तृतीय पुतली चन्द्रकला: खोया हुआ दिव्य मुक्ता-हार, समुद्र-यात्रा और घड़ियाल का उद्धार
The Third Statue: Chandrakala & The Ocean Quest
तृतीय सूर्योदय और चन्द्रकला का प्रबोधन
The Third Dawn & Chandrakala
तृतीय प्रभात की स्वर्णिम रश्मियों ने धारानगरी के संगमरमरी सभा-भवन को जगमगा दिया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपना उपवास पूर्ण किया।

केसरिया परिधान में राजा भोज मन्द-मन्द चरणों से तीसरी सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण तीसरी सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी नील-मणि और चन्द्र-कान्त प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

तीसरी कांस्य-पुतली—चन्द्रकला—की नीलमणि आँखें खुलीं और वह मन्दिर के घण्टों-जैसी मधुर हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस तीसरी सीढ़ी पर पग धरने का साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और चन्द्र-मुकुट धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे चन्द्रकला देवि! विक्रमादित्य के किस पावन पराक्रम का रहस्य आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

चन्द्रकला ने चन्द्र-चिह्न उठाकर दिव्य वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा अगाध समुद्र-साहस है, जब उन्होंने एक उजड़े हुए व्यापारी का सर्वस्व लौटाने के लिए महासागर के दैत्य-मकर के मुख में बिना अस्त्र के छलांग लगा दी थी?
उज्जयिनी राजदरबार और उजड़े हुए वणिक की पुकार
The Ruined Maritime Merchant of Sopara
प्राचीन उज्जयिनी के राजदरबार में ताम्रलिप्ति का प्रसिद्ध समुद्री व्यापारी श्रीवत्स फटे वस्त्रों में अश्रु बहाता हुआ उपस्थित हुआ।
महाराज! समुद्र के महा-मकर ने मेरा सर्वस्व निगल लिया! अब मेरे पास केवल कारागार या मृत्यु शेष है!

श्रीवत्स ने बताया कि उसने सिंहल द्वीप से अनमोल 'कौस्तुभ-मुक्ताहार' खरीदा था, परन्तु शूर्पारक के निकट समुद्र-राक्षस ने उसके पोत को तोड़ डाला।

व्यापारी विलाप करने लगा: 'राक्षस ने मुक्ताओं से भरा लोहे का सन्दूक साबुत निगल लिया!'

विक्रमादित्य ने सिंहासन से उतरकर व्यापारी के कंधे पर हाथ रखा:
धैर्य रखो, श्रीवत्स! मैं स्वयं रत्नाकर की गहराइयों में जाकर तुम्हारा मुक्ता-हार वापस लाऊँगा!

शूर्पारक (सोपारा) के प्राचीन बन्दरगाह पर नाविक का वेश धरकर विक्रमादित्य ने एक द्रुतगामी समुद्री पोत का निरीक्षण किया।
लंगर उठाओ और दक्षिण की दिशा में पाल तानो! हम मकर-द्वीप की ओर प्रस्थान करते हैं!

केसरिया रेशमी पाल तानकर पोत अगाध हिन्द महासागर (रत्नाकर) की उत्ताल तरंगों में उतर गया।
वायु अनुकूल है, वीर नाविक! रत्नाकर की कृपा से हम शीघ्र लक्ष्य तक पहुँचेंगे!
महासागरीय झंझावात और मकर-द्वीप का संहारक रूप
The Ocean Tempest & Makara-Dweepa
कई दिनों तक पोत दक्षिण सागर में आगे बढ़ता रहा, जहाँ क्षितिज पर घनघोर श्याम मेघ मँडराने लगे।

मध्यरात्रि में भयानक समुद्री चक्रवात आया; पर्वत-जैसी ऊँची लहरें काष्ठ के पोत पर प्रहार करने लगीं और विद्युत कौंध उठी!

जब नाविक भय से त्राहि-त्राहि कर रहे थे, तब विक्रमादित्य ने अचल योग-बल से पतवार थाम ली और पोत को भँवरों से सुरक्षित निकाल लिया।
पतवार पर डटे रहो, भाइयो! धर्म जिसकी नौका हो, उसे समुद्र भी नहीं डुबो सकता!

उषाकाल में पोत 'मकर-द्वीप' की काली प्रवाल-चट्टानों के पास पहुँचा, जहाँ समुद्र का जल खौल रहा था।

अचानक खौलती लहरों को चीरकर पचास हाथ लम्बा प्राचीन दैत्य-मकर 'जलग्रीव' भयंकर गर्जना के साथ बाहर निकला!

सैनिकों ने भाले और धनुष तान लिए, परन्तु विक्रमादित्य ने शस्त्र रोकने की आज्ञा दी:
शस्त्र मत चलाओ! यह जल-जीव किसी प्राचीन शाप की पीड़ा से व्याकुल है! हिंसा से धर्म सिद्ध नहीं होता!
मकर-मुख में निडर प्रवेश और कण्ठ-पीड़ा का निवारण
The Fearless Leap & The Healing of Jala-Griva
गम्भीर श्वास लेकर विक्रमादित्य पोत के अग्रभाग से सीधे उस विशालकाय घड़ियाल के खुले जबड़ों में कूद गए!

घड़ियाल के जबड़े तड़तड़ाकर बन्द हो गए और वह विक्रमादित्य को लेकर समुद्र की अथाह गहराइयों में समा गया; नाविक स्तब्ध चीत्कार कर उठे!

विशाल उदर-गुहा में विक्रमादित्य ने व्यापारी का लोहे का मुक्ता-सन्दूक पसलियों के पास सुरक्षित पड़ा देखा।

परन्तु उन्होंने देखा कि एक विशाल जंग लगा लौह-लंगर घड़ियाल के कण्ठ में बुरी तरह फँसा हुआ था, जिससे वह सदियों से भयंकर वेदना में था!

अत्यन्त कोमल हाथों और दिव्य औषधि के लेप से विक्रमादित्य ने बिना कोई आघात पहुँचाए उस तीखे लंगर को कण्ठ से बाहर निकाल दिया।

सदियों की वेदना से मुक्त होकर विशाल घड़ियाल शान्त भाव से एक श्वेत बालू-तट पर उभरा और मन्द मुस्कान से अपने जबड़े खोल दिए।
दिव्य गन्धर्व का प्राकट्य और मुक्ता-हार का पुनः समर्पण
The Transfiguration & The Restored Pearls
विक्रमादित्य अक्षत देह के साथ बालू-तट पर बाहर आए; उनकी भुजाओं में मुक्ताओं से जगमगाता लोहे का सन्दूक था।

एक स्वर्णिम प्रकाश-पुञ्ज ने मकर को घेर लिया और वह वरुण के दिव्य पंखयुक्त गन्धर्व-दूत के रूप में रूपान्तरित हो गया!

दिव्य गन्धर्व ने विक्रमादित्य के चरणों में नमन किया: 'आपके निःस्वार्थ उपकार ने मुझे मुक्ति दी है! मैं इन सागरों को सदा के लिए सुरक्षित करता हूँ!'
हे धर्म-अवतार सम्राट! आपकी कीर्ति समुद्रों के पार गूँजेगी!

उज्जयिनी लौटकर सम्राट विक्रमादित्य ने राजसभा में उस निराश व्यापारी श्रीवत्स को बुलवाया।

विक्रमादित्य ने सन्दूक खोलकर वह देदीप्यमान 'कौस्तुभ-मुक्ताहार' और पाँच रथ भरकर स्वर्ण-मुद्राएँ व्यापारी को सौंप दीं!
यह लो तुम्हारा मुक्ता-हार, श्रीवत्स! व्यापार करो और निर्भय होकर समुद्र पार करो!

श्रीवत्स कृतज्ञता के अश्रुओं से सम्राट के चरणों में गिर पड़ा: 'आपने एक निर्धन वणिक के लिए महासागर के दैत्य का सामना किया!'
सम्राट नहीं, आप इस धरा के साक्षात् धर्म-स्वरूप हैं!
चन्द्रकला का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Chandrakala
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली चन्द्रकला ने राजा भोज को गम्भीर नील-नयनों से देखा।

चन्द्रकला ने अन्तिम चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी किसी व्यापारी का सर्वस्व लौटाने के लिए समुद्र-दैत्य के मुख में बिना अस्त्र के छलांग लगाई है, या अनमोल मुक्ता-हार बिना एक मोती रखे लौटाया है? यदि ऐसा त्याग है, तो कदम बढ़ाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अगाध समुद्र-साहस और निःस्वार्थ त्याग नहीं है, देवि। मैं इस तीसरी सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज तीसरी सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा तटीय प्रान्तों में सभी समुद्री कर माफ करने का आदेश दिया।

व्यापारियों और नाविकों के लिए बन्दरगाहों पर विश्राम-गृह और सुरक्षा-निधियाँ स्थापित की गईं।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और चन्द्रकला मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का तीसरा दिन सम्पन्न हुआ!**
कल प्रातःकाल मैं चौथी सीढ़ी पर चरण रखूँगा और चौथी पुतली—कामकन्दला—की अमर गाथा सुनूँगा!