पुष्पपुरी की मुक्ति: महासंग्राम, मानसार का मान-भंग और चक्रवर्ती साम्राज्य का सूर्योदय
The Liberation of Pushpapuri & The Imperial Restoration of Dharma
पुष्पपुरी की प्राचीरों पर घेराबंदी और युद्ध-घोष
Arrival at Fortified Pushpapuri & The Siege
मगध की ऐतिहासिक राजधानी पुष्पपुरी की विशाल पाषाण-प्राचीरों के चारों ओर दस राजकुमारों के नेतृत्व में दो लाख चतुरंगिणी सेना ने महासागर की भांति घेरा डाल दिया।

पुष्पपुरी के मुख्य बुर्ज से मालवा नरेश मानसार ने नीचे देखा, तो उसका अहंकार भय में बदल गया—चारों दिशाओं से दस राज्यों के ध्वज लहरा रहे थे!
यह असंभव है! राजहंस का कुल तो विन्ध्याटवी में नष्ट हो चुका था! यह विशाल चतुरंगिणी सेना कहाँ से आ गई?!

मानसार ने अपने सेनापतियों को प्राचीरों पर सभी तोप-यंत्र, भारी धनुर्धर और रथ-दल तैनात करने का उन्मत्त आदेश दिया।

अग्रिम पंक्ति में स्वर्ण-रथ पर आरूढ़ युवराज राजवाहन ने अपने नौ भाइयों के साथ एक साथ प्रहार का शाही संकेत दिया।
भाइयों! आज का दिन मगध के सम्मान और धर्म की पुनः स्थापना का है! पुष्पपुरी के फाटकों को खोल दो!

सहस्रों युद्ध-शंखों के गगनभेदी नाद के साथ दो लाख सैनिकों ने पुष्पपुरी की खंदकों की ओर कूच किया!
चतुर्मुखी महा-आक्रमण और नगर-द्वारों का भेदन
The Coordinated Four-Pronged Assault
गंगा के जल-मार्ग से राजकुमार मित्रगुप्त ने सुह्म और सौराष्ट्र के युद्ध-पोतों से प्रज्वलित पाषाण-गोले दागकर नदी-फाटक के धनुर्धरों को निष्प्रभावी कर दिया।

भूमिगत सुरंग से अचानक प्रकट होकर अर्थपाल और अपहारवर्मा ने चौरशास्त्र के बल पर मुख्य फाटक के लोहे के कपाटों के लीवर काट दिए और विशाल काष्ठ-पुल गिरा दिया!
मार्ग निष्कंटक है! गज-सेना को आगे बढ़ाओ!

राजकुमार मन्त्रगुप्त ने ऐरावतवर्मा गजराज पर सवार होकर कांस्य-फाटकों पर ऐसा भीषण प्रहार किया कि नगर-द्वार तिनकों की भांति बिखर गए!
पुष्पपुरी के कपाट टूट चुके हैं! चतुरंगिणी सेना, नगर में प्रवेश करो!

प्रमति, विश्रुत और उपहारवर्मा ने सहस्रों घुड़सवारों और रथों के साथ नगर के मुख्य राजमार्गों पर धावा बोलकर मालवा के सैनिकों को निहत्था कर दिया।

पुष्पोद्भव और सोमदत्त ने नगर के अन्न-भंडारों और राजकोष की सुरक्षा की, जिससे एक भी निर्दोष नागरिक को आंच नहीं आई और नगरवासी हर्ष से जयघोष करने लगे!
राजप्रांगण का महा-द्वंद्व: राजवाहन और मानसार
The Climax Duel: Rajavahana vs. King Manasara
पुष्पपुरी के राजप्रासाद के मुख्य चौक में, क्रोध से पागल मानसार ने भगवान शिव की तपस्या से प्राप्त दिव्य अमोघ गदा को आकाश में उठाया!
राजवाहन! तुम्हारे पिता इस गदा के प्रहार से नहीं बच सके थे! आज तुम्हारा वंश इसी पाषाण पर समाप्त होगा!

युवराज राजवाहन निडर होकर आगे बढ़े—यह उनके जीवन, शौर्य और धर्म की अंतिम और सबसे कठिन परीक्षा थी! उनकी तलवार का चिन्तामणि रत्न सूर्य के समान चमक रहा था।
मानसार! अधर्म और अहंकार से प्राप्त शक्तियां धर्म के खड्ग के सामने तिनके के समान भस्म हो जाती हैं!

मानसार ने पूरी शक्ति से गदा का प्रलयंकारी प्रहार किया, जिससे वायुमंडल में भयंकर विस्फोट हुआ!
इस शिव-गदा के प्रहार से कोई न बच सका! तुम्हारा अंत निश्चित है!

बिजली की तेजी से राजवाहन ने तलवार का वार किया—चिन्तामणि के दिव्य तेज ने शिव-गदा को बीच से चीरकर चिनगारियों और धूल में बदल दिया!

एक ही घुमावदार पैंतरे में राजवाहन ने मानसार को निहत्था कर अपनी तलवार की नोक उसके वक्ष पर टिका दी।
युद्ध समाप्त हुआ, मानसार! शस्त्र त्याग दो!

मानसार विस्मय और पराजय से संगमरमर के फर्श पर घुटनों के बल गिर पड़ा और उसने अपना मुकुट और राज-पटरी राजवाहन के चरणों में समर्पित कर दी।
मानसार का पश्चाताप और पुष्पपुरी का जन-उल्लास
King Manasara
मानसार ने हाथ जोड़कर पश्चाताप के साथ कहा—'हे चक्रवर्ती वीर! आप साक्षात धर्म के अवतार हैं। मैं अपने अहंकार को त्यागकर संन्यास लेता हूँ!'
मेरा समस्त साम्राज्य और सेना आपकी है। मुझे केवल तपोवन में शांतिपूर्वक जाने की अनुमति दें।

राजवाहन ने क्षत्रिय-मर्यादा का पालन करते हुए पराजित मानसार को अभयदान दिया और ससम्मान तपोवन जाने की अनुमति दी।
जो शरणागत हो, उस पर खड्ग नहीं उठाया जाता। आप निर्भय होकर तपोवन में प्रभु-भक्ति में लीन हों।

पुष्पपुरी की सहस्रों प्रजा सड़कों पर उमड़ पड़ी और उन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने राजकुमारों पर गुलाब और चमेली के पुष्प बरसाए।

पुष्पपुरी के मुख्य प्रासाद के सर्वोच्च शिखर पर मगध का प्राचीन स्वर्ण-सूर्य ध्वज पुनः शान से फहरा उठा!

मालवा की शेष सेना ने शांतिपूर्वक अपने अस्त्र समर्पित कर दिए, जिन्हें मित्र-सैनिकों के रूप में ससम्मान स्वीकार किया गया।
महाराज राजहंस का पुनः राज्याभिषेक और चक्रवर्ती पद
Re-Enthronement of Rajahamsa & Vasumati
शंख-नाद और वेद-पाठ के मध्य महाराज राजहंस और महारानी वसुमती स्वर्ण-रथ पर सवार होकर पुष्पपुरी के राजमहल में प्रविष्ट हुए।

राजसभा के स्वर्ण-सिंहासन पर जब महाराज राजहंस और महारानी वसुमती पुनः आसीन हुए, तो संपूर्ण आर्यावर्त की दिशाएं हर्ष से गूंज उठीं।
आज मगध की आत्मा मुक्त हुई है! हमारे पुत्रों के त्याग और धर्म ने असम्भव को सम्भव कर दिखाया!

महाराज राजहंस ने खड़े होकर अपने तेजस्वी पुत्र राजवाहन के मस्तक पर आर्यावर्त का चक्रवर्ती महा-मुकुट धारण कराया!
पुत्र राजवाहन! आज से तुम केवल मगध के नहीं, अपितु अखंड भारत के चक्रवर्ती सम्राट हो!

ब्रह्मर्षि वामदेव और उच्च पुरोहितों ने सप्त-सरिताओं के पवित्र जल से सम्राट राजवाहन का राजसूय अभिषेक संपन्न किया।

समस्त सामंतों, नागरिकों और सेनापतियों ने खड़े होकर 'चक्रवर्ती सम्राट राजवाहन की जय' का गगनभेदी उद्घोष किया।
दश-अधिपतियों का अभिषेक और अखंड धर्म-साम्राज्य
The Consecration of the Ten Viceroys & The Golden Era
सिंहासन पर विराजमान सम्राट राजवाहन ने अपने नौ साथी राजकुमारों को उनके विजित राज्यों का स्वतंत्र अधिपति और महा-सामंत घोषित किया।

पुष्पोद्भव को अवन्ती (उज्जयिनी), सोमदत्त को सौराष्ट्र और अपहारवर्मा को अंग (चम्पा) का राज-मुकुट पहनाया गया।

उपहारवर्मा को विदेह (मिथिला), अर्थपाल को काशी और प्रमति को कौशल (श्रावस्ती) का संप्रभु शासन सौंपा गया।

मित्रगुप्त को सुह्म (दामलिप्त), मन्त्रगुप्त को कलिंग-आन्ध्र और विश्रुत को विदर्भ (महिष्मती) का राज-दंड प्रदान किया गया।

दसों राजकुमारों ने अपनी स्वर्णिम तलवारें और मुकुट एक साथ उठाकर अखंड भ्रातृत्व, सत्य और धर्म-रक्षा की शाश्वत प्रतिज्ञा ली!
धर्मो रक्षति रक्षितः! सत्यमेव जयते! अखंड भारत के इस स्वर्णिम साम्राज्य में न्याय का सूर्य सदैव प्रदीप्त रहेगा!

और इस प्रकार महाकवि दण्डी विरचित 'दशकुमारचरितम्' की यह अमर, रोमांचक और न्याय-युक्त महा-गाथा, अखंड भारत के स्वर्णिम युग के प्राकट्य के साथ संपूर्णता को प्राप्त हुई!