सप्तदश बेताल: चंद्रस्वामी और गुरु का मायाजाल
Chandraswami & The Guru's Grand Illusion
सत्रहवीं चढ़ाई और विद्या-पिपासु चंद्रस्वामी
The Seventeenth Retrieval & The Seeker of Vidyas
सत्रहवीं बार महाराज विक्रमादित्य ने श्मशान भूमि में शीशम के वृक्ष से बेताल को नीचे उतारा और दृढ़तापूर्वक कंधे पर लादकर आगे बढ़े। बेताल ने व्यंग्यभरी मुस्कान के साथ सत्रहवीं पहेली आरंभ की।
राजन! सांसारिक माया और मनुष्य के अंतर्मन के भ्रम को उजागर करने वाली यह अद्भुत कथा सुनो—चंद्रस्वामी और सिद्ध गुरु के मायाजाल की कहानी!

प्राचीन काल में चंद्रस्वामी नाम का एक असाधारण रूप से कुशाग्र और महत्वाकांक्षी ब्राह्मण विद्वान था। उसने समस्त शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था, किंतु उसका मन अलौकिक तांत्रिक सिद्धियों के लिए व्याकुल था।
पुस्तकीय ज्ञान तो साधारण जन के लिए है! मुझे वह गूढ़ विद्या चाहिए जिससे मैं त्रिकालदर्शी और अजेय बन सकूं!

सिद्धियों की खोज में चंद्रस्वामी ने अपना सुखद गृह-संसार त्याग दिया और उच्च हिमालयी शिखरों की दुर्गम कंदराओं की ओर यात्रा आरंभ कर दी।
सिद्ध योगी क्षेमेश्वर की कुटिया और परीक्षा
The Hermitage of Guru Kshemeshvara
शिखरों के पार उसे महासिद्ध योगी क्षेमेश्वर का पावन आश्रम मिला, जिनकी दृष्टि से ही भूत, भविष्य और वर्तमान के रहस्य प्रकट होते थे।
वत्स चंद्रस्वामी! तुम विद्या के खोजी बनकर आए हो, किंतु क्या तुम्हारा हृदय वासनाओं और अहंकार के भार से मुक्त है?

चंद्रस्वामी ने गुरु के चरणों में मस्तक रखकर हठपूर्वक विद्या की दीक्षा मांगी। उसने दावा किया कि वह हर प्रकार की परीक्षा और वैराग्य के लिए सिद्ध है।
हे गुरुदेव! मैंने काम, क्रोध और मोह को जीत लिया है! मुझे सर्वोच्च सिद्धि का अधिकारी बनाकर कृतार्थ करें!

गुरु क्षेमेश्वर मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने शिष्य के अहंकार और अव्यक्त वासनाओं को एक ही क्षण में भांप लिया।
यदि ऐसा है, तो इस पावन अमृत-कुंड के जल में केवल एक डुबकी लगाओ। जल से बाहर आते ही तुम्हें सिद्धि का रहस्य ज्ञात होगा।

बिना किसी संकोच के चंद्रस्वामी कुंड के शीतल जल में उतरा और उसने अपनी आंखें मूंदकर जल के भीतर एक ही गोता लगाया।
माया का अथाह सागर और राजसी वैभव
The Cosmic Plunge & The Life of Splendor
जैसे ही उसका शीश जल में डूबा, काल और दिक् की सीमाएं विलीन हो गईं! चंद्रस्वामी ने आंखें खोलीं तो उसने स्वयं को कंचनपुर के राजमहल के रेशमी शैय्यागार में एक पराक्रमी राजकुमार के रूप में पाया!

उसने कंचनपुर की अनुपम सुंदरी राजकुमारी पद्मावती का वरण किया। वैदिक मंत्रोच्चार, शहनाई और उत्सव के बीच दोनों का पावन परिणय हुआ।
प्राणनाथ! आपके चरणों में ही मेरा संपूर्ण संसार और आनंद है!

वृद्ध राजा के देहांत के पश्चात चंद्रस्वामी का राज्याभिषेक हुआ। उसने बीस वर्षों तक असीम ऐश्वर्य, शक्ति और प्रजा के आदर के साथ अखंड शासन किया।
यह साम्राज्य, यह सेना और यह अपार संपदा मेरी अपनी है! यही जीवन की सार्थकता है!

उन्हें एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ—हर्षवर्धन। चंद्रस्वामी का रोम-रोम अपने उस बालक के स्नेह और वात्सल्य में डूब गया। उसका पूरा अस्तित्व उसी बालक में सिमट गया।
विनाश का तांडव और चिता की लपटें
The Catastrophe of Loss & The Blazing Pyre
किंतु काल की गति क्रूर थी। बालक हर्षवर्धन एक असाध्य महामारी का ग्रास बन गया। राज्य के बड़े-बड़े वैद्य और तांत्रिक उसके प्राणों की रक्षा न कर सके।
पुत्र! मेरी आंखें खोलो! मेरा सारा साम्राज्य ले लो, परंतु मुझे अकेला छोड़कर मत जाओ!

पुत्र के विरह को न सह पाने के कारण महारानी पद्मावती का हृदय भी फट गया और उन्होंने उसी क्षण अपने प्राण त्याग दिए।

श्मशान के तट पर चंदन की विशाल चिता धधक उठी, जिसमें चंद्रस्वामी की पत्नी और पुत्र दोनों का पार्थिव शरीर भस्म हो रहा था।

असह्य वियोग और दारुण दुख से विक्षिप्त होकर चंद्रस्वामी चिल्लाया: 'जब मेरा सर्वस्व ही नष्ट हो गया, तो मैं जीकर क्या करूँगा!' और उसने धधकती चिता में छलांग लगा दी!
हे अग्निदेव! मुझे भी भस्म कर लो! मेरा जीवन यहीं समाप्त होता है!
माया-निद्रा से जागरण और गुरु का हाथ
The Awakening from the Depths of Maya
जैसे ही उसने चिता की ज्वाला का स्पर्श किया, अचानक एक शक्तिशाली हाथ ने उसके गीले बालों को पकड़कर जल से बाहर खींच लिया!

चंद्रस्वामी हांफता हुआ जल से बाहर आया। उसने देखा कि वह उसी हिमालयी आश्रम के अमृत-कुंड के तट पर खड़ा था। धूप ज्यों की त्यों खिली थी और पक्षी उसी डाली पर गा रहे थे!
कहाँ गया मेरा कंचनपुर? कहाँ है मेरी रानी पद्मावती और मेरा नन्हा हर्षवर्धन?! क्या वे सब भस्म हो गए?!

गुरु क्षेमेश्वर ने दयालु स्वर में कहा: 'वत्स! जल में केवल तीन पल (क्षण) बीते हैं। न कोई कंचनपुर था, न कोई रानी और न कोई पुत्र! यह सब केवल तुम्हारे एक सांस की डुबकी का खेल था।'
जिस बीस वर्ष के साम्राज्य, सुख और दारुण शोक को तुमने अभी भोगा, वह तुम्हारे अपने मन की ही सृष्टि थी!

चंद्रस्वामी का समस्त बौद्धिक अहंकार चूर-चूर हो गया। उसने जान लिया कि संसार की समस्त उपलब्धियां और संबंध केवल मन की वासनाओं का एक स्वप्न हैं। उसने गुरु के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया।
शीशम की पहेली और महाराज विक्रम का अमर निर्णय
The Shinshapa Riddle & The Anatomy of Maya
कथा समाप्त कर बेताल ने श्मशान के भयावह अंधकार में अट्टहास करते हुए प्रश्न पूछा।
राजन! अब विचार करो! चंद्रस्वामी द्वारा जल में भोगे गए बीस वर्षों के सुख, साम्राज्य और शोक का वह विशाल मायाजाल—क्या वह गुरु के मंत्र-बल का प्रभाव था या स्वयं चंद्रस्वामी की दमित वासनाओं और संस्कारों का प्रकटीकरण? यदि जानकर भी नहीं बोले, तो तुम्हारा शीश खंड-खंड हो जाएगा!

महाराज विक्रमादित्य ने बिना किसी भय के अत्यंत स्पष्ट और तत्वदर्शी उत्तर दिया।
बेताल! वह मायाजाल पूर्णतः चंद्रस्वामी की अपनी ही दमित वासनाओं, अहंकार और संस्कारों की रचना था!

गुरु का जल केवल एक स्वच्छ दर्पण था जिसने समय की सीमा को शिथिल किया। किंतु उस दर्पण में जो राज्य-लोभ, काम-सुख, पुत्र-मोह और मृत्यु का विलाप दिखाई दिया—वह सब चंद्रस्वामी के अपने अवचेतन मन में संचित था। मनुष्य जैसा भीतर होता है, माया उसे वैसा ही जगत रचकर दिखाती है!

सत्य निर्णय सुनते ही राजा का मौन पुनः टूट गया! बेताल ने भयंकर अट्टहास किया और राजा के कंधे से उड़कर पुनः शीशम के वृक्ष की शाखाओं में जा लटका!
सर्वश्रेष्ठ निर्णय, राजन! किंतु वाणी का प्रयोग करते ही तुम्हारा मौन समाप्त हुआ—और मैं चला पुनः अपने वृक्ष पर! खे-खे-खे!

महाराज विक्रमादित्य ने बिना किसी क्षोभ के अपनी तलवार म्यान से निकाली, अपनी कटार कसी और बेताल को पुनः पकड़ने के लिए अंधेरी रात में दृढ़ पगों से आगे बढ़ गए!
चाहे जितने छल करो बेताल, मेरा संकल्प हिमालय से भी अटल है!