सिकंदर लोदी की सभा: सुल्तान का दाह-रोग निवारण और ५२ कसौटियों की भूमिका
The Royal Court of Sikandar Lodi & The Miracle Cure
जुलाहा बस्ती में शाही पहरा और कबीर की गिरफ्तारी
The Night Arrest & March to the Royal Camp
मध्यरात्रि के समय काशी की जुलाहा बस्ती में शाही घुड़सवारों की टापें गूंज उठीं। नंगी तलवारें और जलती हुई मशालें लिए सुल्तान सिकंदर लोदी के सैनिकों ने नीरू की झोपड़ी को चारों ओर से घेर लिया।

दरवाजे पर बख्तरबंद सिपाहियों को देखकर माता नीमा और पिता नीरू भय से कांपने लगे और हाथ जोड़कर विलाप करने लगे।

माता-पिता, चिंता मत करो। जिस परमात्मा ने यह श्वास दी है, वह हर संकट में अंग-संग खड़ा है।

सिपाहियों ने चौदह वर्षीय कबीर साहिब की कलाइयों में भारी लोहे की बेड़ियां कस दीं। किंतु कबीर साहिब के मुखमंडल पर वही असीम शांति और मंद मुस्कान थी।

शाही पहरेदार बेड़ियों में जकड़े कबीर साहिब को लेकर सुल्तान सिकंदर लोदी की विशाल छावनी की ओर बढ़ चले।
सुल्तान के दरबार में स्वाभिमान और निडरता
Standing Upright Before the Sultan
सुल्तान सिकंदर लोदी का दरबार रेशमी शामियानों, कीमती ईरानी कालीनों और नंगी तलवारें ताने खड़े शाही अंगरक्षकों से सुसज्जित था। दरबार में भयानक सन्नाटा पसरा हुआ था।

तख्त पर बैठे सुल्तान सिकंदर लोदी की देह में आग की तरह जलन दौड़ रही थी। असाध्य दाह-रोग ने सुल्तान को असह्य पीड़ा में जकड़ रखा था।

कबीर साहिब को दरबार के मध्य लाया गया। कोने में खड़े षड्यंत्रकारी पंडित, काज़ी और शाही पीर शेख तकी कुटिल मुस्कान के साथ कबीर के वध की प्रतीक्षा कर रहे थे।

अदब से झुक जा, जुलाहे! हिंदुस्तान के शहंशाह सुल्तान सिकंदर लोदी के कदमों में अपना सिर झुका!

हमारा सिर केवल उस कुल मालिक परमेश्वर के चरणों में झुकता है, जिसने राजा और रंक दोनों को एक ही मिट्टी से गढ़ा है! किसी नश्वर देहधारी के आगे कबीर का सिर नहीं झुक सकता!
सुल्तान का भयंकर क्रोध और दाह-रोग का दौरा
The Sultan
गुस्ताख! तेरी यह मजाल कि तू हमारे तख्त का अपमान करे?! क्या तू नहीं जानता कि तेरी जिंदगी और मौत का फैसला हमारे एक इशारे पर निर्भर है?!

सुल्तान! जीवन और मृत्यु केवल उस परमात्मा के हाथ में है। जो स्वयं अपने शरीर में लगी आग को बुझाने में असमर्थ है, वह दूसरों के प्राणों का स्वामी कैसे बन सकता है?

जहांपनाह! यह गुस्ताख काफिर सल्तनत की तौहीन कर रहा है! इसे इसी क्षण जल्लाद के हवाले कर दीजिए!

तभी सुल्तान के शरीर में दाह-रोग का भयानक दौरा पड़ा! सुल्तान चीखते हुए तख्त पर गिर पड़ा, उसके पूरे बदन से अंगारों जैसी तपन फूट रही थी।
कबीर साहिब की अमृत-दृष्टि और असाध्य रोग से मुक्ति
The Miracle Cure & Extinguishing the Fire
दरबार में अफरा-तफरी मच गई। शाही हकीम ठंडे पानी और लेप लेकर दौड़े, किंतु सुल्तान की जलन बढ़ती ही जा रही थी। सुल्तान दर्द से बेहाल होकर बेहोश होने लगा।

चौदह वर्षीय कबीर साहिब ने असीम करुणा से भरकर पास रखे मिट्टी के कटोरे से थोड़ा सा जल अपनी हथेली में लिया।

कबीर साहिब ने वह पावन जल तड़पते हुए सुल्तान पर छिड़का और अपनी अमृतमयी दिव्य दृष्टि डाली। संपूर्ण शामियाना स्वर्णिम शीतलता के आलोक से भर गया!

जल की बूंदें छूते ही चमत्कार हुआ! सुल्तान के शरीर की भयंकर जलन, छाले और रक्त-विकार एक क्षण में शांत हो गए! सुल्तान की त्वचा प्रातःकाल की ओस की भांति शीतल और कांतियुक्त हो गई!

सुल्तान ने अपने सीने और मस्तक पर हाथ फेरकर देखा। वर्षों का असह्य दर्द ऐसे गायब हो गया था मानो कभी था ही नहीं। सुल्तान अवाक् रह गया।
सुल्तान का आभार, शेख तकी की ईर्ष्या और ५२ कसौटियों का प्रारंभ
The Sultan Bows & The Genesis of the 52 Kasnis
सुल्तान सिकंदर लोदी तख्त से नीचे उतर आया और दोनों हाथ जोड़कर बालक कबीर के सम्मुख नतमस्तक होकर खड़ा हो गया।

हे फकीर-ए-कामिल! आपने मेरी जान बचाई है! आप मेरी सल्तनत का जो भी खजाना, हीरे-जवाहरात या आधा राज्य मांगें, मैं आपके कदमों में अर्पित करने को तैयार हूं!

सुल्तान! हमें न सोने की चाह है, न सल्तनत की। यदि कुछ देना चाहते हो तो अपनी प्रजा पर दया करो, बेजुबान जीवों की हत्या बंद करो और हर हृदय में बसने वाले परमात्मा को पहचानो!

शाही पीर शेख तकी का चेहरा ईर्ष्या से काला पड़ गया। सुल्तान को कबीर के सामने झुकते देख उसका प्रभाव और सम्मान धूल में मिलता नजर आया।

सुल्तान! यह कोई ईश्वर का बंदा नहीं, बल्कि जादूगर है! यदि आपने इसे बिना परीक्षा के छोड़ दिया, तो यह आपकी सल्तनत को पलट देगा! इसकी सच्चाई जानने के लिए इसकी कड़ी कसौटियां लेनी होंगी!

शेख तकी के उकसावे में आकर सुल्तान ने कबीर साहिब पर ५२ कसौटियां (प्राणघातक अत्याचार) आजमाने का षड्यंत्र रच दिया! शाही अखाड़े में खूंखार मदांध हाथी (मदनकर हाथी) तैयार किया जाने लगा! देखिए अगले अध्याय में—पहली कसौटी: मदांध हाथी का नतमस्तक होना और महा-चमत्कार!