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एकोनत्रिंशति पुतली मानवती: शापग्रस्त गन्धर्व, दावाग्नि का संहार और सम्राट का जीवन-कवच

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

एकोनत्रिंशति पुतली मानवती: शापग्रस्त गन्धर्व, दावाग्नि का संहार और सम्राट का जीवन-कवच

The Twenty-Ninth Statue: Manavati & The Raging Forest Fire

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दृश्य 1

उनतीसवाँ सूर्योदय और मानवती का प्रबोधन

The Twenty-Ninth Dawn & Manavati
Morning sunlight streams across the sandstone colonnade onto the 32-step golden throne

उनतीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
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King Bhoja in sacred saffron silks approaches the twenty-ninth step of the throne

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से उनतीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
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The marble dais erupts with brilliant solar-ruby and fiery golden radiance

जैसे ही राजा का चरण उनतीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी सूर्य-माणिक्य और अग्नि-स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

Panel 3
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The twenty-ninth carved statue Manavati opens her glowing ruby eyes, laughing musically
पुतली मानवती
ठहरो, राजा भोज! इस उनतीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

उनतीसवीं कांस्य-पुतली—मानवती—की माणिक्य-नयन खुले और वह सुवर्ण-मयूर-दण्ड व अग्नि-मणि हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली मानवती

ठहरो, राजा भोज! इस उनतीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja halts in deep reverence with folded hands, gazing at the living bronze maiden
राजा भोज
हे मानवती देवि! विक्रमादित्य के किस अरण्य-रक्षण और अग्नि-विजयी आत्म-बलिदान की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और मयूर-दण्ड धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे मानवती देवि! विक्रमादित्य के किस अरण्य-रक्षण और अग्नि-विजयी आत्म-बलिदान की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Manavati speaks: 'Do you possess the environmental self-sacrifice of Vikramaditya?'
पुतली मानवती
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा अरण्य-रक्षण, मूक जीवों हेतु जलती दावाग्नि में कूद पड़ने का साहस और वरुणास्त्र के संधान का आत्म-तेज है, जब उन्होंने सौ योजन के दावानल में एक घायल शापग्रस्त पक्षी को बचाने हेतु अपना शरीर ढाल बना दिया?

मानवती ने मयूर-दण्ड उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली मानवती

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा अरण्य-रक्षण, मूक जीवों हेतु जलती दावाग्नि में कूद पड़ने का साहस और वरुणास्त्र के संधान का आत्म-तेज है, जब उन्होंने सौ योजन के दावानल में एक घायल शापग्रस्त पक्षी को बचाने हेतु अपना शरीर ढाल बना दिया?

Panel 6
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दृश्य 2

विन्ध्याचल का महा-दावानल और शापग्रस्त सुवर्ण-पक्षी

The Cursed Gandharva & The Raging Wildfire
In the deep Vindhya forest, towering teak and bamboo groves dry under the scorching summer sun

विन्ध्याचल के गहन अरण्य में ग्रीष्मकाल की प्रचण्ड धूप से बाँस और सागौन के विशाल वन सूखकर काष्ठ बन चुके थे।

Panel 7
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The cursed celestial bird Chitrangada rests in a hollow banyan tree with injured wings
गन्धर्व चित्राङ्गद
हे विधाता! क्या मेरा यह जीवन इस शाप की अग्नि में ही समाप्त होगा?!

एक प्राचीन वटवृक्ष के कोटर में गन्धर्व चित्राङ्गद एक ऋषि के शापवश पंख-विहीन सुवर्ण-पक्षी बनकर असहाय बैठा था।

गन्धर्व चित्राङ्गद

हे विधाता! क्या मेरा यह जीवन इस शाप की अग्नि में ही समाप्त होगा?!

Panel 8
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A sudden dry thunderstorm strikes the mountain ridge; lightning sets the dry bamboo ablaze

अचानक पर्वतीय शिखरों पर सूखी बिजली गिरी; एक प्रचण्ड तड़ित-आघात ने सूखे बाँसों में भीषण आग भड़का दी!

Panel 9
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A colossal forty-foot wall of roaring flames sweeps across the valleys

देखते ही देखते चालीस फुट ऊँची ज्वालाओं की दीवार ने सौ योजन के वन को घेर लिया; गगनचुम्बी काला धुआँ आकाश में छा गया!

Panel 10
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Herds of deer, peacocks, rabbits, and monkeys flee in panic toward rocky gorges

हज़ारों हरिण, मयूर, वानर और नन्हे वन्यजीव प्राण बचाने हेतु चीत्कार करते हुए पथरीली घाटियों की ओर भागे।

Panel 11
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Patrolling the border hills on horseback, Vikramaditya spots the massive black fire plume
सम्राट विक्रमादित्य
वन और उसके मूक जीव संकट में हैं! सम्राट का धर्म केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है!

सीमावर्ती पहाड़ियों पर अश्व पर सवार सम्राट विक्रमादित्य ने पर्वत-माला को भस्म करती हुई दावानल की विकराल ज्वालाओं को देखा!

सम्राट विक्रमादित्य

वन और उसके मूक जीव संकट में हैं! सम्राट का धर्म केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है!

Panel 12
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दृश्य 3

ज्वालाओं में सम्राट का प्रवेश और मूक जीवों का उद्धार

The Sovereign Charges into the Inferno
Vikramaditya orders his guards to stay behind, galloping toward the flames alone

सम्राट ने अपने सैनिकों को पीछे रुकने की आज्ञा दी और तलवार खींचकर अकेले ही ज्वालाओं की ओर अश्व दौड़ा दिया!

Panel 13
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Vikramaditya leaps from his warhorse, wrapping a wet wool cloak around himself
सम्राट विक्रमादित्य
हे अग्निदेव! इन निर्दोष जीवों का मार्ग छोड़ दो!

अश्व से कूदकर सम्राट ने भीगा हुआ ऊनी कम्बल अपने कवच पर लपेटा और सीधे धधकते नरक जैसे दावानल में छलाँग लगा दी!

सम्राट विक्रमादित्य

हे अग्निदेव! इन निर्दोष जीवों का मार्ग छोड़ दो!

Panel 14
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The Emperor gathers terrified fawns and baby birds into his arms, guiding them across a creek
सम्राट विक्रमादित्य
शीघ्र भागो, शावकों! जल-धारा के पार जाओ!

सम्राट ने भयभीत मृग-शावकों और नन्हे पक्षियों को अपनी भुजाओं में समेटकर एक सुरक्षित पथरीली जल-धारा की ओर पहुँचाया।

सम्राट विक्रमादित्य

शीघ्र भागो, शावकों! जल-धारा के पार जाओ!

Panel 15
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From a burning high cliff, Vikramaditya hears the agonized shriek of the golden bird
शापग्रस्त पक्षी
बचाओ! यह अग्नि मुझे भस्म कर रही है!

ऊँची चट्टान पर जलते हुए वटवृक्ष से एक अलौकिक सुवर्ण-पक्षी की हृदय-विदारक चीत्कार गूँज उठी!

शापग्रस्त पक्षी

बचाओ! यह अग्नि मुझे भस्म कर रही है!

Panel 16
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The ancient banyan tree is completely enveloped in a swirling vortex of roaring flames
सम्राट विक्रमादित्य
मैं आ रहा हूँ! धैर्य रखो!

वटवृक्ष चारों ओर से आग के विशाल बवंडर से घिर चुका था; पत्तियाँ और शाखाएँ चटककर जलते अंगारों की भाँति गिर रही थीं!

सम्राट विक्रमादित्य

मैं आ रहा हूँ! धैर्य रखो!

Panel 17
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Without hesitation, Vikramaditya climbs the scorched, smoking banyan trunk
सम्राट विक्रमादित्य
धैर्य रखो, पक्षी-राज! जब तक विक्रमादित्य के प्राण हैं, तुम्हारी रक्षा होगी!

बिना किसी हिचकिचाहट के सम्राट विक्रमादित्य बरसते अंगारों के बीच उस जलते हुए तने पर चढ़ने लगे!

सम्राट विक्रमादित्य

धैर्य रखो, पक्षी-राज! जब तक विक्रमादित्य के प्राण हैं, तुम्हारी रक्षा होगी!

Panel 18
•
दृश्य 4

सम्राट की छाती की ढाल और वरुणास्त्र का महा-मन्त्र

The Living Shield & The Varunastra Invocation
Vikramaditya reaches the flaming banyan crown, finding the trembling golden bird and sparrows

वृक्ष के कोटर में पहुँचकर सम्राट ने थरथराते सुवर्ण-पक्षी और नन्हीं गौरैयों को देखा जो धुएँ से अचेत हो रही थीं।

Panel 19
•
The Emperor wraps his arms around the hollow nest, shielding the creatures beneath his chest
सम्राट विक्रमादित्य
डरो मत, नन्हें प्राणों! यह क्षत्रिय की देह तुम्हारी ढाल है!

सम्राट ने दोनों भुजाओं से कोटर को घेर लिया और अपनी वज्र-समान योद्धा-छाती को पक्षियों के ऊपर जीवन-कवच बना दिया!

सम्राट विक्रमादित्य

डरो मत, नन्हें प्राणों! यह क्षत्रिय की देह तुम्हारी ढाल है!

Panel 20
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A massive burning banyan branch crashes down; Vikramaditya takes the blow on his own back

तभी एक भारी जलती हुई शाखा गिरी; विक्रमादित्य ने वह भयानक आघात और धधकते अंगारे स्वयं अपनी पीठ और कन्धों पर झेल लिए!

Panel 21
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Bleeding and blistered, Vikramaditya raises his steel sword, entering deep Vedic Samadhi

देह के झुलसने और रक्त बहने पर भी विचलित हुए बिना सम्राट ने खड्ग आकाश की ओर उठाया और 'वरुण-गायत्री' का ध्यान किया!

Panel 22
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The Emperor chants the Varuna mantra; turquoise and sapphire lightning crackles on the blade
सम्राट विक्रमादित्य
हे वरुण देव! इस अरण्य और इसके मूक जीवों की रक्षा हेतु अमृत-वृष्टि करो!

खड्ग की धार पर नीलमणि और फ़िरोज़ी दिव्य विद्युत कौंधने लगी; सम्राट के कण्ठ से पावन मन्त्र गूँजा: 'ॐ जलविम्वाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नो वरुणः प्रचोदयात्!'

सम्राट विक्रमादित्य

हे वरुण देव! इस अरण्य और इसके मूक जीवों की रक्षा हेतु अमृत-वृष्टि करो!

Panel 23
•
A colossal vortex of celestial rain clouds erupts, summoning the mighty Varunastra storm

आकाश में बादलों का प्रचण्ड चक्रवात घुमड़ उठा और दिव्य 'वरुणास्त्र' की शीतल जल-धाराएँ उमड़ पड़ीं!

Panel 24
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दृश्य 5

दावानल का शमन, गन्धर्व का शाप-मोक्ष और अमृत-वर्षा

Extinguishing the Wildfire & The Gandharva
Torrential cooling divine rain pours across the mountain forest, dousing fire in minutes

मूसलाधार अमृत-वृष्टि ने देखते ही देखते सौ योजन के विकराल दावानल को शान्त कर दिया; धधकती धरती शीतल व सुगन्धित हो गई!

Panel 25
•
As rainwater touches the golden bird, a blinding flash of white light shatters the curse

जैसे ही दिव्य जल-बिन्दु सम्राट की छाती के नीचे दबे सुवर्ण-पक्षी पर पड़े, एक तीव्र श्वेत प्रकाश के साथ पाँच सौ वर्ष पुराना शाप टूट गया!

Panel 26
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The golden bird transforms into radiant celestial prince Chitrangada in dazzling silk robes

पक्षी के स्थान पर दिव्य मुकुटधारी, रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित अलौकिक गन्धर्व राजपुत्र—'चित्राङ्गद'—प्रकट हुए!

Panel 27
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The celestial prince weeps, touching Vikramaditya's feet: 'A King gave his flesh to shield a bird!'
गन्धर्व चित्राङ्गद
हे चक्रवर्ती! आप केवल मनुष्यों के नहीं, सम्पूर्ण प्रकृति के रक्षक हैं!

गन्धर्व ने अश्रुओं से सम्राट के झुलसे चरणों को स्पर्श किया: 'पाँच सौ वर्षों से देवता भी इस अग्नि में नहीं उतरे, परन्तु एक नश्वर सम्राट ने पक्षी हेतु अपनी देह जला दी!'

गन्धर्व चित्राङ्गद

हे चक्रवर्ती! आप केवल मनुष्यों के नहीं, सम्पूर्ण प्रकृति के रक्षक हैं!

Panel 28
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Chitrangada sprinkles celestial nectar over Vikramaditya, instantly healing his burns

चित्राङ्गद ने 'गन्धर्व-अमृत' का छिड़काव किया; सम्राट के घाव और फफोले पल भर में चन्दन के समान शीतल होकर पूर्णतः स्वस्थ हो गए!

Panel 29
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Herds of rescued deer, birds, and forest creatures surround the Emperor in joyful harmony

हज़ारों बचाए गए मृग, मयूर और वन्यजीव सम्राट के चारों ओर आनन्द से एकत्र हो गए; सम्पूर्ण विन्ध्याचल में नव-जीवन का उत्सव गूँज उठा!

Panel 30
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दृश्य 6

मानवती का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Manavati
Back in Dharanagari palace, Manavati looks directly at King Bhoja with glowing ruby eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली मानवती ने राजा भोज को गम्भीर माणिक्य-नयनों से देखा।

Panel 31
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Manavati challenges: 'Have you ever charged into a wildfire to shield a flightless bird?'
पुतली मानवती
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी सौ योजन की जलती दावाग्नि में कूदकर किसी मूक पक्षी को बचाने हेतु अपने शरीर को झुलसाया है? यदि ऐसा अरण्य-प्रेम और आत्म-बलिदान तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

मानवती ने उनतीसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:

पुतली मानवती

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी सौ योजन की जलती दावाग्नि में कूदकर किसी मूक पक्षी को बचाने हेतु अपने शरीर को झुलसाया है? यदि ऐसा अरण्य-प्रेम और आत्म-बलिदान तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

Panel 32
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King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's courage
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अरण्य-रक्षण, मूक जीवों हेतु जलती आग में कूदने का अगाध शौर्य और वरुणास्त्र के संधान का आत्म-तेज नहीं है, देवि। मैं इस उनतीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसा अरण्य-रक्षण, मूक जीवों हेतु जलती आग में कूदने का अगाध शौर्य और वरुणास्त्र के संधान का आत्म-तेज नहीं है, देवि। मैं इस उनतीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
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King Bhoja steps down from the twenty-ninth step, ordering forest wildfire defense brigades

राजा भोज उनतीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में वन-दावानल रक्षा दल, वन्यजीव आपातकालीन गलियारे और अरण्य-संरक्षण न्यास स्थापित करने की आज्ञा दी।

Panel 34
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King Bhoja issues royal proclamations establishing forest wildfire defense brigades

राज्य-भर में वनों की अग्नि से सुरक्षा और घायल पशु-पक्षियों के निःशुल्क उपचार हेतु राजसी चिकित्सालय खोले गए।

Panel 35
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Twilight conches echo across Dharanagari as Manavati smiles and freezes back into silent bronze

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और मानवती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का उनतीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

Panel 36
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The remaining three celestial statues gleam in the evening torchlight, awaiting the thirtieth test

शेष तीन कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, तीसवीं पुतली (जयलक्ष्मी) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

Panel 37
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King Bhoja departs the throne hall in quiet contemplation, inspired by Vikramaditya's heroism
राजा भोज
"कल प्रातःकाल हम तीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और तीसवीं पुतली—जयलक्ष्मी—की अमर गाथा सुनेंगे!"

राजा भोज अरण्य-रक्षण और मूक जीवों के प्रति करुणा को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।

राजा भोज

"कल प्रातःकाल हम तीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और तीसवीं पुतली—जयलक्ष्मी—की अमर गाथा सुनेंगे!"

Panel 38
•