प्रस्तावना: मगध-मालवा महासंग्राम, विन्ध्याटवी का आश्रम और दस राजकुमारों की दीक्षा
Prologue: The Fall of Magadha & The Birth of Ten Princes
पुष्पपुरी की राजसभा और मालवा का युद्ध-घोष
The Golden Court of Pushpapuri & The Threat of Malwa
प्राचीन मगध देश की राजधानी पुष्पपुरी (पाटलिपुत्र), अपने उत्तुंग प्रासादों, कमल-सरोवरों और वैभवशाली संस्कृति के साथ आर्यावर्त का मुकुटमणि थी।

सिंहासन पर विराजमान थे महाराज राजहंस, जो अपने शौर्य, सत्यनिष्ठा और न्यायप्रिय शासन के लिए प्रजा के हृदय में पूज्य थे।
जब तक मगध की प्रजा निर्भय होकर धर्म का पालन करती है, तब तक हमारे राज्य की कीर्ति अक्षुण्ण रहेगी।

राजोद्यान में महाराज राजहंस और उनकी धर्मपरायण महारानी वसुमती राज्य के सुख-समृद्धि की चर्चा कर रहे थे।
महाराज, प्रजा आपके न्याय की छत्रछाया में सुरक्षित है, किंतु गुप्तचरों का कहना है कि मालवा नरेश मानसार षड्यंत्र रच रहा है।

सहसा एक धूल-धूसरित गुप्तचर ने राजसभा में प्रवेश कर मालवा नरेश का युद्ध-पत्र महाराज के समक्ष प्रस्तुत किया।
महाराज! मालवा नरेश मानसार ने मगध की सीमाओं को घेर लिया है! वे हमारी संप्रभुता को चुनौती दे रहे हैं!

महाराज राजहंस ने सिंह-गर्जना करते हुए अपनी स्वर्ण-जड़ित तलवार म्यान से खींच ली।
मगध किसी आक्रांता के समक्ष मस्तक नहीं झुकाता! सेनापति, समस्त चतुरंगिणी सेना को रणभूमि में उतरने की आज्ञा दो!
भीषण महासंग्राम और शिव-प्रदत्त गदा का प्रहार
The Cataclysmic Battle & The Celestial Mace
रणभूमि में मगध और मालवा की चतुरंगिणी सेनाओं के मध्य प्रलयंकारी युद्ध छिड़ गया, जिससे धरा कांप उठी और आकाश बाणों से आच्छादित हो गया।

महाराज राजहंस ने दिव्य दिव्यास्त्रों का संधान कर मानसार के रथ के पहियों को एक ही प्रहार में चूर-चूर कर दिया।
मानसार! तुम्हारा अधर्म का मार्ग यहीं समाप्त होता है! शस्त्र त्याग दो!

क्रोध से तमतमाए मानसार ने भगवान शिव की घोर तपस्या से प्राप्त दिव्य अमोघ गदा को आकाश में उठाया।
राजहंस! तुमने मेरी सेना को पीछे धकेला होगा, किंतु इस शिव-प्रदत्त गदा की अमोघ शक्ति का सामना तीनों लोकों में कोई नहीं कर सकता!

मानसार ने गदा का प्रहार भूमि पर किया! एक भयानक विस्फोट हुआ जिसने वायुमंडल को चीर दिया और महाराज राजहंस अचेत होकर रथ में गिर पड़े।

स्वामीभक्त सारथि ने तत्परता दिखाते हुए घोड़ों को चाबुक लगाई और अचेत महाराज को लेकर विन्ध्याचल के सघन वनों की ओर तीव्र गति से निकल गया।
महाराज के प्राणों की रक्षा ही मगध के भविष्य की अंतिम आशा है! हमें विन्ध्याटवी के सुरक्षित आश्रम पहुँचना ही होगा!
विन्ध्याटवी का शांत आश्रम और महर्षि वामदेव की शरण
The Sanctuary of Sage Vamadeva
विन्ध्याचल के सुरम्य अंचलों में, जहाँ कल-कल बहते निर्झर और शांत तपोवन थे, महर्षि वामदेव का पावन आश्रम स्थित था।

महारानी वसुमती और निष्ठावान मंत्रियों ने आश्रम में पहुँचकर ब्रह्मर्षि वामदेव के चरणों में नतमस्तक होकर शरण माँगी।
ऋषिवर! युद्ध में सब कुछ बिखर गया है। महाराज के प्राण संकट में हैं। हम आपकी पावन शरण में आए हैं।

महर्षि वामदेव ने दिव्य वनौषधियों के लेप से महाराज राजहंस के घावों का उपचार किया, जिससे महाराज की चेतना लौट आई।
राजन, धैर्य धारण करो। कालचक्र का यह अंधकार केवल एक नए सूर्य के उदय की पूर्वसंध्या है।

हवन-कुंड की प्रज्वलित ज्वालाओं के समक्ष महर्षि वामदेव ने भविष्य की दिव्य उद्घोषणा की।
शोभन! महारानी के गर्भ से एक चक्रवर्ती राजकुमार का जन्म होगा! और उसके साथ नौ अन्य महापराक्रमी राजकुमार इस आश्रम में आकर मिलेंगे!

महारानी वसुमती ने प्रातःकाल विन्ध्य के शीतल निर्झर में स्नान कर सूर्यदेव को अर्घ्य दिया और कुल की पुनःप्रतिष्ठा की प्रार्थना की।
दस राजकुमारों का जन्म और नामकरण संस्कार
The Birth of the Ten Princes
शुभ मुहूर्त में महारानी वसुमती की कोख से एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, जिसके मुखमंडल पर सूर्य का तेज था—राजकुमार राजवाहन!
यह बालक मगध का उद्धारक होगा! इसका नाम 'राजवाहन' होगा, क्योंकि यह राजधर्म का सच्चा संवाहक बनेगा!

उसी कालखंड में मगध के वफादार मंत्रियों और मित्र नरेशों ने अपने नवजात शिशुओं को युद्ध की विभीषिका से बचाकर वामदेव के आश्रम में समर्पित किया।
ऋषिवर! हम अपने प्राणप्रिय पुत्रों को आपके चरणों में सौंपते हैं। ये राजकुमार राजवाहन के साथ मिलकर धर्म की रक्षा करेंगे!

महर्षि वामदेव ने यज्ञ-वेदी पर दसों नवजात बालकों का नामकरण संस्कार संपन्न किया।

आश्रम के आंगन में दसों राजकुमार एक साथ खेलते, हंसते और प्रकृति के सुरम्य वातावरण में निर्भय होकर बड़े होने लगे।

दस वर्ष की आयु में वे ताड़पत्र के ग्रंथों से वेद, व्याकरण और प्राचीन इतिहास का अध्ययन करने लगे।
चौंसठ कलाएँ, अस्त्र-शस्त्र और गुप्तचर विद्या की दीक्षा
Education in the 64 Arts & Covert Tradecraft
महाराज राजहंस ने राजकुमारों को धनुर्विद्या, खड्ग-युद्ध, गदा और अश्व-संचालन में अद्वितीय योद्धा बनाया।
एक योद्धा का खड्ग केवल शक्ति का नहीं, अपितु निर्दोषों की रक्षा का साधन होना चाहिए!

विन्ध्याचल की ऊँची चोटियों पर वे तीव्रगामी अश्वों को साधते हुए दुर्गम रास्तों पर विजय पाने लगे।

महर्षि वामदेव ने उन्हें कौटिल्य अर्थशास्त्र, राजनीति, गूढ़ कूटनीति और गुप्त संदेशों को डिकोड करने का गूढ़ विज्ञान सिखाया।
शत्रु का दुर्ग केवल बाहुबल से नहीं, अपितु सूक्ष्म प्रज्ञा और कूटनीति से जीता जाता है!

दण्डी कृत 'चौरशास्त्र' और गुप्त प्रवेश विद्या में राजकुमारों ने तालों को खोलने और गुप्त सुरँगें खोदने का कौशल साधा।

विभिन्न बोलियों, स्वांग और वेशभूषा में निपुण होकर पुष्पोद्भव और अपहारवर्मा ने छद्मवेश में श्रेष्ठता सिद्ध की।
जब वेशभूषा बदलती है, तो मनुष्य की पहचान भी बदल जाती है! कोई हमें राजपुत्र नहीं पहचान सकेगा!

कठिनतम परीक्षा और शास्त्रार्थ में विजयी होकर, बीस वर्ष की आयु तक राजकुमार राजवाहन सभी विद्याओं और युद्ध-कला में आर्यावर्त के सर्वश्रेष्ठ युवा नायक बन चुके थे।
पवित्र राजतिलक और दस राजकुमारों की अमर प्रतिज्ञा
The Sacred Coronation & The Eternal Brotherhood Oath
आश्रम में दसों राजकुमारों का समावर्तन और राजवाहन का पावन राजतिलक उत्सव वैदिक मंत्रोच्चार के साथ प्रारंभ हुआ।
पुत्र राजवाहन! आज तुम समस्त विद्याओं में पारंगत होकर मगध के धर्म-ध्वज को पुनः स्थापित करने के योग्य बन चुके हो!

यज्ञ-कुण्ड के चारों ओर दसों राजकुमारों ने अपनी तलवारें एक-दूसरे पर टिकाकर अखंड भ्रातृत्व की प्रतिज्ञा ली।
हम अग्नि को साक्षी मानकर प्रतिज्ञा करते हैं—जीवन रहे या मृत्यु, हम राजवाहन के नेतृत्व में अधर्म का नाश करेंगे और एक-दूसरे का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे!

महारानी वसुमती ने सजल नेत्रों से दसों वीरों की कलाइयों पर रक्षा-सूत्र बांधकर विजय का आशीर्वाद दिया।
जाओ मेरे वीरों! धर्म तुम्हारा कवच बने और सत्य तुम्हारी ढाल! तुम्हारा मार्ग सदैव आलोकित रहे!

महाराज राजहंस ने विन्ध्य के शिखर से आर्यावर्त की चारों दिशाओं की ओर संकेत करते हुए दिग्विजय का आदेश दिया।
आर्यावर्त के नगरों, वनों और दुर्गों का भ्रमण करो! प्रजा के कष्टों को समझो और न्याय का साम्राज्य स्थापित करो!

दसों राजकुमार अपने तेजतर्रार अश्वों पर सवार होकर वन की सीमा पर पहुंचे, उनके हृदय में अदम्य उत्साह था।

और इस प्रकार स्वर्ण-उषा की किरणों के मध्य विन्ध्याटवी के दुर्गम पथ पर दस राजकुमारों की रोमांचक, रहस्यमयी और अमर यात्रा का शुभारंभ हुआ!