लहरतारा का कमल: कबीर साहिब का प्राकट्य, अबोध वाणी और काशी में आगमन
The Descent on the Lotus: Lahartara & The Arrival in Kashi
सत्यलोक का प्रकाश और ब्रह्म मुहूर्त की पदयात्रा
The Cosmic Vision & The Dawn Walk
विक्रम संवत् १४५५ (सन् १३९८ ई.) के ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा (ज्येष्ठ पूर्णिमा) का पावन पर्व। प्राचीन काशी नगरी के घाट और मिट्टी के घर रात्रि के शांत सन्नाटे में विश्राम कर रहे थे। गंगा की लहरें तारों की छांव में चुपचाप बह रही थीं।

काशी के बाहरी छोर पर स्थित विशाल लहरतारा सरोवर के तट पर स्वामी रामानंद जी के वरिष्ठ शिष्य ऋषि अष्टानंद ब्रह्म मुहूर्त में समाधिस्थ थे।

सहसा आकाश चीरता हुआ सत्यलोक से एक असीम ज्योतिपुंज उतरा! दस सहस्र सूर्यों के समान दिव्य श्वेत-स्वर्ण प्रकाश ने संपूर्ण सरोवर को जगमगा दिया।

ऋषि अष्टानंद ने नेत्र खोले तो चकाचौंध से उनके हाथ अपने आप उठ गए। उन्होंने देखा कि वह दिव्य तेजपुंज सरोवर के जल पर आकर सिमट रहा था।
यह कैसा अलौकिक प्रकाश है? क्या साक्षात् परम पुरुष का इस नश्वर धरा पर अवतरण हुआ है?

उधर बीस वर्षीय नव-विवाहित जुलाहा नीरू अपनी उन्नीस वर्षीया नववधू नीमा का गौना कराकर अपने ससुराल से काशी की ओर पदयात्रा कर रहा था। सुबह के सुहाने मौसम में वे विश्राम और जल के लिए लहरतारा सरोवर के समीप पहुंचे।

लंबी यात्रा की थकान के कारण युवा वधू नीमा सरोवर के शीतल तट की ओर बढ़ी ताकि मुख-हाथ धोकर अपनी प्यास बुझा सके। दोनों युवा दंपत्ति अपने नए गृहस्थ जीवन के सुंदर स्वप्न संजोए आगे बढ़ रहे थे।
नीरू जी, थोड़ा ठहरिए! इस सरोवर का जल कितना निर्मल और शीतल है, यहां थोड़ा विश्राम कर लेते हैं।
कमल पर नवजात और जुलाहा दंपति का तीव्र विवाद
The Radiant Lotus & The Standoff
जैसे ही वे सरोवर के तट पर पहुंचे, अरुणोदय की किरणों के मध्य सरोवर के बीचोंबीच एक विशाल, शतदल गुलाबी कमल प्रफुल्लित दिखा।

उस दिव्य कमल दल पर एक अत्यंत रूपवान, स्वर्ण-ज्योतिर्मय नवजात शिशु मंद-मंद मुस्कुरा रहा था! उसके मुखमंडल से शांत ब्रह्मांडीय आभा प्रस्फुटित हो रही थी।

शिशु को देखते ही युवा नीमा की ममता का बांध टूट पड़ा। उसके हाथ से मिट्टी की गगरी पत्थरों पर गिरकर चकनाचूर हो गई और वह दोनों हाथ फैलाए जल में कूद पड़ी।
नीरू, देखो! कमल के फूल पर साक्षात् चांद का टुकड़ा मुस्कुरा रहा है!

नीरू ने घबराकर झपटते हुए नीमा की बांह पकड़ ली और उसे पीछे खींचते हुए भय से कांप उठा।
रुक जा नीमा! होश में आ! तू यह क्या अनर्थ करने जा रही है?

नीरू लोक-लाज और बदनामी के भय से कांप उठा। आज ही वह अपनी नववधू को पहली बार काशी लेकर जा रहा था!
नीमा, होश संभाल! आज ही तो मैं तेरा गौना कराकर तुझे पहली बार घर ले जा रहा हूं! काशी के लोग क्या कहेंगे? वे हंसेंगे और कहेंगे कि नीरू ससुराल से नई दुल्हन के साथ-साथ किसी का बच्चा भी ले आया है! पूरा समाज हम पर थूकेगा और हमें बिरादरी से निकाल देगा!

नीमा ने अपनी बांह छुड़ाते हुए आंसुओं से भीगी आंखों से नीरू की ओर देखा। उसकी ममता के आगे समाज का सारा भय तिनके के समान बिखर गया।
चाहे पंच मुझे पत्थरों से मार डालें, चाहे बिरादरी हुक्का-पानी बंद कर दे! मैं इस अनाथ, ज्योतिर्मय बालक को इस वीराने में मरने के लिए कभी नहीं छोड़ूंगी!

तट पर दोनों के मध्य घोर अंतर्द्वंद्व छिड़ गया—एक ओर लोक-लाज और बदनामी का भय था, तो दूसरी ओर ममता का अगाध समुद्र।
शिशु का दिव्य संभाषण और नीरू का समर्पण
The Miracle of the Speaking Infant
दोनों का विवाद सुनकर कमल पर लेटे नवजात शिशु ने अपना शीश मोड़ा। उसके अधरों पर अलौकिक मुस्कान थी और उसने स्पष्ट, मधुर देव-वाणी में पुकारा!
हे नीरू! सांसारिक मनुष्यों के मिथ्या भय से अपने हृदय को व्याकुल मत कर।

नवजात अबोध शिशु के मुख से अमृत वाणी फूटते देख युवा नीरू जल में दो कदम पीछे लड़खड़ा गया। उसके रोंगटे खड़े हो गए और नेत्र फटे के फटे रह गए।
हे परवरदिगार! एक नवजात अबोध शिशु... पूर्ण ज्ञानियों की भांति अमृत वाणी बोल रहा है?!

शिशु कबीर ने अभय मुद्रा में अपना नन्हा हाथ उठाया और अपने सत्य स्वरूप का रहस्य उद्घाटित किया।
नीरू, मैं किसी नश्वर माता के गर्भ से उत्पन्न नहीं हुआ, न ही मैं हाड़-मांस और कर्म के बंधनों में बंधा हूं। मैं सत्यलोक से जीवों को मोक्ष का मार्ग दिखाने उतरा अविनाशी प्रकाश हूं!

हे नीरू, अपने मन की सारी चिंताएं त्याग दो। मैं सत्यलोक से जीवों के कल्याण हेतु आया हूं। मुझे अपने साथ ले चलो।

नीरू ने हाथ जोड़कर जल में मस्तक झुका दिया। युवा नीमा ने असीम वात्सल्य से उस अलौकिक बालक को उठाकर अपनी छाती से लगा लिया और श्वेत खादी की चादर में लपेट लिया।
काशी में उपहास और गृह-आगमन
The Mockery of Kashi & Arrival at Home
जब युवा नीरू और नीमा उस ज्योतिर्मय बालक को लेकर काशी की गलियों में पहुंचे, तो लोगों की आंखें फटी रह गईं।

जुलाहा मोहल्ले में खबर आग की तरह फैल गई कि नीरू अपनी ससुराल से नई दुल्हन के साथ-साथ एक नवजात शिशु भी ले आया है! पड़ोसी और बिरादरी के लोग आंगन में जमा होकर ठहाके लगाने लगे।

एक पड़ोसी ने ताली पीटते हुए उपहास उड़ाया।
अरे वाह भाई नीरू! क्या गजब का गौना हुआ है! ससुराल गया था दुल्हन ब्याहने, और पहले ही दिन बना-बनाया बेटा भी साथ ले आया! ऐसा चमत्कार तो हमने काशी में कभी नहीं सुना!

कबीर साहिब का काशी में गृह-आगमन तो हो गया, किंतु अब सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि यह दिव्य अबोध शिशु क्या पिएगा? क्या संसार का दूध यह बालक स्वीकार करेगा? देखिए अगले अध्याय में—कामधेनु गौ लीला!