प्रथम पुतली रत्नमञ्जरी: चिन्तामणि रत्न, दरिद्र पण्डित और परम त्याग का रहस्य
The First Statue: Ratnamanjari & The Wish-Granting Jewel
रत्नमञ्जरी का आह्वान और प्रथम सीढ़ी की चेतावनी
Ratnamanjari
धारानगरी के भव्य राजप्रासाद में स्वर्ण-सिंहासन के आरोहण का पावन प्रभात उदित हो चुका था; शंखनाद के बीच राजा भोज ने जैसे ही पहली सीढ़ी पर चरण उठाया, पहली सजीव कांस्य-पुतली रत्नमञ्जरी के नेत्रों में सहसा सजीव दीप्ति चमक उठी!
ठहरो, मालव-नरेश भोज! इस दिव्य सिंहासन पर पाँव धरने की धृष्टता मत करो! यह कोई साधारण आसन नहीं, अपितु देवराज इन्द्र द्वारा सम्राट विक्रमादित्य को प्रदत्त धर्म-पीठ है!

शताब्दियों पूर्व, सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी उज्जयिनी में घनघोर मेघ-गर्जना युक्त मध्यरात्रि छाई थी; सम्राट साधारण पथिक का काला कम्बल ओढ़कर, कटि में वूट्ज़ खड्ग बाँधकर प्रजा की टोह लेने निकले थे।

नगर के निर्जन छोर पर एक जीर्ण-शीर्ण मिट्टी की कुटिया के भीतर से हृदयविदारक रुदन सुनाई दिया, जहाँ प्रकाण्ड संस्कृत विद्वान दरिद्र पण्डित सोमशर्मा भूख से काँपते तीन शिशुओं को देखकर रो रहे थे।
हे विधाता! पूर्वजों ने मुझे चिन्तामणि रत्न का गुप्त मन्त्र सौंपा, किंतु मेरी जर्जर देह उस दुर्गम पर्वत तक नहीं जा सकती। मेरे कुल का अन्त इस भुखमरी में निश्चित है!

विप्र का क्रन्दन सुनकर सम्राट का क्षत्रिय हृदय द्रवित हो उठा; वे कुटिया में प्रविष्ट हुए और स्वर्ण-मुद्राओं की भारी थैली पण्डित के चरणों में रख दी ताकि परिवार की तात्कालिक क्षुधा मिट सके।
धैर्य रखिए, विप्रवर! जब तक उज्जयिनी में धर्म जीवित है, किसी विद्वान का कुल भूखा नहीं सोएगा।

सोमशर्मा ने काँपते हाथों से प्राचीन भूर्जपत्र निकाला, जिस पर गन्धमादन पर्वत पर स्थित चिन्तामणि रत्न का मानचित्र अंकित था।
इस रत्न से सात पीढ़ियों की दरिद्रता नष्ट हो सकती है, किंतु गन्धमादन का मार्ग धधकते मरुस्थल, विषधरों और पाषाण-राक्षसों से आक्रान्त है!

विक्रमादित्य ने विप्र के कन्धों पर हाथ रखते हुए दृढ़ स्वर में कहा: 'भय त्यागिए, विप्रवर! मैं उज्जयिनी का सैनिक हूँ। मैं आपको कन्धों पर बैठाकर गन्धमादन के शिखर तक ले जाऊँगा!'
धधकता मरुस्थल और पिपासा की परीक्षा
The Burning Desert & The Thirst Trial
अरुणोदय की प्रथम किरण के साथ, विक्रमादित्य ने वृद्ध पण्डित को अपने बलिष्ठ कन्धों पर बैठाया और गन्धमादन की ओर प्रस्थान किया।
कन्धों को कसकर थाम लीजिए, विप्रवर! सूर्य ढलने से पहले हमें पहली घाटी पार करनी है।

बारह दिनों तक धधकते अंगारों जैसी तप्त बालू पर विक्रमादित्य अनवरत चलते रहे; पैरों में छाले पड़ गए और ग्रीष्म की लू से कण्ठ सूख गया, किंतु मुख पर लेशमात्र भी क्लेश न था।

मरुस्थल के मध्य जब सोमशर्मा प्यास से अचेत होने लगे, तो एक सूखे बबूल की छाँव में बैठकर विक्रमादित्य ने अपने तुम्बे का अन्तिम जल पण्डित के होठों में उँडेल दिया और स्वयं तृषा सहते रहे।

सोमशर्मा ने गद्गद होकर कहा: 'हे वीर! स्वयं प्यासे रहकर तुमने प्राण-रक्षक जल मुझे दे दिया! तुम्हारे भीतर कौन-सा देवत्व निवास करता है?'
तुम मनुष्य नहीं, साक्षात् धर्म के अवतार हो!

विक्रमादित्य ने मुस्कुराकर कहा: 'जल पीजिए, भ्राता। क्षत्रिय का बल जल से नहीं, शरणागत की रक्षा के संकल्प से पुष्ट होता है।' सामने गन्धमादन के काले पर्वत दिखाई देने लगे।

मरुभूमि पार कर वे गन्धमादन पर्वत की तलहटी में पहुँचे; आकाश छूती काली पाषाण-शृंखलाएँ गन्धक के विषैले धूम्र और फुंकारते विषधरों से आक्रान्त थीं।
पाषाण-राक्षस वज्रदन्त का संहार
The Slaying of the Stone Guardian
संकरी कगारों और अगाध खाइयों के ऊपर विक्रमादित्य वृद्ध पण्डित को अपनी पीठ पर साधे, निर्भय छलाँगें लगाते हुए शिखर-द्वार की ओर बढ़े।

सहसा चट्टानें थरथराईं और चार विशाल पाषाण-भुजाओं वाला क्रूर दैत्य वज्रदन्त जाग उठा; हाथ में भारी शिला-मुद्गर लिए उसने गर्जना की: 'कोई नश्वर यहाँ से जीवित नहीं लौट सकता!'
गन्धमादन का मार्ग केवल मृत्यु की ओर जाता है!

विक्रमादित्य ने काँपते पण्डित को एक सुरक्षित शिला की ओट में बैठाया और म्यान से अपनी चमकती वूट्ज़ खड्ग बाहर खींच ली।

राक्षस ने अपनी वज्र-गदा से भीषण प्रहार किया, जिससे पर्वत की चट्टानें चूर-चूर होकर खाई में गिरने लगीं।

पलक झपकते ही सम्राट ने अद्भुत पैंतरे दिखाते हुए एक ही अचूक वार से राक्षस की पाषाण-गदा को चिनगारियों के साथ खण्ड-खण्ड कर दिया!
धर्म के मार्ग में पाषाण की गदा नहीं टिक सकती!

सम्राट के अतुलनीय पराक्रम और तेज के आगे पाषाण-दैत्य नतमस्तक हो गया और उसने पवित्र गुहा का मार्ग छोड़ दिया।
बर्फीला भँवर और चिंतामणि रत्न की प्राप्ति
The Icy Whirlpool Abyss & The Chintamani
शिखर पार करते ही एक अलौकिक दृश्य दिखा—वहाँ श्वेत कमलों से सुशोभित अगाध नीलम-सरोवर था, जिसके मध्य भीषण बर्फीला भँवर घूम रहा था।

भँवर के गर्भ से देदीप्यमान इन्द्रधनुषी प्रकाश-स्तम्भ आकाश की ओर उठ रहा था—वही साक्षात् मनोकामना पूर्ण करने वाला चिन्तामणि रत्न था!
वही है! वही मेरे कुल का पावन चिंतामणि रत्न है!

सोमशर्मा तट पर घुटनों के बल गिर पड़े और काँपते हुए बोले: 'वही मेरे कुल का स्वप्न है, किंतु यह जल हिम-समान शीतल है और भँवर मृत्यु का मुख है! कोई इसमें जीवित नहीं बच सकता!'

विक्रमादित्य ने पल भर का भी विलम्ब न किया; बिना किसी संकोच के वे उस हिमीभूत भँवर में छलाँग लगा गए!
सत्य और वचन की रक्षा ही क्षत्रिय का प्राण है!

प्राणघाती भँवर के प्रचण्ड खिंचाव को चीरते हुए, सम्राट अतल गहराई में उतरे और अपनी मुट्ठी में प्रज्वलित चिन्तामणि थाम ली।

विक्रमादित्य दिव्य सूर्य की भाँति जल के ऊपर प्रकट हुए, उनके हाथ में चिन्तामणि रत्न तीनों लोकों को आलोकित कर रहा था!
चिन्तामणि का सम्पूर्ण दान और परम त्याग
The Gift of Infinite Fortune
जल से बाहर आकर भीगे वस्त्रों में चमकते विक्रमादित्य ने लेशमात्र भी लोभ किए बिना, वह त्रैलोक्य-पूजित चिन्तामणि रत्न पण्डित सोमशर्मा की काँपती हथेलियों पर रख दिया!
लीजिए विप्रवर, यह रत्न घर ले जाइए। आपके कुल को कभी दारिद्र्य का दुःख नहीं सहना पड़ेगा।

सोमशर्मा अवाक होकर बोले: 'हे महाबाहु! तुमने मरुस्थल पार किया, दैत्य को मारा और बर्फीले भँवर से यह रत्न निकाला! क्या तुम इसमें से आधा भाग भी अपने लिए नहीं माँगते?'

विक्रमादित्य ने करुणा भरी मुस्कान के साथ कहा: 'विप्रवर! एक सच्चे क्षत्रिय का धर्म असहाय को प्रकाश देना है, उसके भाग्य का हरण करना नहीं। यह सम्पत्ति आपके पूर्वजों के तप की है, मेरे लोभ की नहीं।'

तभी पण्डित की दृष्टि सम्राट की अँगूली में सुशोभित राज-मुद्रिका पर पड़ी, जिस पर उज्जयिनी का राज-गरुड़ चिह्न अंकित था!
यह तो... उज्जयिनी की राज-मुद्रिका है!

सोमशर्मा चीख पड़े: 'हे प्रभु! आप कोई साधारण सैनिक नहीं, उज्जयिनी के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हैं! हाय विधाता! मैंने सम्पूर्ण आर्यावर्त के अधिपति को भारवाहक बना दिया!'

विक्रमादित्य ने उन्हें उठाकर गले लगाया: 'संकोच मत कीजिए, मित्र। प्रजा की सेवा ही राजा का सर्वोच्च धर्म है।' सम्राट ने स्वयं पण्डित को सकुशल उज्जयिनी पहुँचाया।
रत्नमञ्जरी का निर्णय और राजा भोज की विनम्रता
Ratnamanjari
कथा समाप्त कर, पुतली रत्नमञ्जरी ने राजा भोज को ललकारा: 'अब कहो, राजा भोज! क्या तुमने कभी अपने प्राण संकट में डालकर किसी याचक के लिए ऐसा अतुलनीय रत्न प्राप्त किया और स्वयं एक कौड़ी भी न ली?'
यदि तुम्हारे भीतर विक्रमादित्य जैसा निष्काम त्याग है, तो इस पहली सीढ़ी पर चरण रखो! अन्यथा लौट जाओ!

पुतली की वाणी से राजा भोज का मस्तक लज्जा से झुक गया; उनका समस्त अभिमान क्षण भर में तिरोहित हो गया।
देवि, मुझमें ऐसा त्याग नहीं है। मैं अभी इस सिंहासन के योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज पहली सीढ़ी से नीचे उतर आए और उन्होंने अपने मन्त्रियों को राजकोष के द्वार खोलकर निर्धनों में अन्न, वस्त्र और स्वर्ण वितरित करने की आज्ञा दी!
राजकोष के द्वार खोल दिए जाएँ! मालवा में कोई भूखा न रहे!

राजा भोज की विनम्रता देखकर पुतली रत्नमञ्जरी मुस्कुराई और उसका सजीव तेज धीरे-धीरे पुनः शान्त कांस्य-मूर्ति में विलीन हो गया।

संध्या के शंख गूँज उठे, रत्नमञ्जरी मौन हो गई, और सिंहासन बत्तीसी का प्रथम दिवस सम्पन्न हुआ।

राजा भोज उपवास और ईश्वर-प्रार्थना में लीन होकर अगले प्रभात की प्रतीक्षा करने लगे, जब दूसरी पुतली चित्रलेखा अपना आह्वान प्रस्तुत करेगी।