श्रावस्ती में प्रमति: कुक्कुट-युद्ध का दांव, तरंगावली का छद्म और विष-षड्यंत्र का अंत
Pramati in Shravasti: The Cockfight Wager & The Maiden Disguise
श्रावस्ती का वसंतोत्सव और कामदेव मंदिर का पावन साक्षात्कार
The Spring Festival of Shravasti & The Temple Glance
कौशल देश की समृद्ध राजधानी श्रावस्ती, वसंत ऋतु के मादक वातावरण, खिलते पलाश-कुंजों और कामदेव के पावन उत्सव के गीतों से झूम रही थी।

राजकुमार प्रमति, जो स्वांग, वेश-परिवर्तन और संवाद-चातुर्य के अद्वितीय निष्णात थे, नगर के उत्सव में प्रविष्ट हुए।
श्रावस्ती की इस उत्सव-धरा पर प्रत्येक नागरिक किसी न किसी रंग में रंगा है। यहाँ बुद्धि और कला ही सर्वोच्च शक्ति हैं।

कामदेव के सुरम्य मंदिर-प्रांगण में कौशल-नरेश की सुपुत्री राजकुमारी नवमालिका अपनी सखियों के साथ पूजा-अर्चना कर रही थीं।

झरते हुए पुष्पों के मध्य राजकुमार प्रमति और राजकुमारी नवमालिका की आँखें मिलीं—और एक ही क्षण में उनके हृदयों में अनन्य अनुराग का दिव्य बीज अंकुरित हो गया!

अंगरक्षकों के साथ पालकी की ओर बढ़ते हुए राजकुमारी ने पीछे मुड़कर मंद मुस्कान से देखा, जिससे प्रमति का हृदय उनके अंतःपुर तक पहुँचने के लिए अधीर हो उठा।
राजकुमारी का अंतःपुर चाहे सहस्र पहरेदारों से घिरा हो, मेरी प्रज्ञा उस दुर्गम प्राचीर को भेदने का मार्ग अवश्य निकालेगी!
कुक्कुट-युद्ध की क्रीड़ा और चतुर पिंचालिक का साथ
The Great Cockfight Tournament & Tactical Wager
उद्यान में प्रमति की भेंट चतुर और विनोदप्रिय वृद्ध ब्राह्मण पिंचालिक से हुई, जिन्होंने राजदरबार की आंतरिक गतिविधियों का पूरा भेद प्रकट किया।
युवक! राजदरबार में सीधे प्रवेश संभव नहीं, किंतु यदि तुम आज की कुक्कुट-क्रीड़ा में बाजी जीत लो, तो राजा के द्वार स्वयं खुल जाएंगे!

प्रमति ने पक्षी-शास्त्र के ज्ञान से एक वज्र-तुल्य नखों वाले, चपल और स्वर्णिम पंखों वाले अजेय मुर्गे का चयन किया, जिसका नाम 'कुक्कुटराज' रखा।

श्रावस्ती के भव्य द्यूत-अखाड़े में सामंतों और सेनापतियों ने लाखों की स्वर्ण-मुद्राएं दांव पर लगा रखी थीं।

प्रमति के कुक्कुटराज ने आकाश में उड़कर एक ही चपल प्रहार में सेनापति धनपालक के अभिमानी मुर्गे को धूल चटा दी!

पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। प्रमति ने दस हजार स्वर्ण-मुद्राएं जीतीं और कौशल के श्रेष्ठियों के मध्य उनका नाम छा गया।
कमाल कर दिया प्रमति! अब हमारी योजना के दूसरे चरण का समय आ गया है—छद्मवेश का महा-नाटक!
तरंगावली का कन्या-छद्म और अंतःपुर में प्रवेश
The Maiden Disguise & Royal Custody
प्रमति ने सौन्दर्य-प्रसाधन, मयूर-नीले रेशमी परिधान और स्वर्णिम आभूषणों से स्वयं को 'तरंगावली' नामक अत्यंत रूपवती, लज्जाशील कन्या के रूप में परिवर्तित कर लिया।

पिंचालिक एक वृद्ध, चिंतित व्यापारी पिता का स्वांग रचकर अपनी 'पुत्री' को लेकर महाराज सिंहवर्मा के राजदरबार में पहुंचे।

पिंचालिक ने निवेदन किया कि दूरस्थ समुद्री व्यापार पर जाते समय उनकी रूपवती पुत्री को अंतःपुर में राजकुमारी नवमालिका के संरक्षण में सुरक्षित रखा जाए।
महाराज! मेरी यह कन्या तरंगावली अत्यंत सुकुमार है। सागर की यात्रा में इसकी रक्षा हेतु मुझे केवल आपके अंतःपुर पर विश्वास है!

कन्या की शालीनता और पिता की विनम्रता से प्रभावित होकर महाराज सिंहवर्मा ने सहर्ष तरंगावली को अंतःपुर में रखने की अनुमति दे दी।
निश्चिंत होकर व्यापार पर जाओ, श्रेष्ठी! तुम्हारी पुत्री हमारी नवमालिका की छोटी बहन के समान सुरक्षित रहेगी!

अंतःपुर के द्वार पर राजकुमारी नवमालिका ने अपनी नई सखी का स्वागत किया और उसे अपने निजी कक्ष में स्थान दिया।

निजी उपवन में दोनों सखियों ने वीणा की तान और काव्य-पाठ के साथ समय बिताया, जहाँ प्रमति की प्रज्ञा ने राजकुमारी को पूरी तरह सम्मोहित कर लिया।
अंतःपुर का रहस्योद्घाटन और विष-षड्यंत्र की खोज
Life in the Antahpura & The Poison Conspiracy
चंद्रमा की शीतल चांदनी में, एकांत मंडप के भीतर 'तरंगावली' ने अपना घूंघट हटाकर मगध के राजकुल की स्वर्ण-मुद्रिका प्रकट की!
राजकुमारी नवमालिका! मैं कोई साधारण कन्या नहीं, अपितु वही कामदेव मंदिर का आपका प्रेमी राजकुमार प्रमति हूँ!

राजकुमारी के मुख पर आश्चर्य और अपार हर्ष की कांति छा गई। उन्होंने अपने प्रेमी के इस अद्वितीय साहस को हृदय से स्वीकार कर लिया।
हे प्राणनाथ! आपने मेरे लिए यह असाध्य स्वांग रचा! मेरा सर्वस्व आपके प्रेम में समर्पित है!

रात्रि के प्रहर में प्रासाद के गलियारे से गुजरते हुए प्रमति ने देखा कि देशद्रोही मंत्री रक्ताक्ष महाराज के स्वर्ण-पात्र में घातक विष मिला रहा था!

रक्ताक्ष ने विष-मिश्रित सुरा को कपटी सेवक को सौंपते हुए राजा की हत्या और सिंहासन हड़पने की योजना बनाई थी।
महाराज इस मदिरा का एक घूंट पीते ही अनंत निद्रा में चले जाएंगे, और कौशल का शासन हमारे हाथों में होगा!

प्रमति ने तुरंत नवमालिका को सचेत किया और संध्या-कालीन राजसभा में इस महा-अपराध का सार्वजनिक पर्दाफाश करने की अचूक योजना बनाई।
विष-पात्र का प्रहार और वीर राजकुमार का प्राकट्य
Foiling the Assassination & Unmasking the Hero
श्रावस्ती के भव्य राजभोज में महाराज सिंहवर्मा सामंतों के मध्य आसीन थे, तभी कपटी सेवक विष-युक्त स्वर्ण-चषक लेकर आगे बढ़ा।

जैसे ही राजा ने चषक होठों से लगाना चाहा, 'तरंगावली' ने बिजली की तेजी से आगे बढ़कर चषक पर प्रहार किया—और विषैली मदिरा संगमरमर पर बिखर गई!
रुकिए महाराज! यह सुरा नहीं, साक्षात काल-कूट विष है!

संगमरमर पर गिरी मदिरा से धुआं उठने लगा, और जब मांस का टुकड़ा उसमें डुबोकर राजमहल के श्वान को दिया गया, तो वह क्षण भर में निष्प्राण हो गया!

प्रमति ने एक ही झटके में रेशमी घूंघट उतार फेंका, नग्न तलवार खींची और भागते हुए गद्दार मंत्री रक्ताक्ष को दबोचकर निहत्था कर दिया!
रक्ताक्ष! तुम्हारा देशद्रोह आज संपूर्ण राजसभा के सम्मुख प्रमाणित हो चुका है!

विस्मय और कृतज्ञता से गद्गद महाराज सिंहवर्मा ने रक्ताक्ष को कारागार में डालने का आदेश दिया और प्रमति को साक्षात अपना प्राणदाता घोषित किया।
हे महाबली वीर! तुम्हारी अद्भुत प्रज्ञा और साहस ने आज मुझे और कौशल राज्य दोनों को नवजीवन दिया है!
राजकुमारी नवमालिका से पावन परिणय और सप्त-मिलन
The Sacred Nuptials & The Campfire Chronicle
श्रावस्ती के राज-प्रांगण में, शंख-ध्वनि, वैदिक मंत्रोच्चार और पुष्प-वृष्टि के मध्य राजकुमार प्रमति और राजकुमारी नवमालिका का भव्य विवाह संपन्न हुआ।

महाराज सिंहवर्मा ने मगध के युवराज राजवाहन के पक्ष में बीस हजार कुशल अश्वारोही और कौशल की समस्त सेना की अटूट संधि पर हस्ताक्षर किए।

कर्तव्य पूर्ण कर राजकुमार प्रमति अपने तेजतर्रार अश्व पर सवार होकर विन्ध्याचल के सघन अरण्य में अपने भाइयों से मिलने के लिए तीव्र गति से प्रस्थान कर गए।

विन्ध्याटवी के अलाव के पास सात भाइयों का यह पुनर्मिलन असीम आनंद और विजय-घोष से गूंज उठा।
युवराज राजवाहन! कौशल का समस्त राज्य अब हमारे साथ है! बीस हजार वीर अश्वारोही मगध के लिए तैयार हैं!

प्रमति ने कौशल का शाही ताम्र-पत्र और सैन्य-संधि राजवाहन के चरणों में समर्पित की।
अद्भुत चातुर्य, प्रमति! तुम्हारे स्वांग और पराक्रम ने उत्तर भारत के सबसे बड़े साम्राज्य को हमारा मित्र बना दिया!

और इस प्रकार विन्ध्याटवी की तारों भरी रात में, राजवाहन ने पूर्व के समुद्र-तट ताम्रलिप्ति (दामलिप्त) की ओर संकेत किया—जहाँ आठवें राजकुमार 'मित्रगुप्त के राक्षस-संवाद, चार गूढ़ पहेलियों और समुद्री अभियान' की अद्भुत गाथा प्रतीक्षारत थी!