एकादश बेताल: हरिस्यामी और दान के भोजन में विष
The Sage Hariswami & The Poison in the Alms Bowl
ग्यारहवीं चढ़ाई और क्षुधातुर विप्र हरिस्यामी
The Eleventh Retrieval & The Starving Pilgrim
ग्यारहवीं बार महाराज विक्रमादित्य श्मशान भूमि के भयावह सन्नाटे में शीशम के वृक्ष पर चढ़े, बेताल के शव को नीचे उतारा और दृढ़ता से अपने कंधे पर लादकर मौन भाव से चल पड़े।
राजन! तुम्हारा धैर्य पर्वत जैसा है! मार्ग का श्रम दूर करने के लिए सुनो, कर्म, नियति और पाप के सबसे गूढ़ धर्मसंकट की यह कथा!

पद्मावती नगरी में हरिस्यामी नाम का एक परम ज्ञानी और सदाचारी विप्र रहता था। भाग्य के फेर से उसकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई और वह भिक्षाटन करते हुए दूर देश के मार्ग पर निकल पड़ा।

ज्येष्ठ मास की चिलचिलाती धूप में कई दिनों के उपवास से दुर्बल होकर हरिस्यामी एक समृद्ध ग्राम के एक गृहस्थ के द्वार पर गिर पड़ा। कंठ सूख चुका था और प्राण कंठगत थे।
हे ईश्वर... कोई पुण्यात्मा है इस गृह में? इस थके हुए विप्र को एक घूंट जल और थोड़ा अन्न देकर प्राण रक्षा कीजिए...

उस घर की स्वामिनी एक परम सुशील और धर्मपरायण ब्राह्मण स्त्री थी। द्वार पर मूर्छित अतिथि को देखकर उसका हृदय दया और सेवाभाव से भर उठा।
हे विप्रवर! धैर्य रखिए! हमारे द्वार पर आया अतिथि साक्षात नारायण रूप है। उठिए, हाथ-मुख धोकर विश्राम कीजिए, मैं अभी आपके लिए ताजी खीर लाती हूँ!
अमृतमयी खीर और आकाश का काल
The Fatal Gift & The Shadow Above
पुण्यात्मा स्त्री ने गाय के शुद्ध दूध और सुगंधित चावल से अत्यंत स्वादिष्ट खीर बनाई और उसे ठंडा होने के लिए खुले आंगन में एक ऊंचे पाषाण-पटल पर रख दिया।

उसी क्षण आकाश मार्ग से एक विशाल गरुड़ पक्षी अपने पंजों में एक भयानक विषधर काले नाग को दबोचे हुए अपने घोंसले की ओर तीव्र गति से उड़ता हुआ जा रहा था।

गरुड़ के तीक्ष्ण पंजों की असह्य पीड़ा से छटपटाते हुए मरणासन्न सर्प ने फुफकार छोड़ी और उसके विषदंतों से हलाहल विष की बूंदें टपक पड़ीं।

नियति का क्रूर खेल देखिए—आकाश से गिरी वह विष की घातक बूंद सीधे आंगन में रखी दूध की खीर में जा गिरी और उसमें अदृश्य होकर विलीन हो गई! न स्त्री ने देखा, न पक्षी को ज्ञात हुआ!
प्राणघाती भोजन और आकस्मिक मृत्यु
The Fatal Feast & The Tragic Collapse
हाथ-पैर धोकर तृप्त मन से हरिस्यामी भोजन के लिए बैठा। उसने अन्नदाता का आभार माना, देवताओं को भोग अर्पित किया और बड़े चाव से खीर खाने लगा।
अन्नदाता सुखी भव! हे देवी, तुम्हारी यह अमृतमयी खीर मेरे क्षीण प्राणों में नया जीवन भर देगी!

किंतु जैसे ही खीर के कुछ ग्रास उसके उदर में पहुंचे, नाग के महाविष ने अपना भयानक प्रभाव दिखाना आरंभ कर दिया। हरिस्यामी की नसें नीली पड़ने लगीं और उसका दम घुटने लगा।
आह... मेरे कंठ में यह कैसी अग्नि प्रज्वलित हो उठी... मेरे प्राण... हे नारायण!

कुछ ही क्षणों में छटपटाते हुए धर्मनिष्ठ विप्र हरिस्यामी ने आंगन के पाषाण पर दम तोड़ दिया। अमृत बनकर आया भोजन उसके लिए काल का ग्रास बन चुका था!

जब गृहणी जल का पात्र लेकर बाहर आई, तो अतिथि को मृत पाकर उसके पैरों तले धरती खिसक गई। वह चीख मारकर धरती पर गिर पड़ी और विलाप करने लगी।
हे विधाता! यह क्या अनर्थ हो गया! मैंने तो नारायण जानकर भोजन कराया था, यह महाप्रलय कैसे हुआ?!
भीड़ का अंधा आक्रोश और कलंक का प्रहार
The Mob
स्त्री का क्रंदन सुनकर आस-पास के ग्रामीण और दंभी पंडित आंगन में एकत्र हो गए। मृत ब्राह्मण को देखकर सभी ने बिना सोचे-समझे उस बेकसूर स्त्री पर विष देने का आरोप मढ़ दिया।
पापिनी! तूने एक भूखे, निष्पाप ब्राह्मण को विष देकर मार डाला! तूने ब्रह्म-हत्या का घोर महापाप किया है!

स्त्री हाथ जोड़कर अपने निर्दोष होने की दुहाई देती रही, किंतु अंध समाज ने उसकी एक न सुनी। उन्होंने उसे 'ब्रह्मघातिनी' कहकर धिक्कारा।
ईश्वर की सौगंध! मैंने कोई विष नहीं दिया! मैंने तो केवल श्रद्धा से खीर परोसी थी! मुझ पर यह झूठा कलंक मत लगाओ!

गांव के लोगों ने उस निर्दोष, परोपकारी स्त्री का तिरस्कार कर उसे गांव से निष्कासित कर दिया। वह रोती-बिलखती निर्जन वनों की ओर चल पड़ी।

एक अनजाने संयोग ने चार प्राणियों को कर्म के विचित्र जाल में बांध दिया था—दान देने वाली स्त्री, आहार खोजने वाला गरुड़, पीड़ा में छटपटाता सर्प और भोजन करने वाला ब्राह्मण!
कर्म की गूढ़ पहेली और धर्मसंकट
The Cosmic Web of Karma & The Insoluble Dilemma
संसार के नियम विचित्र हैं—पक्षी ने केवल अपनी स्वाभाविक भूख मिटाने के लिए सर्प का शिकार किया था, और सर्प ने असह्य पीड़ा में अनजाने में विष उड़ेला था। किसी के मन में हत्या का संकल्प नहीं था।

उधर समाज के तथाकथित धर्मध्वजियों ने बिना सत्य जाने, बिना अनुसंधान किए, केवल अपनी संकीर्ण बुद्धि से एक निष्पाप, दानी स्त्री को हत्यारी घोषित कर दिया था।

श्मशान भूमि के घोर अंधकार में, जलती चिताओं के बीच चलते हुए बेताल ने इस मार्मिक गाथा का समापन किया और राजा के कान में फुसफुसाया।

बेताल ने अपनी तीखी, व्यंग्यपूर्ण वाणी में राजा से वह ऐतिहासिक प्रश्न पूछा जिसका उत्तर केवल साक्षात धर्मराज ही दे सकते थे।
राजन! अब बताओ, इस निर्दोष ब्राह्मण हरिस्यामी की हत्या का घोर ब्रह्म-हत्या पाप किस पर लगेगा?
बेताल का प्रश्न, विक्रम का निर्णय और पलायन
The Riddle, The Verdict, & The Flight
बेताल ने राजा को चेतावनी देते हुए प्रश्न का विस्तार किया।
क्या यह पाप उस दानी स्त्री पर लगेगा जिसने खीर दी? गरुड़ पर जिसने सर्प पकड़ा? या सर्प पर जिसने विष छोड़ा? यदि जानते हुए भी सही उत्तर नहीं दिया, तो तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे!

महाराज विक्रमादित्य ने गंभीर और ओजस्वी वाणी में उत्तर दिया: 'शास्त्रों और धर्म के अनुसार पाप का मूल दुर्भावना और संकल्पात्मक चेतना (Intention) में होता है!'
उस पुण्यात्मा स्त्री ने परोपकार और सेवाभाव से भोजन दिया, अतः वह पूर्णतः निष्पाप है। गरुड़ ने केवल अपनी स्वाभाविक क्षुधा मिटाने के लिए शिकार किया, अतः वह भी निर्दोष है। मरणासन्न सर्प ने असह्य पीड़ा में अनजाने में विष छोड़ा, उसका कोई संकल्प नहीं था। अतः इन तीनों में से किसी को भी ब्रह्म-हत्या का पाप नहीं लगेगा! यह घोर पाप उन दंभी, विवेकहीन ग्रामीणों पर लगेगा, जिन्होंने बिना प्रमाण के एक पवित्र और निर्दोष स्त्री पर झूठा कलंक लगाकर उसे प्रताड़ित किया! शास्त्रों का सिद्धांत है कि निर्दोष पर झूठा दोष मढ़ने वाले को ही उस कृत्य का सम्पूर्ण पाप भोगना पड़ता है!

सत्य और अचूक न्याय सुनते ही राजा का मौन पुनः खंडित हो गया! बेताल गगनभेदी अट्टहास करते हुए राजा के कंधे से छूटकर हवा में विलीन हो गया और पुनः शीशम के पेड़ पर जा लटका।
अद्भुत न्याय, राजन! झूठा दोष लगाने वाले ही वास्तविक पापी हैं! किंतु तुम्हारा मौन टूटा—और मैं चला! खे-खे-खे!

अमावस की घोर, भयानक रात्रि में श्मशान की प्रतिकूल परिस्थितियों की परवाह किए बिना, महाराज विक्रमादित्य ने अपनी चमचमाती तलवार खींची और पुनः बेताल को बांधने के लिए दृढ़ पगों से आगे बढ़ चले।
बेताल! न्याय से तुम भाग सकते हो, किंतु मेरे क्षत्रिय संकल्प से नहीं! मैं तुम्हें पुनः लाऊँगा!