पाखंड-खंडन और शाही षड्यंत्र: 'एकै माटी के सब भांडे' और सिकंदर लोदी का फरमान
The Shattering of Dogmas & The Royal Conspiracy
मीनारों पर बांग और चींटी के पग नेवर
The Loud Azan & The Ant
काशी में प्रातःकाल का समय। लाल बलुआ पत्थर की ऊंची मस्जिद की मीनार पर चढ़कर मुल्ला जी प्रभातकालीन नमाज़ के लिए ऊंची आवाज़ में बांग (अज़ान) देने लगे।

मुल्ला जी गला फाड़-फाड़कर आकाश की ओर चिल्ला रहे थे, मानो उनका परमात्मा किसी सातवें आसमान पर बहुत दूर बैठा हो।

नीचे गली के पत्थरों पर एक नन्हीं चींटी रेंग रही थी। उसके सूक्ष्म पैरों की आहट भी उस परम चैतन्य प्रभु के कान में स्पष्ट गूंज रही थी।

चौदह वर्षीय कबीर साहिब अपनी शुद्ध श्वेत धोती में गली के मोड़ पर खड़े हो गए और उन्होंने जमा हुई भीड़ के सामने सत्य का आईना दिखाया।

कांकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय? चींटी के पग नेवर बाजे, सो भी साहिब सुनता है!

मीनार से उतरे मौलवी और कट्टरपंथी कबीर साहिब की निडर वाणी सुनकर क्रोध से लाल-पीले हो गए। बाहरी दिखावे की धज्जियां उड़ते देख वे बदले की आग में जलने लगे।
रोज़ा, जीव-हिंसा और सुन्नत का तीखा सवाल
Day Fasting vs. Night Slaughter & The Sunnat Question
शाम के समय काज़ी के आंगन में दावत सजी थी। दिनभर भूखे रहकर रोज़ा रखने वाले मौलवी रात होते ही बेजुबान पशुओं का वध कर उनके मांस पर टूट पड़े थे।

दिन को रोजा रहत हैं, रात हनत हैं गाय। यह तो खून वह बंदगी, कैसे खुसी खुदाय!

कबीर! तू हमारी शरीयत और सुन्नत पर उंगली उठाने वाला कौन होता है? हम खुदा के सच्चे बंदे हैं!

जे तू तुरक तुरकनी जाया, पेट ही काहे न सुन्नत कराया? मुसलमान होके सुन्नत कराया, मुसलमानी का क्या कटाया? आधे हिन्दू आधे तुर्क, दोनों में एक ही नूर समाया!

आंगन में उपस्थित जुलाहे और माताएं कबीर साहिब की बात सुनकर सिर हिलाने लगे। काज़ी और मुल्ला लज्जित होकर दांत पीसते रह गए।

काज़ी अपने शिष्यों के साथ क्रोध में आगबबूला होकर गलियों में निकल गया, यह ठानकर कि इस जुलाहे का अंत निकट लाना होगा।
पंडितों का जाति-अहंकार और
The Brahmin Pride &
उधर गंगा के घाटों पर पंडित जी अपनी उच्च जाति और कुलीनता का डंका पीट रहे थे और शूद्रों को अछूत कहकर दूर भगा रहे थे।

जे तू बाम्हन बाम्हनी का जाया, आन बाट ह्वै काहे न आया? पंडित होके जनेऊ पहिना, पंडितानी का क्या पहिनाया?

कबीर साहिब ने समीप स्थित कुम्हार के चाक की ओर संकेत किया, जहां एक ही मिट्टी के लोंदे से छोटे-बड़े सभी प्रकार के पात्र गढ़े जा रहे थे।

एकै माटी के सब भांडे, एकै सिरजनहारा! एकै पवन एक ही पानी, एकै जोति पसारा! गर्भ वास में कुल नहिं जाती, ब्रह्म बिंदु ते सब उतपाती!

कबीर साहिब के इन वचनों ने सदियों से दबे-कुचले निर्धनों और बुनकरों के हृदय में आत्म-गौरव और सत्य का दीप जला दिया।

किंतु रूढ़िवादी ब्राह्मणों का अहंकार तिलमिला उठा। हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के ठेकेदार कबीर की बढ़ती लोकप्रियता से भयभीत हो गए।
अंधेरे कमरे में पंडितों और काज़ियों का गुप्त षड्यंत्र
The Secret Conclave of Pandits & Qazis
रात्रि के गहन अंधकार में काशी के एक गुप्त भवन में एक अभूतपूर्व दृश्य दिखा—जो पंडित और काज़ी एक-दूसरे की छाया से बचते थे, वे आज कबीर के विरोध में एक जाजम पर बैठे थे!

पंडित जी! यह जुलाहा न वेदों को मानता है, न कुरान को! अगर इसे नहीं रोका गया, तो हमारी सारी गद्दियां और धर्म-धंधा उजड़ जाएगा!

शास्त्रार्थ में तो कोई इसे हरा नहीं सका। जनता इसकी साखियों पर मुग्ध है। इसे मिटाने के लिए केवल राज-दंड (शाही तलवार) का ही सहारा लेना होगा!

सुल्तान सिकंदर लोदी इस समय हमारी सीमा के समीप पड़ाव डाले हुए है! वह अत्यंत क्रूर और धार्मिक रूप से कट्टर है। साथ ही वह एक असाध्य दाह-रोग (अंग-जलन) से तड़प रहा है, जिससे उसका गुस्सा आसमान पर है!

दोनों पक्षों ने मिलकर सुल्तान के नाम एक शिकायती फरमान तैयार किया—'कबीर राजद्रोह और धर्मद्रोह का अपराधी है। वह सुल्तान के सामने कभी सिर नहीं झुकाएगा।' उन्हें पूरा विश्वास था कि क्रूर सुल्तान कबीर को देखते ही मौत के घाट उतार देगा।
सुल्तान सिकंदर लोदी का संताप और गिरफ्तारी का शाही आदेश
The Torment of Sikandar Lodi & Royal Summons
शाही छावनी के भव्य तंबू में दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी का दरबार सजा था। किंतु वैभव के मध्य सुल्तान का जीवन नर्क बन चुका था।

सुल्तान के पूरे शरीर में असह्य जलन और भयंकर दाह-रोग फैल चुका था। साम्राज्य के बड़े-बड़े शाही हकीम और पीर-फकीर लेप लगाकर हार चुके थे, किंतु सुल्तान की पीड़ा का कोई अंत न था।

पंडितों और काज़ियों के प्रतिनिधिमंडल ने तड़पते हुए सुल्तान के सामने झुककर कबीर के विरुद्ध विषैली शिकायतें पेश कीं।

मेरी सल्तनत में ऐसा गुस्ताख जुलाहा जो हमारे मजहब और तख्त को चुनौती दे?! सिपाहियों! अभी जाओ और उस कबीर को लोहे की बेड़ियों में जकड़कर हमारे दरबार में पेश करो!

शाही घुड़सवार नंगी तलवारें लिए कबीर साहिब की झोपड़ी की ओर दौड़ पड़े! षड्यंत्रकारियों को लगा कि कबीर का अंत निश्चित है, किंतु वे नहीं जानते थे कि सुल्तान का रोग मिटने और कबीर के ५२ चमत्कारों का नया इतिहास रचने वाला है! देखिए अगले अध्याय में—सिकंदर लोदी की सभा और दाह-रोग मुक्ति!