चतुर्थ बेताल: वीरवर का आत्मबलिदान और राजा शूद्रक का त्याग
The Incomparable Sacrifice of Veervara
चौथी चढ़ाई और शोभावती का राजा
The Fourth Retrieval & The King of Shobhavati
महाराज विक्रमादित्य ने पुनः उसी अंधकारमय श्मशान में जाकर शीशम के वृक्ष से बेताल के शव को उतारा और कंधे पर लादकर चल पड़े। बेताल ने कहा: 'राजन! मार्ग-विनोद के लिए राजा शूद्रक और अद्वितीय वीरवर की यह अमर गाथा सुनो!'
राजन! कर्तव्य और त्याग की पराकाष्ठा क्या होती है, यह इस कथा से समझो!

शोभावती के प्रजापालक राजा शूद्रक के दरबार में मालवा से वीरवर नाम का तेजस्वी राजपूत अपनी पत्नी धर्मवती, आठ वर्षीय पुत्र सत्यवर और पुत्री वीरवती के साथ सेवा हेतु उपस्थित हुआ।

वीरवर ने अपने वेतन के रूप में प्रतिदिन 500 स्वर्णमुद्राओं की भारी मांग रखी। राजा ने उसके असाधारण व्यक्तित्व और तेज को देखकर यह शर्त स्वीकार कर ली।
महाराज! मेरी तलवार और प्राण आपके राज्य की रक्षा के लिए सदैव समर्पित रहेंगे!
गुप्त दान और तूफानी रात का विलाप
The Secret Charities & The Midnight Weeping
राजा के गुप्तचरों ने देखा कि वीरवर उन 500 मुद्राओं में से 100 मंदिर-देवताओं को, 100 अनाथ-दीन दुखियों को, 100 अस्त्र-शस्त्रों को और 100 दान में देकर मात्र 100 से अपने परिवार का निर्वाह करता था!

वीरवर नित्य सिंहद्वार पर तलवार हाथ में लिए खड़ा रहता—धूप हो, कड़ाके की ठंड हो या मूसलाधार बारिश, वह पलक भी नहीं झपकाता था।

एक दिन भादों की घोर अंधेरी आधी रात को मूसलाधार बारिश और गरजती बिजली के बीच दूर से किसी स्त्री के अत्यंत कारुणिक विलाप की आवाज गूंजने लगी!

महल की छत से राजा ने पुकारा: 'सिंहद्वार पर कौन पहरा दे रहा है?' वीरवर ने उत्तर दिया: 'महाराज, आपका सेवक वीरवर उपस्थित है!'
वीरवर! जाओ और पता लगाओ कि इस भयानक रात में कौन रो रहा है!
राज्यलक्ष्मी का प्राकट्य और महाभविष्यवाणी
The Encounter with Goddess Rajyalakshmi
वीरवर तलवार और मशाल लेकर घनघोर अंधेरे में निकल पड़ा। राजा शूद्रक भी कौतुकवश छिपकर उसके पीछे-पीछे चल पड़े।

सरोवर-तट पर वीरवर ने एक स्वर्णिम कांति वाली दिव्य देवी को विलाप करते देखा। उसने पूछा: 'हे देवी! आप कौन हैं और क्यों रो रही हैं?'
मैं राजा शूद्रक की राज्यलक्ष्मी हूँ! तीसरे दिन राजा की मृत्यु निश्चित है, इसलिए मैं विलाप कर रही हूँ!

देवी ने कहा: 'यदि कोई वीर सेवक अपने आठ वर्षीय पुत्र सत्यवर का सिर काटकर चंडी देवी को अर्पित कर दे, तो राजा शूद्रक सौ वर्ष तक जीवित रहेंगे!'

वीरवर तुरंत घर पहुँचा और अपनी पत्नी धर्मवती तथा पुत्र सत्यवर को सारी बात बताई।

आठ वर्षीय बालक सत्यवर ने गर्व से हाथ जोड़े: 'पिताजी! राजा हमारे अन्नदाता हैं। उनके प्राणों के लिए अपने प्राण देना तो मेरा परम सौभाग्य है! मुझे तुरंत देवी के चरणों में ले चलिए!'
पिताजी! राजा के प्राणों के लिए मेरा सिर देवी को अर्पित कीजिए!
चंडी देवी का मंदिर और चार आत्मबलिदान
The Altar of Chandi & The Four Sacrifices
वीरवर, उसकी पत्नी धर्मवती, पुत्र सत्यवर और नन्हीं पुत्री चारों आधी रात चंडी देवी के प्राचीन मंदिर पहुँचे। राजा शूद्रक भी छिपकर यह सब देख रहे थे।

मंदिर के गर्भगृह में चंडी देवी की महाकाली रूपी उग्र प्रतिमा के समक्ष सबने हाथ जोड़कर प्रार्थना की।

वीरवर ने तलवार निकाली और एक ही झटके में अपने वीर पुत्र सत्यवर का सिर काटकर देवी के चरणों में अर्पित कर दिया!
जय माँ चंडी! राजा शूद्रक शतायु हों!

पुत्र का बलिदान देखकर माता धर्मवती और पुत्री ने भी पुत्र के शव से लिपटकर प्राण त्याग दिए!

समस्त परिवार को निष्प्राण देखकर वीरवर बोला: 'अब मेरा जीवन भी राजा और परिवार के बिना व्यर्थ है!' और उसने उसी तलवार से अपना मस्तक भी काट लिया!

खंभे की ओट में खड़े राजा शूद्रक फूट-फूटकर रो पड़े: 'हाय! मेरे जैसे नश्वर राजा के लिए इस महापुरुष ने अपना पूरा कुल मिटा दिया!'
राजा का आत्मबलिदान और देवी का वरदान
The King
राजा ने अपनी तलवार निकाली: 'अपने सेवक के रक्त पर जीवित रहना नरक के समान है!' और ज्योंही राजा अपनी गर्दन पर तलवार चलाने लगे...
हे देवी! मैं भी अपना शीश आपके चरणों में अर्पित करता हूँ!

तभी साक्षात् भगवती चंडी दिव्य स्वर्णिम प्रकाश में प्रकट हुईं और उन्होंने राजा का हाथ पकड़ लिया: 'रुक जा राजन! मैं तेरे और वीरवर के अनुपम त्याग से अत्यंत प्रसन्न हूँ!'
राजन! वर मांगो, मैं तेरी निष्कामता से प्रसन्न हूँ!

राजा ने रोते हुए कहा: 'माता! मुझे केवल वीरवर और उसके परिवार का जीवन लौटा दीजिए!' देवी ने अमृत बरसाया और वीरवर का पूरा परिवार जीवित उठ बैठा!

परिवार को सुखी और जीवित देखकर, राजा शूद्रक चुपके से रात के अंधेरे में महल लौट आए और अपने कक्ष में चले गए।
मालवा का राजतिलक और महाराज विक्रम का अमर निर्णय
The Coronation of Malwa & Vikram
अगली सुबह दरबार में जब राजा ने रात का हाल पूछा, तो वीरवर ने अपनी बड़ाई छिपाकर कहा: 'राजन, एक दुखी स्त्री थी जो देवी की कृपा से शांत होकर चली गई।'

राजा ने भरी सभा में रोते हुए रात का सारा सत्य सुनाया, वीरवर को गले लगाया और उसे मालवा का राजा बनाकर स्वर्ण-मुकुट पहना दिया!
वीरवर! तुम सेवक नहीं, इस पृथ्वी के सबसे महान राजा हो! यह मालवा का सिंहासन तुम्हारा है!

बेताल ने पूछा: 'बताओ विक्रमादित्य! वीरवर, उसकी पत्नी, बालक सत्यवर और राजा शूद्रक—इन चारों में सबसे बड़ा और निष्काम त्याग किसका था? उत्तर जानते हुए मौन रहे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा!'
राजन! कर्तव्य और त्याग में किसका बड़प्पन सर्वोच्च है?

महाराज विक्रमादित्य ने उत्तर दिया: 'राजा शूद्रक का त्याग सर्वश्रेष्ठ था! वीरवर और उसके परिवार ने राजा का अन्न और भारी वेतन लिया था, अतः उन्होंने स्वामी-भक्ति का कर्तव्य निभाया। किंतु राजा शूद्रक का किसी पर कोई ऋण नहीं था—एक चक्रवर्ती सम्राट होकर भी अपने सेवक के लिए राज्य और प्राण त्याग देना ही सर्वोच्च निष्काम त्याग है!'
सम्राट होकर भी सेवक के लिए प्राण न्योछावर करना ही निष्काम त्याग का शिखर है!