दामलिप्त में मित्रगुप्त: कन्दुकवती का नृत्य, राक्षस की चार पहेलियाँ और आकाश-उड़ान
Mitragupta in Damalipta: The Rakshasa's Four Riddles & The Ocean Flight
दामलिप्त का विशाल बंदरगाह और कन्दुकवती का कन्दुक-नृत्य
The Seaport of Damalipta & The Sacred Ball Dance
सुह्म देश का अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह दामलिप्त (ताम्रलिप्ति), बंगाल की खाड़ी के नीले जल, यवनों के विशाल नौका-दलों और सागर-तटीय विंध्यवासिनी देवी के मंदिर से सुशोभित था।

राजकुमार मित्रगुप्त, जो समुद्र-विद्या, दर्शनशास्त्र और पहेलियों के अद्वितीय ज्ञाता थे, दामलिप्त के उत्सव में प्रविष्ट हुए।
इस विशाल बंदरगाह पर समुद्र की लहरों के साथ-साथ ज्ञान और व्यापार की अनंत धाराएं बह रही हैं।

समुद्र-तट के खुले मंडप पर सुह्म-नरेश की राजकन्या कन्दुकवती अपने अद्वितीय 'कन्दुक-नृत्य' (गेंद-नृत्य) की तालबद्ध प्रस्तुति दे रही थीं।

जब गेंद हवा में ऊंची उछली, तो मित्रगुप्त ने उसे चपलता से थामकर ससम्मान राजकुमारी को लौटाया—और दोनों की दृष्टि मिलते ही प्रेम की विद्युत तरंग दौड़ गई!
हे रूपवान आर्य! आपके हाथों की यह चपलता और गरिमा आपके किसी उच्च राजकुल के होने का प्रमाण है।
राजकुमारी, आपका यह नृत्य केवल कला नहीं, अपितु सुर-ताल और सौंदर्य का साक्षात साक्षात्कार है!

मंदिर के प्रस्तर-स्तंभ की ओट से ईर्ष्यालु सामंत-पुत्र भीमधन्वा ने यह दृश्य देखा और उसके मन में विषैला प्रतिशोध भड़क उठा।
सागर में प्रक्षेप, यवन-पोत और भयानक जल-प्लावन
The Treacherous Ocean Cast & The Shipwreck
मध्यरात्रि में भीमधन्वा के भाड़े के सैनिकों ने मित्रगुप्त पर विश्वासघात से आक्रमण किया, उन्हें भारी लोहे की जंजीरों में बांधकर समुद्र की उत्ताल लहरों में फेंक दिया!
जाओ विदेशी युवक! समुद्र के घड़ियाल ही अब तुम्हारी अंतिम सैया बनेंगे! कन्दुकवती केवल मेरी होगी!

मित्रगुप्त ने अदम्य साहस और योग-बल से जंजीरों के भार के बावजूद तूफानी सागर में रात भर तैरकर अपने प्राणों की रक्षा की।

प्रभात की पहली किरण के साथ यवनों (ग्रीक व्यापारियों) का एक विशाल व्यापारिक पोत निकट आया और नाविकों ने रस्सियाँ फेंककर राजकुमार को ऊपर खींच लिया।

सहसा समुद्री डाकुओं के बेड़े ने पोत पर आक्रमण किया। मित्रगुप्त ने अपनी बेड़ियों को तोड़कर खड्ग थामा और नाविकों का नेतृत्व करते हुए डाकुओं को खदेड़ दिया!
साहस रखो नाविकों! समुद्र उन वीरों का साथ देता है जो मृत्यु के सम्मुख भी नहीं झुकते!

किंतु तभी एक विनाशकारी समुद्री चक्रवात ने पोत को शिलाओं पर पटक दिया, और मित्रगुप्त एक अज्ञात, रहस्यमयी द्वीप के तट पर जा गिरे।
मायावी द्वीप का राक्षस और चार दार्शनिक पहेलियाँ
The Island Rakshasa & The Four Existential Riddles
इस रहस्यमयी द्वीप के गहन वनों में अलौकिक प्रकाशमान वटवृक्ष, बहते दिव्य निर्झर और स्वर्ण-कमलों से युक्त सरोवर विद्यमान थे।

सहसा वृक्षों की शाखाओं से दस फुट ऊंचा एक विशाल, विद्वान राक्षस प्रकट हुआ, जिसने मित्रगुप्त को हवा में उठाकर भीषण गर्जना की!
मानव! यदि अपने प्राणों की रक्षा चाहते हो, तो मेरी चार गूढ़ दार्शनिक पहेलियों की कठिन परीक्षा में सफल होकर दिखाओ, अन्यथा मेरा ग्रास बनो!

प्रथम पहेली: मित्रगुप्त ने निर्भय होकर 'धूमिनिका की कथा' सुनाई, जिसमें उन्होंने वासना, चंचल चित्त और आत्म-संयम के रहस्य का विश्लेषण किया।
जो मनुष्य विवेक को त्यागकर केवल कामुक वासना के पीछे भागता है, वह अपने ही बुने जाल में नष्ट हो जाता है!

द्वितीय पहेली: मित्रगुप्त ने 'गोमिनी की प्रसिद्ध कथा' सुनाई कि किस प्रकार एक विदुषी और गुणवती नारी मात्र एक मुट्ठी धान से संपूर्ण राजभोज तैयार कर सकती है।

तृतीय पहेली: 'निम्बवती की कथा' के माध्यम से उन्होंने सिद्ध किया कि धैर्य, विनम्रता और चातुर्य से दुष्ट और कृतघ्न पति के हृदय को भी जीता जा सकता है।

चतुर्थ पहेली: 'नितम्बवती की गाथा' से मित्रगुप्त ने प्रमाणित किया कि निष्कलंक प्रेम और सत्य के सम्मुख तांत्रिक माया और झूठे आरोप कभी नहीं टिक सकते।
राक्षस का कायाकल्प और आकाश-मार्ग से प्रयाण
The Demon
मित्रगुप्त के अद्भुत ज्ञान और नीति-कथाओं से राक्षस के हृदय का समस्त अंधकार मिट गया, और वह एक दिव्य, पंख-युक्त यक्ष में परिवर्तित हो गया!

कृतज्ञ यक्ष ने मित्रगुप्त के चरणों में नमन करते हुए उन्हें आकाश में उड़ने की अलौकिक 'खेचर-विद्या' और दिव्य पारिजात-माला प्रदान की।
हे प्रज्ञा के महासागर! आपके वचनों ने मेरे शाप का अंत कर दिया। अब आप वायु-वेग से उड़कर अपनी प्रेमिका की रक्षा करें!

राजकुमार मित्रगुप्त बादलों को चीरते हुए, स्वर्णिम संध्या-आकाश में उड़ते हुए दामलिप्त नगरी की ओर तीव्र गति से बढ़े।

दामलिप्त के राजोद्यान में, क्रूर भीमधन्वा विवश राजकुमारी कन्दुकवती को बलपूर्वक विवाह-मंडप की ओर घसीट रहा था।
तुम्हारा मित्रगुप्त अब समुद्र की तलहटी में सड़ चुका है! अब तुम्हें मुझसे विवाह करना ही होगा!

राजकुमारी कन्दुकवती ने अपने वस्त्र में छिपा खंजर निकाला, अपने सतीत्व की रक्षा के लिए प्राण त्यागने को तत्पर हो गईं।
आकाश से प्रहार, भीमधन्वा का संहार और कन्दुकवती की रक्षा
Overthrowing Tyranny & Rescuing Kandukavati
उसी क्षण आकाश में गर्जना हुई और राजकुमार मित्रगुप्त मेघों से सीधे विवाह-मंडप के मध्य अवतरित हुए!
ठहर दुराचारी भीमधन्वा! मित्रगुप्त जीवित है और तुम्हारा काल बनकर उपस्थित है!

भीमधन्वा ने तलवार से वार किया, किंतु मित्रगुप्त ने अपने खड्ग के एक ही तीव्र घुमाव से उसकी तलवार के टुकड़े-टुकड़े कर उसे भूमि पर पटक दिया!

राजकुमारी कन्दुकवती ने खंजर फेंक दिया और अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ अपने वीर प्रेमी की बाहों में समा गईं।
हे मेरे प्राणनाथ! आप बादलों को चीरकर मेरे उद्धार के लिए आ गए! मेरी आत्मा धन्य हो गई!

सुह्म-नरेश तुंगधन्वा राजरक्षकों के साथ पहुंचे और उन्होंने मित्रगुप्त के इस अलौकिक पराक्रम को देखकर उन्हें राज्य का मुक्तिदाता घोषित किया।
राजकुमार मित्रगुप्त! आपकी वीरता और प्रज्ञा ने मेरी सुपुत्री के सम्मान और सुह्म राज्य की मर्यादा की रक्षा की है!

गद्दार भीमधन्वा को बेड़ियों में जकड़कर आजीवन कारागार में डाल दिया गया और नगर में सत्य की जयघोष हुई।
राजकीय नौसैनिक परिणय और अष्ट-कुमारों का महा-संगम
The Royal Nuptials & The Campfire Chronicle
दामलिप्त के विशाल बंदरगाह पर सुसज्जित नौका-दल के मध्य, वैदिक मंत्रोच्चार और शंख-ध्वनि के साथ राजकुमार मित्रगुप्त और राजकुमारी कन्दुकवती का पावन विवाह संपन्न हुआ।

महाराज तुंगधन्वा ने मगध के युवराज राजवाहन के पक्ष में तीस हजार नौसैनिक और पचास सशस्त्र युद्ध-पोतों की अटूट सैन्य-संधि पर हस्ताक्षर किए।

कर्तव्य पूर्ण कर मित्रगुप्त अपने तेजतर्रार अश्व पर सवार होकर विन्ध्याचल के सघन अरण्य में अपने भाइयों से मिलने के लिए तीव्र गति से निकल पड़े।

विन्ध्याटवी के अलाव के पास आठ भाइयों का यह पुनर्मिलन असीम आनंद और विजय-घोष से गूंज उठा।
युवराज राजवाहन! बंगाल की खाड़ी का संपूर्ण नौसैनिक साम्राज्य अब मगध के साथ खड़ा है!

मित्रगुप्त ने सुह्म की शाही नौसैनिक संधि और यक्ष द्वारा प्रदत्त दिव्य पारिजात-माला राजवाहन के चरणों में समर्पित की।
अद्भुत दार्शनिक विजय, मित्रगुप्त! तुम्हारी प्रज्ञा ने जल, थल और नभ तीनों लोकों पर धर्म की विजय पताका फहरा दी है!

और इस प्रकार विन्ध्याटवी की तारों भरी रात में, राजवाहन ने दक्षिण के कलिंग देश की ओर संकेत किया—जहाँ नौवें राजकुमार 'मन्त्रगुप्त के ओष्ठ-विहीन व्रत और समुद्र-मुक्ति' की अनोखी गाथा प्रतीक्षारत थी!