सप्तदश पुतली विद्यावती: नव-रत्नों की सभा, दण्डी संन्यासी का एक धान्य और ज्ञानी का पावन सत्कार
The Seventeenth Statue: Vidyavati & The Assembly of Scholars
सप्तदश सूर्योदय और विद्यावती का प्रबोधन
The Seventeenth Dawn & Vidyavati
सत्रहवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने तृतीय सत्र (सीज़न ३) के शुभारम्भ हेतु विशेष तपस्या पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से सत्रहवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण सत्रहवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी नील-मणि और मरकत-हरित दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

सत्रहवीं कांस्य-पुतली—विद्यावती—की नील-नयन खुले और वह सुवर्ण-ज्ञान-ग्रन्थ व स्फटिक-माला हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस सत्रहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और ज्ञान-ग्रन्थ धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे विद्यावती देवि! विक्रमादित्य के किस ज्ञान-विवेक और निरहंकार सत्कार की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

विद्यावती ने सुवर्ण-ज्ञान-ग्रन्थ उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा सच्चा ज्ञान-विवेक और अहंकार-रहित भाव है, जब पाँच सौ अभिमानी पण्डितों ने नव-रत्न भेंट किए, और विक्रमादित्य ने केवल एक चावल का दाना लाने वाले मौनी संन्यासी को सर्वोच्च आसन पर बैठाकर मस्तक झुकाया?
पाँच सौ पण्डितों की महा-विद्वत्-सभा और नव-रत्न
The Grand Conclave of Five Hundred Scholars
उज्जयिनी के विशाल मणिक-सभागार में सम्राट विक्रमादित्य की अध्यक्षता में आर्यावर्त के पाँच सौ प्रख्यात आचार्यों की महा-विद्वत्-सभा आयोजित हुई।

काशी, मिथिला और तक्षशिला से आए विद्वान् रेशमी वस्त्रों में न्याय, वैशेषिक और वेदान्त के गूढ़ सूत्रों पर उग्र शास्त्रार्थ कर रहे थे।
तर्क की पराकाष्ठा ही ब्रह्म-ज्ञान का प्रमाण है!

प्रधान तार्किक विद्यानिधि ने सुवर्ण-थाल में जड़े नौ अलौकिक नव-रत्न (माणिक्य, मुक्ता, विद्रुम, मरकत, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद, वैदूर्य) सम्राट को भेंट किए।
महाराज! ये नव-रत्न हमारे प्रकाण्ड ज्ञान और आपकी चक्रवर्ती सत्ता के अमर प्रतीक हैं!

थाल में रखे नव-रत्नों का तेज पूरी राजसभा को चौंधिया रहा था; पण्डित अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता पर गर्व से फूले न समा रहे थे।

विद्यानिधि ने घोषणा की: 'संसार में विद्या की शक्ति और रत्नों का वैभव ही राजा को अमर बनाते हैं!'

विक्रमादित्य मन्द मुस्कान से देखते रहे; उन्हें दिखाई दिया कि इस पाण्डित्य के पीछे अहंकार और राज-आश्रय पाने की लालसा छिपी है।
मौन संन्यासी महर्षि ज्ञानशील और एक पवित्र धान्य
The Silent Forest Hermit & The Single Grain
तभी विन्ध्याचल की गुफाओं में साधना करने वाले सत्तर वर्षीय मौनी संन्यासी महर्षि ज्ञानशील नंगे पाँव वल्कल वस्त्र पहने राजसभा में प्रविष्ट हुए।

संन्यासी के मुख-मण्डल पर अगाध शान्ति और दिव्य तेज था; उनके हाथ में न कोई पोथी थी, न कोई आभूषण।

रेशमी वस्त्रों में सजे पण्डितों ने उस फटेहाल वनवासी को देखकर उपहास किया और कानाफूसी करने लगे।
इस अनपढ़ वनवासी का इस विद्वत्-सभा में क्या काम?!

बिना किसी शास्त्रार्थ या विवाद के महर्षि ज्ञानशील मन्द गति से सीधे सम्राट के सिंहासन की वेदी तक पहुँचे।

संन्यासी ने पीपल के पत्ते से एक अनकुटा, शुद्ध अक्षत—धान का एक अकेला दाना—उठाकर नव-रत्नों के थाल के मध्य में रख दिया।

विद्यानिधि ठहाका मार कर हँस पड़े:
एक निर्धन वनवासी हमारे नव-रत्नों के सामने चावल का एक दाना रखकर क्या सिद्ध करना चाहता है?! क्या यह राजसभा का उपहास नहीं है?!
एक धान्य की महिमा और सुवर्ण-तुला का दिव्य निर्णय
The Parable of the Single Grain & The Cosmic Scales
सम्राट विक्रमादित्य अपने सिंहासन से उतर आए और मुकुट झुकाकर मौनी संन्यासी के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया।

विक्रमादित्य ने राज-तुला मँगवाई और सभागार के मध्य में स्थापित कराई।
आज इस तुला पर पाण्डित्य के दम्भ और सादगी के सत्य का परीक्षण होगा!

सम्राट ने तुला के एक पलड़े पर नौ भारी अलौकिक रत्न रखे और दूसरे पलड़े पर संन्यासी का वह अकेला अक्षत-धान्य रख दिया।

विक्रमादित्य ने गम्भीर वाणी में सत्य का उद्घोष किया:
लाखों हीरे मिलकर भी एक तिनका नहीं उगा सकते और न ही किसी भूखे का पेट भर सकते हैं; परन्तु यह एक अक्षत-धान्य अपने भीतर अनन्त जीवन और सृष्टि का बीज संजोए हुए है! यही निरहंकार ज्ञान का सार है!

अलौकिक चमत्कार हुआ—दिव्य पुण्य-भार से चावल के एक अकेले दाने वाला पलड़ा भारी होकर नीचे झुक गया, जबकि नौ भारी रत्न ऊपर उठ गए!

पाँच सौ पण्डित स्तब्ध होकर अपने स्थान पर खड़े रह गए; अहंकार का पर्वत ज्ञान के एक कण के सामने चूर-चूर हो गया!
यह... यह ईश्वरीय न्याय है! हमारे पाण्डित्य का अहंकार नष्ट हो गया!
सर्वोच्च ज्ञान-सिंहासन और नव-रत्नों का लोकोपकार
The Highest Throne of Wisdom & Renunciation
पाँच सौ विद्वानों ने लज्जा और आत्म-ग्लानि से सिर झुका लिया; वे समझ गए कि सच्चा ज्ञान वाद-विवाद में नहीं, निष्काम जीवन में है।
हम शब्दों के जाल में उलझे रहे, जबकि सत्य इस मौन संन्यासी के साथ था!

विक्रमादित्य ने महर्षि ज्ञानशील का हाथ थामकर उन्हें राजसभा के सर्वोच्च गजदन्त-सिंहासन पर ससम्मान बैठाया।
जिसके हृदय में परमात्मा का सत्य है, वही आर्यावर्त का वास्तविक अधिपति है!

सम्राट ने सुवर्ण-पात्र से गंगाजल लेकर स्वयं अपने हाथों से वनवासी संन्यासी के चरण पखारे।
सम्राट ने ज्ञान के वास्तविक स्वरूप को मुकुट से ऊँचा स्थान दिया है!

विक्रमादित्य ने उन नव-रत्नों को बेचकर राज्य-भर में निःशुल्क गुरुकुल, ग्रन्थागार और अन्नागार स्थापित करने का आदेश दिया।

महर्षि ज्ञानशील ने सम्राट के मस्तक पर हाथ रखकर मौन आशीर्वाद दिया: 'जो सत्य को मुकुट से ऊँचा रखता है, उसका यश युग-युगान्तर तक अमर रहेगा!'

पाँच सौ पण्डितों ने एक स्वर में महर्षि और सम्राट के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया; ज्ञान-सभा साक्षात् तपोभूमि बन गई।
विद्यावती का निर्णय और तृतीय सत्र (सीज़न ३) का शुभारम्भ
Vidyavati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली विद्यावती ने राजा भोज को गम्भीर नील-नयनों से देखा।

विद्यावती ने सत्रहवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी पाँच सौ पण्डितों के नव-रत्नों और पाण्डित्य-दम्भ के ऊपर एक मौनी संन्यासी के चावल के दाने को तौलकर सर्वोच्च सम्मान दिया है? यदि ऐसा निष्काम ज्ञान-विवेक तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा सच्चा ज्ञान-विवेक, पण्डितों के दम्भ को पहचानने की दृष्टि और सादगी के सामने नतमस्तक होने का त्याग नहीं है, देवि। मैं इस सत्रहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज सत्रहवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में ग्रामीण आचार्यों, वनवासी आश्रमों और ग्रन्थागारों हेतु राज-कोष से स्थाई अनुदान जारी करने का आदेश दिया।

राज्य-भर में सादगी और आध्यात्मिक ज्ञान के संवर्धन हेतु विद्वत्-परिषदों का पुनर्गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और विद्यावती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का सत्रहवाँ दिन सम्पन्न हुआ और सीज़न ३ का शुभारम्भ हुआ!**

शेष पंद्रह कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, अठारहवीं पुतली (तारावती) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज ज्ञान के अहंकार-रहित उच्चतर सत्यों को आत्मसात करते हुए मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम अठारहवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और अठारहवीं पुतली—तारावती—की अमर गाथा सुनेंगे!"