्रमादित्य

बेताल! वह मायाजाल पूर्णतः चंद्रस्वामी की अपनी ही दमित वासनाओं, अहंकार और संस्कारों की रचना था!

Panel 21
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Visual metaphor of the Guru holding a mirror to the disciple's latent desires

गुरु का जल केवल एक स्वच्छ दर्पण था जिसने समय की सीमा को शिथिल किया। किंतु उस दर्पण में जो राज्य-लोभ, काम-सुख, पुत्र-मोह और मृत्यु का विलाप दिखाई दिया—वह सब चंद्रस्वामी के अपने अवचेतन मन में संचित था। मनुष्य जैसा भीतर होता है, माया उसे वैसा ही जगत रचकर दिखाती है!

Panel 22
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Betal laughing hysterically as he takes flight into the pitch-black canopy of the Shinshapa tree
बेताल
सर्वश्रेष्ठ निर्णय, राजन! किंतु वाणी का प्रयोग करते ही तुम्हारा मौन समाप्त हुआ—और मैं चला पुनः अपने वृक्ष पर! खे-खे-खे!

सत्य निर्णय सुनते ही राजा का मौन पुनः टूट गया! बेताल ने भयंकर अट्टहास किया और राजा के कंधे से उड़कर पुनः शीशम के वृक्ष की शाखाओं में जा लटका!

बेताल

सर्वश्रेष्ठ निर्णय, राजन! किंतु वाणी का प्रयोग करते ही तुम्हारा मौन समाप्त हुआ—और मैं चला पुनः अपने वृक्ष पर! खे-खे-खे!

Panel 23
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King Vikramaditya firmly gripping his sword and returning into the darkness with unyielding determination
महाराज विक्रमादित्य
चाहे जितने छल करो बेताल, मेरा संकल्प हिमालय से भी अटल है!

महाराज विक्रमादित्य ने बिना किसी क्षोभ के अपनी तलवार म्यान से निकाली, अपनी कटार कसी और बेताल को पुनः पकड़ने के लिए अंधेरी रात में दृढ़ पगों से आगे बढ़ गए!

महाराज विक्रमादित्य

चाहे जितने छल करो बेताल, मेरा संकल्प हिमालय से भी अटल है!

Panel 24
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