कामधेनु गौ लीला: नवजात का अन्न-त्याग और दिव्य अमृत-पान
The Miracle of the Celestial Cow: The Divine Sustenance
नवजात का व्रत और सांसारिक दुग्ध-अस्वीकार
The Fast & The Worldly Milk
काशी के जुलाहा मोहल्ले में स्थित मिट्टी की झोपड़ी में प्रातःकाल की धूप खिली। उन्नीस वर्षीया नववधू नीमा खाट पर श्वेत वस्त्र में लिपटे नवजात कबीर के समीप बैठी थी।

नीमा ने बड़े वात्सल्य से मिट्टी के सकोरे में ताजा गाय का दूध भरकर नन्हे बालक के होठों से लगाने का यत्न किया।
पी ले मेरे लाल! थोड़ा सा दूध पी ले, तेरी नन्हीं देह भूखी है।

किंतु बालक कबीर ने अपने ओठ दृढ़ता से बंद रखे और एक शांत, अलौकिक मुस्कान के साथ अपना मुख फेर लिया।

मोहल्ले की अन्य जुलाहा स्त्रियां बकरियों का दूध और शहद-मिश्रित जल लेकर दौड़ी आईं।

शिशु ने किसी भी सांसारिक दूध की एक बूंद को भी स्वीकार नहीं किया। नीमा के नेत्रों में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।

बीस वर्षीय नीरू चौखट पर खड़ा अपनी युवा पत्नी और उपवासी शिशु को देखकर गहरी चिंता में डूब गया।
नीमा! इसने कल से एक बूंद दूध नहीं चखा। यह अबोध बालक बिना आहार के कैसे जीवित रहेगा?
तीन रात्रियों का संताप और प्रार्थना
Three Nights of Agony
एक, दो और तीन दिन बीत गए! बालक कबीर ने अन्न-जल का पूर्ण त्याग बनाए रखा। रात के सन्नाटे में नीरू और नीमा का रुदन थम नहीं रहा था।

हे परवरदिगार! यदि इस कमल-नयन बालक को प्राण ही त्यागने थे, तो तूने हमारी सूनी गोद में यह अमृत क्यों भेजा? इस नन्हे फूल पर दया करो!

दीये की मद्धिम रोशनी में दोनों युवा पति-पत्नी हाथ थामे बैठे रहे, भयभीत कि प्रातःकाल होने तक कहीं यह प्रकाश बुझ न जाए।

चारों ओर अंधकार और सन्नाटा छाया था, किंतु सत्यलोक के स्वामी की लीला का एक नया विस्मयकारी अध्याय आरंभ होने वाला था।
श्वेत कामधेनु का प्राकट्य और मिट्टी का पात्र
The Descent of the Celestial Cow
चौथे दिन का सूर्य जैसे ही उदित हुआ, नीरू के आंगन में अचानक एक अलौकिक, हिम-धवल कामधेनु गौ प्रकट हुई! उसके शरीर से मंद कस्तूरी सुगंध और स्वर्णिम आभा फूट रही थी।

वह दिव्य गौ अत्यंत शांत भाव से आंगन के मध्य खड़ी थी। उसकी आंखों में असीम वात्सल्य और दिव्यता झलक रही थी।

नीरू ने आंगन में आकर देखा तो उसकी आंखें फटी रह गईं। उसने हाथों में मिट्टी का एक कोरा, स्वच्छ पात्र उठाया।

नीरू ने श्रद्धापूर्वक उस रिक्त मिट्टी के पात्र को कामधेनु गौ के थनों के ठीक नीचे भूमि पर रख दिया।

अद्भुत चमत्कार! बिना किसी मानवीय स्पर्श या दोहन के, उस दिव्य गौ के थनों से स्वतः ही अमृतमय श्वेत दुग्ध की धार नीचे रखे मिट्टी के पात्र में सीधी बहने लगी!
अमृत-पान और कामधेनु का स्थायी वास
The Divine Sustenance & The Cow
कुछ ही क्षणों में मिट्टी का पात्र लबालब भर गया। नीरू ने कांपते हाथों और कृतज्ञ हृदय से वह दिव्य पात्र उठा लिया।

नीमा ने तुरंत उस अलौकिक दुग्ध को बालक कबीर के मुख से लगाया।

बालक कबीर ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए उस दिव्य अमृत को तृप्तिपूर्वक ग्रहण किया! तीन दिनों का उपवास समाप्त हुआ और उनका मुखमंडल सूर्यवत देदीप्यमान हो उठा।

नीरू और नीमा ने एक-दूसरे को देखा और उनकी आंखों से आनंद के अश्रु बह निकले। उनकी नन्हीं झोपड़ी साक्षात् वैकुंठ धाम बन गई थी।

वह दिव्य कामधेनु कहीं नहीं गई, बल्कि नीरू के आंगन में बने छप्पर में ही अपना स्थायी वास बना लिया, ताकि बालक कबीर के बचपन में प्रतिदिन प्रातःकाल दिव्य दुग्ध-पान करा सके।
जनसमूह का विस्मय और नामकरण की आगामी परीक्षा
The Community in Awe & The Cliffhanger
जो पड़ोसी कल तक उपहास उड़ा रहे थे, वे आज आंगन की पवित्र मिट्टी को माथे से लगा रहे थे। बालक का दिव्य प्रभाव पूरी काशी में कौतूहल का केंद्र बन गया।

बालक कबीर का नित्य पोषण तो कामधेनु गौ से निश्चित हो गया, किंतु अब रूढ़िवादी मौलवी और काज़ी बालक के नामकरण और शरीयत की परीक्षा के लिए एकत्रित हो रहे हैं! देखिए अगले अध्याय में—कलाम-ए-पाक के अक्षरों का रहस्य और नामकरण लीला!