चतुर्थ पुतली कामकन्दला: माधवानल का संगीत, सुवर्ण-वृष्टि और कला-पारखी विक्रमादित्य
The Fourth Statue: Kamakandala & The Gold-Raining Cloud
चतुर्थ सूर्योदय और कामकन्दला का प्रबोधन
The Fourth Dawn & Kamakandala
चतुर्थ प्रभात की स्वर्णिम रश्मियों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपना उपवास पूर्ण किया।

केसरिया रेशमी वस्त्र धारण कर राजा भोज मन्द-मन्द चरणों से चौथी सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा ने चौथा चरण उठाया, संगमरमर का फर्श माणिक्य-लाल और स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से धधक उठा!

चौथी कांस्य-पुतली—कामकन्दला—की माणिक आँखें खुलीं और वह वीणा-झंकार-जैसी मधुर हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस चौथी सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने विनीत भाव से हाथ जोड़े और सुवर्ण वीणा धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे कामकन्दला देवि! विक्रमादित्य के किस कला-प्रेम और त्याग की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

कामकन्दला ने वीणा के तारों को झंकृत कर दिव्य वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसी कला-पारखी दृष्टि और उदारता है, जब उन्होंने निष्कासित गन्धर्व-कलाकार माधवानल और नृत्यांगना कामकन्दला के शुद्ध प्रेम के लिए पूरे राज्य पर स्वर्ण की वर्षा करा दी थी?
निष्कासित वीणा-वादक माधवानल और मध्यरात्रि उज्जयिनी
The Exiled Musician Madhavanala
प्राचीन उज्जयिनी में महाकाल मन्दिर के शिला-सोपानों पर निष्कासित विद्वान् कवि एवं वीणा-वादक माधवानल अश्रु बहाते हुए वीणा बजा रहे थे।
हे महाकाल! क्या कला का कोई मूल्य नहीं? क्या ईर्ष्यालु राजाओं के भय से सत्य का स्वर सदा मूक रहेगा?

उनकी वीणा के स्वर इतने अलौकिक थे कि वन के मृग और पक्षी मन्त्र-मुग्ध होकर मौन भाव से उनके चारों ओर एकत्र हो गए।

मध्यरात्रि में नगर-भ्रमण करते हुए सम्राट विक्रमादित्य उस अद्वितीय गान्धर्व-संगीत को सुनकर स्तब्ध रह गए।

विक्रमादित्य ने युवा विद्वान् को आदरपूर्वक सम्बोधित किया और उनके निष्कासन का दुःखद वृत्तान्त सुना।

माधवानल ने कहा: 'कामावती नगरी में अनुपम नृत्यांगना कामकन्दला रहती हैं; हम दोनों की आत्माएँ संगीत से जुड़ी हैं, परन्तु अहंकारी राजा कामसेन ने उन्हें बन्दिनी बना रखा है!'

विक्रमादित्य ने अभय-मुद्रा में कहा:
सच्ची कला और निष्कलंक प्रेम कभी पराजित नहीं हो सकते! मैं स्वयं तुम्हारे साथ कामावती चलूँगा!
कामावती का राजदरबार और भ्रमर-नृत्य की सूक्ष्म परीक्षा
The Secret Dance & The Rhythmic Bee Test
कामावती के भव्य राजसभा में राजा कामसेन के समक्ष महा-नृत्यांगना कामकन्दला का शास्त्रीय नृत्य आरम्भ हुआ।

कामकन्दला के घुँघरुओं की झंकार और मृदंग के ताल का ऐसा अद्भुत समन्वय था कि पूरी राजसभा सम्मोहित हो उठी।

नृत्य के मध्य एक काला भौंरा उनकी कंचुकी में प्रविष्ट हो गया; बिना ताल तोड़े, कामकन्दला ने श्वास-बल और कंधे की सूक्ष्म गति से भौंरे को बाहर निकाल दिया!

सहस्रों दर्शकों में केवल माधवानल ने उस अलौकिक श्वास-नियन्त्रण को पहचाना और उठकर अपनी अन्तिम स्वर्ण-मुद्रा उनके चरणों में समर्पित कर दी!
अद्भुत! श्वास और ताल का ऐसा दिव्य योग केवल स्वर्ग की अप्सरा ही सिद्ध कर सकती है!

राजा कामसेन अहंकार में गरज उठा: 'एक दरिद्र भिक्षुक की यह मजाल कि राजा से पहले मेरी राज-नर्तकी को पुरस्कृत करे?!'
सैनिको! इस उद्दण्ड भिक्षुक को कारागार में डालो और प्रातःकाल प्राणदण्ड दो!

सशस्त्र प्रहरियों ने माधवानल को घेर लिया, जबकि कामकन्दला अश्रुपूरित नेत्रों से काँप उठीं।
सम्राट विक्रमादित्य का प्राकट्य और कामावती में सुवर्ण-वृष्टि
Vikramaditya
उसी क्षण विक्रमादित्य ने अपना साधारण वस्त्र उतार फेंका और चक्रवर्ती सम्राट के अदम्य तेज के साथ राजसभा के मध्य आ खड़े हुए!
ठहरो, कामसेन! सच्चे कला-पारखी का सम्मान करना राजा का धर्म है, अहंकार में दण्ड देना नहीं!

विक्रमादित्य ने पूरी सभा के सम्मुख भ्रमर और श्वास-संचालन का वह गुप्त रहस्य प्रकट किया जिसे मूर्ख राजा न समझ सका था।

कामसेन ने कुटिलता से कहा: 'यदि इस भिखारी की कला इतनी मूल्यवान है, तो क्या तुम्हारी बातें मेरे राजकोष को सोने से भर सकती हैं?'
स्वर्ण दो, अन्यथा यह कवि कल का सूर्य नहीं देखेगा!

विक्रमादित्य ने दाहिना हाथ उठाया और वेताल-सिद्धि तथा मेघ-मन्त्रों का सस्वर आह्वान किया!

राजप्रासाद के ऊपर देदीप्यमान सुवर्ण-मेघ घिर आए और कामावती के पूरे सभा-भवन में लाखों चमचमाती स्वर्ण-मुद्राओं की घनघोर वृष्टि होने लगी!

राजा कामसेन और समस्त दरबारी भय और विस्मय से काँपते हुए सोने के ढेरों के बीच घुटनों के बल गिर पड़े!
क्षमा करें, हे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य! मेरी आँखें आपके पावन तेज से खुल गई हैं!
माधवानल-कामकन्दला का पावन परिणय और सम्राट का निस्पृह दान
The Sacred Union of Lovers
राजा कामसेन ने हाथ जोड़कर सम्राट के चरणों में क्षमा-याचना की और कामकन्दला को बन्धन-मुक्त कर दिया।

कामकन्दला अश्रु-विगलित नयनों से आगे बढ़ीं और माधवानल के चरणों में नमन किया।
आपके संगीत और सम्राट के धर्म ने आज मुझे नया जीवन प्रदान किया है!

सम्राट विक्रमादित्य ने मन्द मुस्कान से दोनों निष्कलंक कलाकारों के हाथ मिलाए और चमेली के पुष्पों से उनका अभिषेक किया।
जहाँ कला और प्रेम शुद्ध हों, वहाँ देवत्व स्वयं पहरा देता है! तुम दोनों का परिणय अमर रहेगा!

विक्रमादित्य ने दोनों को उज्जयिनी में एक भव्य सुवर्ण-प्रासाद और जीवन-पर्यन्त का राजसी सम्मान प्रदान किया, स्वयं के लिए कुछ न माँगा।

कामावती और उज्जयिनी की प्रजा ने शुद्ध प्रेम और दिव्य कला की विजय का महा-उत्सव मनाया।

उत्सव के कोलाहल के बीच सम्राट विक्रमादित्य मौन भाव से अपनी राजधानी लौट आए; उनका हृदय परोपकार के आनन्द से परिपूर्ण था।
कामकन्दला का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Kamakandala
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली कामकन्दला ने राजा भोज को गम्भीर दृष्टि से देखा।

कामकन्दला ने अन्तिम चुनौती प्रस्तुत की:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी कला के सम्मान हेतु अपना सर्वस्व दाँव पर लगाया है, सोने की वर्षा कराकर दो प्रेमियों को मिलाया है और अपने लिए एक नर्तकी भी नहीं माँगी? यदि ऐसा त्याग है, तो कदम बढ़ाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसी अलौकिक कला-दृष्टि और निःस्वार्थ त्याग नहीं है, देवि। मैं इस चौथी सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज चौथी सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा के सभी कवियों, गायकों और शिल्पियों को राजसी वृत्ति देने का आदेश दिया।

कला-भवनों और संगीत-शालाओं की स्थापना कर कलाकारों को अभय-दान दिया गया।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और कामकन्दला मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का चौथा दिन सम्पन्न हुआ!**
कल प्रातःकाल मैं पाँचवीं सीढ़ी पर चरण रखूँगा और पाँचवीं पुतली—लीलावती—की अमर गाथा सुनूँगा!