एकोनत्रिंशति पुतली मानवती: शापग्रस्त गन्धर्व, दावाग्नि का संहार और सम्राट का जीवन-कवच
The Twenty-Ninth Statue: Manavati & The Raging Forest Fire
उनतीसवाँ सूर्योदय और मानवती का प्रबोधन
The Twenty-Ninth Dawn & Manavati
उनतीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से उनतीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण उनतीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी सूर्य-माणिक्य और अग्नि-स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

उनतीसवीं कांस्य-पुतली—मानवती—की माणिक्य-नयन खुले और वह सुवर्ण-मयूर-दण्ड व अग्नि-मणि हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस उनतीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और मयूर-दण्ड धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे मानवती देवि! विक्रमादित्य के किस अरण्य-रक्षण और अग्नि-विजयी आत्म-बलिदान की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

मानवती ने मयूर-दण्ड उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा अरण्य-रक्षण, मूक जीवों हेतु जलती दावाग्नि में कूद पड़ने का साहस और वरुणास्त्र के संधान का आत्म-तेज है, जब उन्होंने सौ योजन के दावानल में एक घायल शापग्रस्त पक्षी को बचाने हेतु अपना शरीर ढाल बना दिया?
विन्ध्याचल का महा-दावानल और शापग्रस्त सुवर्ण-पक्षी
The Cursed Gandharva & The Raging Wildfire
विन्ध्याचल के गहन अरण्य में ग्रीष्मकाल की प्रचण्ड धूप से बाँस और सागौन के विशाल वन सूखकर काष्ठ बन चुके थे।

एक प्राचीन वटवृक्ष के कोटर में गन्धर्व चित्राङ्गद एक ऋषि के शापवश पंख-विहीन सुवर्ण-पक्षी बनकर असहाय बैठा था।
हे विधाता! क्या मेरा यह जीवन इस शाप की अग्नि में ही समाप्त होगा?!

अचानक पर्वतीय शिखरों पर सूखी बिजली गिरी; एक प्रचण्ड तड़ित-आघात ने सूखे बाँसों में भीषण आग भड़का दी!

देखते ही देखते चालीस फुट ऊँची ज्वालाओं की दीवार ने सौ योजन के वन को घेर लिया; गगनचुम्बी काला धुआँ आकाश में छा गया!

हज़ारों हरिण, मयूर, वानर और नन्हे वन्यजीव प्राण बचाने हेतु चीत्कार करते हुए पथरीली घाटियों की ओर भागे।

सीमावर्ती पहाड़ियों पर अश्व पर सवार सम्राट विक्रमादित्य ने पर्वत-माला को भस्म करती हुई दावानल की विकराल ज्वालाओं को देखा!
वन और उसके मूक जीव संकट में हैं! सम्राट का धर्म केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है!
ज्वालाओं में सम्राट का प्रवेश और मूक जीवों का उद्धार
The Sovereign Charges into the Inferno
सम्राट ने अपने सैनिकों को पीछे रुकने की आज्ञा दी और तलवार खींचकर अकेले ही ज्वालाओं की ओर अश्व दौड़ा दिया!

अश्व से कूदकर सम्राट ने भीगा हुआ ऊनी कम्बल अपने कवच पर लपेटा और सीधे धधकते नरक जैसे दावानल में छलाँग लगा दी!
हे अग्निदेव! इन निर्दोष जीवों का मार्ग छोड़ दो!

सम्राट ने भयभीत मृग-शावकों और नन्हे पक्षियों को अपनी भुजाओं में समेटकर एक सुरक्षित पथरीली जल-धारा की ओर पहुँचाया।
शीघ्र भागो, शावकों! जल-धारा के पार जाओ!

ऊँची चट्टान पर जलते हुए वटवृक्ष से एक अलौकिक सुवर्ण-पक्षी की हृदय-विदारक चीत्कार गूँज उठी!
बचाओ! यह अग्नि मुझे भस्म कर रही है!

वटवृक्ष चारों ओर से आग के विशाल बवंडर से घिर चुका था; पत्तियाँ और शाखाएँ चटककर जलते अंगारों की भाँति गिर रही थीं!
मैं आ रहा हूँ! धैर्य रखो!

बिना किसी हिचकिचाहट के सम्राट विक्रमादित्य बरसते अंगारों के बीच उस जलते हुए तने पर चढ़ने लगे!
धैर्य रखो, पक्षी-राज! जब तक विक्रमादित्य के प्राण हैं, तुम्हारी रक्षा होगी!
सम्राट की छाती की ढाल और वरुणास्त्र का महा-मन्त्र
The Living Shield & The Varunastra Invocation
वृक्ष के कोटर में पहुँचकर सम्राट ने थरथराते सुवर्ण-पक्षी और नन्हीं गौरैयों को देखा जो धुएँ से अचेत हो रही थीं।

सम्राट ने दोनों भुजाओं से कोटर को घेर लिया और अपनी वज्र-समान योद्धा-छाती को पक्षियों के ऊपर जीवन-कवच बना दिया!
डरो मत, नन्हें प्राणों! यह क्षत्रिय की देह तुम्हारी ढाल है!

तभी एक भारी जलती हुई शाखा गिरी; विक्रमादित्य ने वह भयानक आघात और धधकते अंगारे स्वयं अपनी पीठ और कन्धों पर झेल लिए!

देह के झुलसने और रक्त बहने पर भी विचलित हुए बिना सम्राट ने खड्ग आकाश की ओर उठाया और 'वरुण-गायत्री' का ध्यान किया!

खड्ग की धार पर नीलमणि और फ़िरोज़ी दिव्य विद्युत कौंधने लगी; सम्राट के कण्ठ से पावन मन्त्र गूँजा: 'ॐ जलविम्वाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नो वरुणः प्रचोदयात्!'
हे वरुण देव! इस अरण्य और इसके मूक जीवों की रक्षा हेतु अमृत-वृष्टि करो!

आकाश में बादलों का प्रचण्ड चक्रवात घुमड़ उठा और दिव्य 'वरुणास्त्र' की शीतल जल-धाराएँ उमड़ पड़ीं!
दावानल का शमन, गन्धर्व का शाप-मोक्ष और अमृत-वर्षा
Extinguishing the Wildfire & The Gandharva
मूसलाधार अमृत-वृष्टि ने देखते ही देखते सौ योजन के विकराल दावानल को शान्त कर दिया; धधकती धरती शीतल व सुगन्धित हो गई!

जैसे ही दिव्य जल-बिन्दु सम्राट की छाती के नीचे दबे सुवर्ण-पक्षी पर पड़े, एक तीव्र श्वेत प्रकाश के साथ पाँच सौ वर्ष पुराना शाप टूट गया!

पक्षी के स्थान पर दिव्य मुकुटधारी, रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित अलौकिक गन्धर्व राजपुत्र—'चित्राङ्गद'—प्रकट हुए!

गन्धर्व ने अश्रुओं से सम्राट के झुलसे चरणों को स्पर्श किया: 'पाँच सौ वर्षों से देवता भी इस अग्नि में नहीं उतरे, परन्तु एक नश्वर सम्राट ने पक्षी हेतु अपनी देह जला दी!'
हे चक्रवर्ती! आप केवल मनुष्यों के नहीं, सम्पूर्ण प्रकृति के रक्षक हैं!

चित्राङ्गद ने 'गन्धर्व-अमृत' का छिड़काव किया; सम्राट के घाव और फफोले पल भर में चन्दन के समान शीतल होकर पूर्णतः स्वस्थ हो गए!

हज़ारों बचाए गए मृग, मयूर और वन्यजीव सम्राट के चारों ओर आनन्द से एकत्र हो गए; सम्पूर्ण विन्ध्याचल में नव-जीवन का उत्सव गूँज उठा!
मानवती का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Manavati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली मानवती ने राजा भोज को गम्भीर माणिक्य-नयनों से देखा।

मानवती ने उनतीसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी सौ योजन की जलती दावाग्नि में कूदकर किसी मूक पक्षी को बचाने हेतु अपने शरीर को झुलसाया है? यदि ऐसा अरण्य-प्रेम और आत्म-बलिदान तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अरण्य-रक्षण, मूक जीवों हेतु जलती आग में कूदने का अगाध शौर्य और वरुणास्त्र के संधान का आत्म-तेज नहीं है, देवि। मैं इस उनतीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज उनतीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में वन-दावानल रक्षा दल, वन्यजीव आपातकालीन गलियारे और अरण्य-संरक्षण न्यास स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में वनों की अग्नि से सुरक्षा और घायल पशु-पक्षियों के निःशुल्क उपचार हेतु राजसी चिकित्सालय खोले गए।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और मानवती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का उनतीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष तीन कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, तीसवीं पुतली (जयलक्ष्मी) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज अरण्य-रक्षण और मूक जीवों के प्रति करुणा को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम तीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और तीसवीं पुतली—जयलक्ष्मी—की अमर गाथा सुनेंगे!"