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प्रथम पुतली रत्नमञ्जरी: चिन्तामणि रत्न, दरिद्र पण्डित और परम त्याग का रहस्य

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

प्रथम पुतली रत्नमञ्जरी: चिन्तामणि रत्न, दरिद्र पण्डित और परम त्याग का रहस्य

The First Statue: Ratnamanjari & The Wish-Granting Jewel

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दृश्य 1

रत्नमञ्जरी का आह्वान और प्रथम सीढ़ी की चेतावनी

Ratnamanjari
Living statue Ratnamanjari addressing King Bhoja from the first throne step
पुतली रत्नमञ्जरी
ठहरो, मालव-नरेश भोज! इस दिव्य सिंहासन पर पाँव धरने की धृष्टता मत करो! यह कोई साधारण आसन नहीं, अपितु देवराज इन्द्र द्वारा सम्राट विक्रमादित्य को प्रदत्त धर्म-पीठ है!

धारानगरी के भव्य राजप्रासाद में स्वर्ण-सिंहासन के आरोहण का पावन प्रभात उदित हो चुका था; शंखनाद के बीच राजा भोज ने जैसे ही पहली सीढ़ी पर चरण उठाया, पहली सजीव कांस्य-पुतली रत्नमञ्जरी के नेत्रों में सहसा सजीव दीप्ति चमक उठी!

पुतली रत्नमञ्जरी

ठहरो, मालव-नरेश भोज! इस दिव्य सिंहासन पर पाँव धरने की धृष्टता मत करो! यह कोई साधारण आसन नहीं, अपितु देवराज इन्द्र द्वारा सम्राट विक्रमादित्य को प्रदत्त धर्म-पीठ है!

Panel 1
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In ancient midnight Ujjayini, Emperor Vikramaditya wanders the streets in a traveler's cloak

शताब्दियों पूर्व, सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी उज्जयिनी में घनघोर मेघ-गर्जना युक्त मध्यरात्रि छाई थी; सम्राट साधारण पथिक का काला कम्बल ओढ़कर, कटि में वूट्ज़ खड्ग बाँधकर प्रजा की टोह लेने निकले थे।

Panel 2
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Vikramaditya overhears desperate weeping inside a dilapidated earthen hut
पण्डित सोमशर्मा
हे विधाता! पूर्वजों ने मुझे चिन्तामणि रत्न का गुप्त मन्त्र सौंपा, किंतु मेरी जर्जर देह उस दुर्गम पर्वत तक नहीं जा सकती। मेरे कुल का अन्त इस भुखमरी में निश्चित है!

नगर के निर्जन छोर पर एक जीर्ण-शीर्ण मिट्टी की कुटिया के भीतर से हृदयविदारक रुदन सुनाई दिया, जहाँ प्रकाण्ड संस्कृत विद्वान दरिद्र पण्डित सोमशर्मा भूख से काँपते तीन शिशुओं को देखकर रो रहे थे।

पण्डित सोमशर्मा

हे विधाता! पूर्वजों ने मुझे चिन्तामणि रत्न का गुप्त मन्त्र सौंपा, किंतु मेरी जर्जर देह उस दुर्गम पर्वत तक नहीं जा सकती। मेरे कुल का अन्त इस भुखमरी में निश्चित है!

Panel 3
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Vikramaditya enters the hut offering comfort; Somasharma unrolls an ancient palm-leaf manuscript
सम्राट विक्रमादित्य
धैर्य रखिए, विप्रवर! जब तक उज्जयिनी में धर्म जीवित है, किसी विद्वान का कुल भूखा नहीं सोएगा।

विप्र का क्रन्दन सुनकर सम्राट का क्षत्रिय हृदय द्रवित हो उठा; वे कुटिया में प्रविष्ट हुए और स्वर्ण-मुद्राओं की भारी थैली पण्डित के चरणों में रख दी ताकि परिवार की तात्कालिक क्षुधा मिट सके।

सम्राट विक्रमादित्य

धैर्य रखिए, विप्रवर! जब तक उज्जयिनी में धर्म जीवित है, किसी विद्वान का कुल भूखा नहीं सोएगा।

Panel 4
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Somasharma unrolls the birch-bark scroll revealing the map to Mount Gandhamadana
पण्डित सोमशर्मा
इस रत्न से सात पीढ़ियों की दरिद्रता नष्ट हो सकती है, किंतु गन्धमादन का मार्ग धधकते मरुस्थल, विषधरों और पाषाण-राक्षसों से आक्रान्त है!

सोमशर्मा ने काँपते हाथों से प्राचीन भूर्जपत्र निकाला, जिस पर गन्धमादन पर्वत पर स्थित चिन्तामणि रत्न का मानचित्र अंकित था।

पण्डित सोमशर्मा

इस रत्न से सात पीढ़ियों की दरिद्रता नष्ट हो सकती है, किंतु गन्धमादन का मार्ग धधकते मरुस्थल, विषधरों और पाषाण-राक्षसों से आक्रान्त है!

Panel 5
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Vikramaditya makes a sacred vow, placing his hand upon the scholar's shoulder

विक्रमादित्य ने विप्र के कन्धों पर हाथ रखते हुए दृढ़ स्वर में कहा: 'भय त्यागिए, विप्रवर! मैं उज्जयिनी का सैनिक हूँ। मैं आपको कन्धों पर बैठाकर गन्धमादन के शिखर तक ले जाऊँगा!'

Panel 6
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दृश्य 2

धधकता मरुस्थल और पिपासा की परीक्षा

The Burning Desert & The Thirst Trial
At dawn, Vikramaditya carries the frail scholar upon his broad shoulders across desert dunes
सम्राट विक्रमादित्य
कन्धों को कसकर थाम लीजिए, विप्रवर! सूर्य ढलने से पहले हमें पहली घाटी पार करनी है।

अरुणोदय की प्रथम किरण के साथ, विक्रमादित्य ने वृद्ध पण्डित को अपने बलिष्ठ कन्धों पर बैठाया और गन्धमादन की ओर प्रस्थान किया।

सम्राट विक्रमादित्य

कन्धों को कसकर थाम लीजिए, विप्रवर! सूर्य ढलने से पहले हमें पहली घाटी पार करनी है।

Panel 7
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Twelve days of grueling march across red-hot sand dunes under a blistering desert sun

बारह दिनों तक धधकते अंगारों जैसी तप्त बालू पर विक्रमादित्य अनवरत चलते रहे; पैरों में छाले पड़ गए और ग्रीष्म की लू से कण्ठ सूख गया, किंतु मुख पर लेशमात्र भी क्लेश न था।

Panel 8
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Resting beneath a withered acacia tree; Somasharma collapses from heat exhaustion

मरुस्थल के मध्य जब सोमशर्मा प्यास से अचेत होने लगे, तो एक सूखे बबूल की छाँव में बैठकर विक्रमादित्य ने अपने तुम्बे का अन्तिम जल पण्डित के होठों में उँडेल दिया और स्वयं तृषा सहते रहे।

Panel 9
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Somasharma weeps in gratitude at the stranger giving away his last water
पण्डित सोमशर्मा
तुम मनुष्य नहीं, साक्षात् धर्म के अवतार हो!

सोमशर्मा ने गद्गद होकर कहा: 'हे वीर! स्वयं प्यासे रहकर तुमने प्राण-रक्षक जल मुझे दे दिया! तुम्हारे भीतर कौन-सा देवत्व निवास करता है?'

पण्डित सोमशर्मा

तुम मनुष्य नहीं, साक्षात् धर्म के अवतार हो!

Panel 10
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Vikramaditya smiles calmly, encouraging the scholar as the distant mountain peaks appear

विक्रमादित्य ने मुस्कुराकर कहा: 'जल पीजिए, भ्राता। क्षत्रिय का बल जल से नहीं, शरणागत की रक्षा के संकल्प से पुष्ट होता है।' सामने गन्धमादन के काले पर्वत दिखाई देने लगे।

Panel 11
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Entering the sulfurous ravines of Mount Gandhamadana infested with venomous black vipers

मरुभूमि पार कर वे गन्धमादन पर्वत की तलहटी में पहुँचे; आकाश छूती काली पाषाण-शृंखलाएँ गन्धक के विषैले धूम्र और फुंकारते विषधरों से आक्रान्त थीं।

Panel 12
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दृश्य 3

पाषाण-राक्षस वज्रदन्त का संहार

The Slaying of the Stone Guardian
Vikramaditya scales steep granite ledges with the scholar strapped securely to his chest

संकरी कगारों और अगाध खाइयों के ऊपर विक्रमादित्य वृद्ध पण्डित को अपनी पीठ पर साधे, निर्भय छलाँगें लगाते हुए शिखर-द्वार की ओर बढ़े।

Panel 13
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The mountain tremors; a colossal four-armed stone demon awakens from the rock face
राक्षस वज्रदन्त
गन्धमादन का मार्ग केवल मृत्यु की ओर जाता है!

सहसा चट्टानें थरथराईं और चार विशाल पाषाण-भुजाओं वाला क्रूर दैत्य वज्रदन्त जाग उठा; हाथ में भारी शिला-मुद्गर लिए उसने गर्जना की: 'कोई नश्वर यहाँ से जीवित नहीं लौट सकता!'

राक्षस वज्रदन्त

गन्धमादन का मार्ग केवल मृत्यु की ओर जाता है!

Panel 14
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Vikramaditya places the trembling scholar behind a protective rock redoubt

विक्रमादित्य ने काँपते पण्डित को एक सुरक्षित शिला की ओट में बैठाया और म्यान से अपनी चमकती वूट्ज़ खड्ग बाहर खींच ली।

Panel 15
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The stone demon swings his colossal mace, shattering granite cliffs into dust

राक्षस ने अपनी वज्र-गदा से भीषण प्रहार किया, जिससे पर्वत की चट्टानें चूर-चूर होकर खाई में गिरने लगीं।

Panel 16
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Vikramaditya leaps through the air, slicing the stone mace in half with sparking steel
सम्राट विक्रमादित्य
धर्म के मार्ग में पाषाण की गदा नहीं टिक सकती!

पलक झपकते ही सम्राट ने अद्भुत पैंतरे दिखाते हुए एक ही अचूक वार से राक्षस की पाषाण-गदा को चिनगारियों के साथ खण्ड-खण्ड कर दिया!

सम्राट विक्रमादित्य

धर्म के मार्ग में पाषाण की गदा नहीं टिक सकती!

Panel 17
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The stone guardian bows before Vikramaditya's valor, parting to reveal the inner cave portal

सम्राट के अतुलनीय पराक्रम और तेज के आगे पाषाण-दैत्य नतमस्तक हो गया और उसने पवित्र गुहा का मार्ग छोड़ दिया।

Panel 18
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दृश्य 4

बर्फीला भँवर और चिंतामणि रत्न की प्राप्ति

The Icy Whirlpool Abyss & The Chintamani
Inside the cavern: a subterranean sapphire lake with a swirling icy vortex

शिखर पार करते ही एक अलौकिक दृश्य दिखा—वहाँ श्वेत कमलों से सुशोभित अगाध नीलम-सरोवर था, जिसके मध्य भीषण बर्फीला भँवर घूम रहा था।

Panel 19
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A pillar of blinding rainbow light radiates from the heart of the swirling whirlpool
पण्डित सोमशर्मा
वही है! वही मेरे कुल का पावन चिंतामणि रत्न है!

भँवर के गर्भ से देदीप्यमान इन्द्रधनुषी प्रकाश-स्तम्भ आकाश की ओर उठ रहा था—वही साक्षात् मनोकामना पूर्ण करने वाला चिन्तामणि रत्न था!

पण्डित सोमशर्मा

वही है! वही मेरे कुल का पावन चिंतामणि रत्न है!

Panel 20
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Somasharma weeps that the freezing vortex is certain death for any mortal swimmer

सोमशर्मा तट पर घुटनों के बल गिर पड़े और काँपते हुए बोले: 'वही मेरे कुल का स्वप्न है, किंतु यह जल हिम-समान शीतल है और भँवर मृत्यु का मुख है! कोई इसमें जीवित नहीं बच सकता!'

Panel 21
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Vikramaditya dives fearlessly into the freezing torrent without a moment of hesitation
सम्राट विक्रमादित्य
सत्य और वचन की रक्षा ही क्षत्रिय का प्राण है!

विक्रमादित्य ने पल भर का भी विलम्ब न किया; बिना किसी संकोच के वे उस हिमीभूत भँवर में छलाँग लगा गए!

सम्राट विक्रमादित्य

सत्य और वचन की रक्षा ही क्षत्रिय का प्राण है!

Panel 22
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Underwater: Vikramaditya swims through the icy pressure, gripping the blazing ruby

प्राणघाती भँवर के प्रचण्ड खिंचाव को चीरते हुए, सम्राट अतल गहराई में उतरे और अपनी मुट्ठी में प्रज्वलित चिन्तामणि थाम ली।

Panel 23
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Vikramaditya surfaces holding the radiant jewel aloft like a blazing miniature sun

विक्रमादित्य दिव्य सूर्य की भाँति जल के ऊपर प्रकट हुए, उनके हाथ में चिन्तामणि रत्न तीनों लोकों को आलोकित कर रहा था!

Panel 24
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दृश्य 5

चिन्तामणि का सम्पूर्ण दान और परम त्याग

The Gift of Infinite Fortune
Dripping wet on the shore, Vikramaditya places the jewel directly into Somasharma's hands
सम्राट विक्रमादित्य
लीजिए विप्रवर, यह रत्न घर ले जाइए। आपके कुल को कभी दारिद्र्य का दुःख नहीं सहना पड़ेगा।

जल से बाहर आकर भीगे वस्त्रों में चमकते विक्रमादित्य ने लेशमात्र भी लोभ किए बिना, वह त्रैलोक्य-पूजित चिन्तामणि रत्न पण्डित सोमशर्मा की काँपती हथेलियों पर रख दिया!

सम्राट विक्रमादित्य

लीजिए विप्रवर, यह रत्न घर ले जाइए। आपके कुल को कभी दारिद्र्य का दुःख नहीं सहना पड़ेगा।

Panel 25
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Somasharma stares in disbelief, asking if the warrior demands half the treasure

सोमशर्मा अवाक होकर बोले: 'हे महाबाहु! तुमने मरुस्थल पार किया, दैत्य को मारा और बर्फीले भँवर से यह रत्न निकाला! क्या तुम इसमें से आधा भाग भी अपने लिए नहीं माँगते?'

Panel 26
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Vikramaditya smiles: 'A true Kshatriya brings light to the helpless, not plunder'

विक्रमादित्य ने करुणा भरी मुस्कान के साथ कहा: 'विप्रवर! एक सच्चे क्षत्रिय का धर्म असहाय को प्रकाश देना है, उसके भाग्य का हरण करना नहीं। यह सम्पत्ति आपके पूर्वजों के तप की है, मेरे लोभ की नहीं।'

Panel 27
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Somasharma spots the imperial signet ring bearing the royal eagle of Ujjayini
पण्डित सोमशर्मा
यह तो... उज्जयिनी की राज-मुद्रिका है!

तभी पण्डित की दृष्टि सम्राट की अँगूली में सुशोभित राज-मुद्रिका पर पड़ी, जिस पर उज्जयिनी का राज-गरुड़ चिह्न अंकित था!

पण्डित सोमशर्मा

यह तो... उज्जयिनी की राज-मुद्रिका है!

Panel 28
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Somasharma falls prostrate at the Emperor's feet in tears of awe and repentance

सोमशर्मा चीख पड़े: 'हे प्रभु! आप कोई साधारण सैनिक नहीं, उज्जयिनी के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हैं! हाय विधाता! मैंने सम्पूर्ण आर्यावर्त के अधिपति को भारवाहक बना दिया!'

Panel 29
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Vikramaditya lifts the scholar, embracing him as a brother and escorting him safely home

विक्रमादित्य ने उन्हें उठाकर गले लगाया: 'संकोच मत कीजिए, मित्र। प्रजा की सेवा ही राजा का सर्वोच्च धर्म है।' सम्राट ने स्वयं पण्डित को सकुशल उज्जयिनी पहुँचाया।

Panel 30
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दृश्य 6

रत्नमञ्जरी का निर्णय और राजा भोज की विनम्रता

Ratnamanjari
Living statue Ratnamanjari looks down at King Bhoja with a challenging smile
पुतली रत्नमञ्जरी
यदि तुम्हारे भीतर विक्रमादित्य जैसा निष्काम त्याग है, तो इस पहली सीढ़ी पर चरण रखो! अन्यथा लौट जाओ!

कथा समाप्त कर, पुतली रत्नमञ्जरी ने राजा भोज को ललकारा: 'अब कहो, राजा भोज! क्या तुमने कभी अपने प्राण संकट में डालकर किसी याचक के लिए ऐसा अतुलनीय रत्न प्राप्त किया और स्वयं एक कौड़ी भी न ली?'

पुतली रत्नमञ्जरी

यदि तुम्हारे भीतर विक्रमादित्य जैसा निष्काम त्याग है, तो इस पहली सीढ़ी पर चरण रखो! अन्यथा लौट जाओ!

Panel 31
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King Bhoja lowers his head in deep humility and self-awareness
राजा भोज
देवि, मुझमें ऐसा त्याग नहीं है। मैं अभी इस सिंहासन के योग्य नहीं हूँ।

पुतली की वाणी से राजा भोज का मस्तक लज्जा से झुक गया; उनका समस्त अभिमान क्षण भर में तिरोहित हो गया।

राजा भोज

देवि, मुझमें ऐसा त्याग नहीं है। मैं अभी इस सिंहासन के योग्य नहीं हूँ।

Panel 32
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King Bhoja steps down from the first step onto the marble floor
राजा भोज
राजकोष के द्वार खोल दिए जाएँ! मालवा में कोई भूखा न रहे!

राजा भोज पहली सीढ़ी से नीचे उतर आए और उन्होंने अपने मन्त्रियों को राजकोष के द्वार खोलकर निर्धनों में अन्न, वस्त्र और स्वर्ण वितरित करने की आज्ञा दी!

राजा भोज

राजकोष के द्वार खोल दिए जाएँ! मालवा में कोई भूखा न रहे!

Panel 33
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Living statue Ratnamanjari smiles warmly, her bronze form freezing back into silent metal

राजा भोज की विनम्रता देखकर पुतली रत्नमञ्जरी मुस्कुराई और उसका सजीव तेज धीरे-धीरे पुनः शान्त कांस्य-मूर्ति में विलीन हो गया।

Panel 34
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Twilight falls across the palace hall as evening conches echo; the throne stands silent

संध्या के शंख गूँज उठे, रत्नमञ्जरी मौन हो गई, और सिंहासन बत्तीसी का प्रथम दिवस सम्पन्न हुआ।

Panel 35
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King Bhoja returns to his chambers in fasting and prayer, awaiting the dawn of Statue 2

राजा भोज उपवास और ईश्वर-प्रार्थना में लीन होकर अगले प्रभात की प्रतीक्षा करने लगे, जब दूसरी पुतली चित्रलेखा अपना आह्वान प्रस्तुत करेगी।

Panel 36
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