त्रयोदश बेताल: जीमूतवाहन का आत्म-बलिदान
The Unfailing Devotion of Jimutavahana
तेरहवीं चढ़ाई और नागों के अस्थियों का पर्वत
The Thirteenth Retrieval & The Mountain of Bones
तेरहवीं बार महाराज विक्रमादित्य श्मशान के भयानक अंधकार में शीशम के वृक्ष पर चढ़े, बेताल के शव को नीचे उतारा और दृढ़ता से अपने कंधे पर लादकर मौन व्रत धारण कर चल पड़े।
राजन! तुम्हारा यह अद्वितीय धैर्य धन्य है! सुनो, विद्याधर राजकुमार जीमूतवाहन और नाग शंखचूड़ के आत्म-बलिदान की यह अमर और पावन गाथा!

विद्याधरों के चक्रवर्ती राजकुमार जीमूतवाहन परम दयालु और त्याग की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने संसार की दरिद्रता दूर करने के लिए कल्पवृक्ष दान कर दिया और राजपाट त्यागकर मलय पर्वत पर माता-पिता की सेवा करने लगे।

एक दिन समुद्र तट पर भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन ने श्वेत रंग का एक विशाल पर्वत देखा। निकट जाने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि वह कोई पर्वत नहीं, बल्कि अनगिनत नागों की हड्डियों का विशाल ढेर था!
हे विधाता! यह कैसा भीषण नरसंहार है? इस पावन तट पर अस्थियों का यह पर्वत किसने खड़ा किया?

मित्रों ने बताया कि पक्षीराज गरुड़ से नागवंश की रक्षा के लिए नागराज वासुकि ने समझौता किया है—प्रतिदिन एक नाग स्वयं इस वध्यशिला (बलि-शिला) पर गरुड़ के आहार हेतु आता है।
माता का क्रंदन और जीमूतवाहन का संकल्प
The Weeping Mother & The Vow of Compassion
उसी समय जीमूतवाहन को किसी स्त्री का हृदयविदारक क्रंदन सुनाई दिया। एक वृद्ध नाग-माता अपने इकलौते, रूपवान पुत्र शंखचूड़ को छाती से चिपकाए फूट-फूटकर रो रही थी।
हाय मेरे लाल! आज वासुकि ने तुझे गरुड़ का आहार बनने भेजा है! मैं तेरे बिना कैसे जीवित रहूँगी!

आज शंखचूड़ की बलि की बारी थी। वह लाल वस्त्र पहनकर गरुड़ के सामने प्रस्तुत होने जा रहा था, किंतु माता का दुख देखकर उसका हृदय भी फटा जा रहा था।
माता, विलाप न करो! जाति की रक्षा के लिए अपने प्राण देना मेरा कर्तव्य है! मुझे आशीर्वाद दो!

जीमूतवाहन का कोमल हृदय करुणा से द्रवित हो उठा। उन्होंने आगे बढ़कर माता के आंसू पोंछे और अपने प्राणों की आहुति देने का दृढ़ संकल्प लिया।
हे माता! रोना बंद करो! आज तुम्हारे पुत्र के स्थान पर मैं यह लाल वस्त्र ओढ़कर वध्यशिला पर बैठूँगा और गरुड़ को अपना शरीर अर्पित करूँगा!

शंखचूड़ ने किसी परोपकारी महात्मा को अपने लिए मरते देखने से इनकार कर दिया और अंतिम दर्शन के लिए निकट स्थित गोकर्ण शिव मंदिर की ओर दौड़ पड़ा।
महात्मन! मैं अपनी रक्षा के लिए किसी निष्पाप का वध नहीं होने दूंगा! मैं शिव-दर्शन करके अभी लौटता हूँ!
वध्यशिला पर समर्पण और गरुड़ का आक्रमण
The Slaughter-Rock & Garuda
शंखचूड़ की अनुपस्थिति में, जीमूतवाहन ने अवसर पाकर तुरंत वह लाल वस्त्र धारण किया और वध्यशिला पर बैठकर शांति से ध्यानमग्न हो गए।
यदि यह नश्वर शरीर किसी निर्दोष के प्राण बचा सके, तो इससे बड़ा कोई धर्म नहीं!

अचानक आकाश में प्रलयंकारी आंधी चलने लगी। बादलों को चीरते हुए विशालकाय पक्षीराज गरुड़ अपने प्रचंड वेग से वध्यशिला पर उतरे।

गरुड़ ने लाल वस्त्र में लिपटे जीमूतवाहन को नाग समझकर अपने तीक्ष्ण पंजों में दबोच लिया और उसकी देह को चीरते हुए पर्वत के शिखर पर ले गए।

शारीरिक पीड़ा के स्थान पर जीमूतवाहन के मुख पर अलौकिक शांति और परमानंद की मुस्कान थी। दूसरों के प्राण बचाने के सुख से उनका रोम-रोम खिल उठा था!
हे पक्षीराज! संकोच न करो! तृप्त होकर मेरे शरीर का मांस खाओ और अपनी क्षुधा शांत करो!
शंखचूड़ की वापसी और गरुड़ का पश्चाताप
Shankhachuda
मंदिर से लौटकर शंखचूड़ ने जब वध्यशिला पर रक्त के निशान देखे, तो वह समझ गया कि उस पुण्यात्मा राजकुमार ने उसके लिए अपने प्राण दे दिए। वह पागलों की भांति पर्वत की ओर दौड़ा।
ठहरो गरुड़! अनर्थ मत करो! जिसे तुम खा रहे हो वह नाग नहीं, साक्षात धर्म की मूर्ति राजकुमार जीमूतवाहन हैं!

शंखचूड़ ने पर्वत शिखर पर पहुंचकर गरुड़ के सामने अपनी छाती तान दी और उस महात्मा को छोड़कर स्वयं को खाने की प्रार्थना की।
मैं हूँ असली नाग शंखचूड़! मेरे प्राणों के बदले इस महात्मा को मत मारो! इन्हें छोड़ो और मुझे खाओ!

गरुड़ स्तब्ध रह गए! उन्होंने देखा कि जिस मनुष्य का आधा शरीर वे खा चुके थे, वह तनिक भी भयभीत नहीं था, बल्कि प्रसन्न था; और जो नाग बच चुका था, वह स्वेच्छा से मृत्यु के मुख में लौट आया था!
हे महापुरुष! तुम कौन हो? जो मृत्यु के पंजों में भी आनंदित हो रहे हो? और यह नाग क्यों अपनी जान देने दौड़ा आया?

गरुड़ का हृदय पश्चाताप की अग्नि में जल उठा। उन्होंने अपने जीवन में ऐसा अलौकिक त्याग कभी नहीं देखा था। उन्होंने तुरंत भोजन त्याग दिया और लज्जा से सिर झुका लिया।
देवी का वरदान और नागवंश का पुनर्जीवन
Divine Revival & Universal Redemption
उसी समय विलाप करते हुए जीमूतवाहन के माता-पिता और पत्नी मलयवती वहां पहुंचे। मलयवती ने माता गौरी का स्मरण कर पति के प्राणों की भिक्षा मांगी।

सती के पातिव्रत्य और जीमूतवाहन के महात्याग से प्रसन्न होकर साक्षात भगवती गौरी प्रकट हुईं और उन्होंने अमृत छिड़ककर जीमूतवाहन को पूर्व से भी अधिक तेजस्वी और स्वस्थ बना दिया!

प्रायश्चित करते हुए गरुड़ स्वर्ग से अमृत कलश ले आए और अस्थियों के पर्वत पर छिड़ककर पूर्व में मारे गए सभी नागों को जीवित कर दिया तथा सदा के लिए नाग-हिंसा त्यागने की प्रतिज्ञा की!

कथा समाप्त कर श्मशान के सन्नाटे में बेताल ने राजा विक्रमादित्य से त्याग की पराकाष्ठा का गूढ़ प्रश्न पूछा।
राजन! अब बताओ, इस कथा में जीमूतवाहन और शंखचूड़ में से किसका त्याग और वीरता अधिक महान और श्रेष्ठ थी?
बेताल का प्रश्न, विक्रम का अमर निर्णय और पलायन
The Riddle, The Verdict, & The Flight
बेताल ने राजा को चेतावनी देते हुए प्रश्न दोहराया।
क्या राजकुमार जीमूतवाहन का त्याग श्रेष्ठ था जिसने पराये के लिए प्राण दिए, या नाग शंखचूड़ का? उत्तर जानते हुए मौन रहे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा!

महाराज विक्रमादित्य ने गंभीर वाणी में उत्तर दिया: 'नाग शंखचूड़ का त्याग और साहस ही संसार में श्रेष्ठतर और अधिक महान था!'
राजकुमार जीमूतवाहन तो जन्म से ही बोधिसत्व, विद्याधर और महात्मा थे—त्याग, करुणा और परोपकार उनका स्वाभाविक स्वभाव और कुल-धर्म था। किंतु शंखचूड़ एक साधारण तिर्यग-योनि (सर्प) का प्राणी था, जो एक बार निश्चित मृत्यु के मुख से पूर्णतः बच चुका था! सुरक्षित बच जाने के बाद भी, केवल अपने उपकारी की रक्षा और कर्तव्य के लिए स्वेच्छा से पुनः काल के जबड़ों में लौट आना—प्राकृतिक प्राण-रक्षा की मूल वृत्ति पर विजय पाने का सर्वोच्च और दुर्लभतम उदाहरण है! अतः शंखचूड़ का कृत्य अधिक महान था!

न्यायपूर्ण उत्तर सुनते ही राजा का मौन पुनः टूट गया! बेताल खिलखिलाकर हंसा और वायु में विलीन होकर पुनः शीशम के वृक्ष पर जा लटका।
अद्भुत और सूक्ष्म न्याय, राजन! कर्तव्य के लिए मृत्यु के मुख में लौटना ही सर्वोच्च वीरता है! किंतु तुम्हारा मौन टूटा—और मैं चला! खे-खे-खे!

अमावस की घोर अंधियारी रात में, श्मशान के भयंकर भूतों और पिशाचों की परवाह किए बिना महाराज विक्रमादित्य ने तलवार खींची और पुनः बेताल को लाने चल पड़े।
तुम चाहे सहस्त्र बार उड़ जाओ बेताल, मैं तुम्हें हर बार पकड़कर लाऊँगा!