षड्विंशति पुतली ध्वनिमती: सात सुरों का प्रज्ञाचक्षु साधक, वीणा का टूटा तार और गान्धर्व-नाद का चमत्कार
The Twenty-Sixth Statue: Dhwanimati & The Broken Veena String
छब्बीसवाँ सूर्योदय और ध्वनिमती का प्रबोधन
The Twenty-Sixth Dawn & Dhwanimati
छब्बीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से छब्बीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण छब्बीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी अम्बर-स्वर्णिम और नाद-ब्रह्म के दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

छब्बीसवीं कांस्य-पुतली—ध्वनिमती—की अम्बर-नयन खुले और वह सुवर्ण-रुद्र-वीणा व स्फटिक-कुंजी हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस छब्बीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और रुद्र-वीणा धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे ध्वनिमती देवि! विक्रमादित्य के किस नाद-विवेक और सुर-साधना के सत्कार की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

ध्वनिमती ने सुवर्ण-रुद्र-वीणा उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म नाद-विवेक और कला की आत्मा को पहचानने की दृष्टि है, जब एक नेत्रहीन संन्यासी ने टूटे हुए तार पर अपने हृदय के अनुरणन से मेघमल्हार गाकर राज-दरबारियों के अहंकार को पिघला दिया?
उज्जयिनी की शरद-संगीत सभा और राज-गायक का अहंकार
The Imperial Music Conclave & The Proud Virtuoso
शरद पूर्णिमा के पावन पर्व पर उज्जयिनी के मणि-जड़ित राजसभा में सम्राट विक्रमादित्य ने 'महा-संगीत सम्मेलन' का आयोजन किया।

प्रधान राज-गायक पण्डित स्वरनिधि ने अपनी हीरों से जड़ी सुवर्ण-वीणा पर द्रुत-लय में सात सुरों का ऐसा तीव्र प्रदर्शन किया कि दरबारी चकित रह गए!
सुनो सभासदों! यह है आर्यावर्त के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार की उँगलियों का चमत्कार!

विक्रमादित्य ने गम्भीर मुद्रा में सुना; संगीत तकनीक में निर्दोष था, परन्तु उसमें आत्मा की भक्ति (भाव) और करुणा का सर्वथा अभाव था।

स्वरनिधि ने गर्व से भरकर घोषणा की: 'आर्यावर्त में कोई ऐसा गायक नहीं जो मेरी उँगलियों की गति और सात सुरों की पकड़ की बराबरी कर सके!'
महाराज! इस सुवर्ण-वीणा का सम्मान केवल मेरी उँगलियों के योग्य है!

दरबारी सामन्तों ने तालियाँ बजाकर चापलूसी में सिर हिलाया, कलाकार के अहंकार को ही संगीत की पराकाष्ठा मानकर।

तभी राजसभा के मुख्य द्वार से एक सत्तर वर्षीय नेत्रहीन वृद्ध साधक—आचार्य नादब्रह्म—एक अनाथ बालक का हाथ पकड़े विनीत भाव से प्रविष्ट हुए।
प्रज्ञाचक्षु आचार्य नादब्रह्म और पुरानी काष्ठ-वीणा
The Blind Ascetic Musician Enters
सादे खद्दर की चादर ओढ़े आचार्य नादब्रह्म के कन्धों पर एक पुरानी, छिले हुए तुम्बों वाली काष्ठ-निर्मित रुद्र-वीणा टिकी थी।

दरबारी सामन्तों ने फटेहाल अन्धे साधक की टूटी-फूटी वीणा देखकर उपहास में फुसफुसाना आरम्भ किया।
इस टूटी काठ की वीणा से यह अन्धा भिखारी राज-सभा में क्या गायेगा?!

आचार्य नादब्रह्म ने हाथ जोड़कर शान्ति से कहा: 'संगीत उँगलियों का करतब नहीं, राजन! यह आत्मा की वह पुकार है जो जड़ में भी चेतना जगा दे!'
यदि आज्ञा हो, तो मैं प्रभु के चरणों में सात सुरों का एक दीपक जलाऊँ?

विक्रमादित्य सिंहासन से उठ खड़े हुए और ससम्मान आगे बढ़कर अन्धे साधक को मध्य-कालीन पर आसन ग्रहण कराया।
पधारिए, आचार्य! उज्जयिनी का राजप्रासाद आपके नाद-ब्रह्म के स्वागत में नतमस्तक है!

आचार्य ने अपनी खुरदरी उँगलियों से पुरानी वीणा की खूंटियों को घुमाकर मन्द स्वर में सुर मिलाया।

सभागार में गहरा सन्नाटा छा गया; अन्धे साधक ने अपने प्रज्ञाचक्षुओं को भीतर की ओर मोड़ा और ध्यान-मुद्रा में लीन हो गए।
मेघमल्हार का नाद, वीणा का टूटा तार और सीने का अनुरणन
The Broken String & The Miracle of Resonance
जैसे ही आचार्य की उँगलियों ने तारों को छुआ, 'राग मेघमल्हार' की अमृतमयी पवित्र स्वर-लहरी गूँज उठी, जिसने सम्पूर्ण वातावरण को शीतल कर दिया!

सारे दरबारी, मन्त्री और यहाँ तक कि झरोखों पर बैठी कोयलें भी मन्त्रमुग्ध होकर मौन हो गईं; संगीत साक्षात् ईश्वर का रूप ले चुका था।
ऐसा दिव्य नाद हमने जीवन में कभी नहीं सुना!

राग के चरमोत्कर्ष पर अचानक वीणा का मुख्य और सबसे ऊँचा तार 'टंकार' की तीखी ध्वनि के साथ टूट गया!

सभा में हाहाकार मचने लगा; लोगों ने सोचा कि अब संगीत खण्डित हो गया और अन्धा साधक पराजित हो गया।
हाय! वीणा का मुख्य तार टूट गया! अब क्या होगा?!

परन्तु आचार्य रुके नहीं! उन्होंने समाधि में स्थित होकर शेष तारों को छेड़ा और टूटे तार के सुरों को अपने कण्ठ और सीने की गूंज (श्रुतियों) से भर दिया!
नाद तार में नहीं, प्राण में है! सा... रे... ग... म... प... ध... नी...

टूटा हुआ तार भी वायु के 'सहानुकम्पी अनुरणन' (अनुध्वनि) से अपने आप झंकृत होने लगा; वह नाद किसी भी अखण्ड वीणा से सौ गुना अधिक मधुर था!
कमलों का प्रस्फुटन, राज-गायक का नमन और नाद-गुरुकुल का सम्मान
Blooming Lotuses & Svaranidhi
उस दिव्य नाद के प्रभाव से राजप्रासाद के फव्वारों में बन्द कमल के फूल स्वतः खिल उठे और प्रांगण में सुगन्धित शीतल फुहारें बरसने लगीं!

अहंकारी राज-गायक पण्डित स्वरनिधि अश्रुओं से भीगकर अन्धे साधक के चरणों में गिर पड़ा और अपनी सुवर्ण-वीणा उनके चरणों में रख दी।
क्षमा करें, गुरुदेव! मैं उँगलियों का जादूगर था, परन्तु आप संगीत के साक्षात् ईश्वर हैं!

सम्राट विक्रमादित्य ने सिंहासन से उठकर अपना मुकुटयुक्त मस्तक साधक के चरणों में झुका दिया।
आपके चर्म-चक्षु नहीं हैं, आचार्य, परन्तु आपकी आत्मा ब्रह्माण्ड के हृदय-नाद को देख रही है!

सम्राट ने आचार्य नादब्रह्म को राजसी सुवर्ण-रुद्र-वीणा और दस हज़ार स्वर्ण-दीनारों की थैली समर्पित की।

विक्रमादित्य ने उज्जयिनी में 'नाद-योग गुरुकुल' की स्थापना कर आचार्य नादब्रह्म को उसका आजीवन कुलाधिपति नियुक्त किया।

उज्जयिनी की राजसभा जयघोष से गूँज उठी: 'नाद-ब्रह्म की जय! संगीत-रक्षक सम्राट विक्रमादित्य की जय!'
ध्वनिमती का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Dhwanimati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली ध्वनिमती ने राजा भोज को गम्भीर अम्बर नयनों से देखा।

ध्वनिमती ने छब्बीसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी टूटी वीणा में छिपे नाद-ब्रह्म को पहचानकर किसी नेत्रहीन साधक को राज-गायक से ऊँचा आसन दिया है? यदि ऐसा सूक्ष्म सुर-विवेक और कला-सत्कार तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म नाद-विवेक, भौतिक उपकरणों के टूटने पर भी आत्मा के सुर को सुनने की क्षमता और सच्चे गुणीजनों का निष्कपट सत्कार करने का शील नहीं है, देवि। मैं इस छब्बीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज छब्बीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में शास्त्रीय संगीत गुरुकुल, नेत्रहीन कलाकारों हेतु राजसी वृत्ति और कला-संरक्षण न्यास स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में निपुण वृद्ध और दिव्यांग संगीतकारों के सम्मान हेतु विशेष छात्रवृत्तियों की घोषणा हुई।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और ध्वनिमती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का छब्बीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष छह कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, सत्ताईसवीं पुतली (वासुकी / वैदेही) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज नाद-ब्रह्म और कला के आत्मिक सत्य को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम सत्ताईसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और सत्ताईसवीं पुतली की अमर गाथा सुनेंगे!"