नवम पुतली अनुराधिका: दो माताएँ, शिशु का विवाद और सुवर्ण-पालने का न्याय
The Ninth Statue: Anuradhika & The Judgment of Two Mothers
नवम सूर्योदय और अनुराधिका का प्रबोधन (द्वितीय ऋतु शुभारम्भ)
The Ninth Dawn & Anuradhika
नवम प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के प्रासाद को आलोकित किया, जहाँ द्वितीय ऋतु (सीज़न २) के शुभारम्भ पर राजा भोज पुनः उपस्थित हुए।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से नौवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण नौवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, संगमरमर का फर्श नीलमणि-नील और स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठा!

नौवीं कांस्य-पुतली—अनुराधिका—की नीलम आँखें खुलीं और वह न्याय-तुला हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस नौवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और स्वर्ण-न्यायतुला धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे अनुराधिका देवि! विक्रमादित्य के किस सूक्ष्म न्याय और मनोवैधानिक विवेक की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

अनुराधिका ने न्याय-तुला उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म न्याय-विवेक और मातृ-हृदय को परखने की दिव्य दृष्टि है, जब एक ही अबोध शिशु पर दो नारियों ने दावा किया और उन्होंने तलवार के एक आदेश से सत्य माता का त्याग सिद्ध कर दिया?
काशी का विचित्र विवाद और दो माताओं का दावा
The Disputed Child of Kashi
उज्जयिनी के भव्य सभागार में सम्राट विक्रमादित्य के सम्मुख काशी से आया एक अत्यन्त जटिल पारिवारिक विवाद प्रस्तुत हुआ।

एक काष्ठ-पालने के दोनों ओर दो स्त्रियाँ खड़ी थीं—सरल माता गुणवती और चतुर धाय रम्भा—दोनों स्वयं को उस शिशु की एकमात्र जननी बता रही थीं।

पालने में छह मास का अत्यन्त रूपवान् बालक लेटा था, जिसके कण्ठ में राजसी सूर्य-पदक झूल रहा था।

दोनों स्त्रियों ने समान जन्म-कुण्डली और रोते हुए प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही प्रस्तुत की; उनके अश्रु और स्वर एक जैसे सच्चे प्रतीत हो रहे थे।
महाराज! यह बालक मेरी कोख का रक्त है! इस धाय ने कपट से इसे चुराया है!
झूठ मत बोलो! यह मेरा पुत्र है; मेरे आँसुओं की साक्षी काशी का विश्वनाथ मन्दिर है!

उज्जयिनी के प्रधान न्यायाधीश और मन्त्री किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए; केवल गवाही और कुण्डली से सत्य को सिद्ध करना असम्भव था।
महाराज! दोनों पक्ष समान प्रमाण दे रहे हैं। किसी एक को शिशु देना धर्म-विरुद्ध हो सकता है!

सम्राट विक्रमादित्य गम्भीर मौन में पद्मासन लगाकर दोनों स्त्रियों की दृष्टि, श्वास-गति और सूक्ष्म भाव-भंगिमाओं को तौलते रहे।
मातृ-हृदय का मनोवैज्ञानिक परीक्षण और खड्ग-प्रदर्शन
The Forensic Examination of Maternal Instinct
जब पालने में बालक भूख से रोने लगा, दोनों स्त्रियाँ दूध के कटोरे लेकर आगे लपकीं और ममता की दुहाई देने लगीं।
मेरा लाल भूखा है! इसे पहले दूध पीने दो!
यह मेरा दूध पिएगा, किसी दासी का नहीं!

विक्रमादित्य ने देखा कि गुणवती के हाथ शिशु के रोने पर वास्तविक पीड़ा से काँप रहे थे, जबकि रम्भा की दृष्टि अपनी प्रतिद्वन्द्वी पर क्रोध साध रही थी।

सम्राट ने विचार किया: केवल तर्क और गवाही से मातृ-भाव सिद्ध नहीं हो सकता; सत्य माता वही है जो शिशु के प्राणों के लिए स्वयं का अधिकार त्याग दे!

विक्रमादित्य गम्भीर मुख-मुद्रा के साथ सिंहासन से उठे और राज-जल्लाद को तलवार सहित आगे आने की आज्ञा दी।
राज-जल्लाद! अपनी चमचमाती खड्ग लेकर आगे आओ!

विक्रमादित्य ने स्वयं अपनी तीक्ष्ण वूट्ज़ खड्ग म्यान से खींच ली; धूप में इस्पात की चमक बिजली की भाँति कौंध उठी!

खुली नंगी तलवार देखकर पूरी राजसभा, मन्त्री और दर्शक स्तब्ध होकर काँप उठे!
शिशु-विभाजन का भयानक आदेश और माता का करुण क्रन्दन
The Decree of Division & The Mother
विक्रमादित्य ने गर्जना की: 'जब मानवीय गवाही असमर्थ है, तो न्याय का एक ही मार्ग है—इस शिशु को खड्ग के एक वार से दो बराबर भागों में काट दिया जाए! आधा-आधा दोनों स्त्रियाँ ले लें!'

कपटी धाय रम्भा ने ईर्ष्या और लोभ में सिर हिलाया: 'हाँ महाराज! बालक को आधा-आधा काट दीजिए, ताकि न इसका रहे और न मेरा!'
न्याय यही है! आधा बालक मुझे मिले और आधा इसे!

उसी क्षण माता गुणवती असह्य वेदना से चीख पड़ी और अपने शरीर को पालने पर ढाल बनाकर बालक के ऊपर गिर पड़ी!

गुणवती ने विक्रमादित्य के चरणों में गिरकर विलाप किया:
रुकिए, महाराज! मेरे फूल-जैसे बच्चे को मत काटिए! यह पूरा जीवित बालक इसी धाय को सौंप दीजिए! मेरा बच्चा जीवित रहे, भले ही वह उम्र-भर मुझे माँ न कहे!

गुणवती के अश्रुओं ने विक्रमादित्य के चरणों को भिगो दिया; उसने शिशु के जीवन की रक्षा के लिए अपनी ममता का समस्त अधिकार त्याग दिया था!

विक्रमादित्य के चेहरे पर परम सन्तोष और करुणा की मुस्कान खिल उठी; उन्होंने एक झटके में खड्ग को म्यान में बन्द कर दिया। परीक्षा पूर्ण हो चुकी थी!
अचूक न्याय, धाय का पश्चाताप और सुवर्ण-पालने का उपहार
The Infallible Verdict & The Golden Cradle
विक्रमादित्य ने गम्भीर वाणी में निर्णय सुनाया:
जो स्त्री अपने स्वार्थ और अधिकार को त्यागकर शिशु के जीवन को चुनती है, वही इसकी वास्तविक जननी है! झूठी धाय बच्चे के टुकड़े चाहती है, परन्तु सच्ची माता स्वयं मिटकर भी सन्तान को जीवित देखना चाहती है!

धाय रम्भा लज्जा और भय से संगमरमर पर गिर पड़ी और धन के लोभ में बालक चुराने का षड्यन्त्र स्वीकार कर लिया।
महाराज! मुझे क्षमा करें! मैंने स्वर्ण और जागीर के लोभ में यह पाप किया था!

विक्रमादित्य ने स्वयं पालने से उस हँसते हुए राजकुमार को उठाया और रोती हुई गुणवती की गोद में सौंप दिया!

सम्राट ने माता गुणवती को मोतियों जड़ा 'सुवर्ण-पालना' और आजीवन राजकोष से वृत्ति प्रदान करने का आदेश दिया।

समस्त सभागार जयघोष से गूँज उठा: 'न्याय के सूर्य चक्रवर्ती विक्रमादित्य की जय हो!'

गुणवती अपने हँसते हुए बालक को सीने से लगाकर कृतज्ञता के अश्रुओं के साथ राजद्वार की ओर प्रस्थान कर गई।
अनुराधिका का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Anuradhika
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली अनुराधिका ने राजा भोज को गम्भीर नीलम-नयनों से देखा।

अनुराधिका ने नौवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी शुष्क धाराओं से परे जाकर मानव-मन के त्याग को परखकर न्याय किया है, और असहाय मातृत्व की रक्षा की है? यदि ऐसा सूक्ष्म विवेक तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विवेक और ममता को परखने की दिव्य दृष्टि नहीं है, देवि। मैं इस नौवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज नौवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में निःशुल्क पारिवारिक न्याय-पीठ और मातृ-कल्याण अधिकरण स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में निर्धनों और माताओं के अधिकारों की सुरक्षा हेतु विशेष अधिकरणों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और अनुराधिका मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का नौवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**
कल प्रातःकाल हम दसवीं सीढ़ी पर चरण रखेंगे और दसवीं पुतली—पद्मावती—की अमर गाथा सुनेंगे!