द्वाविंशति पुतली अनुरोधवती: निष्ठावान् तन्तुवाय का पावन वस्त्र, सुवर्ण-तूरी का विवाद और सत्य-श्रम का न्याय
The Twenty-Second Statue: Anurodhavati & The Master Weaver
बाईसवाँ सूर्योदय और अनुरोधवती का प्रबोधन
The Twenty-Second Dawn & Anurodhavati
बाईसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से बाईसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण बाईसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी कुंकुम-स्वर्णिम और पुखराज-पीत दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

बाईसवीं कांस्य-पुतली—अनुरोधवती—की स्वर्णिम-नयन खुले और वह सुवर्ण-तूरी (शटल) व रेशमी वस्त्र हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस बाईसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और सुवर्ण-तूरी धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे अनुरोधवती देवि! विक्रमादित्य के किस शिल्प-विवेक और श्रमजीवियों की रक्षा की अमर गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

अनुरोधवती ने सुवर्ण-तूरी उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म शिल्प-विवेक और पसीने के श्रम का आदर है, जब एक शक्तिशाली व्यापारी महाजन मण्डल ने निर्धन बुनकर पर चोरी का कलंक लगाया, और सम्राट ने लौंग-जल व सूत्र-गणना से सत्य को उजागर कर दिया?
काशी का निष्ठावान् तन्तुवाय और महाजन का षड्यन्त्र
The Master Weaver & The Stolen Silk Accusation
उज्जयिनी के राज-सभागार में काशी का साठ वर्षीय निर्धन तन्तुवाय (बुनकर) पद्मनाभ तीन वर्षों की अनथक साधना से बुना हुआ एक अलौकिक वस्त्र लेकर उपस्थित हुआ।

पद्मनाभ ने सम्राट के चरणों में 'सुवर्ण-उत्तरीय' खोला, जो पंख से भी हल्का, शुद्ध सोने के तारों और कमल-तन्तुओं से बुना हुआ था।
महाराज! मैंने गायत्री मन्त्र के एक-एक जाप के साथ इस वस्त्र के तार काते हैं; यह आपकी चक्रवर्ती शोभा हेतु समर्पित है!

तभी वस्त्र-व्यापारी महाजन मण्डल का धनी अध्यक्ष—श्रेष्ठि हेमदत्त—पहरेदारों के साथ आ धमका और चीखने लगा!
यह वस्त्र हमारे महाजन मण्डल की सम्पत्ति है! इस चोर ने हमारे गोदाम से सोने के तार और प्राचीन सुवर्ण-तूरी चुराकर यह चादर बनाई है!

हेमदत्त ने राज-मुहर लगे जाली बही-खाते और चार बिकाऊ पारखियों को गवाह के रूप में पेश किया जिन्होंने शपथ खाई कि सोना महाजन का ही है।
हम सब प्रमाणित करते हैं कि यह सोना और बुनाई महाजन मण्डल की ही है!

वृद्ध पद्मनाभ थर-थर काँपते हुए रो पड़ा: 'मैंने साठ वर्षों के जीवन में कभी किसी का एक तिनका नहीं चुराया; यह वस्त्र मेरे अपने पसीने और तपस्या की कमाई है!'

न्यायाधीश महाजन के बही-खातों से प्रभावित होकर तन्तुवाय के हाथ काटने और वस्त्र जब्त करने का दण्ड सुनाने ही वाले थे।
शिल्प-शास्त्र और सम्राट का रासायनिक परीक्षण
The Emperor
सम्राट विक्रमादित्य ने अपना हाथ उठाकर दण्ड रोका और स्वयं वस्त्र के समीप आकर उसके रेशों का सूक्ष्म निरीक्षण किया।
ठहरो! कागजी बही-खाते झूठे हो सकते हैं, परन्तु वस्त्र के एक-एक धागे में बुनकर की आत्मा और तकनीक का साक्ष्य अंकित होता है!

विक्रमादित्य ने शिल्प-शास्त्र का मर्म बताया: 'व्यापारिक करघों का कपड़ा गोंद और मिलावटी रंगों से चमकता है, जबकि सच्चे साधक का वस्त्र पर्वत के मोम और कमल-जल से काता जाता है!'

विक्रमादित्य ने राज-परिचारकों को गुनगुने लौंग-जल के पात्र और स्फटिक के विशाल आवर्धक लेन्स (लेंस) लाने की आज्ञा दी।

सभागार के मध्य में न्यायिक परीक्षण की वेदी तैयार की गई; दरबारी और व्यापारी कौतूहल से घेरकर खड़े हो गए।

श्रेष्ठि हेमदत्त के माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं; उसे इस रासायनिक और सूक्ष्म परीक्षण की आशा न थी!
महाराज! परीक्षण की क्या आवश्यकता है जब हमारे पास मोहरबंद रजिस्टर हैं?!

तन्तुवाय पद्मनाभ हाथ जोड़े शान्त खड़ा रहा; उसे अपने श्रम की पवित्रता और ईश्वर के न्याय पर पूर्ण विश्वास था।
लौंग-जल परीक्षण, १०८ सूत्रों की गणना और सत्य का प्रकटीकरण
The Thread-Count & Clove-Water Trial
विक्रमादित्य ने महाजन के कारखाने के रेशम का एक टुकड़ा और पद्मनाभ के वस्त्र का एक धागा गुनगुने लौंग-जल में एक साथ डुबोया।

महाजन के रेशम से तत्काल कृत्रिम काला-पीला रंग और चिपचिपा मांडी-गोंद छूटने लगा, जिससे पानी गन्दला हो गया!

परन्तु पद्मनाभ का धागा जल में काँच जैसा निर्मल चमकता रहा और उससे शुद्ध पहाड़ी मधुमक्खी के मोम व कमल-जल की मनभावन सुगन्ध फूट पड़ी!
अद्भुत! इस धागे से कमल और मोम की दिव्य सुगन्ध आ रही है!

अब विक्रमादित्य ने स्फटिक के आवर्धक लेंस से वस्त्र की बुनाई के ताने-बाने की सूक्ष्म गणना आरम्भ की।

लेंस के नीचे प्रति अंगुल में ठीक **एक हज़ार आठ (१००८)** सूक्ष्म सूत्र निकले—१०८ वैदिक मन्त्रों की लयबद्ध हस्तशिल्प तकनीक, जो किसी भी व्यावसायिक करघे से असम्भव थी!

सारे मन्त्री और पारखी विस्मय से स्तब्ध रह गए; वस्त्र के धागों ने स्वयं चीख-चीख कर अपने सच्चे स्वामी का नाम बता दिया था!
यह वस्त्र साक्षात् साधना की रचना है; यह किसी कारखाने का हो ही नहीं सकता!
महाजन का दण्ड, वस्त्र का सम्मान और महा-वस्त्राध्यक्ष का पद
The Fall of the Guild & The Weaver
वैज्ञानिक साक्ष्य के सामने श्रेष्ठि हेमदत्त और उसके चारों झूठे पारखी थर-थर काँपते हुए घुटनों पर गिर पड़े और अपना सारा षड्यन्त्र स्वीकार कर लिया।
क्षमा करें, महाराज! हमने इसके अद्वितीय रूप को देखकर लोभ में झूठा मुकदमा रचा था!

विक्रमादित्य ने हेमदत्त का व्यापारिक अधिकार-पत्र रद्द कर उस पर बीस हज़ार स्वर्ण-दीनार का दण्ड लगाया और वह सारी धनराशि पद्मनाभ को दिलवाई!

सम्राट ने वह पावन सुवर्ण-उत्तरीय ससम्मान अपने कन्धों पर धारण किया और राजसभा जगमगा उठी।
पवित्र श्रम से बुना हुआ यह वस्त्र किसी भी स्वर्ण-मुकुट से अधिक पावन और मूल्यवान है!

विक्रमादित्य ने पद्मनाभ को पाँच हज़ार स्वर्ण-दीनार का अतिरिक्त पुरस्कार दिया और उन्हें पूरे मालवा का 'महा-वस्त्राध्यक्ष' नियुक्त किया।

पद्मनाभ ने आनन्द के अश्रुओं से सम्राट के चरण स्पर्श किए; साठ वर्षों की उपेक्षित कला आज आर्यावर्त के सिंहासन पर प्रतिष्ठित हो चुकी थी!
आपने निर्धन के पसीने को भगवान के प्रसाद का सम्मान दिया, महाराज!

उज्जयिनी का सभागार जयघोष से गूँज उठा: 'श्रम-रक्षक सम्राट विक्रमादित्य की जय हो!'
अनुरोधवती का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Anurodhavati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली अनुरोधवती ने राजा भोज को गम्भीर स्वर्णिम नयनों से देखा।

अनुरोधवती ने बाईसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी शक्तिशाली महाजनों के जाली बही-खातों को विज्ञान से झुठलाकर किसी निर्धन बुनकर के पसीने का सत्कार किया है? यदि ऐसा सूक्ष्म शिल्प-विवेक और श्रम-गौरव तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म शिल्प-विवेक, महाजनों के दबाव से ऊपर उठकर निष्पक्ष न्याय करने की दृष्टि और श्रमजीवियों को मुकुट के समान आदर देने का शील नहीं है, देवि। मैं इस बाईसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज बाईसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में हस्तशिल्पियों, बुनकरों और दस्तकारों हेतु निःशुल्क कच्चा माल और न्याय-संरक्षण मण्डल स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में बुनकरों के शोषण को रोकने और उनके अधिकारों की रक्षा हेतु विशेष शिल्प-न्यासों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और अनुरोधवती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का बाईसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष दस कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, तेईसवीं पुतली (धर्मवती) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज श्रम के गौरव और निष्पक्ष न्याय के अमर सत्यों को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम तेईसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और तेईसवीं पुतली—धर्मवती—की अमर गाथा सुनेंगे!"