द्वितीय बेताल: तीन प्रेमी, तीन मार्ग और संजीवनी विद्या
The Three Suitors & The Sanjeevani Resurrection
दूसरी चढ़ाई और ब्रह्मस्थल की रूपवती कन्या
The Second Retrieval & The Maiden of Brahmashthala
राजा विक्रमादित्य ने पुनः उसी भयानक श्मशान में जाकर शीशम के वृक्ष से बेताल के शव को उतारा और कंधे पर लादकर चल पड़े। बेताल ने कहा: 'राजन! तुम्हारा यह अद्वितीय धैर्य देखकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। लो, मार्ग का श्रम मिटाने के लिए यह रोचक कथा सुनो!'
राजन! प्रेम की पराकाष्ठा और त्याग का रहस्य इस कथा में छिपा है!

यमुना-तट पर स्थित ब्रह्मस्थल नगर के अग्निहोत्री ब्राह्मण केशव की 'मंदारवती' नाम की एक कन्या थी, जो रूप और लावण्य में साक्षात् अप्सरा के समान अनुपम थी।

मंदारवती का रूप और सदाचार ऐसा था कि जो भी उसे देखता, मुग्ध हो जाता। उसके पिता उसके योग्य वर की खोज में चिंतित रहते थे।
विद्या और शील ही कन्या का वास्तविक आभूषण हैं।
तीन गुणी वर और पिता का धर्मसंकट
The Three Suitors & The Father
उसके विवाह योग्य होने पर तीन रूपवान, विद्वान और शूरवीर ब्राह्मण युवक—चंद्रकांत, सोमदत्त और हरिस्वामी—एक साथ विवाह का प्रस्ताव लेकर केशव के पास पहुंचे।
हे विप्रवर! हम तीनों में से जो भी आपको योग्य लगे, उसे अपनी कन्या का पाणिग्रहण करने की अनुमति दीजिए!

प्रथम वर 'चंद्रकांत' परम निष्ठावान और मूक प्रेमी था, जिसका हृदय केवल मंदारवती के सुख के लिए समर्पित था।

द्वितीय वर 'सोमदत्त' वेदों का प्रकांड ज्ञाता और पवित्र तीर्थ-व्रती था, जो धर्म और तप में लीन रहता था।

तृतीय वर 'हरिस्वामी' निर्भीक, साहसी और गुप्त विद्याओं का अन्वेषक था, जो असंभव को संभव करने का सामर्थ्य रखता था।

पिता केशव घोर धर्मसंकट में पड़ गए—तीनों युवक रूप, कुल, विद्या और शील में एक समान थे! किसी एक को कन्या देने पर शेष दो के प्राण त्यागने का भय था।
तीनों ही अद्वितीय गुणवान हैं... किसे चुनूं और किसे मना करूं? यह कैसा विचित्र धर्मसंकट है!
काल-सर्प का दंश और देह-संरक्षण का संकल्प
The Fatal Cobra Strike & The Vow of Preservation
किंतु निर्णय होने से पूर्व ही एक दिन गोधूलि वेला में बगिया में फूल चुनते समय एक विषैले काले नाग ने मंदारवती के पैर में डस लिया!

विष का प्रभाव इतनी तीव्र गति से फैला कि मंदारवती तुरंत अचेत होकर गिर पड़ी और उसके प्राण-पखेरू उड़ गए!

राजवैद्य और तांत्रिक विष-चिकित्सक दौड़े आए, किंतु समस्त मन्त्र और औषधियां निष्फल रहीं। परिजनों में हाहाकार मच गया।

तीनों प्रेमी युवक वहां पहुंचे। उन्होंने मंदारवती की देह को अग्नि में भस्म करने से मना कर दिया और सुगंधित तेलों व फूलों से उसके शरीर को सुरक्षित रखने का संकल्प लिया!
हम अपनी प्राणवल्लभा को भस्म नहीं होने देंगे! हम तीनों अलग-अलग मार्गों से इसकी रक्षा करेंगे!
प्रेम के तीन मार्ग: साधना, तीर्थ और विद्या-खोज
The Three Paths of Devotion
प्रथम प्रेमी 'चंद्रकांत' ने वहीं एक कुटिया बनाकर दिन-रात मंदारवती के शव के पास पहरा दिया, उसे ताजे फूलों से ढका और उसकी सेवा में लीन रहा।
जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मैं इस देह की रक्षा अपनी आँखों की पलकों की तरह करूँगा।

द्वितीय प्रेमी 'सोमदत्त' संन्यासी बनकर गंगा के समस्त पवित्र तीर्थों की यात्रा पर निकल पड़ा, ताकि मंदारवती की आत्मा की शांति और मुक्ति हेतु पुण्य अर्जित कर सके।

तृतीय प्रेमी 'हरिस्वामी' मृत-संजीवनी विद्या की खोज में हिमालय के दुर्गम हिमाच्छादित शिखरों और सिद्ध गुफाओं की ओर निकल पड़ा।

महीनों की कठिन तपस्या के बाद वह एक सिद्ध महायोगी की गुफा में पहुँचा और उनकी सेवा में लीन हो गया।
संजीवनी विद्या की प्राप्ति और घर वापसी
The Sanjeevani Secret & The Race Against Time
एक दिन एक विलाप करती माता अपने मृत बालक को लेकर आई। योगी ने एक प्राचीन ताड़पत्र से संजीवनी मन्त्र पढ़कर जल छिड़का, और बालक जीवित उठ बैठा!

हरिस्वामी ने उस गुप्त संजीवनी मन्त्र को कंठस्थ कर लिया और उस पावन ग्रन्थ की प्रतिलिपि बनाकर अपने हृदय से लगा ली!
मेरी तपस्या सफल हुई! अब मंदारवती पुनः जीवित होगी!

दिन-रात दौड़े हुए हरिस्वामी पहाड़ों और नदियों को पार कर पुनः ब्रह्मस्थल नगरी पहुँचा।

कुटिया में पहुँचकर उसने देखा कि चंद्रकांत अब भी निष्ठा से पहरा दे रहा था और सोमदत्त भी तीर्थों का पवित्र गंगाजल लेकर ठीक उसी समय लौटा था!
पुनर्जीवन का चमत्कार और विवाह का विवाद
The Golden Resurrection & The Great Dispute
हरिस्वामी ने संजीवनी मन्त्र का उच्च स्वर में पाठ किया और सोमदत्त ने उस पर पवित्र गंगाजल छिड़का!
ॐ ह्रीं संजीवनी प्राणाया स्वाहा!

चमत्कार हुआ! दिव्य स्वर्णिम प्रकाश के साथ मंदारवती के अंगों में रक्त दौड़ा, उसके गालों पर लाली लौटी और वह ऐसे उठ बैठी जैसे सुखद नींद से जागी हो!

मंदारवती को जीवित देखकर नगर में जयजयकार हुई। किंतु तुरंत ही तीनों युवकों में यह भीषण विवाद छिड़ गया कि मंदारवती का विवाह किससे होगा!

हरिस्वामी बोला: 'मेरे मन्त्र ने प्राण दिए!', सोमदत्त बोला: 'मेरे गंगाजल ने पवित्र किया!', चंद्रकांत बोला: 'यदि मैं इसके शरीर की रक्षा न करता, तो तुम मन्त्र किस पर पढ़ते?!'
बेताल का यक्ष-प्रश्न और महाराज विक्रम का अमर निर्णय
The Riddle of Kinship & Vikram
श्मशान के अंधकार में बेताल ने कथा रोककर राजा विक्रमादित्य से प्रश्न किया।
बताओ विक्रमादित्य! इन तीनों में से मंदारवती का वास्तविक पति कौन हुआ? उत्तर जानते हुए मौन रहे तो तुम्हारा मस्तक फट जाएगा!

महाराज विक्रमादित्य ने उत्तर दिया: 'जिसने मन्त्र से नया जीवन दिया, वह जीवनदाता होने के कारण उसका 'पिता' हुआ। जिसने तीर्थों का जल छिड़ककर संस्कार किया, वह 'पुत्र' के समान हुआ। किंतु जिसने उसके मृत शरीर को छोड़े बिना, दिन-रात कुटिया में रहकर अनन्य प्रेम से उसकी देह की रक्षा की, वही उसका सच्चा प्रेमी और धर्मसम्मत 'पति' हुआ! अतः मंदारवती चंद्रकांत की पत्नी हुई!'
जीवन देने वाला पिता है, संस्कार करने वाला पुत्र है, किंतु अनन्य प्रेम से देह की रक्षा करने वाला ही सच्चा पति है!

निर्णय सुनते ही राजा का मौन पुनः भंग हो गया! बेताल ठहाका लगाते हुए धुएँ की भांति उड़कर पुनः शीशम के पेड़ पर जा लटका।
अचूक न्याय, राजन! चंद्रकांत ही सच्चा पति है! किंतु तुम्हारा मौन टूटा—और मैं चला! खे-खे-खे!

अमावस की घोर अंधियारी रात में, बीहड़ और भयानक श्मशान वन में महाराज विक्रमादित्य बिना थके, दृढ़ संकल्प के साथ पुनः बेताल को पकड़ने चल पड़े।
तुम जितनी बार भागोगे बेताल, मैं उतनी बार आऊँगा—क्षत्रिय अपना वचन कभी नहीं छोड़ता!