पंचदश बेताल: चार मित्र और जीवित किया गया सिंह
The Resurrection of the Dead Lion
पंद्रहवीं चढ़ाई और चार ब्राह्मण मित्र
The Fifteenth Retrieval & The Four Companions
पंद्रहवीं बार महाराज विक्रमादित्य श्मशान के विकराल अंधकार में शीशम के वृक्ष पर चढ़े, बेताल के शव को नीचे उतारा और दृढ़ता से अपने कंधे पर लादकर मौन व्रत के साथ चल पड़े।
राजन! तुम्हारी निष्ठा अडिग है! सुनो, पोथी-ज्ञान और व्यावहारिक बुद्धि (Common Sense) के द्वंद्व की यह अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद कथा!

कान्यकुब्ज देश में चार ब्राह्मण मित्र साथ-साथ बड़े हुए। उनमें से तीन मित्र—शास्त्रों, तंत्र-मंत्र और गुप्त विधाओं के प्रकांड विद्वान थे, किंतु व्यावहारिक बुद्धि से सर्वथा शून्य थे।

चौथा मित्र—सुबुद्धि, बहुत अधिक पढ़ा-लिखा नहीं था, किंतु वह स्वाभाविक विवेक, व्यावहारिक समझ और तीक्ष्ण सामान्य बुद्धि (Common Sense) का धनी था।
पुस्तकों का ज्ञान तभी सार्थक है जब मनुष्य के पास परिस्थिति को समझने का विवेक हो!

चारों मित्रों ने देश-विदेश में जाकर अपनी विद्या के बल पर धनोपार्जन और राजसम्मान प्राप्त करने का विचार किया और एक घने वन के मार्ग से यात्रा आरंभ की।
वन में अस्थि-समूह और विद्या का अहंकार
The Bones in the Forest & The Pride of Vidya
वन के बीहड़ मार्ग में चलते हुए तीनों पंडितों ने सुबुद्धि का उपहास उड़ाया कि उसके पास कोई गुप्त विद्या नहीं है, फिर भी बचपन के स्नेह के कारण वे उसे साथ ले चले।

जंगल के मध्य में उन्हें एक विशालकाय मृत पशु का बिखरा हुआ सूखा कंकाल और अस्थि-समूह पड़ा मिला।

सूखी हड्डियों को देखकर तीनों विद्वानों की आंखें चमक उठीं। उन्होंने अपनी विद्या की अलौकिक शक्ति का प्रत्यक्ष चमत्कार देखने का निश्चय किया।
मित्रों! देखो, यह हमारी विद्या की परीक्षा का सर्वोत्तम अवसर है! मैं इन बिखरी हड्डियों को जोड़कर कंकाल बना सकता हूँ!

दूसरे ने मांस और चमड़ा रचने का दावा किया, और तीसरे ने उसमें प्राण फूंकने की घोषणा की। सुबुद्धि ने उन्हें चेताने का प्रयास किया।
सिंह का निर्माण और विवेक की चेतावनी
The Construction & The Voice of Reason
प्रथम विद्वान ने मंत्र पढ़कर जल छिड़का। तत्क्षण बिखरी हुई हड्डियां आपस में जुड़ गईं और एक विशालकाय हिंसक पशु का संपूर्ण कंकाल तैयार हो गया।

दूसरे विद्वान ने अपनी विद्या का प्रयोग किया। देखते ही देखते कंकाल पर मांसपेशियां, नसें, रक्त और सुनहरी त्वचा चढ़ गई—साक्षात एक भयानक वनराज सिंह की देह तैयार हो गई!

अब तीसरा विद्वान अपने अहंकार में भरकर आगे बढ़ा और संजीवनी विद्या से उस नरभक्षी सिंह में प्राण फूंकने के लिए मंत्र पढ़ने लगा।

सुबुद्धि ने भय और विवेक से कांपते हुए तीसरे मित्र का हाथ पकड़ लिया और उसे इस भयंकर अनर्थ से रोकने के लिए चिल्ला उठा!
मूर्खों! रुक जाओ! यह कोई साधारण पशु नहीं, साक्षात हिंसक वनराज सिंह है! यदि तुमने इसमें प्राण फूंक दिए, तो यह जीवित होते ही हम चारों को फाड़कर खा जाएगा!
दंभी विद्वता और प्रलयंकारी गर्जना
The Arrogance of Pedantry & The Fatal Roar
तीसरे पंडित ने अहंकार में सुबुद्धि का हाथ झटक दिया और उसका उपहास उड़ाते हुए अपनी विद्या का प्रदर्शन करने पर अड़ गया।
मूर्ख गंवार! तू क्या जाने शास्त्रों का सामर्थ्य! क्या मैं अपनी अलौकिक संजीवनी विद्या को तेरे डरपोकपन के कारण व्यर्थ जाने दूँ? मैं इसे जीवित करके ही रहूँगा!

जब सुबुद्धि ने देखा कि हठी पंडित किसी की नहीं सुनेंगे, तो उसने कहा: 'तो एक क्षण ठहरो, मुझे इस ऊंचे वटवृक्ष पर चढ़ जाने दो!' और वह तेजी से पेड़ की सबसे ऊंची डाल पर चढ़ गया।

तीसरे विद्वान ने जैसे ही संजीवनी मंत्र पूरा किया, सिंह की देह में चेतना दौड़ गई। उसने आंखें खोलीं, अंगड़ाई ली और भयानक गर्जना के साथ उठ खड़ा हुआ!

जीवित होते ही भूखे सिंह ने अपनी प्राकृतिक हिंसक वृत्ति के वशीभूत होकर सामने खड़े तीनों पंडितों पर हमला कर दिया और पलक झपकते ही तीनों को फाड़कर मार डाला!
विद्या पर बुद्धि की विजय और अकेला यात्री
Wisdom Over Pedantry & The Solitary Return
तीनों विद्वानों को मारकर और उनका मांस खाकर तृप्त हुआ सिंह जंगल के गहरे बीहड़ में चला गया। पूरा वन पुनः शांत हो गया।

जब सिंह दूर चला गया, तो सुबुद्धि पेड़ से नीचे उतरा। उसने अपने अभागे मित्रों के अवशेषों को देखकर गहरा शोक प्रकट किया और विवेकहीन विद्या की निरर्थकता को समझा।
वरं बुद्धिर्न सा विद्या विद्याया बुद्धिरुत्तमा! बुद्धिहीना विनश्यन्ति यथा ते सिंहकारकाः!

सुबुद्धि अपनी व्यावहारिक बुद्धि और समयोचित निर्णय के कारण जीवित बचकर सकुशल अपने घर लौट आया।

कथा समाप्त कर श्मशान के सन्नाटे में बेताल ने राजा विक्रमादित्य से उस भीषण विनाश के दायित्व का प्रश्न पूछा।
राजन! अब बताओ, उन तीनों विद्वानों की दर्दनाक मृत्यु और हत्या का वास्तविक अपराधी कौन है?
बेताल का प्रश्न, विक्रम का अमर निर्णय और पलायन
The Riddle, The Verdict, & The Flight
बेताल ने राजा को चेतावनी देते हुए प्रश्न दोहराया।
क्या कंकाल जोड़ने वाला अपराधी था? मांस-त्वचा रचने वाला? प्राण फूंकने वाला? या पेड़ पर चढ़ने वाला सुबुद्धि जिसने उन्हें बलपूर्वक नहीं रोका? उत्तर जानते हुए मौन रहे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा!

महाराज विक्रमादित्य ने गंभीर वाणी में उत्तर दिया: 'तीसरा विद्वान जिसने सिंह में प्राण फूंके, वही उन तीनों की हत्या का एकमात्र वास्तविक पापी और अपराधी है!'
प्रथम विद्वान ने केवल अस्थियों को जोड़ा और दूसरे ने उस पर मांस-त्वचा चढ़ाई—वह निर्जीव आकृति किसी के लिए प्राणघातक नहीं थी, वह केवल शारीरिक शिल्प था। चौथे मित्र सुबुद्धि ने स्पष्ट चेतावनी दी और उन्हें रोकने का पूरा यत्न किया, किंतु उसके पास उन्हें बलपूर्वक रोकने का कोई अधिकार या सामर्थ्य नहीं था, अतः वह भी निर्दोष है। वास्तविक महाअपराधी तीसरा विद्वान था, जिसे अपने मित्र द्वारा सिंह की हिंसक प्रकृति और आसन्न मृत्यु की स्पष्ट चेतावनी दी गई थी! उस चेतावनी को जानते-बूझते हुए भी केवल अपनी विद्या के झूठे दंभ और अहंकार के कारण उसने एक भयानक नरभक्षी को जीवन दिया! विवेकहीन और अहंकारी ज्ञान ही संसार में सबसे बड़ा विनाशकारी और हत्यारा होता है!

सटीक और अकाट्य न्याय सुनते ही राजा का मौन पुनः टूट गया! बेताल गगनभेदी अट्टहास के साथ राजा के कंधे से उड़ा और पुनः शीशम के वृक्ष पर जा लटका।
अद्भुत न्याय, राजन! विवेकहीन अहंकार ही विनाश का मूल है! किंतु तुम्हारा मौन टूटा—और मैं चला! खे-खे-खे!

अमावस की घोर, भयानक रात्रि में श्मशान के प्रेतों और अंधकार की चिंता किए बिना महाराज विक्रमादित्य ने अपनी तलवार खींची और पुनः बेताल को बांधने के लिए दृढ़ता से आगे बढ़ चले।
बेताल! तुम्हारी हर पहेली न्याय का प्रकाश फैलाती है, किंतु मेरा संकल्प अडिग है—मैं तुम्हें ले जाकर ही रहूँगा!