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तृतीय पुतली चन्द्रकला: खोया हुआ दिव्य मुक्ता-हार, समुद्र-यात्रा और घड़ियाल का उद्धार

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

तृतीय पुतली चन्द्रकला: खोया हुआ दिव्य मुक्ता-हार, समुद्र-यात्रा और घड़ियाल का उद्धार

The Third Statue: Chandrakala & The Ocean Quest

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दृश्य 1

तृतीय सूर्योदय और चन्द्रकला का प्रबोधन

The Third Dawn & Chandrakala
Morning rays reflect off polished marble as King Bhoja approaches the 32-step throne

तृतीय प्रभात की स्वर्णिम रश्मियों ने धारानगरी के संगमरमरी सभा-भवन को जगमगा दिया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपना उपवास पूर्ण किया।

Panel 1
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King Bhoja in regal saffron robes ascends to the third step of the golden throne

केसरिया परिधान में राजा भोज मन्द-मन्द चरणों से तीसरी सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
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The dais vibrates with brilliant sapphire-blue and golden lunar radiance

जैसे ही राजा का चरण तीसरी सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी नील-मणि और चन्द्र-कान्त प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

Panel 3
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The third carved statue Chandrakala opens her glowing sapphire-blue eyes, laughing musically
पुतली चन्द्रकला
ठहरो, राजा भोज! इस तीसरी सीढ़ी पर पग धरने का साहस मत करो!

तीसरी कांस्य-पुतली—चन्द्रकला—की नीलमणि आँखें खुलीं और वह मन्दिर के घण्टों-जैसी मधुर हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली चन्द्रकला

ठहरो, राजा भोज! इस तीसरी सीढ़ी पर पग धरने का साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja pauses in reverence with folded hands, admiring the living celestial bronze maiden
राजा भोज
हे चन्द्रकला देवि! विक्रमादित्य के किस पावन पराक्रम का रहस्य आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और चन्द्र-मुकुट धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे चन्द्रकला देवि! विक्रमादित्य के किस पावन पराक्रम का रहस्य आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Chandrakala speaks: 'Do you possess the ocean courage and compassion of Vikramaditya?'
पुतली चन्द्रकला
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा अगाध समुद्र-साहस है, जब उन्होंने एक उजड़े हुए व्यापारी का सर्वस्व लौटाने के लिए महासागर के दैत्य-मकर के मुख में बिना अस्त्र के छलांग लगा दी थी?

चन्द्रकला ने चन्द्र-चिह्न उठाकर दिव्य वाणी में कहा:

पुतली चन्द्रकला

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा अगाध समुद्र-साहस है, जब उन्होंने एक उजड़े हुए व्यापारी का सर्वस्व लौटाने के लिए महासागर के दैत्य-मकर के मुख में बिना अस्त्र के छलांग लगा दी थी?

Panel 6
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दृश्य 2

उज्जयिनी राजदरबार और उजड़े हुए वणिक की पुकार

The Ruined Maritime Merchant of Sopara
Merchant Shrivatsa kneels in tears before Vikramaditya on his royal throne
व्यापारी श्रीवत्स
महाराज! समुद्र के महा-मकर ने मेरा सर्वस्व निगल लिया! अब मेरे पास केवल कारागार या मृत्यु शेष है!

प्राचीन उज्जयिनी के राजदरबार में ताम्रलिप्ति का प्रसिद्ध समुद्री व्यापारी श्रीवत्स फटे वस्त्रों में अश्रु बहाता हुआ उपस्थित हुआ।

व्यापारी श्रीवत्स

महाराज! समुद्र के महा-मकर ने मेरा सर्वस्व निगल लिया! अब मेरे पास केवल कारागार या मृत्यु शेष है!

Panel 7
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Merchant Shrivatsa explains how his fleet was wrecked near the whirlpool of Sopara

श्रीवत्स ने बताया कि उसने सिंहल द्वीप से अनमोल 'कौस्तुभ-मुक्ताहार' खरीदा था, परन्तु शूर्पारक के निकट समुद्र-राक्षस ने उसके पोत को तोड़ डाला।

Panel 8
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The merchant weeps: 'The monster swallowed the iron chest containing the pearls!'

व्यापारी विलाप करने लगा: 'राक्षस ने मुक्ताओं से भरा लोहे का सन्दूक साबुत निगल लिया!'

Panel 9
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Vikramaditya places a comforting hand on the merchant's shoulder with noble resolve
सम्राट विक्रमादित्य
धैर्य रखो, श्रीवत्स! मैं स्वयं रत्नाकर की गहराइयों में जाकर तुम्हारा मुक्ता-हार वापस लाऊँगा!

विक्रमादित्य ने सिंहासन से उतरकर व्यापारी के कंधे पर हाथ रखा:

सम्राट विक्रमादित्य

धैर्य रखो, श्रीवत्स! मैं स्वयं रत्नाकर की गहराइयों में जाकर तुम्हारा मुक्ता-हार वापस लाऊँगा!

Panel 10
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At the port of Sopara, Vikramaditya disguised in sailor's tunic inspects a swift sea vessel
सम्राट विक्रमादित्य
लंगर उठाओ और दक्षिण की दिशा में पाल तानो! हम मकर-द्वीप की ओर प्रस्थान करते हैं!

शूर्पारक (सोपारा) के प्राचीन बन्दरगाह पर नाविक का वेश धरकर विक्रमादित्य ने एक द्रुतगामी समुद्री पोत का निरीक्षण किया।

सम्राट विक्रमादित्य

लंगर उठाओ और दक्षिण की दिशा में पाल तानो! हम मकर-द्वीप की ओर प्रस्थान करते हैं!

Panel 11
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The royal ship raises its saffron silk sails, sailing out into the deep azure waters
पोताध्यक्ष
वायु अनुकूल है, वीर नाविक! रत्नाकर की कृपा से हम शीघ्र लक्ष्य तक पहुँचेंगे!

केसरिया रेशमी पाल तानकर पोत अगाध हिन्द महासागर (रत्नाकर) की उत्ताल तरंगों में उतर गया।

पोताध्यक्ष

वायु अनुकूल है, वीर नाविक! रत्नाकर की कृपा से हम शीघ्र लक्ष्य तक पहुँचेंगे!

Panel 12
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दृश्य 3

महासागरीय झंझावात और मकर-द्वीप का संहारक रूप

The Ocean Tempest & Makara-Dweepa
The ship navigates the vast southern sea under ominous dark storm clouds

कई दिनों तक पोत दक्षिण सागर में आगे बढ़ता रहा, जहाँ क्षितिज पर घनघोर श्याम मेघ मँडराने लगे।

Panel 13
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A violent midnight hurricane strikes the ship with massive turquoise waves crashing

मध्यरात्रि में भयानक समुद्री चक्रवात आया; पर्वत-जैसी ऊँची लहरें काष्ठ के पोत पर प्रहार करने लगीं और विद्युत कौंध उठी!

Panel 14
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While the crew panics, Vikramaditya grips the wooden rudder with unshakeable calm
सम्राट विक्रमादित्य
पतवार पर डटे रहो, भाइयो! धर्म जिसकी नौका हो, उसे समुद्र भी नहीं डुबो सकता!

जब नाविक भय से त्राहि-त्राहि कर रहे थे, तब विक्रमादित्य ने अचल योग-बल से पतवार थाम ली और पोत को भँवरों से सुरक्षित निकाल लिया।

सम्राट विक्रमादित्य

पतवार पर डटे रहो, भाइयो! धर्म जिसकी नौका हो, उसे समुद्र भी नहीं डुबो सकता!

Panel 15
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Dawn breaks over the treacherous black coral reef of Makara-Dweepa

उषाकाल में पोत 'मकर-द्वीप' की काली प्रवाल-चट्टानों के पास पहुँचा, जहाँ समुद्र का जल खौल रहा था।

Panel 16
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From the churning ocean waves, the giant ancient crocodile emerges with a roar

अचानक खौलती लहरों को चीरकर पचास हाथ लम्बा प्राचीन दैत्य-मकर 'जलग्रीव' भयंकर गर्जना के साथ बाहर निकला!

Panel 17
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Sailors draw harpoons, but Vikramaditya commands them to stand down
सम्राट विक्रमादित्य
शस्त्र मत चलाओ! यह जल-जीव किसी प्राचीन शाप की पीड़ा से व्याकुल है! हिंसा से धर्म सिद्ध नहीं होता!

सैनिकों ने भाले और धनुष तान लिए, परन्तु विक्रमादित्य ने शस्त्र रोकने की आज्ञा दी:

सम्राट विक्रमादित्य

शस्त्र मत चलाओ! यह जल-जीव किसी प्राचीन शाप की पीड़ा से व्याकुल है! हिंसा से धर्म सिद्ध नहीं होता!

Panel 18
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दृश्य 4

मकर-मुख में निडर प्रवेश और कण्ठ-पीड़ा का निवारण

The Fearless Leap & The Healing of Jala-Griva
Vikramaditya takes a deep breath and fearlessly leaps off the bowsprit into the jaws of the monster

गम्भीर श्वास लेकर विक्रमादित्य पोत के अग्रभाग से सीधे उस विशालकाय घड़ियाल के खुले जबड़ों में कूद गए!

Panel 19
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The crocodile's jaws snap shut, plunging into the depths while the crew watches in horror

घड़ियाल के जबड़े तड़तड़ाकर बन्द हो गए और वह विक्रमादित्य को लेकर समुद्र की अथाह गहराइयों में समा गया; नाविक स्तब्ध चीत्कार कर उठे!

Panel 20
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Inside the creature's stomach cavity, Vikramaditya spots the swallowed iron chest intact

विशाल उदर-गुहा में विक्रमादित्य ने व्यापारी का लोहे का मुक्ता-सन्दूक पसलियों के पास सुरक्षित पड़ा देखा।

Panel 21
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Vikramaditya discovers a sharp rusted iron anchor painfully pierced through the creature's throat

परन्तु उन्होंने देखा कि एक विशाल जंग लगा लौह-लंगर घड़ियाल के कण्ठ में बुरी तरह फँसा हुआ था, जिससे वह सदियों से भयंकर वेदना में था!

Panel 22
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With gentle warrior hands and herbal balm, Vikramaditya dislodges the rusted iron anchor

अत्यन्त कोमल हाथों और दिव्य औषधि के लेप से विक्रमादित्य ने बिना कोई आघात पहुँचाए उस तीखे लंगर को कण्ठ से बाहर निकाल दिया।

Panel 23
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Relieved of pain, the giant crocodile surfaces upon a moonlit white sandbar, opening its jaws wide

सदियों की वेदना से मुक्त होकर विशाल घड़ियाल शान्त भाव से एक श्वेत बालू-तट पर उभरा और मन्द मुस्कान से अपने जबड़े खोल दिए।

Panel 24
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दृश्य 5

दिव्य गन्धर्व का प्राकट्य और मुक्ता-हार का पुनः समर्पण

The Transfiguration & The Restored Pearls
Vikramaditya steps out onto the white sandbar unharmed, carrying the iron chest of glowing pearls

विक्रमादित्य अक्षत देह के साथ बालू-तट पर बाहर आए; उनकी भुजाओं में मुक्ताओं से जगमगाता लोहे का सन्दूक था।

Panel 25
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A brilliant golden light envelops the crocodile, transfiguring it into a winged Gandharva spirit

एक स्वर्णिम प्रकाश-पुञ्ज ने मकर को घेर लिया और वह वरुण के दिव्य पंखयुक्त गन्धर्व-दूत के रूप में रूपान्तरित हो गया!

Panel 26
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The celestial Gandharva bows in reverence before Vikramaditya: 'Your compassion has liberated me!'
गन्धर्व-देवता
हे धर्म-अवतार सम्राट! आपकी कीर्ति समुद्रों के पार गूँजेगी!

दिव्य गन्धर्व ने विक्रमादित्य के चरणों में नमन किया: 'आपके निःस्वार्थ उपकार ने मुझे मुक्ति दी है! मैं इन सागरों को सदा के लिए सुरक्षित करता हूँ!'

गन्धर्व-देवता

हे धर्म-अवतार सम्राट! आपकी कीर्ति समुद्रों के पार गूँजेगी!

Panel 27
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In the grand audience hall of Ujjayini, Emperor Vikramaditya summons the weeping merchant

उज्जयिनी लौटकर सम्राट विक्रमादित्य ने राजसभा में उस निराश व्यापारी श्रीवत्स को बुलवाया।

Panel 28
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Vikramaditya opens the chest, placing the glowing pearl necklace into the merchant's hands
सम्राट विक्रमादित्य
यह लो तुम्हारा मुक्ता-हार, श्रीवत्स! व्यापार करो और निर्भय होकर समुद्र पार करो!

विक्रमादित्य ने सन्दूक खोलकर वह देदीप्यमान 'कौस्तुभ-मुक्ताहार' और पाँच रथ भरकर स्वर्ण-मुद्राएँ व्यापारी को सौंप दीं!

सम्राट विक्रमादित्य

यह लो तुम्हारा मुक्ता-हार, श्रीवत्स! व्यापार करो और निर्भय होकर समुद्र पार करो!

Panel 29
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Merchant Shrivatsa prostrates in tears of overwhelming devotion: 'You braved the monster's jaws!'
व्यापारी श्रीवत्स
सम्राट नहीं, आप इस धरा के साक्षात् धर्म-स्वरूप हैं!

श्रीवत्स कृतज्ञता के अश्रुओं से सम्राट के चरणों में गिर पड़ा: 'आपने एक निर्धन वणिक के लिए महासागर के दैत्य का सामना किया!'

व्यापारी श्रीवत्स

सम्राट नहीं, आप इस धरा के साक्षात् धर्म-स्वरूप हैं!

Panel 30
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दृश्य 6

चन्द्रकला का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Chandrakala
Back in Dharanagari palace, Chandrakala looks directly at King Bhoja with sapphire-blue eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली चन्द्रकला ने राजा भोज को गम्भीर नील-नयनों से देखा।

Panel 31
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Chandrakala challenges: 'Have you ever leaped into a sea monster's jaws without weapons?'
पुतली चन्द्रकला
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी किसी व्यापारी का सर्वस्व लौटाने के लिए समुद्र-दैत्य के मुख में बिना अस्त्र के छलांग लगाई है, या अनमोल मुक्ता-हार बिना एक मोती रखे लौटाया है? यदि ऐसा त्याग है, तो कदम बढ़ाओ!

चन्द्रकला ने अन्तिम चुनौती दी:

पुतली चन्द्रकला

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी किसी व्यापारी का सर्वस्व लौटाने के लिए समुद्र-दैत्य के मुख में बिना अस्त्र के छलांग लगाई है, या अनमोल मुक्ता-हार बिना एक मोती रखे लौटाया है? यदि ऐसा त्याग है, तो कदम बढ़ाओ!

Panel 32
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King Bhoja lowers his head in deep humility, acknowledging Vikramaditya's valor
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अगाध समुद्र-साहस और निःस्वार्थ त्याग नहीं है, देवि। मैं इस तीसरी सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसा अगाध समुद्र-साहस और निःस्वार्थ त्याग नहीं है, देवि। मैं इस तीसरी सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
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King Bhoja steps down from the third step, ordering maritime tariffs waived

राजा भोज तीसरी सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा तटीय प्रान्तों में सभी समुद्री कर माफ करने का आदेश दिया।

Panel 34
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King Bhoja issues royal decrees waiving port taxes and establishing maritime relief treasuries

व्यापारियों और नाविकों के लिए बन्दरगाहों पर विश्राम-गृह और सुरक्षा-निधियाँ स्थापित की गईं।

Panel 35
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Twilight conches sound across Dharanagari as Chandrakala smiles and returns to silent bronze
राजा भोज
कल प्रातःकाल मैं चौथी सीढ़ी पर चरण रखूँगा और चौथी पुतली—कामकन्दला—की अमर गाथा सुनूँगा!

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और चन्द्रकला मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का तीसरा दिन सम्पन्न हुआ!**

राजा भोज

कल प्रातःकाल मैं चौथी सीढ़ी पर चरण रखूँगा और चौथी पुतली—कामकन्दला—की अमर गाथा सुनूँगा!

Panel 36
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