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चतुर्थ बेताल: वीरवर का आत्मबलिदान और राजा शूद्रक का त्याग

बेताल पच्चीसी (सोमदेव भट्ट कृत)• katha

चतुर्थ बेताल: वीरवर का आत्मबलिदान और राजा शूद्रक का त्याग

The Incomparable Sacrifice of Veervara

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दृश्य 1

चौथी चढ़ाई और शोभावती का राजा

The Fourth Retrieval & The King of Shobhavati
King Vikramaditya climbing the gnarled Shinshapa tree for the fourth time carrying Betal
Betal
राजन! कर्तव्य और त्याग की पराकाष्ठा क्या होती है, यह इस कथा से समझो!

महाराज विक्रमादित्य ने पुनः उसी अंधकारमय श्मशान में जाकर शीशम के वृक्ष से बेताल के शव को उतारा और कंधे पर लादकर चल पड़े। बेताल ने कहा: 'राजन! मार्ग-विनोद के लिए राजा शूद्रक और अद्वितीय वीरवर की यह अमर गाथा सुनो!'

Betal

राजन! कर्तव्य और त्याग की पराकाष्ठा क्या होती है, यह इस कथा से समझो!

Panel 1
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Valiant Rajput warrior Veervara with his wife Dharmavati and brave children standing before King Shudraka

शोभावती के प्रजापालक राजा शूद्रक के दरबार में मालवा से वीरवर नाम का तेजस्वी राजपूत अपनी पत्नी धर्मवती, आठ वर्षीय पुत्र सत्यवर और पुत्री वीरवती के साथ सेवा हेतु उपस्थित हुआ।

Panel 2
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Veervara boldly stating his daily wage of 500 gold coins before King Shudraka
वीरवर
महाराज! मेरी तलवार और प्राण आपके राज्य की रक्षा के लिए सदैव समर्पित रहेंगे!

वीरवर ने अपने वेतन के रूप में प्रतिदिन 500 स्वर्णमुद्राओं की भारी मांग रखी। राजा ने उसके असाधारण व्यक्तित्व और तेज को देखकर यह शर्त स्वीकार कर ली।

वीरवर

महाराज! मेरी तलवार और प्राण आपके राज्य की रक्षा के लिए सदैव समर्पित रहेंगे!

Panel 3
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दृश्य 2

गुप्त दान और तूफानी रात का विलाप

The Secret Charities & The Midnight Weeping
Royal spies watching Veervara distribute his 500 daily coins in sacred charities

राजा के गुप्तचरों ने देखा कि वीरवर उन 500 मुद्राओं में से 100 मंदिर-देवताओं को, 100 अनाथ-दीन दुखियों को, 100 अस्त्र-शस्त्रों को और 100 दान में देकर मात्र 100 से अपने परिवार का निर्वाह करता था!

Panel 4
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Veervara standing guard with gleaming sword at the palace lion-gate through severe weather

वीरवर नित्य सिंहद्वार पर तलवार हाथ में लिए खड़ा रहता—धूप हो, कड़ाके की ठंड हो या मूसलाधार बारिश, वह पलक भी नहीं झपकाता था।

Panel 5
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Pitch-black midnight storm over Shobhavati with lightning as a weeping voice echoes

एक दिन भादों की घोर अंधेरी आधी रात को मूसलाधार बारिश और गरजती बिजली के बीच दूर से किसी स्त्री के अत्यंत कारुणिक विलाप की आवाज गूंजने लगी!

Panel 6
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King Shudraka commanding Veervara on the balcony to find the weeping voice
राजा शूद्रक
वीरवर! जाओ और पता लगाओ कि इस भयानक रात में कौन रो रहा है!

महल की छत से राजा ने पुकारा: 'सिंहद्वार पर कौन पहरा दे रहा है?' वीरवर ने उत्तर दिया: 'महाराज, आपका सेवक वीरवर उपस्थित है!'

राजा शूद्रक

वीरवर! जाओ और पता लगाओ कि इस भयानक रात में कौन रो रहा है!

Panel 7
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दृश्य 3

राज्यलक्ष्मी का प्राकट्य और महाभविष्यवाणी

The Encounter with Goddess Rajyalakshmi
Veervara marching into dark drenched forest while King Shudraka stalks silently behind

वीरवर तलवार और मशाल लेकर घनघोर अंधेरे में निकल पड़ा। राजा शूद्रक भी कौतुकवश छिपकर उसके पीछे-पीछे चल पड़े।

Panel 8
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Veervara discovering a radiant weeping celestial golden woman Goddess Rajyalakshmi by the lake
भगवती राज्यलक्ष्मी
मैं राजा शूद्रक की राज्यलक्ष्मी हूँ! तीसरे दिन राजा की मृत्यु निश्चित है, इसलिए मैं विलाप कर रही हूँ!

सरोवर-तट पर वीरवर ने एक स्वर्णिम कांति वाली दिव्य देवी को विलाप करते देखा। उसने पूछा: 'हे देवी! आप कौन हैं और क्यों रो रही हैं?'

भगवती राज्यलक्ष्मी

मैं राजा शूद्रक की राज्यलक्ष्मी हूँ! तीसरे दिन राजा की मृत्यु निश्चित है, इसलिए मैं विलाप कर रही हूँ!

Panel 9
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Goddess Rajyalakshmi revealing the condition of sacrifice before Goddess Chandi

देवी ने कहा: 'यदि कोई वीर सेवक अपने आठ वर्षीय पुत्र सत्यवर का सिर काटकर चंडी देवी को अर्पित कर दे, तो राजा शूद्रक सौ वर्ष तक जीवित रहेंगे!'

Panel 10
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Veervara returning home explaining the prophecy to his wife Dharmavati and son Satyavara

वीरवर तुरंत घर पहुँचा और अपनी पत्नी धर्मवती तथा पुत्र सत्यवर को सारी बात बताई।

Panel 11
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Brave boy Satyavara smiling proudly consenting to give his life for the King
सत्यवर (पुत्र)
पिताजी! राजा के प्राणों के लिए मेरा सिर देवी को अर्पित कीजिए!

आठ वर्षीय बालक सत्यवर ने गर्व से हाथ जोड़े: 'पिताजी! राजा हमारे अन्नदाता हैं। उनके प्राणों के लिए अपने प्राण देना तो मेरा परम सौभाग्य है! मुझे तुरंत देवी के चरणों में ले चलिए!'

सत्यवर (पुत्र)

पिताजी! राजा के प्राणों के लिए मेरा सिर देवी को अर्पित कीजिए!

Panel 12
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दृश्य 4

चंडी देवी का मंदिर और चार आत्मबलिदान

The Altar of Chandi & The Four Sacrifices
Veervara, his wife Dharmavati, son Satyavara, and daughter walking to Chandi's temple

वीरवर, उसकी पत्नी धर्मवती, पुत्र सत्यवर और नन्हीं पुत्री चारों आधी रात चंडी देवी के प्राचीन मंदिर पहुँचे। राजा शूद्रक भी छिपकर यह सब देख रहे थे।

Panel 13
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Mystic inner sanctum of Goddess Chandi illuminated by torches

मंदिर के गर्भगृह में चंडी देवी की महाकाली रूपी उग्र प्रतिमा के समक्ष सबने हाथ जोड़कर प्रार्थना की।

Panel 14
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Veervara severing Satyavara's head before the altar in devotion for the King
वीरवर
जय माँ चंडी! राजा शूद्रक शतायु हों!

वीरवर ने तलवार निकाली और एक ही झटके में अपने वीर पुत्र सत्यवर का सिर काटकर देवी के चरणों में अर्पित कर दिया!

वीरवर

जय माँ चंडी! राजा शूद्रक शतायु हों!

Panel 15
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Mother Dharmavati and daughter collapsing in death and sacrifice beside the boy

पुत्र का बलिदान देखकर माता धर्मवती और पुत्री ने भी पुत्र के शव से लिपटकर प्राण त्याग दिए!

Panel 16
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Veervara severing his own head with both hands before the altar of Goddess Chandi

समस्त परिवार को निष्प्राण देखकर वीरवर बोला: 'अब मेरा जीवन भी राजा और परिवार के बिना व्यर्थ है!' और उसने उसी तलवार से अपना मस्तक भी काट लिया!

Panel 17
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King Shudraka emerging from behind the pillar weeping uncontrollably

खंभे की ओट में खड़े राजा शूद्रक फूट-फूटकर रो पड़े: 'हाय! मेरे जैसे नश्वर राजा के लिए इस महापुरुष ने अपना पूरा कुल मिटा दिया!'

Panel 18
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दृश्य 5

राजा का आत्मबलिदान और देवी का वरदान

The King
King Shudraka raising his sword to his own throat to die for his servant
राजा शूद्रक
हे देवी! मैं भी अपना शीश आपके चरणों में अर्पित करता हूँ!

राजा ने अपनी तलवार निकाली: 'अपने सेवक के रक्त पर जीवित रहना नरक के समान है!' और ज्योंही राजा अपनी गर्दन पर तलवार चलाने लगे...

राजा शूद्रक

हे देवी! मैं भी अपना शीश आपके चरणों में अर्पित करता हूँ!

Panel 19
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Goddess Chandi manifesting in four-armed golden glory grasping the King's blade
भगवती चंडी
राजन! वर मांगो, मैं तेरी निष्कामता से प्रसन्न हूँ!

तभी साक्षात् भगवती चंडी दिव्य स्वर्णिम प्रकाश में प्रकट हुईं और उन्होंने राजा का हाथ पकड़ लिया: 'रुक जा राजन! मैं तेरे और वीरवर के अनुपम त्याग से अत्यंत प्रसन्न हूँ!'

भगवती चंडी

राजन! वर मांगो, मैं तेरी निष्कामता से प्रसन्न हूँ!

Panel 20
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Goddess Chandi resurrecting Veervara, Dharmavati, Satyavara, and daughter with divine nectar

राजा ने रोते हुए कहा: 'माता! मुझे केवल वीरवर और उसके परिवार का जीवन लौटा दीजिए!' देवी ने अमृत बरसाया और वीरवर का पूरा परिवार जीवित उठ बैठा!

Panel 21
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King Shudraka quietly slipping away into the night shadows back to the palace

परिवार को सुखी और जीवित देखकर, राजा शूद्रक चुपके से रात के अंधेरे में महल लौट आए और अपने कक्ष में चले गए।

Panel 22
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दृश्य 6

मालवा का राजतिलक और महाराज विक्रम का अमर निर्णय

The Coronation of Malwa & Vikram
Next morning in court King Shudraka asks Veervara who modestly downplays his deed

अगली सुबह दरबार में जब राजा ने रात का हाल पूछा, तो वीरवर ने अपनी बड़ाई छिपाकर कहा: 'राजन, एक दुखी स्त्री थी जो देवी की कृपा से शांत होकर चली गई।'

Panel 23
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King Shudraka weeping in court embracing Veervara and crowning him King of Malwa
राजा शूद्रक
वीरवर! तुम सेवक नहीं, इस पृथ्वी के सबसे महान राजा हो! यह मालवा का सिंहासन तुम्हारा है!

राजा ने भरी सभा में रोते हुए रात का सारा सत्य सुनाया, वीरवर को गले लगाया और उसे मालवा का राजा बनाकर स्वर्ण-मुकुट पहना दिया!

राजा शूद्रक

वीरवर! तुम सेवक नहीं, इस पृथ्वी के सबसे महान राजा हो! यह मालवा का सिंहासन तुम्हारा है!

Panel 24
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In the midnight forest Betal whisper-challenging King Vikramaditya on the greatest sacrifice
Betal
राजन! कर्तव्य और त्याग में किसका बड़प्पन सर्वोच्च है?

बेताल ने पूछा: 'बताओ विक्रमादित्य! वीरवर, उसकी पत्नी, बालक सत्यवर और राजा शूद्रक—इन चारों में सबसे बड़ा और निष्काम त्याग किसका था? उत्तर जानते हुए मौन रहे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा!'

Betal

राजन! कर्तव्य और त्याग में किसका बड़प्पन सर्वोच्च है?

Panel 25
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King Vikramaditya standing resolute in the dark moonless Amavasya jungle turning back to retrieve Betal
King Vikramaditya
सम्राट होकर भी सेवक के लिए प्राण न्योछावर करना ही निष्काम त्याग का शिखर है!

महाराज विक्रमादित्य ने उत्तर दिया: 'राजा शूद्रक का त्याग सर्वश्रेष्ठ था! वीरवर और उसके परिवार ने राजा का अन्न और भारी वेतन लिया था, अतः उन्होंने स्वामी-भक्ति का कर्तव्य निभाया। किंतु राजा शूद्रक का किसी पर कोई ऋण नहीं था—एक चक्रवर्ती सम्राट होकर भी अपने सेवक के लिए राज्य और प्राण त्याग देना ही सर्वोच्च निष्काम त्याग है!'

King Vikramaditya

सम्राट होकर भी सेवक के लिए प्राण न्योछावर करना ही निष्काम त्याग का शिखर है!

Panel 26
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