विन्ध्याटवी में महा-सम्मेलन: दस राजकुमारों का समागम और पुष्पपुरी का युद्ध-घोष
The Grand Assembly in Vindhyatavi: The Ten Masters Swear the Imperial March
महर्षि वामदेव के पावन आश्रम में प्रत्यागमन
Return to the Sacred Hermitage of Vamadeva
विन्ध्याचल की सुरम्य उपत्यका में स्थित महर्षि वामदेव का पावन तपोवन, प्रभात के स्वर्णिम आलोक, कल-कल बहते निर्झरों और वैदिक मंत्रों की गूंज से आलोकित हो रहा था।

दसों दिशाओं पर अपनी प्रज्ञा और शौर्य का परचम फहराकर, दशों राजकुमार एक साथ अश्वों पर सवार होकर आश्रम के मुख्य द्वार में प्रविष्ट हुए।
भाइयों! वर्षों के गुप्त अभियानों और कठिन परीक्षाओं के उपरांत, हम पुनः अपनी मातृ-भूमि और पूज्य गुरुदेव के चरणों में उपस्थित हैं!

आश्रम के द्वार पर खड़े महाराज राजहंस और महारानी वसुमती ने अपने वीर पुत्रों को जीवित और विजयी लौटते देखा, तो उनके नेत्रों से अश्रु बह निकले।

राजकुमार राजवाहन ने नतमस्तक होकर माता-पिता के चरण स्पर्श किए। महाराज और महारानी ने अपने तेजस्वी पुत्र को छाती से लगाकर आशीष दिया।
पुत्र राजवाहन! तुमने और तुम्हारे भाइयों ने असंभव को संभव कर दिखाया! मगध का सूर्य पुनः उदय होने को है!
मेरे वीर पुत्रो! तुम्हारी तपस्या और धर्म-निष्ठा ने आज आर्यावर्त का मस्तक गर्व से ऊंचा कर दिया है!

दसों राजकुमारों ने प्राचीन वटवृक्ष के नीचे विराजमान ब्रह्मर्षि वामदेव के चरणों में सिर झुकाकर उनका पावन आशीर्वाद ग्रहण किया।
दश-राज्यों की संधियों और विजयरत्नों का समर्पण
The Presentation of Triumphs & Allied Charters
वटवृक्ष की छाया में आयोजित भव्य राजसभा में दसों राजकुमारों ने अपने-अपने अभियानों की विजय-पताकाएं और सैन्य-संधि पत्र समर्पित किए।

पुष्पोद्भव ने उज्जयिनी का व्यापारिक राजकोष और सोमदत्त ने सौराष्ट्र की नौसैनिक संधि और दिव्य वज्रमणि महाराज के चरणों में रखी।
मालवा का आंतरिक व्यापारिक तंत्र और सौराष्ट्र का समुद्री बेड़ा अब मगध के धर्म-युद्ध के लिए समर्पित है!

अपहारवर्मा ने चम्पा (अंग) के दस हजार धनुर्धरों और उपहारवर्मा ने मिथिला के बीस हजार रथियों की संधि-मुद्रा समर्पित की।
महाराज! मिथिला और अंग के समस्त शस्त्रागार अब मगध की सेना के साथ जुड़ चुके हैं!

अर्थपाल ने काशी के पच्चीस हजार सैनिकों का ताम्र-पत्र और प्रमति ने श्रावस्ती (कौशल) के बीस हजार अश्वारोहियों का राज-पत्र प्रस्तुत किया।

मित्रगुप्त ने तीस हजार नौसैनिक, मन्त्रगुप्त ने चालीस हजार गज-सैनिक और विश्रुत ने विदर्भ के तीस हजार रथ-सैनिकों का सैन्य-दल समर्पित किया!
दसों दिशाओं के दो लाख अजेय योद्धा विन्ध्याचल की तलहटी में मगध के ध्वज तले एकत्र हो चुके हैं!
महर्षि वामदेव का महायज्ञ और चिन्तामणि-खड्ग का अभिषेक
The Prophetic Consecration by Sage Vamadeva
आश्रम में महायज्ञ की प्रज्वलित ज्वालाओं के मध्य महर्षि वामदेव ने ऋग्वेद के विजय-सूक्तों का पाठ करते हुए पूर्णाहुति समर्पित की।

ऋषिवर ने गंगाजल से राजवाहन की तलवार का अभिषेक किया और उसकी मूठ पर पाताल-प्राप्त दिव्य 'चिन्तामणि' रत्न को प्रतिष्ठापित कर दिया!

महर्षि वामदेव ने अपना हाथ उठाकर दिव्य वाणी में कहा—'दशों कुमारों की कठिन परीक्षा पूर्ण हुई! अब आर्यावर्त का कोई भी अत्याचारी तुम्हारे सम्मुख नहीं ठहर सकता!'
जाओ राजवाहन! पुष्पपुरी तुम्हारा आह्वान कर रही है! अधर्म के अंधकार को मिटाकर धर्म-साम्राज्य की पुनः स्थापना करो!

महारानी वसुमती ने सजल नेत्रों से दसों वीरों के मस्तक पर रोली का विजय-तिलक लगाया और उनकी कलाइयों पर स्वर्ण-युक्त रक्षा-सूत्र बांधे।
जाओ मेरे वीरो! सत्य तुम्हारे आगे चले और धर्म तुम्हारी रक्षा करे!

महाराज राजहंस ने मगध का प्राचीन विजय-शंख युवराज राजवाहन के हाथों में सौंपते हुए साम्राज्य के मुक्ति-संग्राम का सेनापतित्व प्रदान किया।
पुत्र राजवाहन! यह शंख मगध की संप्रभुता का प्रतीक है! इसका नाद पुष्पपुरी के प्राचीरों पर गूंजना चाहिए!

दसों राजकुमारों ने अपनी चमकती तलवारें आकाश में उठाकर एक स्वर में 'मगध की जय और धर्म की जय' का गगनभेदी उद्घोष किया!
विन्ध्य की तलहटी में दो लाख चतुरंगिणी सेना का समागम
The Convergence of 200,000 Allied Armies
विन्ध्याचल की तलहटी में फैले विशाल मैदानों पर आर्यावर्त के दस शक्तिशाली राज्यों की दो लाख चतुरंगिणी सेनाएं असीम महासागर के समान उमड़ पड़ीं।

कलिंग और आन्ध्र की विशाल गज-सेना, कांस्य-कवचों और स्वर्ण-होदों से सुसज्जित होकर युद्ध की अगली पंक्ति में खड़ी थी।

विदर्भ, मिथिला और कौशल के सहस्रों स्वर्णिम युद्ध-रथ सूर्य के प्रकाश में दमक रहे थे, जिनके अश्व रण-भूमि में दौड़ने को आतुर थे।

अंग के कुशल धनुर्धर, श्रावस्ती के बख्तरबंद घुड़सवार और काशी के भाला-सैनिक अनुशासित पंक्तियों में खड़े थे।
दशों राजकुमारों की जय! मगध के साम्राज्य की पुनः प्रतिष्ठा के लिए हम प्राण न्योछावर करेंगे!

सुह्म और सौराष्ट्र के युद्ध-पोतों का विशाल बेड़ा नदी के तट पर लंगर डाले हुए था, जो भारी रसद और तोप-तुल्य यंत्रों से सज्जित था।
शाही युद्ध-परिषद और पुष्पपुरी-मुक्ति का चक्रव्यूह
The Imperial War Council & Strategic Plan
शाही युद्ध-तंबू के भीतर, युवराज राजवाहन ने आर्यावर्त और पुष्पपुरी के किलेबंदी के विशाल मानचित्र पर अपनी अंतिम रणनीति निश्चित की।

राजवाहन ने कमान बांटी: मित्रगुप्त जल-मार्ग का नियंत्रण करेंगे, मन्त्रगुप्त गज-सेना का नेतृत्व संभालेंगे और प्रमति-विश्रुत घुड़सवार सेना का संचालन करेंगे।
पुष्पपुरी की प्राचीरों पर अधर्म का शासन अधिक देर नहीं टिकेगा! चतुरंगिणी सेना चारों दिशाओं से एक साथ घेराबंदी करेगी!

अर्थपाल और अपहारवर्मा ने चौरशास्त्र की विधियों से पुष्पपुरी के मुख्य फाटकों और खंदकों के यांत्रिक अवरोधों को चुपचाप निष्क्रिय करने का दायित्व लिया।

पुष्पोद्भव और सोमदत्त ने दो लाख सैनिकों के लिए अबाध अन्न-भंडार, स्वर्ण-कोष और चिकित्सा-शिविरों की पूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित की।

दसों सेनापतियों ने मगध के मानचित्र पर एक साथ हाथ रखकर मातृभूमि की मुक्ति की अंतिम प्रतिज्ञा पर अपनी मुहर लगाई!
एक प्राण, एक लक्ष्य, एक खड्ग! मगध की स्वतंत्रता तक विश्राम नहीं!
पुष्पपुरी की ओर महा-प्रयाण और विजय का शंखनाद
The Departure & The Imperial March on Pushpapuri
विन्ध्याचल के सर्वोच्च शिखर पर खड़े होकर महाराज राजहंस ने मगध का पावन शंख फूंका, जिसकी गूंज से दिशाएं कांप उठीं!

युवराज राजवाहन ने अपने स्वर्ण-रथ से प्रदीप्त चिन्तामणि-खड्ग हवा में लहराते हुए महा-प्रयाण का आदेश दिया!
पुष्पपुरी की ओर आगे बढ़ो! धर्म, सत्य और मगध की स्वतंत्रता के लिए हर अन्याय को धूल में मिला दो!

दो लाख सैनिकों की चतुरंगिणी सेना ने नगाड़ों की गड़गड़ाहट और फहराते ध्वजों के साथ उत्तर की ओर प्रयाण प्रारंभ कर दिया!

आश्रम के शिखर से महारानी वसुमती और महर्षि वामदेव ने उठती हुई स्वर्णिम धूलि को देखा और विजय की प्रार्थनाएं कीं।

दशों राजकुमार अग्रिम पंक्ति में एक साथ अश्वों पर सवार होकर चल रहे थे, उनके मुखमंडल पर अपनी मातृभूमि की मुक्ति का अपार तेज था।
पुष्पपुरी की प्राचीरों पर न्याय का सूर्य चमकेगा! भाइयों, आगे बढ़ो!

और इस प्रकार विन्ध्याचल से उठी यह न्याय की महा-सेना, मगध के पाषाण-दुर्ग पुष्पपुरी के अंतिम मुक्ति-संग्राम और धर्म-साम्राज्य की पुनः-स्थापना की ओर अग्रसर हुई!