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षोडश बेताल: राजा, ब्राह्मण-युवक और ब्रह्मराक्षस

बेताल पच्चीसी (सोमदेव भट्ट कृत)• katha

षोडश बेताल: राजा, ब्राह्मण-युवक और ब्रह्मराक्षस

The King, the Brahman Youth & The Demon

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दृश्य 1

सोलहवीं चढ़ाई और शिवपुर की गाथा

The Sixteenth Retrieval at Midnight
King Vikramaditya carrying the corpse of Betal across the haunted cremation ground under a tempestuous night sky
बेताल
राजन! त्याग और स्वामिभक्ति की पराकाष्ठा देखनी हो, तो शिवपुर के प्रतापी राजा चंद्रप्रभ और उस निष्कलंक ब्राह्मण युवक जीवधर की यह अमर गाथा सुनो!

अमावस्या की घोर अंधियारी रात में, महाराज विक्रमादित्य ने सोलहवीं बार शीशम के वृक्ष से बेताल के शव को उतारा और मौन रहकर कंधे पर लाद लिया। बेताल ने अपनी कुटिल हंसी के साथ एक नई गाथा प्रारंभ की।

बेताल

राजन! त्याग और स्वामिभक्ति की पराकाष्ठा देखनी हो, तो शिवपुर के प्रतापी राजा चंद्रप्रभ और उस निष्कलंक ब्राह्मण युवक जीवधर की यह अमर गाथा सुनो!

Panel 1
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King Chandraprabha holding court in his grand palace of Shivapura, radiating justice and benevolence
राजा चंद्रप्रभ
मेरी प्रजा की रक्षा ही मेरा एकमात्र धर्म है; उनका सुख ही मेरा सर्वस्व है!

शिवपुर नगरी में राजा चंद्रप्रभ धर्मपूर्वक शासन करते थे। उनकी प्रजा सुख-शांति से परिपूर्ण थी, और राजा अपनी प्रजा को संतान की भांति स्नेह करते थे।

राजा चंद्रप्रभ

मेरी प्रजा की रक्षा ही मेरा एकमात्र धर्म है; उनका सुख ही मेरा सर्वस्व है!

Panel 2
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Young Brahman youth Jivadhara in a hermitage study, calm, virtuous, and dedicated to truth
जीवधर
धर्म और सत्य की रक्षा के लिए यदि यह जीवन भी समर्पित करना पड़े, तो वह परम सौभाग्य होगा।

उसी राज्य में जीवधर नाम का एक युवा ब्राह्मण रहता था, जो वेदों का प्रकांड ज्ञाता होने के साथ-साथ परम सत्यनिष्ठ, निर्भय और राजा का अनन्य निष्ठावान भक्त था।

जीवधर

धर्म और सत्य की रक्षा के लिए यदि यह जीवन भी समर्पित करना पड़े, तो वह परम सौभाग्य होगा।

Panel 3
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दृश्य 2

मृगया-अभियान और शापित महावन

The Royal Hunt & The Cursed Forest
King Chandraprabha leading his royal hunting retinue through the lush ancient forest

एक दिवस महाराज चंद्रप्रभ अपनी सेना और चतुरंगिणी वाहिनी के साथ वन में आखेट के लिए निकले।

Panel 4
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A mystical golden stag leaping into the dark shrouded thicket of the forbidden forest
राजा चंद्रप्रभ
ऐसा अलौकिक मृग मैंने कभी नहीं देखा! मुझे इसे जीवित पकड़ना होगा!

अचानक राजा की दृष्टि एक अत्यंत मनोहारी स्वर्ण-मृग पर पड़ी, जो वायु वेग से घने दुर्गम वन की ओर भागा। राजा ने अकेले ही उसका पीछा किया।

राजा चंद्रप्रभ

ऐसा अलौकिक मृग मैंने कभी नहीं देखा! मुझे इसे जीवित पकड़ना होगा!

Panel 5
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King Chandraprabha riding into a sinister, gnarled ancient grove as darkness falls swiftly

मृग का पीछा करते हुए राजा अपनी सेना से बहुत दूर निकल गए और एक ऐसे निर्जन, अंधकारमय वन में पहुंच गए जहां पक्षियों का कलरव भी थम चुका था।

Panel 6
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Jivadhara catching up through the shadowy forest to accompany his beloved King
जीवधर
महाराज! यह वन अत्यंत शापित और भयानक प्रतीत होता है! कृपया आगे न बढ़ें!

राजा को अकेले जाते देख, निष्ठावान ब्राह्मण युवक जीवधर अपने अश्व पर सवार होकर उनके पीछे-पीछे उसी बीहड़ वन में आ पहुंचा।

जीवधर

महाराज! यह वन अत्यंत शापित और भयानक प्रतीत होता है! कृपया आगे न बढ़ें!

Panel 7
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दृश्य 3

भयानक ब्रह्मराक्षस का प्राकट्य

The Wrath of Brahma-Rakshasa Jvalamukha
The colossal Brahma-Rakshasa Jvalamukha manifesting amidst smoke, flame, and crackling lightning
ब्रह्मराक्षस ज्वालामुख
मूर्ख मानुष! मेरी शापित सीमा में प्रवेश करने का दुस्साहस किसने किया?! आज मेरी सहस्र वर्षों की क्षुधा तुम दोनों के रक्त और मांस से शांत होगी!

सहसा धरा कांप उठी! आकाश में काले मेघ उमड़ पड़े और ज्वाला उगलते मुख वाला, विशालकाय ब्रह्मराक्षस ज्वालामुख भयानक गर्जना करता हुआ प्रकट हुआ!

ब्रह्मराक्षस ज्वालामुख

मूर्ख मानुष! मेरी शापित सीमा में प्रवेश करने का दुस्साहस किसने किया?! आज मेरी सहस्र वर्षों की क्षुधा तुम दोनों के रक्त और मांस से शांत होगी!

Panel 8
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King Chandraprabha drawing his sword fearlessly to shield his companion from the demon
राजा चंद्रप्रभ
राक्षस! मैं शिवपुर का राजा चंद्रप्रभ हूँ! यदि तुझे युद्ध की तृष्णा है, तो पहले मुझसे टकरा!

राजा चंद्रप्रभ ने तुरंत अपनी चमचमाती तलवार खींच ली और निडर होकर राक्षस के समक्ष तनकर खड़े हो गए।

राजा चंद्रप्रभ

राक्षस! मैं शिवपुर का राजा चंद्रप्रभ हूँ! यदि तुझे युद्ध की तृष्णा है, तो पहले मुझसे टकरा!

Panel 9
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The demon shattering metal weapons with dark occult magic, mocking mortal steel
ब्रह्मराक्षस ज्वालामुख
हा-हा-हा! राजा, तुम्हारा लौह-खड्ग मेरी मायावी काया का कुछ नहीं बिगाड़ सकता! मुझे केवल एक स्वेच्छा से समर्पित श्रेष्ठ बलि चाहिए!

राक्षस ने एक विकट अट्टहास किया और एक ही वार से राजा के अस्त्र-शस्त्र निष्फल कर दिए। उसका तपोबल और दैत्य-बल किसी भी अस्त्र से अभेद्य था।

ब्रह्मराक्षस ज्वालामुख

हा-हा-हा! राजा, तुम्हारा लौह-खड्ग मेरी मायावी काया का कुछ नहीं बिगाड़ सकता! मुझे केवल एक स्वेच्छा से समर्पित श्रेष्ठ बलि चाहिए!

Panel 10
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The demon delivering his terrible ultimatum under the ominous twilight canopy

राक्षस ने गर्जना की: 'यदि तुममें से कोई एक स्वेच्छा से अपना मस्तक मेरे चरणों में अर्पित कर दे, तो मैं दूसरे को जीवित छोड़ दूंगा; अन्यथा दोनों को चीरकर खा जाऊंगा!'

Panel 11
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दृश्य 4

राजा चंद्रप्रभ का आत्म-बलिदान

The King
King Chandraprabha calmly taking off his royal crown and laying it upon the earth
राजा चंद्रप्रभ
हे राक्षस! इस निष्पाप ब्राह्मण युवक को छोड़ दे। मेरा यह राजसी शरीर तेरी क्षुधा शांत करने के लिए उपस्थित है!

राजा चंद्रप्रभ ने तनिक भी संकोच नहीं किया। उन्होंने अपने शीश से मुकुट उतारा और धरती पर रख दिया। उनके मुख पर मृत्यु का नहीं, बल्कि परम संतोष का तेज था।

राजा चंद्रप्रभ

हे राक्षस! इस निष्पाप ब्राह्मण युवक को छोड़ दे। मेरा यह राजसी शरीर तेरी क्षुधा शांत करने के लिए उपस्थित है!

Panel 12
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Jivadhara protesting in anguish as the King steps forward toward the demon
जीवधर
नहीं, महाराज! अनर्थ न करें! आपका जीवन इस पूरे साम्राज्य का जीवन है! आपके बिना लाखों प्रजा अनाथ हो जाएगी!

राजा का यह निर्णय सुनकर युवा जीवधर व्याकुल हो उठा। उसने आगे बढ़कर राजा के चरण पकड़ लिए।

जीवधर

नहीं, महाराज! अनर्थ न करें! आपका जीवन इस पूरे साम्राज्य का जीवन है! आपके बिना लाखों प्रजा अनाथ हो जाएगी!

Panel 13
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King Chandraprabha gently explaining the supreme duty of a ruler to the young scholar
राजा चंद्रप्रभ
यदि राजा अपने सेवक की रक्षा न कर सके, तो उस मुकुट और सिंहासन पर धिक्कार है!

राजा ने स्नेहपूर्वक जीवधर को उठाया और कहा: 'वत्स! क्षत्रिय और राजा का धर्म ही प्रजा के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं को अर्पित करना है।'

राजा चंद्रप्रभ

यदि राजा अपने सेवक की रक्षा न कर सके, तो उस मुकुट और सिंहासन पर धिक्कार है!

Panel 14
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King Chandraprabha offering his neck serenely beneath the demon's raised talons

राजा ने राक्षस के समक्ष जाकर अपने घुटने टेक दिए और आंखें मूंदकर ईश्वर का स्मरण करने लगे।

Panel 15
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दृश्य 5

जीवधर का महा-त्याग और राक्षस का हृदय-परिवर्तन

The Brahman Youth
Jivadhara leaping courageously in front of the demon's talons to shield King Chandraprabha
जीवधर
रुक, राक्षस! मेरा शरीर तेरे समक्ष है! एक साधारण ब्राह्मण के जाने से संसार की कोई हानि नहीं होगी, किंतु राजा जीवित रहेगा तो सहस्रों का कल्याण होगा!

जैसे ही राक्षस ने अपने भयानक पंजे उठाए, जीवधर बिजली की गति से झपटा और राजा के आगे अपनी छाती तानकर खड़ा हो गया!

जीवधर

रुक, राक्षस! मेरा शरीर तेरे समक्ष है! एक साधारण ब्राह्मण के जाने से संसार की कोई हानि नहीं होगी, किंतु राजा जीवित रहेगा तो सहस्रों का कल्याण होगा!

Panel 16
•
The colossal demon freezing his claws in mid-strike, struck by the unyielding devotion of the youth
ब्रह्मराक्षस ज्वालामुख
आश्चर्य! घोर आश्चर्य! मृत्यु के द्वार पर ऐसा त्याग और ऐसा प्रेम?! तुम दोनों में से कोई भी मृत्यु से तनिक भी भयभीत नहीं है!

राक्षस के भयानक हाथ हवा में ही ठिठक गए। उसने सहस्रों वर्षों में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था जहां दो मानव एक-दूसरे के लिए मृत्यु का वरण करने को होड़ लगा रहे हों!

ब्रह्मराक्षस ज्वालामुख

आश्चर्य! घोर आश्चर्य! मृत्यु के द्वार पर ऐसा त्याग और ऐसा प्रेम?! तुम दोनों में से कोई भी मृत्यु से तनिक भी भयभीत नहीं है!

Panel 17
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The Brahma-Rakshasa transforming into a radiant divine being as the ancient curse shatters
मुक्त आत्मा
हे निष्कलंक राजन और वीर ब्राह्मण! तुम्हारे अपूर्व त्याग ने मुझे पिशाच योनि से मुक्ति दिला दी! मैं तुम्हें दीर्घायु और अनंत यश का वरदान देता हूँ!

उन दोनों के निस्वार्थ और पावन त्याग के स्पर्श से राक्षस का क्रूर हृदय पिघल गया और उसका सहस्रों वर्षों का शाप तत्काल भस्म हो गया!

मुक्त आत्मा

हे निष्कलंक राजन और वीर ब्राह्मण! तुम्हारे अपूर्व त्याग ने मुझे पिशाच योनि से मुक्ति दिला दी! मैं तुम्हें दीर्घायु और अनंत यश का वरदान देता हूँ!

Panel 18
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King Chandraprabha embracing Jivadhara like a beloved son under the golden rays of dawn

शापमुक्त होकर वह दिव्य पुरुष स्वर्गलोक को प्रस्थान कर गया। राजा ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से जीवधर को गले से लगा लिया और उसे अपने हृदय का भाग बना लिया।

Panel 19
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दृश्य 6

अमावस्या की पहेली और महाराज विक्रम का अमर निर्णय

The Amavasya Riddle & King Vikramaditya
King Vikramaditya carrying Betal near the haunted Shinshapa tree as Betal poses the ultimate moral question
बेताल
राजन! अब न्याय करो! राजा चंद्रप्रभ और ब्राह्मण युवक जीवधर—इन दोनों में किसका त्याग श्रेष्ठ और अधिक कठिन था? यदि जानते हुए भी मौन रहे, तो तुम्हारा मस्तक शत-शत टुकड़ों में फट जाएगा!

कथा समाप्त कर बेताल ने श्मशान के सन्नाटे में तीखे स्वर में प्रश्न पूछा।

बेताल

राजन! अब न्याय करो! राजा चंद्रप्रभ और ब्राह्मण युवक जीवधर—इन दोनों में किसका त्याग श्रेष्ठ और अधिक कठिन था? यदि जानते हुए भी मौन रहे, तो तुम्हारा मस्तक शत-शत टुकड़ों में फट जाएगा!

Panel 20
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King Vikramaditya delivering his discerning philosophical judgment with utter composure
महाराज विक्रमादित्य
बेताल! ब्राह्मण युवक जीवधर का त्याग निसंदेह राजा से कहीं अधिक महान और दुर्लभ था!

महाराज विक्रमादित्य ने गंभीर और धीर वाणी में उत्तर दिया।

महाराज विक्रमादित्य

बेताल! ब्राह्मण युवक जीवधर का त्याग निसंदेह राजा से कहीं अधिक महान और दुर्लभ था!

Panel 21
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Vikram explaining the distinction between royal duty and voluntary selfless devotion

राजा का कर्तव्य और राजधर्म ही यह है कि वह प्रजा के लिए प्राण दे; वह राज्य के कर का उपभोग करता है और प्रजा की रक्षा का उत्तरदायित्व उठाता है। किंतु ब्राह्मण युवक पर ऐसा कोई वैधानिक भार नहीं था!

Panel 22
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Betal cackling wildly and flying high into the dark branches of the Shinshapa tree
बेताल
अद्भुत न्याय, राजन! किंतु तुम्हारा मौन टूट गया—और मैं चला पुनः अपने वृक्ष पर! आ सको तो पुनः पकड़ लो! खे-खे-खे!

जैसे ही राजा के मुख से सत्य वाणी निकली, उनका मौन-व्रत भंग हो गया! बेताल ने भयंकर अट्टहास किया और राजा के कंधे से फिसलकर पुनः शीशम के वृक्ष की शाखाओं में जा लटका!

बेताल

अद्भुत न्याय, राजन! किंतु तुम्हारा मौन टूट गया—और मैं चला पुनः अपने वृक्ष पर! आ सको तो पुनः पकड़ लो! खे-खे-खे!

Panel 23
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King Vikramaditya firmly gripping his sword and turning back into the haunted forest with unyielding resolve
महाराज विक्रमादित्य
बेताल! जब तक मेरा संकल्प पूर्ण नहीं होता, मैं विश्राम नहीं लूंगा!

महाराज विक्रमादित्य विचलित नहीं हुए। उन्होंने दृढ़ संकल्प के साथ अपनी खड्ग पुनः म्यान से खींची और बेताल को पुनः बंदी बनाने के लिए अंधकार में वृक्ष की ओर डग भर दिए!

महाराज विक्रमादित्य

बेताल! जब तक मेरा संकल्प पूर्ण नहीं होता, मैं विश्राम नहीं लूंगा!

Panel 24
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