हाट में वस्त्र-दान: कबीर साहिब की परोपकार लीला और गुप्त भंडारा
The Market of Kashi & The Gift of Cloth
आठ वर्षीय कबीर और करघे पर अलौकिक वस्त्र
The Master Boy at the Loom
आठ वर्ष की आयु में बालक कबीर पिता नीरू के साथ करघे पर बैठने लगे। उनके नन्हे हाथ काष्ठ की ढरकी को ऐसी कुशलता और लय से चलाते थे जैसे वे जन्म-जन्मांतर के सिद्ध बुनकर हों।

सूत के बारीक श्वेत तार आपस में ऐसे गूंथते चले गए कि करघे से दूध के समान धवल, अत्यंत कोमल और निष्कलंक वस्त्र का एक विशाल थान तैयार हो गया।

नीरू और नीमा करघे के पास खड़े होकर अपने बालक की इस अद्भुत रचना को देख कर चकित रह गए। काशी के बड़े-बड़े बुनकर भी ऐसा महीन वस्त्र नहीं बना सकते थे।

पिता जी, यह करघा केवल पेट भरने का साधन नहीं है; इसका प्रत्येक धागा जगत के परम जुलाहे के प्रति प्रेम का स्मरण है।
घर में निर्धनता और हाट की ओर प्रस्थान
Poverty & The Market Mission
काशी में शीत ऋतु की ठंडी हवाएं चलने लगी थीं। घर में मंदी के कारण मिट्टी के सारे अन्न-पात्र रिक्त हो चुके थे। रात के भोजन के लिए एक मुट्ठी आटा भी शेष नहीं था।

नीरू ने करघे से उस श्वेत वस्त्र के थान को समेटा और बालक कबीर के कंधे पर रखते हुए हाट में बेचने का परामर्श दिया।

बेटा कबीर! इसे काशी के चौक बाज़ार में ले जाओ। किसी ईमानदार व्यापारी को कम से कम पांच टके में बेचना, ताकि हम गेहूं और दाल खरीद सकें।

बालक कबीर श्वेत वस्त्र का थान कंधे पर रखकर शांत और गरिमामयी चाल से काशी की संकरी गलियों से होते हुए मुख्य बाज़ार की ओर चल पड़े।
काशी का हाट और निर्धनों को वस्त्र-दान
The Marketplace & The Gift of Cloth
काशी का चौक बाज़ार व्यापारियों, ग्राहकों और धनी सेठों के कोलाहल से गूंज रहा था। रेशम, मसाले और पीतल के दीपकों की दुकानें सजी थीं।

बालक कबीर एक चबूतरे पर बैठ गए। लोभी व्यापारी उस अद्भुत वस्त्र की गुणवत्ता देखकर ललचाए, किंतु बालक को अबोध समझकर कौड़ियों के दाम खरीदने के लिए मोलभाव करने लगे।

तभी हाट में एक अत्यंत वृद्ध, दुर्बल और दरिद्र भिक्षुक आया। कड़ाके की शीत में उसका शरीर थर-थर कांप रहा था और वह तन ढंकने के लिए भिक्षा मांग रहा था।
हे बालक! शीत से मेरे प्राण निकल रहे हैं... कोई मुझे तन ढंकने को चिथड़ा भी नहीं देता... मुझ पर दया करो!

वृद्ध की पुकार सुनते ही बालक कबीर का हृदय करुणा से पिघल गया। उन्होंने बिना एक पल की हिचकिचाहट के उस बहुमूल्य थान को बीच से दो टुकड़ों में चीर दिया!

बालक कबीर ने वह लंबा, कोमल और गर्म श्वेत वस्त्र उस कांपते वृद्ध के कंधों पर लपेट दिया। वृद्ध की आंखों से कृतज्ञता के आंसू बहने लगे।

कुछ ही क्षणों में एक अन्य नंगे बदन कांपता पथिक आया। कबीर साहिब ने बचा हुआ आधा थान भी सहर्ष उसे सौंप दिया और स्वयं पूरी तरह खाली हाथ हो गए!
परम समर्पण और माता-पिता की व्याकुलता
Total Surrender & Parental Anguish
सब कुछ दान कर बालक कबीर गंगा तट पर एक विशाल वटवृक्ष की छांव में ध्यानस्थ बैठ गए। न धन की चिंता थी, न अन्न का मोह—केवल परमात्मा पर पूर्ण भरोसा था।

उधर झोपड़ी में रात का अंधेरा घिर आया। बालक कबीर के न लौटने पर नीरू व्याकुल होकर कमरे में चक्कर काटने लगा।
नीमा! रात हो गई और कबीर नहीं लौटा! कहीं हाट के ठगों ने हमारे मासूम बच्चे को कोई नुकसान तो नहीं पहुंचा दिया?

हे परवरदिगार! मुझे अन्न नहीं चाहिए, वस्त्र नहीं चाहिए! बस मेरे लाडले कबीर को सकुशल घर लौटा दो!

चांदनी रात में बालक कबीर शांत और निर्भय कदमों से अपने घर की ओर चल पड़े। उनके मुख पर वही शाश्वत, मनमोहक मुस्कान थी।
अज्ञात सेठ का प्राकट्य और गुप्त भंडारा
The Miracle of the Unknown Merchant
सहसा नीरू के द्वार पर एक जोरदार दस्तक हुई! द्वार खोलते ही सामने एक भव्य, रेशमी वस्त्र पहने धनी व्यापारी बैल-गाड़ियों और बोरियों से लदे बैलों के साथ खड़ा दिखा!

क्या यही जुलाहा नीरू का घर है? हाट में एक अत्यंत तेजस्वी और रूपवान बालक ने अशर्फियां देकर गेहूं, बासमती चावल, दाल और शुद्ध घी के ये सारे बोरे तुम्हारे घर पहुंचाने का आदेश दिया है!

कबीर साहिब आंगन में पहुंचे तो नीरू और नीमा समझ गए कि जो बालक वस्त्र दान कर आया था, वही साक्षात् समस्त सृष्टि का पालनहार है! दोनों ने अश्रुपूरित नेत्रों से बालक को गले से लगा लिया।

कबीर साहिब की परोपकार लीला संपन्न हुई! अब बालक कबीर काशी के विद्वान ब्राह्मणों और पंडितों से संवाद करने वाले हैं—जहां गंगा तट पर सच्चे जनेऊ का मर्म उद्घाटित होगा! देखिए अगले अध्याय में—गंगा तट पर सच्चा जनेऊ!