पंचम बेताल: सोमप्रभा और तीन गुणी वर
Somaprabha & The Three Prodigies
पांचवीं चढ़ाई और सोमप्रभा का प्रण
The Fifth Ascent & The Maiden
काली अमावस की रात श्मशान भूमि में राजा विक्रमादित्य ने पांचवीं बार बेताल को पेड़ से उतारकर कंधे पर लादा। बेताल ने एक नई कथा आरंभ की।
राजन! बुद्धि, शिल्प और शौर्य में से किसका अधिकार सर्वोच्च है, ध्यानपूर्वक सुनो!

पाटलीपुत्र के धर्माधिकारी हरिस्वामी की पुत्री सोमप्रभा अपने अनुपम सौंदर्य और प्रखर बुद्धि के लिए पूरे आर्यावर्त में प्रसिद्ध थी। उसने असाधारण गुणों वाले वर से ही विवाह करने का प्रण लिया था।
पिताजी! मैं उसी पुरुष को वरमाला पहनाऊँगी जो अलौकिक शिल्प, दिव्य दृष्टि या असीम पराक्रम में अद्वितीय हो।

पुत्री के प्रण को पूरा करने के लिए हरिस्वामी ने असाधारण प्रतिभा वाले वरों की खोज शुरू की। सोमप्रभा के प्रण की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई।
आप में से कौन ऐसा है जिसके पास साधारण मनुष्यों से परे अलौकिक विद्या है?
तीन असाधारण गुणी वर
The Three Prodigies of Exceptional Genius
पहला वर आया—एक कुशल विमान-शिल्पी, जो काष्ठ का ऐसा उड़ने वाला रथ बना सकता था जो वायु के वेग से बादलों में उड़ता था!
मेरा यह विमान पलक झपकते ही किसी को भी पृथ्वी के किसी भी कोने में पहुंचा सकता है!

दूसरा वर आया—एक त्रिकालदर्शी ज्ञानी, जो ध्यान लगाते ही तीनों लोकों में किसी भी छिपी वस्तु या व्यक्ति को साक्षात् देख लेता था!
तीनों लोकों में कोई भी रहस्य मेरी दिव्य दृष्टि से छिपा नहीं रह सकता!

तीसरा वर आया—एक अपराजित धनुर्धर, जिसके अचूक बाण शब्दवेधी थे और जो दानवों को भी रणभूमि में धूल चटाने का साहस रखता था!
मेरी प्रत्यंचा की टंकार से शत्रु कांप उठते हैं! धर्म की रक्षा के लिए मैं अपने प्राणों की बाजी लगाने को सदैव तत्पर हूँ!
राक्षस का हरण और आशा की किरण
The Demon
किंतु निर्णय होने से पूर्व ही विंध्याचल का क्रूर राक्षस 'धूम्रशिखा' बवंडर बनकर आया और सोमप्रभा का हरण करके आकाश-मार्ग से उड़ गया!
हा-हा-हा! यह रूपवती कन्या अब मेरी विंध्य-गुफा की बंदिनी बनेगी!

पुत्री के वियोग में हरिस्वामी विलाप करने लगे। पूरे भवन में शोक छा गया, क्योंकि किसी को ज्ञात नहीं था कि राक्षस कहाँ गया।
मेरी पुत्री छिन गई! इस अनंत संसार में कौन उस दानव की खोज कर सकता है?!

तभी त्रिकालदर्शी ज्ञानी आगे आया और उसने ध्यान लगाया। कुछ ही पलों में उसकी दिव्य दृष्टि ने रहस्य भेद दिया।
मैंने देख लिया! वह दक्षिण में सैकड़ों योजन दूर विंध्याचल पर्वत की एक दुर्गम गुफा में कैद है!
विमान से आकाश-यात्रा
The Aerial Pursuit on the Wooden Vimana
विमान-शिल्पी तुरंत आगे बढ़ा और उसने अपना विशाल काष्ठ-विमान तैयार किया, जो दुर्गम पहाड़ों तक उड़ने में सक्षम था।
विमान में बैठिए! मेरा रथ आज ही हमें विंध्याचल के शिखर तक पहुंचा देगा!

तीनों गुणी वरों ने आपसी प्रतिद्वंद्विता त्याग दी और सोमप्रभा की रक्षा के लिए एक साथ विमान में सवार हुए।
ज्ञानी मार्ग दिखाओ, शिल्पी गति बढ़ाओ! दानव के संहार का दायित्व मेरी प्रत्यंचा पर छोड़ो!

पवन के वेग से बादलों को चीरता हुआ विमान विंध्याचल के बीहड़ शिखरों की ओर तेज़ी से उड़ चला।

कुछ ही घंटों में विमान उस दुर्गम पहाड़ी गुफा के मुहाने पर उतरा जहाँ राक्षस का पहरा था।
सोमप्रभा इसी गुफा के भीतर है, किंतु सावधान! दानव क्रोध में बाहर आ रहा है!
राक्षस-वध और सोमप्रभा की मुक्ति
The Battle at Mount Vindhya & Liberation
मानवों की गंध पाकर राक्षस धूम्रशिखा भयंकर गर्जना करते हुए अपनी विशाल लौह-गदा लहराकर बाहर झपटा।
क्षुद्र मानवों! तुम अपनी मृत्यु के स्वयं चलकर मेरी गुफा तक आए हो!

जहाँ अन्य साथी पीछे हटे, वहीं धनुर्धर निर्भय होकर दानव के साक्षात प्रहार के सामने सीना तानकर खड़ा हो गया।
निर्दोष कन्या को छोड़ दे दानव, अन्यथा मेरे अग्नि-बाणों से भस्म होने को तैयार हो जा!

धनुर्धर ने शब्दवेधी बाणों की ऐसी भयंकर वर्षा की कि दानव की छाती छलनी हो गई और वह रक्त से लथपथ होकर गिर पड़ा।

तीनों वीरों ने गुफा में प्रवेश कर सोमप्रभा के बंधन काटे। सोमप्रभा ने कृतज्ञता और राहत से अपने रक्षकों को देखा।
आप तीनों के अद्भुत पुरुषार्थ ने मुझे काल के मुख से बचा लिया!

पुनः विमान में सवार होकर वे सभी सकुशल पाटलीपुत्र लौटे, जहाँ नगरवासियों ने उनका भव्य स्वागत किया।
राजसभा का धर्मसंकट और महाराज विक्रम का अमर निर्णय
The Royal Dispute & Vikram
पिता हरिस्वामी ने अपनी कन्या को गले लगाकर ईश्वर को धन्यवाद दिया। पूरी राजसभा ने तीनों वीरों की जयकार की।
मेरी पुत्री सकुशल लौट आई! किंतु अब इन तीनों गुणी वरों में से इसका विवाह किससे किया जाए?!

राजसभा में धर्मसंकट उत्पन्न हो गया, क्योंकि तीनों वरों का योगदान अमूल्य और अनिवार्य था।
ज्ञानी: 'मेरी दृष्टि बिना खोज असंभव थी!' • शिल्पी: 'मेरा विमान न होता तो कोई पहुँच न पाता!' • धनुर्धर: 'मैंने प्राणों की बाजी लगाकर शत्रु का वध किया!'

बेताल ने कथा रोककर मौन चल रहे महाराज विक्रमादित्य से प्रश्न किया।
राजन! बताओ, सोमप्रभा का वास्तविक पति कौन है? यदि जानकर भी मौन रहे, तो तुम्हारा शीश खंड-खंड हो जाएगा!

धर्म और न्याय से बंधे महाराज विक्रमादित्य ने अपने मौन को तोड़ते हुए निर्भीक होकर धर्मसम्मत उत्तर दिया।
ज्ञानी और विमान-शिल्पी केवल साधन और सहायक थे। किंतु जिसने प्रत्यक्ष रणभूमि में खड़े होकर अपने प्राणों की बाजी लगाई और दानव का वध किया, वही वास्तविक शूरवीर और पति होने का अधिकारी है! अतः सोमप्रभा धनुर्धर की हुई!

न्याय सटीक था, किंतु राजा के बोलते ही मौन का प्रण टूट गया! बेताल ठहाका लगाते हुए पुनः वृक्ष की ओर उड़ गया।
अचूक निर्णय राजन! किंतु तुम्हारा मौन टूट गया—और मैं चला पुनः वृक्ष पर! खे-खे-खे!

अमावस की घोर अंधियारी रात में, बीहड़ और भयानक श्मशान वन में महाराज विक्रमादित्य बिना थके, दृढ़ संकल्प के साथ पुनः बेताल को पकड़ने चल पड़े।
तुम जितनी बार भागोगे बेताल, मैं उतनी बार आऊँगा—क्षत्रिय अपना वचन कभी नहीं छोड़ता!