पाताल-प्रवेश, चिन्तामणि-प्राप्ति और दस दिशाओं में राजकुमारों का प्रस्थान
The Netherworld Quest & The Great Forest Dispersion
विन्ध्याटवी का बीहड़ मार्ग और रहस्यमयी धूम्र-रेखा
The Expedition into Wild Vindhyatavi
विन्ध्याचल के सघन, अगम्य अरण्य में दस राजकुमार अपने अश्वों के साथ आगे बढ़ रहे थे, जहाँ प्राचीन वृक्षों की छत्रछाया में सूर्य की किरणें थिरक रही थीं।

राजकुमार राजवाहन अग्रिम पंक्ति में चलते हुए दिशा-सूचक यंत्र और चर्म-मानचित्र के माध्यम से बीहड़ पथ का निर्धारण कर रहे थे।
बंधुओं! यह वन जितना सुरम्य है, उतना ही रहस्यमयी भी। हमें सूर्यास्त से पूर्व किसी सुरक्षित कंदरा या जलस्रोत के निकट पड़ाव डालना होगा।

दोपहर के समय एक शीतल जल-प्रपात के निकट उन्होंने अपने घोड़ों को विश्राम दिया और कंदमूल-फल साझा करते हुए हँसी-ठिठोली की।
भ्राता राजवाहन! इन निर्जन पहाड़ों में भी आपकी सतर्क दृष्टि किसी मंझे हुए सेनापति जैसी है!

सहसा दूर एक दुर्गम चट्टान की ओट से नीले रंग की पतली धूम्र-रेखा आकाश की ओर उठती दिखाई दी।

राजकुमार राजवाहन ने अपने साथियों को शिविर की रक्षा करने का आदेश दिया और स्वयं उस रहस्यमयी धूम्र के स्रोत की खोज में आगे बढ़े।
तुम सब यहीं अश्वों और शिविर की रक्षा करो। मैं देखकर आता हूँ कि इस बीहड़ में कौन तपस्वी अथवा तांत्रिक निवास कर रहा है।
साधक मातङ्ग का परिचय और प्राचीन ताम्र-पत्र का रहस्य
The Meeting with Ascetic Matanga
चट्टान की गुफा के भीतर एक तपस्वी, जिसका नाम मातङ्ग था, भस्म-लेपित मस्तक के साथ जड़ी-बूटियों की आहुति देते हुए मंत्रोच्चार कर रहा था।

राजवाहन के दिव्य रूप, सुडौल भुजाओं और चक्रवर्ती लक्षणों को देखकर मातङ्ग ने अत्यंत श्रद्धा से हाथ जोड़ लिए।
हे महाबाहु राजपुत्र! आपके आगमन से मेरी वर्षों की तपस्या सफल हो गई! विधाता ने ही आपको मेरे अनुष्ठान का सहायक बनाकर भेजा है!

मातङ्ग ने अपनी झोली से एक प्राचीन, उत्कीर्ण ताम्र-पत्र निकाला, जिस पर पाताल लोक के गुप्त प्रवेश-द्वार का मानचित्र अंकित था।

मातङ्ग ने ताम्र-पत्र का रहस्य उद्घाटित किया कि पाताल लोक में असुर-कन्या का प्रासाद और चिन्तामणि रत्न सुरक्षित है।
इस अनुष्ठान को पूर्ण करने के लिए मुझे एक निर्भीक क्षत्रिय वीर की आवश्यकता है, जो पाताल के भयंकर मायावी विघ्नों से मेरी रक्षा कर सके!

राजकुमार राजवाहन का साहसी हृदय इस अलौकिक रोमांच के लिए तत्पर हो उठा।
मातङ्ग! भय का त्याग करो। जब तक राजवाहन का खड्ग तुम्हारे साथ है, पाताल का कोई भी मायावी बल तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकता!
पाताल-विवर में प्रवेश और अलौकिक कंदराओं की यात्रा
The Descent into the Chasm of Patala
मातङ्ग राजवाहन को पर्वत की एक गुप्त दरार के समक्ष ले गया, जो कंटीली लताओं और सर्पाकार शिलाओं से ढकी हुई थी।

राजवाहन ने अपनी तीक्ष्ण तलवार के एक ही वार से लताओं को काट फेंका, जिससे पाताल की ओर जाने वाली सीढ़ियाँ प्रकट हो गईं।

कंदरा के भीतर नीले रंग की प्रकाशमान काई और चमकीले प्रस्तर स्तंभों से एक अलौकिक नीरव प्रकाश फैल रहा था।
राजकुमार! हम पृथ्वी की ऊपरी सीमा पार कर रसातल के क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं!

नीचे बहती तप्त अंबर-धाराओं के ऊपर एक संकीर्ण प्राकृतिक शिला-पुल को उन्होंने अत्यंत संतुलन के साथ पार किया।

सहसा एक विशाल, विस्मयकारी पाताल-लोक उनके समक्ष उद्घाटित हुआ—जहाँ मणियों से जड़ा आकाश और पन्ने के भव्य प्रासाद चमक रहे थे!

असुरों की प्राचीन नगरी में काले संगमरमर के परकोटे और सुवासित धूप से महकते स्वर्णिम कंगूरे शोभा पा रहे थे।
पाताल का महायज्ञ और मातङ्ग का दिव्य कायाकल्प
The Sacrificial Fire & The Transformation
एक संगमरमरी मंडप के भीतर मातङ्ग ने यज्ञ-वेदी स्थापित की, जबकि राजकुमार राजवाहन नग्न खड्ग लिए पहरा देने लगे।

ताम्र-पत्र के अंतिम गूढ़ श्लोकों का उच्चारण करते हुए मातङ्ग ने अग्नि-कुंड में पूर्णाहुति समर्पित की।
ॐ पाताल-अधिपतये नमः! यह आहुति स्वीकार हो और अलौकिक संप्रभुता सिद्ध हो!

अग्नि की ज्वालाओं से एक दिव्य आलोक फूटा और मातङ्ग का जीर्ण-शीर्ण रूप एक तेजस्वी, मुकुटधारी पाताल-नरेश में परिवर्तित हो गया!

प्रासाद के स्वर्ण-द्वार से पाताल-नरेश की सुपुत्री राजकुमारी कालिन्दी सखियों सहित वरमाला लेकर उपस्थित हुई।
हे दिव्य साधक! आपकी निष्कलंक तपस्या ने पाताल के सिंहासन को उसका सच्चा अधिपति प्रदान किया है!

राजा बने मातङ्ग ने राजकुमार राजवाहन को कृतज्ञतापूर्वक गले से लगा लिया।
राजकुमार राजवाहन! आपकी वीरता और संगति के बिना यह सिद्धि असंभव थी! मेरा यह संपूर्ण साम्राज्य आपका चिर-ऋणी है!
चिन्तामणि महामणि का वरदान और निर्जन शिविर का आघात
The Boon of Chintamani & The Desolate Camp
राजा मातङ्ग ने कृतज्ञता स्वरूप राजवाहन को पाताल की सर्वोत्कृष्ट धरोहर 'चिन्तामणि' प्रदान की—एक ऐसी दिव्य मणि जो भूख, प्यास, विष और थकान को नष्ट कर देती थी।
इस मणि को अपने अंगवस्त्र में धारण करें, राजकुमार! यह संकट के हर क्षण में आपकी रक्षा करेगी और आपकी समस्त कामनाओं को सिद्ध करेगी!

राजवाहन ने मणि को आदरपूर्वक अपने कटि-वस्त्र में बांधा और पाताल-नरेश से विदा लेकर पुनः भूलोक की ओर प्रस्थान किया।

कंदरा की सीढ़ियाँ चढ़कर जब राजवाहन बाहर निकले, तो विन्ध्याचल के जंगलों में दोपहर ढल चुकी थी।

किंतु शिविर में पहुँचते ही राजवाहन के पाँव ठिठक गए—तंबू उखड़े पड़े थे, अलाव की राख ठंडी थी और घोड़े नदारद थे!
यह क्या अनर्थ है?! शिविर निर्जन क्यों है?! प्रमति! मित्रगुप्त! पुष्पोद्भव! तुम सब कहाँ चले गए?!

वृक्ष के तने पर तीर से बंधा एक भोजपत्र मिला, जिस पर राजकुमारों का संदेश खुदा हुआ था।
'हमारे प्राणप्रिय युवराज गुफा में लुप्त हो गए हैं! हम दसों दिशाओं—अवन्ती, कलिंग, विदर्भ, मिथिला, सौराष्ट्र—में उन्हें खोजने निकल रहे हैं! जब तक राजवाहन नहीं मिलते, हम विश्राम नहीं लेंगे!'
पुष्पोद्भव से मिलन और उज्जयिनी का रोमांचक आख्यान
The Forest Reunion with Pushpodbhava
अपने प्राणप्रिय भाइयों की खोज में राजवाहन विन्ध्याचल के सघन जंगलों में भटकते रहे, जब तक कि गोधूलि वेला में पेड़ों के पीछे से पैरों की आहट सुनाई नहीं दी।

झाड़ियों को चीरते हुए एक युवक प्रकट हुआ—धनी व्यापारी के वेश में सुसज्जित राजकुमार पुष्पोद्भव!

राजवाहन को जीवित और सकुशल देखकर पुष्पोद्भव की आँखों से हर्ष के आँसू छलक पड़े और दोनों भाई परस्पर गले मिल गए।
युवराज! देवों की कृपा है कि आप सकुशल हैं! हम समझे थे कि पाताल के असुरों ने आपको बंदी बना लिया!
पुष्पोद्भव! मेरे भाई! मुझे पाताल में चिन्तामणि की सिद्धि हुई। पर कहो, तुम इस व्यापारी के वेश में कहाँ से आ रहे हो?

अलाव की सुखद ऊष्मा में बैठकर दोनों भाइयों ने वन के फलों का स्वाद लिया और यात्रा के कष्टों को भुला दिया।

पुष्पोद्भव ने अपने कटि-वस्त्र से मालवा की राजधानी उज्जयिनी का एक विस्तृत मानचित्र निकाला।
युवराज! आपकी खोज में मैं शत्रु-देश मालवा की राजधानी उज्जयिनी पहुँचा था। वहाँ मैंने व्यापारिक संघों, जुआरियों के अड्डों और राजदरबार के षड्यंत्रों में जो विचित्र खेल रचा... वह सुनने योग्य है!

और इस प्रकार विन्ध्याटवी के शांत निशा-काल में, अलाव की स्वर्णिम लपटों के समक्ष, दस राजकुमारों के पहले गुप्त अभियान—'उज्जयिनी में पुष्पोद्भव के साहसिक कारनामे'—की गाथा का आरंभ हुआ!