सच्चा जनेऊ: काशी के पंडितों से संवाद और पाखंड-खंडन
The True Sacred Thread & The Scholars of Kashi
काशी के घाट और कर्मकांडी पंडितों की सभा
The Holy Ghats of Varanasi
प्राचीन काशी नगरी के मणिकर्णिका और दशाश्वमेध घाटों पर प्रातःकालीन सूर्य की स्वर्णिम किरणें बिखर रही थीं। गंगा की पावन लहरों में सहस्त्रों श्रद्धालु स्नान कर रहे थे और मंदिरों से शंख-ध्वनि गूंज रही थी।

घाट की सीढ़ियों पर विशाल छतरियों के नीचे उच्च कुलीन ब्राह्मण और प्रकांड पंडित काष्ठ की चौकियों पर आसीन थे। वे विधि-विधान, मंत्रोच्चार और बाहरी कर्मकांडों में लीन थे।

काशी के प्रधान पंडित पीतांबर अपने वक्ष पर लटकते सूत के पवित्र जनेऊ (यज्ञोपवीत) को गर्व से स्पर्श करते हुए शिष्यों को जाति-श्रेष्ठता और कर्मकांड के नियम समझा रहे थे।

दस वर्षीय बालक कबीर अपनी श्वेत धोती में गंगा तट की सीढ़ियों से शांत कदमों से उतरे। उनके मुख पर बाल-सुलभ सरलता और अनंत ज्ञान की आभा एक साथ झलक रही थी।
पंडितों का क्रोध और बालक का शांत भाव
The Rebuking of the Weaver Boy
बालक कबीर एक सीढ़ी पर बैठकर पंडितों द्वारा मोक्ष और वेदों के गूढ़ श्लोकों पर किए जा रहे वाद-विवाद को ध्यानपूर्वक सुनने लगे।

सहसा पंडित पीतांबर की दृष्टि समीप बैठे जुलाहे के बालक पर पड़ी। एक नीच जाति के समझे जाने वाले बालक को अपने पास बैठा देख पंडित का मुख क्रोध से लाल हो उठा।

अरे नीच जुलाहे के बालक! तेरी यह धृष्टता कि तू उच्च कुलीन ब्राह्मणों के समीप बैठा है? न तेरे गले में जनेऊ है, न कोई वैदिक संस्कार! बिना जनेऊ के तू अपवित्र है और कभी ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता!

घाट पर उपस्थित अन्य तीर्थयात्री और पुरोहित बालक कबीर को घेरकर खड़े हो गए और निंदा भरी दृष्टि से देखने लगे।

किंतु बालक कबीर के अधरों पर वही अगाध करुणा और शांति भरी मुस्कान खिली रही। वे भयभीत होने के स्थान पर पंडित के अज्ञान पर दया से भर उठे।
कपास का धागा और कबीर का तीखा प्रश्न
The Inquiry into the Cotton Thread
दस वर्षीय कबीर साहिब सीढ़ियों पर सीधे खड़े हुए और उन्होंने शांत वाणी में पंडित जी से प्रश्न किया।

पंडित जी! आप जिस धागे पर इतना अभिमान कर रहे हैं, वह क्या है? चार कौड़ी में बाज़ार से कपास खरीदी जाती है, ब्राह्मण उसे ऐंठकर गले में डाल देता है!

पंडित पीतांबर हड़बड़ा कर अपने जनेऊ को पकड़ते हुए पीछे हटे। घाट के सारे शिष्य इस बालक की निर्भीकता देखकर सन्न रह गए।

जब देह त्यागकर मनुष्य श्मशान जाता है, तो यह सूत का धागा भी चिता के साथ जलकर राख हो जाता है! क्या यह धागा परलोक में आत्मा के साथ जाता है?

और यदि इस सूत के जनेऊ से ही आत्मा द्विज (पवित्र) होती है, तो तुम्हारी माताएं और बहनें तो इसे कभी धारण नहीं करतीं—तो क्या तुम्हारी समस्त कुल-नारियां अपवित्र हैं?
सच्चे जनेऊ का मर्म और अमर साखी
The Revelation of the True Inner Thread
बालक कबीर ने दोनों हाथ उठाकर सत्य का शाश्वत स्वरूप उद्घाटित किया। उनकी वाणी से साक्षात् ब्रह्म-ज्ञान की गंगा बहने लगी!

दया, संतोष, संयम और सत्य—इन चार परम गुणों से निर्मित आत्मा का अलौकिक जनेऊ संपूर्ण ब्रह्मांड को आलोकित करने लगा।

दया का कपास, संतोष का सूत, जत की गांठ और सत्य की ऐंठन! यही आत्मा का सच्चा जनेऊ है—जो न कभी टूटता है, न मैला होता है, न जलता है और न नष्ट होता है!

घाट पर उपस्थित युवा शिष्य, संस्कृत विद्यार्थी और संन्यासी उस दस वर्षीय बालक के मुख से सच्चा वेदांत सुनकर नतमस्तक हो गए।

पंडित पीतांबर पसीने से तर-बतर होकर चुपचाप खड़े रहे। उनके पास बालक के एक भी प्रश्न का कोई शास्त्रीय उत्तर नहीं था।
पाषाण पूजा और घर की चक्की का मर्म
The Clay Idols & The Living Flour Mill
एक युवा पुरोहित ने अपनी लाज बचाने के लिए वेदी पर रखी पत्थर की मूर्ति की ओर संकेत किया।
तुम हमारे देव-विग्रहों और पाषाण-पूजा को कैसे नकार सकते हो? यह साक्षात् भगवान हैं!

पाहन पूजे हरि मिलै, तो मैं पूजूं पहार। ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार॥

कबीर साहिब ने समझाया कि जड़ पत्थरों को पूजने से अधिक पुण्य उस साधन में है जो भूखों का पेट भरता है और जीवन की सेवा करता है।

घाट पर उपस्थित जनसाधारण ताली बजाकर बालक की जय-जयकार करने लगा, जबकि रूढ़िवादी पुरोहित लज्जित होकर मौन हो गए।
विद्वानों का विसर्जन और पंचगंगा घाट की प्रतीक्षा
The Humbled Scholars & The Midnight Yearning
संध्या की लालिमा छाते ही काशी के पंडित अपने ग्रंथ समेटकर पराजित भाव से घाट से प्रस्थान कर गए। आडंबर का अंधकार सत्य के सूर्य के समक्ष टिक न सका।

बालक कबीर गंगा की शीतल लहरों के पास खड़े होकर बहते हुए दीपकों को निहारने लगे। काशी की धरती ने उनके दिव्य ज्ञान का पहला साक्षात्कार कर लिया था।

पंडितों का अहंकार तो चकनाचूर हो गया, किंतु अब सांसारिक मर्यादा के अनुसार साक्षात् सतगुरु की दीक्षा का समय निकट आ रहा है! आधी रात को पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर स्वामी रामानंद जी से मिलन की अलौकिक लीला! देखिए अगले अध्याय में—पंचगंगा घाट पर दीक्षा और 'राम-राम' महामंत्र!