प्रस्तावना: धारानगरी, चरवाहा बालक का टीला और बत्तीस सीढ़ियों के दिव्य सिंहासन का प्राकट्य
Prologue: The Discovery of the Buried Throne
विवादित चारागाह और चरवाहा बालक का टीला
The Disputed Meadow & The Cowherd
प्राचीन मालवा की सुरम्य भूमि पर, धारानगरी के उपकण्ठ में फैले विस्तृत चारागाह सुनहरी धूप में नहा रहे थे; पीली सरसों के लहलहाते खेतों के मध्य गऊएँ चर रही थीं, किंतु उस शांत दोपहर की नीरवता सहसा क्रोधपूर्ण गर्जना से भंग हो गई।

दो समृद्ध कृषक, देवदत्त और सोमका, भूमि की मेढ़ और गोधन के स्वामित्व को लेकर लाठियाँ ताने, लाल आँखों से एक-दूसरे को घूरते हुए विवाद कर रहे थे।
तूने आधी रात के घने अंधकार में सीमा-प्रस्तर सरका दिए, सोमका! ये पाँच दुधारू गायें और उनके बछड़े मेरी पैतृक गौशाला के हैं!
झूठ मत बोल, देवदत्त! यह प्राचीन नीम का वृक्ष साक्षी है कि यह भूमि मेरे पूर्वजों की है। मेरी चरागाह से एक भी खुर बाहर नहीं जाएगा!

चारागाह के मध्य हरी दूब से ढका एक ऊँचा मिट्टी का टीला था; उस टीले के शिखर पर चौदह वर्षीय चरवाहा बालक चन्द्रभानु अपनी बाँस की छड़ी लिए शान्त भाव से बैठा था।

विवाद इतना उग्र हो चुका था कि रक्तपात निश्चित जान पड़ता था; दोनों कृषक एक-दूसरे के वस्त्र खींचते हुए ग्राम-प्रधान को बुलाने के लिए टीले की ओर बढ़े।
चल टीले पर! इस चरवाहे से कहेंगे कि ग्राम-मुखिया को बुलाकर लाए!

जैसे ही चन्द्रभानु टीले की चोटी पर सीधा बैठा, उसका मुखमण्डल सूर्य-समान तेजस्वी हो उठा और उसने बाँस की छड़ी को राज-दण्ड की भाँति उठा लिया!
ठहरो! व्यर्थ कोलाहल त्यागकर अपने विवाद को मेरे धर्म-न्यायालय में प्रस्तुत करो! सत्य को चीखने की आवश्यकता नहीं होती, और असत्य चाहे जितना चीखे, धर्म के सम्मुख ठहर नहीं सकता!

टीले पर विराजे बालक ने किसी प्रकाण्ड न्यायविद की भाँति वर्षा के जल-प्रवाह, वृक्षों की जड़ों के विस्तार और हल के पुराने चिह्नों का सूक्ष्म विश्लेषण किया और भूमि खोदकर प्राचीन लौह-कीलों को प्रत्यक्ष करा दिया!
मिट्टी के गर्भ में सुरक्षित ये प्राचीन कीलें सिद्ध करती हैं कि भूमि देवदत्त की है, किंतु बछड़े सोमका की गाय से जन्मे हैं। भूमि देवदत्त को सौंपी जाए और बछड़े सोमका को!
विलुप्त विवेक और राजदरबार में संवाद
The Vanishing Wisdom & The Royal Court
दोनों समृद्ध कृषक विस्मय के अश्रु बहाते हुए गले लग गए और बालक के अद्वितीय न्याय के सम्मुख नतमस्तक हो गए।

किंतु जैसे ही चन्द्रभानु टीले से नीचे कूदा, वह तुरंत साधारण ग्वाला बन गया और हँसता हुआ बछड़े के पीछे दौड़ा!

समतल भूमि पर पूछने पर वह लजा गया; उसे अपने द्वारा दिए गए गंभीर न्याय-निर्णय का किञ्चित भी स्मरण न था!
पुत्र! हमें फिर बताओ, तुम्हें भूमि के भीतर दबी कीलों का ज्ञान कैसे हुआ?
कैसा निर्णय, काका? मुझे तो केवल इतना पता है कि मेरी काली गऊ को पोखर के पास की हरी घास पसंद है!

यह विस्मयकारी समाचार धारानगरी के भव्य राजदरबार तक पहुँचा; राजा भोज के सम्मुख उपस्थित होकर कृषकों ने टीले का अलौकिक चमत्कार सुनाया।

प्रधान अमात्य और राज-पण्डितों ने संशय व्यक्त किया: 'महाराज, क्या मिट्टी का कोई टीला किसी अनपढ़ चरवाहे को देवगुरु बृहस्पति जैसा विवेक दे सकता है?'
महाराज, यह असम्भव है! मिट्टी कभी मनुष्य की बुद्धि नहीं बदल सकती!

राजा भोज ने स्वर्ण-जड़ित राज-दण्ड को स्पर्श करते हुए कहा: 'एक सच्चा धर्मात्मा राजा केवल कानों से सुनकर उपहास नहीं करता, वह अपनी आँखों से सत्य की परीक्षा करता है। अश्व सज्ज किए जाएँ!'
राजा भोज की परीक्षा और लाक्षा-मुहर का रहस्य
King Bhoja
अगले ही प्रभात, राजा भोज अपने मन्त्रियों, न्यायविदों और सशस्त्र रक्षकों के साथ श्वेत मारवाड़ी अश्व पर सवार होकर चारागाह पहुँचे।

टीले पर पहुँचकर राजा भोज ने देखा कि वही ग्रामीण बालक बाँस की छड़ी लिए साधारण भाव से बैठा था।

राजा भोज ने टीले पर बैठे बालक के सम्मुख तीन कूट-रचित वसीयतों, गुप्त राजकीय मुहरों और स्वर्ण-मुद्राओं का अत्यंत उलझा हुआ विवाद प्रस्तुत किया।
हे बालक! जब तीनों मुहरें प्रामाणिक प्रतीत हों, तब धर्म-सिंहासन सत्य का निर्णय कैसे करे?

टीले पर बैठे चन्द्रभानु ने तनिक भी संकोच न किया; उसने लाख के पिघलने की गति, लेखनी के दबाव और राजकीय मुहर की धातु का अद्वितीय विश्लेषण किया!
महाराज, ग्रीष्म की धूप में लाख को तपाया जाए। कूट-रचित राल सत्य की मुहर से पहले पिघलकर अपना पाखंड प्रकट कर देती है!

धूप में तपाने पर जाली मुहर तुरंत बह निकली; राज-पण्डितों और मन्त्रियों के मुख खुले के खुले रह गए!

जैसे ही बालक टीले से नीचे उतरा, वह पुनः लजाता हुआ अबोध ग्वाला बन गया। अब राजा भोज ने स्वयं टीले की ओर कदम बढ़ाए।
सम्राट की आत्म-जागृति और उत्खनन की आज्ञा
The Sovereign
राजा भोज मन्द-मन्द गति से उस पावन टीले पर चढ़े; जैसे ही उनके चरण शिखर पर टिके, उनके भीतर एक अलौकिक विद्युत-तरंग दौड़ गई!

समस्त सांसारिक अहंकार और राज्य का मद क्षण भर में भस्म हो गया; उनकी आत्मा में निष्पक्ष धर्म, सत्य और सार्वभौम न्याय का अगाध समुद्र हिलोरें लेने लगा।
हे परमेश्वर! यह दिव्यता इस साधारण मिट्टी में नहीं है। इस भूमि के गर्भ में किसी महान चक्रवर्ती सम्राट की पुण्यात्मा अथवा उसका पावन आसन विश्राम कर रहा है!

समतल भूमि पर उतरते ही वह अलौकिक विस्तार पुनः सामान्य चेतना में सिमट गया, जिससे राजा का विश्वास अटल हो गया।

राजा भोज ने तुरंत राज-शिल्पियों और सेनापतियों को आज्ञा दी: 'इस टीले के नीचे चालीस हाथ गहरा उत्खनन आरम्भ किया जाए!'
हम इस पावन धरोहर को संसार के सम्मुख प्रकट करेंगे!

राजा ने चरवाहा बालक चन्द्रभानु को जीवन-पर्यन्त राजसी वृत्ति और सम्पूर्ण चारागाह का भू-स्वामित्व सहर्ष प्रदान किया।

संध्या ढलते ही टीले के चारों ओर सहस्रों मशालें प्रज्वलित हो उठीं और इतिहास के सबसे बड़े पुरातात्विक उत्खनन का शंखनाद हुआ।
चालीस हाथ का उत्खनन और सुवर्ण-सिंहासन का प्राकट्य
The Forty-Cubit Excavation & The Golden Throne
मशालों के प्रखर प्रकाश में सैकड़ों श्रमिकों ने दिन-रात एक कर दिया; लोहे की कुदालों से लाल मिट्टी को खोदा गया और पीतल के बर्तनों में भरकर बाहर निकाला गया।

चालीस हाथ की गहराई पर पहुँचते ही, एक श्रमिक की कुदाल किसी अति-दृढ़ धातु से टकराई—स्वर्णिम चिनगारियाँ छिटकीं और महा-मन्दिर के घण्टे जैसी सुमधुर झंकार गूँज उठी!
महाराज! नीचे धातु की कोई विशाल स्वर्णिम संरचना है!

श्रमिकों ने सावधानी से सदियों पुरानी मिट्टी की परतों को हटाया; पाताल की गहराइयों से बत्तीस स्वर्णिम सीढ़ियों वाला एक अलौकिक सिंहासन प्रकट हुआ!

प्रत्येक सीढ़ी के दोनों ओर अत्यंत सजीव बत्तीस अप्सरा-पुतलियाँ हाथ जोड़े और चँवर-कमल लिए अलौकिक कला-सौन्दर्य के साथ विराजमान थीं।

दीपकों के प्रकाश में स्वर्ण-पीठिका पर प्राचीन ब्राह्मी लिपि चमक उठी: 'उज्जयिनी के परम प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का धर्म-सिंहासन!'
यह तो महाराज विक्रमादित्य का साक्षात् बत्तीसी सिंहासन है!

पचास मतवाले गजराजों ने मोटे रस्सों की सहायता से उस विशाल सिंहासन को जयघोष के बीच धरती के गर्भ से बाहर निकाला; राजा भोज ने नतमस्तक होकर उस पावन आसन की धूलि अपने मस्तक पर लगाई!
महा-अभिषेक, राज्यारोहण और प्रथम पुतली का प्रबोधन
The Consecration & Ratnamanjari
विद्वान ब्राह्मणों ने पवित्र गंगाजल, गोदुग्ध, हरिद्रा, केसर और चन्दन से उस दिव्य पीठ का वैदिक महा-अभिषेक किया; चारों ओर धूप-दीप की सुगन्ध फैल गई।

राजदरबार के मुख्य मण्डप में, श्वेत संगमरमर की अष्टदल कमल वेदी पर उस बत्तीस सीढ़ियों वाले सुवर्ण सिंहासन की प्रतिष्ठा की गई।
धारानगरी में न्याय का नया सूर्य उदित होगा!

राज-ज्योतिषियों ने पावन सूर्योदय का मुहूर्त निश्चित किया; राजा भोज ने तीन दिनों तक कठोर उपवास रखकर अपनी आत्मा को पवित्र किया और केसरिया रेशमी वस्त्र धारण किए।

जैसे ही राजा भोज ने अपना दाहिना चरण सिंहासन की पहली सीढ़ी पर रखने के लिए उठाया, सम्पूर्ण मण्डप में एक अलौकिक स्वर्णिम प्रकाश छा गया!

पहली सीढ़ी पर प्रतिष्ठित कांस्य-पुतली—रत्नमञ्जरी—की आँखें सहसा सजीव हो उठीं और वह एक सहस्र मन्दिर-घण्टियों की मधुर झंकार के साथ खिलखिलाकर हँस पड़ी!
ठहरो, राजा भोज! इस सिंहासन पर चरण रखने का दुस्साहस मत करो! हम देवराज इन्द्र की शाप-ग्रस्त बत्तीस अप्सराएँ हैं, जो इस पाषाण-पीठ में बंधी हैं। इस दिव्य आसन पर वही राजा बैठ सकता है, जिसका हृदय उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य के समान निष्काम, परोपकारी, निर्भीक और अहंकार-शून्य हो!

राजा भोज लज्जित होकर हाथ जोड़कर पीछे हट गए: 'हे देवि! मुझे सम्राट विक्रमादित्य के उस पावन चरित्र का श्रवण कराओ।' रत्नमञ्जरी ने मुस्कुराकर पहली अमर गाथा आरम्भ की!