षोडश बेताल: राजा, ब्राह्मण-युवक और ब्रह्मराक्षस
The King, the Brahman Youth & The Demon
सोलहवीं चढ़ाई और शिवपुर की गाथा
The Sixteenth Retrieval at Midnight
अमावस्या की घोर अंधियारी रात में, महाराज विक्रमादित्य ने सोलहवीं बार शीशम के वृक्ष से बेताल के शव को उतारा और मौन रहकर कंधे पर लाद लिया। बेताल ने अपनी कुटिल हंसी के साथ एक नई गाथा प्रारंभ की।
राजन! त्याग और स्वामिभक्ति की पराकाष्ठा देखनी हो, तो शिवपुर के प्रतापी राजा चंद्रप्रभ और उस निष्कलंक ब्राह्मण युवक जीवधर की यह अमर गाथा सुनो!

शिवपुर नगरी में राजा चंद्रप्रभ धर्मपूर्वक शासन करते थे। उनकी प्रजा सुख-शांति से परिपूर्ण थी, और राजा अपनी प्रजा को संतान की भांति स्नेह करते थे।
मेरी प्रजा की रक्षा ही मेरा एकमात्र धर्म है; उनका सुख ही मेरा सर्वस्व है!

उसी राज्य में जीवधर नाम का एक युवा ब्राह्मण रहता था, जो वेदों का प्रकांड ज्ञाता होने के साथ-साथ परम सत्यनिष्ठ, निर्भय और राजा का अनन्य निष्ठावान भक्त था।
धर्म और सत्य की रक्षा के लिए यदि यह जीवन भी समर्पित करना पड़े, तो वह परम सौभाग्य होगा।
मृगया-अभियान और शापित महावन
The Royal Hunt & The Cursed Forest
एक दिवस महाराज चंद्रप्रभ अपनी सेना और चतुरंगिणी वाहिनी के साथ वन में आखेट के लिए निकले।

अचानक राजा की दृष्टि एक अत्यंत मनोहारी स्वर्ण-मृग पर पड़ी, जो वायु वेग से घने दुर्गम वन की ओर भागा। राजा ने अकेले ही उसका पीछा किया।
ऐसा अलौकिक मृग मैंने कभी नहीं देखा! मुझे इसे जीवित पकड़ना होगा!

मृग का पीछा करते हुए राजा अपनी सेना से बहुत दूर निकल गए और एक ऐसे निर्जन, अंधकारमय वन में पहुंच गए जहां पक्षियों का कलरव भी थम चुका था।

राजा को अकेले जाते देख, निष्ठावान ब्राह्मण युवक जीवधर अपने अश्व पर सवार होकर उनके पीछे-पीछे उसी बीहड़ वन में आ पहुंचा।
महाराज! यह वन अत्यंत शापित और भयानक प्रतीत होता है! कृपया आगे न बढ़ें!
भयानक ब्रह्मराक्षस का प्राकट्य
The Wrath of Brahma-Rakshasa Jvalamukha
सहसा धरा कांप उठी! आकाश में काले मेघ उमड़ पड़े और ज्वाला उगलते मुख वाला, विशालकाय ब्रह्मराक्षस ज्वालामुख भयानक गर्जना करता हुआ प्रकट हुआ!
मूर्ख मानुष! मेरी शापित सीमा में प्रवेश करने का दुस्साहस किसने किया?! आज मेरी सहस्र वर्षों की क्षुधा तुम दोनों के रक्त और मांस से शांत होगी!

राजा चंद्रप्रभ ने तुरंत अपनी चमचमाती तलवार खींच ली और निडर होकर राक्षस के समक्ष तनकर खड़े हो गए।
राक्षस! मैं शिवपुर का राजा चंद्रप्रभ हूँ! यदि तुझे युद्ध की तृष्णा है, तो पहले मुझसे टकरा!

राक्षस ने एक विकट अट्टहास किया और एक ही वार से राजा के अस्त्र-शस्त्र निष्फल कर दिए। उसका तपोबल और दैत्य-बल किसी भी अस्त्र से अभेद्य था।
हा-हा-हा! राजा, तुम्हारा लौह-खड्ग मेरी मायावी काया का कुछ नहीं बिगाड़ सकता! मुझे केवल एक स्वेच्छा से समर्पित श्रेष्ठ बलि चाहिए!

राक्षस ने गर्जना की: 'यदि तुममें से कोई एक स्वेच्छा से अपना मस्तक मेरे चरणों में अर्पित कर दे, तो मैं दूसरे को जीवित छोड़ दूंगा; अन्यथा दोनों को चीरकर खा जाऊंगा!'
राजा चंद्रप्रभ का आत्म-बलिदान
The King
राजा चंद्रप्रभ ने तनिक भी संकोच नहीं किया। उन्होंने अपने शीश से मुकुट उतारा और धरती पर रख दिया। उनके मुख पर मृत्यु का नहीं, बल्कि परम संतोष का तेज था।
हे राक्षस! इस निष्पाप ब्राह्मण युवक को छोड़ दे। मेरा यह राजसी शरीर तेरी क्षुधा शांत करने के लिए उपस्थित है!

राजा का यह निर्णय सुनकर युवा जीवधर व्याकुल हो उठा। उसने आगे बढ़कर राजा के चरण पकड़ लिए।
नहीं, महाराज! अनर्थ न करें! आपका जीवन इस पूरे साम्राज्य का जीवन है! आपके बिना लाखों प्रजा अनाथ हो जाएगी!

राजा ने स्नेहपूर्वक जीवधर को उठाया और कहा: 'वत्स! क्षत्रिय और राजा का धर्म ही प्रजा के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं को अर्पित करना है।'
यदि राजा अपने सेवक की रक्षा न कर सके, तो उस मुकुट और सिंहासन पर धिक्कार है!

राजा ने राक्षस के समक्ष जाकर अपने घुटने टेक दिए और आंखें मूंदकर ईश्वर का स्मरण करने लगे।
जीवधर का महा-त्याग और राक्षस का हृदय-परिवर्तन
The Brahman Youth
जैसे ही राक्षस ने अपने भयानक पंजे उठाए, जीवधर बिजली की गति से झपटा और राजा के आगे अपनी छाती तानकर खड़ा हो गया!
रुक, राक्षस! मेरा शरीर तेरे समक्ष है! एक साधारण ब्राह्मण के जाने से संसार की कोई हानि नहीं होगी, किंतु राजा जीवित रहेगा तो सहस्रों का कल्याण होगा!

राक्षस के भयानक हाथ हवा में ही ठिठक गए। उसने सहस्रों वर्षों में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था जहां दो मानव एक-दूसरे के लिए मृत्यु का वरण करने को होड़ लगा रहे हों!
आश्चर्य! घोर आश्चर्य! मृत्यु के द्वार पर ऐसा त्याग और ऐसा प्रेम?! तुम दोनों में से कोई भी मृत्यु से तनिक भी भयभीत नहीं है!

उन दोनों के निस्वार्थ और पावन त्याग के स्पर्श से राक्षस का क्रूर हृदय पिघल गया और उसका सहस्रों वर्षों का शाप तत्काल भस्म हो गया!
हे निष्कलंक राजन और वीर ब्राह्मण! तुम्हारे अपूर्व त्याग ने मुझे पिशाच योनि से मुक्ति दिला दी! मैं तुम्हें दीर्घायु और अनंत यश का वरदान देता हूँ!

शापमुक्त होकर वह दिव्य पुरुष स्वर्गलोक को प्रस्थान कर गया। राजा ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से जीवधर को गले से लगा लिया और उसे अपने हृदय का भाग बना लिया।
अमावस्या की पहेली और महाराज विक्रम का अमर निर्णय
The Amavasya Riddle & King Vikramaditya
कथा समाप्त कर बेताल ने श्मशान के सन्नाटे में तीखे स्वर में प्रश्न पूछा।
राजन! अब न्याय करो! राजा चंद्रप्रभ और ब्राह्मण युवक जीवधर—इन दोनों में किसका त्याग श्रेष्ठ और अधिक कठिन था? यदि जानते हुए भी मौन रहे, तो तुम्हारा मस्तक शत-शत टुकड़ों में फट जाएगा!

महाराज विक्रमादित्य ने गंभीर और धीर वाणी में उत्तर दिया।
बेताल! ब्राह्मण युवक जीवधर का त्याग निसंदेह राजा से कहीं अधिक महान और दुर्लभ था!

राजा का कर्तव्य और राजधर्म ही यह है कि वह प्रजा के लिए प्राण दे; वह राज्य के कर का उपभोग करता है और प्रजा की रक्षा का उत्तरदायित्व उठाता है। किंतु ब्राह्मण युवक पर ऐसा कोई वैधानिक भार नहीं था!

जैसे ही राजा के मुख से सत्य वाणी निकली, उनका मौन-व्रत भंग हो गया! बेताल ने भयंकर अट्टहास किया और राजा के कंधे से फिसलकर पुनः शीशम के वृक्ष की शाखाओं में जा लटका!
अद्भुत न्याय, राजन! किंतु तुम्हारा मौन टूट गया—और मैं चला पुनः अपने वृक्ष पर! आ सको तो पुनः पकड़ लो! खे-खे-खे!

महाराज विक्रमादित्य विचलित नहीं हुए। उन्होंने दृढ़ संकल्प के साथ अपनी खड्ग पुनः म्यान से खींची और बेताल को पुनः बंदी बनाने के लिए अंधकार में वृक्ष की ओर डग भर दिए!
बेताल! जब तक मेरा संकल्प पूर्ण नहीं होता, मैं विश्राम नहीं लूंगा!