गोरख-कबीर संवाद: सूत के धागे पर आसन, 'युगन-युगन हम योगी' और सत्यलोक का रहस्य
The Cosmic Dialogue with Yogeshwar Gorakhnath
प्राचीन सिद्ध गोरखनाथ का आगमन और चुनौती
The Arrival of Ancient Siddha Gorakhnath
काशी में स्वामी रामानंद जी के आश्रम के पावन प्रांगण में प्रभातकालीन सत्संग चल रहा था। बारह वर्षीय कबीर साहिब अपने निष्कलंक श्वेत वस्त्रों में गुरुदेव और उपस्थित संतों के मध्य शांत भाव से विराजमान थे।

सहसा आकाश में योगिक आंधियां चलने लगीं! बिजली की कौंध और अलौकिक गर्जना के साथ ५०० वर्षीय प्राचीन नाथ सिद्ध योगेश्वर गोरखनाथ आकाश मार्ग से आश्रम में उतरे।

दीर्घ जटाएं, भस्म-लेपित काया, कानों में विशाल कुंडल और हाथ में भारी लौह त्रिशूल लिए गोरखनाथ जी का योगिक तेज संपूर्ण प्रांगण को कंपित कर रहा था।

रामानंद! मैंने पांच शताब्दियों की कठोर तपस्या से अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों पर विजय पाई है! आज मेरे साथ हठयोग और ब्रह्म-तत्व पर शास्त्रार्थ करो!

गुरुदेव को चुनौती मिलते देख बारह वर्षीय बालक कबीर अपने श्वेत वस्त्रों में शांत कदमों से आगे बढ़े और दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

गोरख जी! हमारी परंपरा में पूज्य गुरुदेव को कष्ट देने से पहले, आपको आश्रम के सबसे छोटे शिष्य के प्रश्नों का उत्तर देना होगा!
लौह त्रिशूल बनाम कच्चे सूत का धागा
The Iron Trishul vs. The Unspun Thread
गोरखनाथ जी ने बारह वर्ष के बालक को देखकर अट्टहास किया और अपने भारी लौह त्रिशूल को पत्थर की धरती में जोर से गाड़ दिया।

यदि तू वास्तव में कोई सिद्ध है, तो आ! मेरे त्रिशूल की दूसरी नोक पर आसन लगाकर मुझसे संवाद कर!

कबीर साहिब मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने अपनी जेब से कच्चे सूत का एक अत्यंत महीन और कोमल धागा निकाला।

कबीर साहिब ने वह कच्चा धागा हवा में उछाला। आश्चर्य! वह कोमल धागा अंतरिक्ष में वज्र के समान सीधा तन गया और स्वर्णिम ज्योति से जगमगा उठा!

बारह वर्षीय कबीर साहिब बिना किसी शारीरिक प्रयास के भारहीन होकर ऊपर उठे और उस कच्चे सूत के धागे पर पद्मासन लगाकर बैठ गए!

गोरख जी! आपके अहंकार को टिकने के लिए भारी लोहे के त्रिशूल का सहारा चाहिए, किंतु सत्य तो प्रेम के सबसे सुक्ष्म कच्चे धागे पर भी सहज विराजमान रहता है! अब कहिए, क्या पूछना चाहते हैं?
जल-तत्व का रूप और सर्वव्यापी शून्य में लोप
The Water Transformation & The All-Pervading Void
क्रोधित होकर गोरखनाथ जी ने अपनी जल-सिद्धि का प्रदर्शन करने का निश्चय किया।

गोरखनाथ जी ने अपनी स्थूल देह को जल में परिवर्तित कर दिया और चौकी पर रखे गंगाजल के मिट्टी के कटोरे में पूर्णतः विलीन हो गए!

कबीर साहिब ने नीचे उतरकर अपनी तर्जनी अंगुली कटोरे के जल में डुबोई और विवेक की दिव्य शक्ति से गोरखनाथ जी के प्राण-तत्व को जल से अलग कर दिया।

गोरखनाथ जी पानी से भीगे हुए पत्थर की धरती पर प्रकट हो गए, उनकी सांस फूल रही थी और वे बालक को अवाक् देख रहे थे।

अब कबीर साहिब ने अपनी देह को सर्वव्यापी आकाश (शून्य) में विलीन कर दिया। उनकी आकृति संपूर्ण सृष्टि में ऐसे समा गई जैसे हवा में सुगंध।

गोरखनाथ जी ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर पाताल, पृथ्वी और स्वर्ग तीनों लोकों को मथ डाला, किंतु कबीर साहिब का कहीं कोई सुराग न मिला!
बूंद में समंदर, श्वास का मर्म और सार-शब्द
The Ocean in the Drop & The True Breath
हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराई। बूंद समानी समंद में, सो कत हेरी जाई॥ समंद समाना बूंद में, सो कत हेरा जाई॥

बालक! इस नश्वर काया में सार-तत्व क्या है? क्या प्राण, कुंडलिनी और षट्चक्र ही मुक्ति के अंतिम द्वार हैं?

गोरख जी! श्वास तो केवल रथ है, यात्री तो वह अविनाशी आत्मा है। हठयोग की साधना केवल काल के तीन गुणों और सूक्ष्म देह तक सीमित है; मुक्ति हठ से नहीं, सुरति-निरति के योग और सत्यलोक के सार-शब्द से मिलती है!

कबीर साहिब ने समझाया कि श्वास-श्वास में बिना बोले परमात्मा के सत्य नाम का स्मरण (अजपा जाप) ही सहज योग है, जो बिना किसी कष्ट के जीवात्मा को भवसागर से पार उतार देता है।

गोरखनाथ जी की पांच सौ वर्षों की योगिक साधना का सारा अहंकार तिनके की तरह बिखर गया। उनके नेत्रों से पश्चाताप और विस्मय के आंसू बहने लगे।

आश्रम के समस्त संन्यासी और स्वामी रामानंद जी अवाक् होकर देख रहे थे कि कैसे एक १२ वर्षीय बालक ने भारत के सबसे महान हठयोगी को निरुत्तर कर दिया था।
महा-प्रकटीकरण:
The Cosmic Revelation:
हे दिव्य बालक! तुम कौन हो? तुम्हारी वास्तविक आयु क्या है? तुम किस लोक से इस नश्वर धरा पर उतरे हो?

युगन युगन हम योगी, अवधू हम तो निर्भय पद के बासी! जब नहिं होते धरनी अकासा, जल थल पवन न वासी॥

सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग—चारों युग कबीर साहिब के चरणों में काल-चक्र की भांति घूमते दिखाई दिए। वे अनादि, अजन्मा और शाश्वत परम पुरुष हैं!

कबीर साहिब ने गोरखनाथ को अपनी विराट सत्ता का वह अमर भेद बताया जिसे सुनकर देवता भी नतमस्तक हो जाते हैं।

कोटि ब्रह्मा जहां उपजत विनसत, कोटि विष्णु जहां लय को पासी। कोटि महेश जहां ध्यान लगावत, कोटि कृष्ण भये दास दासी॥ हमरी उम्र कोई क्या गिनेगा, हम तो सत्यलोक के बासी!

आश्रम में साक्षात् सत्यलोक का दिव्य आलोक प्रस्फुटित हो गया—जहां न जन्म है, न मृत्यु, न काल का भय। केवल विशुद्ध आनंद और अविनाशी अमृत की वर्षा है।
गोरखनाथ का शरणागति और कबीर साहिब से नाम-दीक्षा
The Ancient Siddha Surrenders & Receives Naam Diksha
विराट दर्शन पाते ही गोरखनाथ जी का त्रिशूल और सींगी हाथ से छूटकर धरती पर गिर पड़े। ५०० वर्षों का संचित अहंकार एक क्षण में भस्म हो गया।

पांच सौ वर्षीय महान योगेश्वर गोरखनाथ ने अपना मस्तक बारह वर्षीय कबीर साहिब के पावन चरणों में रख दिया और साष्टांग दंडवत प्रणाम किया!

हे पूर्ण परमात्मा! हे साक्षात् सतगुरु कबीर! मेरी सिद्धियों ने मुझे काल के जाल में ही उलझाए रखा। मुझ पर कृपा करो और मुझे सत्यलोक का सच्चा नाम देकर भवसागर से पार उतारो!

कबीर साहिब ने करुणापूर्वक अपना हाथ गोरखनाथ जी के मस्तक पर रखा और उनके कर्ण में सत्यलोक का परम गोपनीय सार-शब्द (नाम-दीक्षा) प्रदान किया!

दीक्षा प्राप्त होते ही गोरखनाथ जी का अंतःकरण सत्य के प्रकाश से जगमगा उठा। पांच सौ वर्षों में पहली बार उन्होंने सच्चे आत्मानंद और मुक्ति का साक्षात्कार किया।

समस्त काशी और भारतवर्ष ने देखा कि हठयोग के अधिपति गोरखनाथ जी ने कबीर साहिब को अपना परम गुरु स्वीकार कर लिया! अब कबीर साहिब की सत्य-ध्वजा काशी के हर घर और घाट पर फहराने वाली है! देखिए अगले अध्याय में—पुत्र कमाल और पुत्री कमाली का प्राकट्य!