त्रयोदश पुतली रतिप्रिया: तीन समरूप कांस्य-प्रतिमाएँ, शिल्पी की पहेली और सुवर्ण-तार की गूढ़ परीक्षा
The Thirteenth Statue: Ratipriya & The Sculptor's Riddle
त्रयोदश सूर्योदय और रतिप्रिया का प्रबोधन
The Thirteenth Dawn & Ratipriya
तेरहवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से तेरहवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण तेरहवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, संगमरमर का फर्श रक्त-गुलाबी और स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठा!

तेरहवीं कांस्य-पुतली—रतिप्रिया—की रक्त-गुलाबी आँखें खुलीं और वह स्वर्ण-छेनी व सुवर्ण-तार हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस तेरहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और स्वर्ण-तार धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे रतिप्रिया देवि! विक्रमादित्य के किस दार्शनिक विवेक और शिल्पी की पहेली की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

रतिप्रिया ने स्वर्ण-तार की चरखी उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म दार्शनिक विवेक है, जब एक विदेशी शिल्पाचार्य ने तीन समरूप कांस्य-प्रतिमाएँ रखकर उनका मूल्य पूछा, और उन्होंने धातु को बिना तोड़े एक पतले सुवर्ण-तार से मानव-चरित्र के तीनों भेदों को उजागर कर दिया?
शिल्पाचार्य मय-शिल्पी की चुनौती और तीन समरूप प्रतिमाएँ
The Sculptor
उज्जयिनी के राज-सभागार में सुदूर देशों से आए प्रसिद्ध शिल्पाचार्य मय-शिल्पी ने तीन मखमली सन्दूक खोले।

सभागार के संगमरमर पर तीन आदमकद, अत्यन्त चमचमाती कांस्य-प्रतिमाएँ एक पंक्ति में स्थापित की गईं।

तीनों प्रतिमाओं का मुख-मण्डल, नयन, आभूषण, मुस्कान और धातु का रंग पूरी तरह एक समान था; इनमें रत्ती-भर का भी भेद नहीं दिख रहा था!

शिल्पाचार्य ने हाथ जोड़कर गर्व से चुनौती रखी:
महाराज! इनमें से एक प्रतिमा का मूल्य एक लाख स्वर्ण-दीनार है, दूसरी का एक हजार दीनार और तीसरी का मूल्य केवल एक ताँबे का कौड़ी है! बिना धातु तोड़े इनका मूल्य बताइए!

उज्जयिनी के धातु-शास्त्रियों ने तुला पर तौला और हथौड़ी की ध्वनि से परखा; तीनों का भार ठीक सौ-सौ पल निकला!
महाराज! तीनों का भार, घनत्व और कांसा बिल्कुल एक समान है; बाह्य परीक्षा से कोई भेद नहीं मिलता!

दरबार के महामन्त्री और पण्डित सिर पकड़कर बैठ गए; पहेली अभेद्य प्रतीत हो रही थी।
सम्राट का सुवर्ण-तार परीक्षण और प्रथम प्रतिमा का भेद
The Emperor
सम्राट विक्रमादित्य मन्द मुस्कान के साथ सिंहासन से उतरे और तीनों प्रतिमाओं के चारों ओर शान्त दृष्टि से परिक्रमा की।

विक्रमादित्य ने राज-स्वर्णकारों से एक अत्यन्त बारीक, लचीले सुवर्ण-तार की चरखी मँगवाई।

विक्रमादित्य ने प्रतिमाओं के कर्ण-छिद्रों का सूक्ष्म निरीक्षण किया; उन्हें आभास हुआ कि शिल्पी ने आन्तरिक नालियों से मानव-मन के तीन स्वभाव रचे हैं!

पूरी राजसभा के सम्मुख विक्रमादित्य ने प्रथम प्रतिमा के दाहिने कान में वह पतला सुवर्ण-तार धीरे-धीरे प्रविष्ट कराया।

तार आन्तरिक नाली से सरकता हुआ प्रथम प्रतिमा के **बाएँ कान** से सीधा बाहर निकल आया!

दरबारी विस्मय से कानाफूसी करने लगे, जबकि विक्रमादित्य ने मन्द मुस्कान से सिर हिलाया। प्रथम भेद सिद्ध हो चुका था!
तार एक कान से घुसकर दूसरे कान से बाहर आ गया, महाराज!
धैर्य रखें, मन्त्रीवर! द्वितीय और तृतीय प्रतिमा का रहस्य भी अभी खुलेगा!
द्वितीय व तृतीय प्रतिमा का परीक्षण और हृदय-गुहा का रहस्य
The Second and Third Statues Tested
विक्रमादित्य द्वितीय प्रतिमा के निकट गए और सुवर्ण-तार उसके दाहिने कर्ण-छिद्र में डाला।

तार कण्ठ से होता हुआ द्वितीय प्रतिमा के **खुले मुख** से बाहर निकल आया!
इस प्रतिमा के मुख से तार निकला है, महाराज!

अन्त में विक्रमादित्य ने तृतीय प्रतिमा के दाहिने कान में सुवर्ण-तार धीरे-धीरे उतारा।

तार नीचे उतरता गया और प्रतिमा के **हृदय-कक्ष** में कुण्डली मारकर समा गया; वह किसी भी छिद्र से बाहर नहीं निकला!
तार हृदय-गुहा में लीन हो गया; यह प्रतिमा मौन और गूढ़ है!

विक्रमादित्य के नयनों में दिव्य ज्ञान का प्रकाश कौंध उठा; वे सभा के सम्मुख खड़े हो गए।

शिल्पाचार्य मय-शिल्पी की आँखें फटी की फटी रह गईं; बिना खुरचे गुप्त नालियों को ढूँढ़ने वाले सम्राट को देखकर वह स्तब्ध था!
दार्शनिक निर्णय, तीनों मूल्यों का रहस्य और शिल्पी का नमन
The Philosophical Revelation & True Worth
विक्रमादित्य ने प्रथम प्रतिमा की ओर संकेत किया:
यह प्रथम प्रतिमा केवल 'एक ताँबे के सिक्के' के मूल्य की है! यह उस अधम व्यक्ति का प्रतीक है जो एक कान से ज्ञान की बात सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाल देता है, हृदय में रत्ती-भर भी नहीं रोकता!

विक्रमादित्य ने द्वितीय प्रतिमा की व्याख्या की:
यह द्वितीय प्रतिमा 'एक हजार स्वर्ण-दीनार' की है! यह उस वाचाल मनुष्य का प्रतीक है जो कान से गुप्त बात सुनकर तुरन्त मुख से संसार में ढिंढोरा पीट देता है; इसकी कला उत्तम है परन्तु यह विश्वास योग्य नहीं!

विक्रमादित्य ने तृतीय प्रतिमा की महिमा बताई:
और यह तृतीय प्रतिमा 'एक लाख स्वर्ण-दीनार' की है! यह उस उत्तम पुरुष का प्रतीक है जो ज्ञान और रहस्य को सुनकर अपने हृदय में धारण करता है और निष्ठा से सुरक्षित रखता है!

शिल्पाचार्य मय-शिल्पी कृतज्ञता और विस्मय के अश्रुओं से सम्राट के चरणों में गिर पड़ा: 'आपने मेरी कला की आत्मा को पढ़ लिया, हे चक्रवर्ती देव!'
आर्यावर्त में आपके समान दार्शनिक विवेक किसी अन्य सम्राट में नहीं है!

विक्रमादित्य ने शिल्पी को दो लाख स्वर्ण-दीनार और राज-शिल्प परिषद के प्रधान पद से अलंकृत किया।

उज्जयिनी का राज-सभागार जयघोष से गूँज उठा: 'दार्शनिक सम्राट विक्रमादित्य की जय हो!'
रतिप्रिया का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Ratipriya
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली रतिप्रिया ने राजा भोज को गम्भीर रक्त-गुलाबी नयनों से देखा।

रतिप्रिया ने तेरहवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुममें मानव-चरित्र के छिपे हुए दार्शनिक रहस्यों को एक पतले तार से भेदने की ऐसी दिव्य दृष्टि है? यदि ऐसा सूक्ष्म ज्ञान तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म दार्शनिक विवेक और कला के मर्म को भेदने की दृष्टि नहीं है, देवि। मैं इस तेरहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज तेरहवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में नीति-शास्त्र और शिल्प-कौशल की अकादमियाँ स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में उत्तम चरित्र, विवेक और शिल्पकला के संवर्धन हेतु राज-परिषदों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और रतिप्रिया मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का तेरहवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष उन्नीस कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, चौदहवीं पुतली की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज आत्म-मन्थन करते हुए मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
कल प्रातःकाल हम चौदहवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और चौदहवीं पुतली—तारामती—की अमर गाथा सुनेंगे!