अष्टम बेताल: तीन अतिसुकुमार रानियां
The Three Delicate Queens of Dharmadhvaja
आठवीं चढ़ाई और तीन अतिसुकुमार रानियां
The Eighth Retrieval & The Ultra-Delicate Queens
आठवीं बार महाराज विक्रमादित्य ने श्मशान भूमि में शीशम के वृक्ष से बेताल को उतारा और कंधे पर लादकर चल पड़े। बेताल ने एक नई मनोरंजक कथा आरंभ की।
राजन! सुकुमारता और संवेदनशीलता की पराकाष्ठा क्या है, सुनो कांचनपुर के राजा धर्मध्वज की यह अद्भुत कथा!

कांचनपुर के प्रतापी राजा धर्मध्वज की तीन परम सुंदरी रानियां थीं—इंदुलेखा, तारावली और कुसुमावती। तीनों अपने अलौकिक सौंदर्य और अद्वितीय सुकुमारता के लिए विख्यात थीं।
मेरी तीनों रानियां नवपल्लवित पुष्पों से भी अधिक कोमल और निष्कलंक हैं।

प्रथम रानी 'इंदुलेखा' चंद्रमा के समान गौर वर्ण और श्वेत मोतियों से सुसज्जित थी, जिसकी देह का स्पर्श भी केवल रेशम से कराया जाता था।
प्रथम कौतुक: चंद्र-किरणों से दाह
The First Wonder: The Scorch of Moonlight
द्वितीय रानी 'तारावली' कनक जैसी कांति वाली थी, जो फूलों की सेज पर भी केवल कोमल पंखुड़ियों के बीच विश्राम करती थी।

तृतीय रानी 'कुसुमावती' इतनी सुकोमल थी कि किसी कठोर कार्य या भारी आभूषण का भार भी उसकी देह सहन नहीं कर सकती थी।

शरद पूर्णिमा की मनोहारी रात्रि में, महल की श्वेत संगमरमर की छत पर शीतल अमृतमयी चांदनी बरस रही थी।

रानी इंदुलेखा चांदनी का आनंद लेने छत पर टहलने निकली। ज्योंही पूर्ण चंद्रमा की शीतल किरणों ने उसके शरीर को छुआ, वह दर्द से चीख उठी!
आह्ह्ह! चंद्रमा की शीतल किरणें भी मेरी त्वचा को अग्नि की भांति जला रही हैं!

चांदनी के स्पर्श मात्र से रानी इंदुलेखा के कोमल अंगों पर गंभीर लाल छाले और फफोले पड़ गए, मानो वह दहकते अंगारों से छू गई हो!

राजवैद्यों ने तुरंत चंदन और खस का शीतल लेप लगाकर रानी के छालों की जलन को शांत करने का प्रयास किया। राजा विस्मय में पड़ गया।
ऐसी सुकुमारता संसार में कभी किसी ने न देखी होगी!
द्वितीय कौतुक: कमल-पंखुड़ी से गहरा घाव
The Second Wonder: The Bruise of a Lotus Petal
कुछ दिनों बाद, द्वितीय रानी 'तारावली' अपने सुगंधित शयनकक्ष में मखमली रेशमी गद्दों पर गहरी नींद में सो रही थी।

छत पर लटकी पुष्प-माला से एक अत्यंत कोमल लाल कमल की पंखुड़ी टूटकर हवा में तैरती हुई रानी की जांघ पर गिरी।

पंखुड़ी के गिरते ही रानी तारावली दर्द से तड़प उठी। उस कोमल स्पर्श से उसकी जांघ पर भारी पत्थर की चोट जैसा गहरा नीला घाव और नील पड़ गया!
हाय! कमल की एक पंखुड़ी ने मेरी देह को बुरी तरह कुचल दिया!

दासियां पंखा झलने लगीं और वैद्यों ने दर्द निवारक लेप लगाया। राजा सोचने लगा कि तारावली ही संसार की सबसे सुकुमार नारी है।
तृतीय कौतुक: मूसल के शब्द से फफोले
The Third Wonder: The Blisters of Sound
एक अन्य रात्रि को तृतीय रानी 'कुसुमावती' अपने एकांत अंतःपुर में विश्राम कर रही थी। चारों ओर पूर्ण सन्नाटा था।

महल से दूर, किसी किसान की कुटिया में एक स्त्री भारी काष्ठ के मूसल से धान कूटने लगी। 'धम-धम' की धीमी गूंज दूर तक फैली।

उस मूसल की धीमी आवाज रानी कुसुमावती के कानों में पड़ी। नींद में ही रानी के हाथ कांपने लगे और वह असहज हो उठी।

आश्चर्य! बिना किसी वस्तु को छुए, केवल दूर के मूसल की आवाज सुनकर ही रानी कुसुमावती की दोनों हथेलियों पर खून से भरे फफोले और छाले निकल आए!

रानी रोती हुई चीख पड़ी: 'हाय! मेरे हाथ जल रहे हैं!' राजा ने जब उसकी हथेलियों पर फफोले देखे, तो वह सन्न रह गया!
उस दूर बजते मूसल की ध्वनि ने मेरी हथेलियों को छील डाला है स्वामी!
राजसभा का विस्मय और धर्मसंकट
The Royal Debate & The Unresolvable Enigma
कांचनपुर की राजसभा में यह कौतुक चर्चा का विषय बन गया। राजवैद्य और विद्वान यह तय नहीं कर पा रहे थे कि तीनों रानियों में सर्वाधिक सुकुमार कौन है।

दरबारियों ने कहा: 'एक को चांदनी ने जलाया, दूसरी को कमल ने घायल किया, और तीसरी को ध्वनि मात्र ने फफोले दिए! न्याय असंभव है!'
बेताल का यक्ष-प्रश्न और महाराज विक्रम का अमर निर्णय
The Riddle of Delicacy & Vikram
श्मशान के सन्नाटे में बेताल ने कथा रोककर राजा विक्रमादित्य को ललकारा।
बताओ राजन! इंदुलेखा, तारावली और कुसुमावती—इन तीनों में सबसे अधिक सुकुमार कौन थी? उत्तर जानते हुए भी मौन रहे तो तुम्हारा मस्तक फट जाएगा!

धर्म और विवेक से बंधे महाराज विक्रमादित्य ने मौन तोड़ते हुए अकाट्य निर्णय दिया: 'तृतीय रानी 'कुसुमावती' ही संसार में सबसे अधिक सुकुमार है!'
प्रथम दो रानियों को चांदनी और कमल की पंखुड़ी का प्रत्यक्ष भौतिक स्पर्श हुआ था। किंतु तीसरी रानी 'कुसुमावती' को बिना किसी भौतिक स्पर्श के, केवल दूर से सुनाई देने वाली ध्वनि से ही हथेलियों पर फफोले पड़ गए! अतः इंद्रिय-संवेदना की ऐसी सूक्ष्मता ही सुकुमारता की चरम सीमा है!

निर्णय सुनते ही राजा का मौन पुनः भंग हो गया! बेताल ठहाका लगाते हुए धुएँ की भांति उड़कर पुनः शीशम के पेड़ पर जा लटका।
अचूक न्याय, राजन! कुसुमावती ही सर्वाधिक सुकुमार है! किंतु तुम्हारा मौन टूटा—और मैं चला! खे-खे-खे!

अमावस की घोर अंधियारी रात में, बीहड़ और भयानक श्मशान वन में महाराज विक्रमादित्य बिना थके, दृढ़ संकल्प के साथ पुनः बेताल को पकड़ने चल पड़े।
तुम जितनी बार भागोगे बेताल, मैं उतनी बार आऊँगा—क्षत्रिय अपना वचन कभी नहीं छोड़ता!