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त्रयोदश पुतली रतिप्रिया: तीन समरूप कांस्य-प्रतिमाएँ, शिल्पी की पहेली और सुवर्ण-तार की गूढ़ परीक्षा

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

त्रयोदश पुतली रतिप्रिया: तीन समरूप कांस्य-प्रतिमाएँ, शिल्पी की पहेली और सुवर्ण-तार की गूढ़ परीक्षा

The Thirteenth Statue: Ratipriya & The Sculptor's Riddle

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दृश्य 1

त्रयोदश सूर्योदय और रतिप्रिया का प्रबोधन

The Thirteenth Dawn & Ratipriya
Morning sunlight streams across the sandstone colonnade onto the 32-step golden throne

तेरहवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
•
King Bhoja in sacred saffron silks approaches the thirteenth step of the throne

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से तेरहवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
•
The marble dais erupts with brilliant crimson-rose and golden radiance

जैसे ही राजा का चरण तेरहवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, संगमरमर का फर्श रक्त-गुलाबी और स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठा!

Panel 3
•
The thirteenth carved statue Ratipriya opens her glowing crimson-rose eyes, laughing musically
पुतली रतिप्रिया
ठहरो, राजा भोज! इस तेरहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

तेरहवीं कांस्य-पुतली—रतिप्रिया—की रक्त-गुलाबी आँखें खुलीं और वह स्वर्ण-छेनी व सुवर्ण-तार हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली रतिप्रिया

ठहरो, राजा भोज! इस तेरहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja halts in deep reverence with folded hands, gazing at the living bronze maiden
राजा भोज
हे रतिप्रिया देवि! विक्रमादित्य के किस दार्शनिक विवेक और शिल्पी की पहेली की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और स्वर्ण-तार धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे रतिप्रिया देवि! विक्रमादित्य के किस दार्शनिक विवेक और शिल्पी की पहेली की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Ratipriya speaks: 'Do you possess the razor-sharp philosophical intellect of Vikramaditya?'
पुतली रतिप्रिया
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म दार्शनिक विवेक है, जब एक विदेशी शिल्पाचार्य ने तीन समरूप कांस्य-प्रतिमाएँ रखकर उनका मूल्य पूछा, और उन्होंने धातु को बिना तोड़े एक पतले सुवर्ण-तार से मानव-चरित्र के तीनों भेदों को उजागर कर दिया?

रतिप्रिया ने स्वर्ण-तार की चरखी उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली रतिप्रिया

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म दार्शनिक विवेक है, जब एक विदेशी शिल्पाचार्य ने तीन समरूप कांस्य-प्रतिमाएँ रखकर उनका मूल्य पूछा, और उन्होंने धातु को बिना तोड़े एक पतले सुवर्ण-तार से मानव-चरित्र के तीनों भेदों को उजागर कर दिया?

Panel 6
•
दृश्य 2

शिल्पाचार्य मय-शिल्पी की चुनौती और तीन समरूप प्रतिमाएँ

The Sculptor
In the grand audience hall of Ujjayini, Vikramaditya sits on his throne as Maya-Shilpi unveils crates

उज्जयिनी के राज-सभागार में सुदूर देशों से आए प्रसिद्ध शिल्पाचार्य मय-शिल्पी ने तीन मखमली सन्दूक खोले।

Panel 7
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Three life-sized, exquisitely polished cast-bronze statues of celestial maidens stand side-by-side

सभागार के संगमरमर पर तीन आदमकद, अत्यन्त चमचमाती कांस्य-प्रतिमाएँ एक पंक्ति में स्थापित की गईं।

Panel 8
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The three bronze statues are completely identical in every curve, carved smile, and jewelry

तीनों प्रतिमाओं का मुख-मण्डल, नयन, आभूषण, मुस्कान और धातु का रंग पूरी तरह एक समान था; इनमें रत्ती-भर का भी भेद नहीं दिख रहा था!

Panel 9
•
Master sculptor Maya-Shilpi proclaims his challenge
शिल्पाचार्य मय-शिल्पी
महाराज! इनमें से एक प्रतिमा का मूल्य एक लाख स्वर्ण-दीनार है, दूसरी का एक हजार दीनार और तीसरी का मूल्य केवल एक ताँबे का कौड़ी है! बिना धातु तोड़े इनका मूल्य बताइए!

शिल्पाचार्य ने हाथ जोड़कर गर्व से चुनौती रखी:

शिल्पाचार्य मय-शिल्पी

महाराज! इनमें से एक प्रतिमा का मूल्य एक लाख स्वर्ण-दीनार है, दूसरी का एक हजार दीनार और तीसरी का मूल्य केवल एक ताँबे का कौड़ी है! बिना धातु तोड़े इनका मूल्य बताइए!

Panel 10
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The royal metallurgists examine the statues with scales and sound-hammers
प्रधान धातु-शास्त्री
महाराज! तीनों का भार, घनत्व और कांसा बिल्कुल एक समान है; बाह्य परीक्षा से कोई भेद नहीं मिलता!

उज्जयिनी के धातु-शास्त्रियों ने तुला पर तौला और हथौड़ी की ध्वनि से परखा; तीनों का भार ठीक सौ-सौ पल निकला!

प्रधान धातु-शास्त्री

महाराज! तीनों का भार, घनत्व और कांसा बिल्कुल एक समान है; बाह्य परीक्षा से कोई भेद नहीं मिलता!

Panel 11
•
The chief ministers shake their heads in complete bewilderment

दरबार के महामन्त्री और पण्डित सिर पकड़कर बैठ गए; पहेली अभेद्य प्रतीत हो रही थी।

Panel 12
•
दृश्य 3

सम्राट का सुवर्ण-तार परीक्षण और प्रथम प्रतिमा का भेद

The Emperor
Vikramaditya steps down from the royal throne, walking around the three statues

सम्राट विक्रमादित्य मन्द मुस्कान के साथ सिंहासन से उतरे और तीनों प्रतिमाओं के चारों ओर शान्त दृष्टि से परिक्रमा की।

Panel 13
•
Vikramaditya requests a spool of thin, flexible golden wire from the royal jewelers

विक्रमादित्य ने राज-स्वर्णकारों से एक अत्यन्त बारीक, लचीले सुवर्ण-तार की चरखी मँगवाई।

Panel 14
•
Vikramaditya inspects the ear openings of the statues, suspecting hidden internal channels

विक्रमादित्य ने प्रतिमाओं के कर्ण-छिद्रों का सूक्ष्म निरीक्षण किया; उन्हें आभास हुआ कि शिल्पी ने आन्तरिक नालियों से मानव-मन के तीन स्वभाव रचे हैं!

Panel 15
•
Vikramaditya gently feeds the thin golden wire into the right ear canal of the First Statue

पूरी राजसभा के सम्मुख विक्रमादित्य ने प्रथम प्रतिमा के दाहिने कान में वह पतला सुवर्ण-तार धीरे-धीरे प्रविष्ट कराया।

Panel 16
•
The wire glides through the internal cavity and emerges straight out through the Left Ear

तार आन्तरिक नाली से सरकता हुआ प्रथम प्रतिमा के **बाएँ कान** से सीधा बाहर निकल आया!

Panel 17
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The courtiers whisper in confusion, while Vikramaditya nods with a knowing, serene smile
महामन्त्री
तार एक कान से घुसकर दूसरे कान से बाहर आ गया, महाराज!
सम्राट विक्रमादित्य
धैर्य रखें, मन्त्रीवर! द्वितीय और तृतीय प्रतिमा का रहस्य भी अभी खुलेगा!

दरबारी विस्मय से कानाफूसी करने लगे, जबकि विक्रमादित्य ने मन्द मुस्कान से सिर हिलाया। प्रथम भेद सिद्ध हो चुका था!

महामन्त्री

तार एक कान से घुसकर दूसरे कान से बाहर आ गया, महाराज!

सम्राट विक्रमादित्य

धैर्य रखें, मन्त्रीवर! द्वितीय और तृतीय प्रतिमा का रहस्य भी अभी खुलेगा!

Panel 18
•
दृश्य 4

द्वितीय व तृतीय प्रतिमा का परीक्षण और हृदय-गुहा का रहस्य

The Second and Third Statues Tested
Vikramaditya approaches the Second Statue, feeding the golden wire into its right ear

विक्रमादित्य द्वितीय प्रतिमा के निकट गए और सुवर्ण-तार उसके दाहिने कर्ण-छिद्र में डाला।

Panel 19
•
The wire glides through the bronze throat and pops out straight through the Open Mouth
प्रधान धर्माधिकारी
इस प्रतिमा के मुख से तार निकला है, महाराज!

तार कण्ठ से होता हुआ द्वितीय प्रतिमा के **खुले मुख** से बाहर निकल आया!

प्रधान धर्माधिकारी

इस प्रतिमा के मुख से तार निकला है, महाराज!

Panel 20
•
Vikramaditya approaches the Third Statue, carefully feeding the golden wire into its right ear

अन्त में विक्रमादित्य ने तृतीय प्रतिमा के दाहिने कान में सुवर्ण-तार धीरे-धीरे उतारा।

Panel 21
•
The golden wire travels down into the bronze chest and coils securely inside the Heart
सम्राट विक्रमादित्य
तार हृदय-गुहा में लीन हो गया; यह प्रतिमा मौन और गूढ़ है!

तार नीचे उतरता गया और प्रतिमा के **हृदय-कक्ष** में कुण्डली मारकर समा गया; वह किसी भी छिद्र से बाहर नहीं निकला!

सम्राट विक्रमादित्य

तार हृदय-गुहा में लीन हो गया; यह प्रतिमा मौन और गूढ़ है!

Panel 22
•
Vikramaditya holds the spool, his eyes blazing with profound philosophical clarity

विक्रमादित्य के नयनों में दिव्य ज्ञान का प्रकाश कौंध उठा; वे सभा के सम्मुख खड़े हो गए।

Panel 23
•
Master Sculptor Maya-Shilpi watches with wide eyes in astonishment

शिल्पाचार्य मय-शिल्पी की आँखें फटी की फटी रह गईं; बिना खुरचे गुप्त नालियों को ढूँढ़ने वाले सम्राट को देखकर वह स्तब्ध था!

Panel 24
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दृश्य 5

दार्शनिक निर्णय, तीनों मूल्यों का रहस्य और शिल्पी का नमन

The Philosophical Revelation & True Worth
Vikramaditya points to the First Statue: 'This is worth barely ONE COPPER PANA!'
सम्राट विक्रमादित्य
यह प्रथम प्रतिमा केवल 'एक ताँबे के सिक्के' के मूल्य की है! यह उस अधम व्यक्ति का प्रतीक है जो एक कान से ज्ञान की बात सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाल देता है, हृदय में रत्ती-भर भी नहीं रोकता!

विक्रमादित्य ने प्रथम प्रतिमा की ओर संकेत किया:

सम्राट विक्रमादित्य

यह प्रथम प्रतिमा केवल 'एक ताँबे के सिक्के' के मूल्य की है! यह उस अधम व्यक्ति का प्रतीक है जो एक कान से ज्ञान की बात सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाल देता है, हृदय में रत्ती-भर भी नहीं रोकता!

Panel 25
•
Vikramaditya points to the Second Statue: 'This is worth ONE THOUSAND DINARS!'
सम्राट विक्रमादित्य
यह द्वितीय प्रतिमा 'एक हजार स्वर्ण-दीनार' की है! यह उस वाचाल मनुष्य का प्रतीक है जो कान से गुप्त बात सुनकर तुरन्त मुख से संसार में ढिंढोरा पीट देता है; इसकी कला उत्तम है परन्तु यह विश्वास योग्य नहीं!

विक्रमादित्य ने द्वितीय प्रतिमा की व्याख्या की:

सम्राट विक्रमादित्य

यह द्वितीय प्रतिमा 'एक हजार स्वर्ण-दीनार' की है! यह उस वाचाल मनुष्य का प्रतीक है जो कान से गुप्त बात सुनकर तुरन्त मुख से संसार में ढिंढोरा पीट देता है; इसकी कला उत्तम है परन्तु यह विश्वास योग्य नहीं!

Panel 26
•
Vikramaditya points to the Third Statue: 'This is worth ONE HUNDRED THOUSAND GOLD DINARS!'
सम्राट विक्रमादित्य
और यह तृतीय प्रतिमा 'एक लाख स्वर्ण-दीनार' की है! यह उस उत्तम पुरुष का प्रतीक है जो ज्ञान और रहस्य को सुनकर अपने हृदय में धारण करता है और निष्ठा से सुरक्षित रखता है!

विक्रमादित्य ने तृतीय प्रतिमा की महिमा बताई:

सम्राट विक्रमादित्य

और यह तृतीय प्रतिमा 'एक लाख स्वर्ण-दीनार' की है! यह उस उत्तम पुरुष का प्रतीक है जो ज्ञान और रहस्य को सुनकर अपने हृदय में धारण करता है और निष्ठा से सुरक्षित रखता है!

Panel 27
•
Master Sculptor Maya-Shilpi drops to his knees on the marble floor in tears
शिल्पाचार्य मय-शिल्पी
आर्यावर्त में आपके समान दार्शनिक विवेक किसी अन्य सम्राट में नहीं है!

शिल्पाचार्य मय-शिल्पी कृतज्ञता और विस्मय के अश्रुओं से सम्राट के चरणों में गिर पड़ा: 'आपने मेरी कला की आत्मा को पढ़ लिया, हे चक्रवर्ती देव!'

शिल्पाचार्य मय-शिल्पी

आर्यावर्त में आपके समान दार्शनिक विवेक किसी अन्य सम्राट में नहीं है!

Panel 28
•
Vikramaditya rewards the sculptor with two hundred thousand gold dinars and royal titles

विक्रमादित्य ने शिल्पी को दो लाख स्वर्ण-दीनार और राज-शिल्प परिषद के प्रधान पद से अलंकृत किया।

Panel 29
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The entire assembly of Ujjayini erupts in thunderous cheering, celebrating the triumph

उज्जयिनी का राज-सभागार जयघोष से गूँज उठा: 'दार्शनिक सम्राट विक्रमादित्य की जय हो!'

Panel 30
•
दृश्य 6

रतिप्रिया का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Ratipriya
Back in Dharanagari palace, Ratipriya looks directly at King Bhoja with crimson-rose eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली रतिप्रिया ने राजा भोज को गम्भीर रक्त-गुलाबी नयनों से देखा।

Panel 31
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Ratipriya challenges: 'Have you ever judged the hidden moral temperaments of humanity?'
पुतली रतिप्रिया
अब कहो, राजा भोज—क्या तुममें मानव-चरित्र के छिपे हुए दार्शनिक रहस्यों को एक पतले तार से भेदने की ऐसी दिव्य दृष्टि है? यदि ऐसा सूक्ष्म ज्ञान तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

रतिप्रिया ने तेरहवीं सीढ़ी की चुनौती दी:

पुतली रतिप्रिया

अब कहो, राजा भोज—क्या तुममें मानव-चरित्र के छिपे हुए दार्शनिक रहस्यों को एक पतले तार से भेदने की ऐसी दिव्य दृष्टि है? यदि ऐसा सूक्ष्म ज्ञान तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

Panel 32
•
King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's insight
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म दार्शनिक विवेक और कला के मर्म को भेदने की दृष्टि नहीं है, देवि। मैं इस तेरहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म दार्शनिक विवेक और कला के मर्म को भेदने की दृष्टि नहीं है, देवि। मैं इस तेरहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
•
King Bhoja steps down from the thirteenth step, ordering philosophical ethics academies established

राजा भोज तेरहवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में नीति-शास्त्र और शिल्प-कौशल की अकादमियाँ स्थापित करने की आज्ञा दी।

Panel 34
•
King Bhoja issues royal proclamations establishing philosophical academies

राज्य-भर में उत्तम चरित्र, विवेक और शिल्पकला के संवर्धन हेतु राज-परिषदों का गठन हुआ।

Panel 35
•
Twilight conches echo across Dharanagari as Ratipriya smiles and freezes back into silent bronze

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और रतिप्रिया मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का तेरहवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

Panel 36
•
The remaining nineteen celestial statues gleam in the evening torchlight

शेष उन्नीस कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, चौदहवीं पुतली की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

Panel 37
•
King Bhoja departs the throne room in quiet contemplation, enriched by Vikramaditya's wisdom
राजा भोज
कल प्रातःकाल हम चौदहवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और चौदहवीं पुतली—तारामती—की अमर गाथा सुनेंगे!

राजा भोज आत्म-मन्थन करते हुए मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।

राजा भोज

कल प्रातःकाल हम चौदहवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और चौदहवीं पुतली—तारामती—की अमर गाथा सुनेंगे!

Panel 38
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