अष्टादश पुतली तारावती: तीन गूढ़ पहेलियाँ, निशीथ जागरण और अक्षय-स्वर्णपात्र का पावन दान
The Eighteenth Statue: Taravati & The City of Three Riddles
अष्टादश सूर्योदय और तारावती का प्रबोधन
The Eighteenth Dawn & Taravati
अठारहवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से अठारहवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण अठारहवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी हीरक-तारक और रक्त-स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

अठारहवीं कांस्य-पुतली—तारावती—की तारक-नयन खुले और वह सुवर्ण-अक्षय-पात्र व त्रिशूल-दण्ड हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस अठारहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और अक्षय-पात्र धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे तारावती देवि! विक्रमादित्य के किस निशीथ-साहस और अक्षय-दान की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

तारावती ने अक्षय-सुवर्णपात्र उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा तूफानी श्मशान में निशीथ जागरण करने का अदम्य साहस, मृत्यु की पहेलियाँ सुलझाने का विवेक और कामधेनु-समान अक्षय-पात्र को एक निर्धन भिक्षुक को सौंपने का वैराग्य है?
चन्द्रावती नगरी का संताप और मध्यरात्रि का राक्षस
The Plight of the Cursed Realm of Chandravati
साधारण क्षत्रिय योद्धा का वेश बनाकर विक्रमादित्य सूर्यास्त के समय चन्द्रावती नगरी के विशाल नगर-द्वार पर पहुँचे।

नगर की सड़कें पूरी तरह वीरान थीं, दुकानों और घरों पर लोहे की भारी सांकलें चढ़ी थीं और नागरिक भय से खिड़कियों से झांक रहे थे।

एक पुरानी धर्मशाला में वृद्ध सरायपाल ने काँपते हुए बताया कि प्रत्येक अमावस्या की मध्यरात्रि को श्मशान से एक चार भुजाओं वाला भयानक राक्षस प्रकट होकर नगर के किसी युवक की बलि माँगता है!
जो भी श्मशान में पहरा देने गया, वह या तो जलकर भस्म हो गया या पागल होकर लौटा!

चन्द्रावती के राजा अपने सिंहासन पर विलाप कर रहे थे; उनका कोई भी मन्त्री या सेनापति उस श्मशान में रात बिताने का साहस नहीं जुटा पा रहा था।
क्या कोई शूरवीर नहीं जो इस विनाशकारी राक्षस का सामना कर सके?!

विक्रमादित्य ने राजसभा में उठकर सिंह-गर्जना की: 'जब तक धर्म का सेवक जीवित है, इस नगर का कोई भी निरपराध युवक बलि नहीं चढ़ेगा! आज की रात श्मशान का पहरा मैं दूँगा!'
नगर के द्वार बन्द रखें; कल प्रातःकाल यह भय सदा के लिए समाप्त हो जाएगा!

घने काले मेघों और गरजती बिजली के बीच विक्रमादित्य हाथ में वूट्ज़ तलवार लिए अकेले श्मशान भूमि की ओर बढ़ चले।
तूफानी श्मशान, निशीथ जागरण और राक्षस का प्राकट्य
The Stormy Midnight Vigil & Demon Manifestation
प्राचीन वट-वृक्षों से घिरा भयानक श्मशान, जहाँ मूसलाधार वर्षा और आँधी जलती हुई चिताओं के अंगारों को उड़ा रही थी।

विक्रमादित्य एक प्रज्वलित चिता के समीप अचल पद्मासन लगाकर योग-साधना में लीन हो गए; उनके चारों ओर स्वर्णिम आभा का सुरक्षा-चक्र था।

आधी रात के ठीक बारह बजे बिजली कड़की और चिता के काले धुएँ से चार भुजाओं वाला, लाल आँखों वाला विशाल राक्षस प्रकट हुआ!

राक्षस ने अट्टहास करते हुए अपनी जलती गदा लहराई: 'ओ नश्वर प्राणी! मेरी तीन पहेलियों का उत्तर दे, अन्यथा इस चिता में भस्म हो जा!'
आज तक कोई भी मानव मेरे इन तीन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सका!

विक्रमादित्य मन्द मुस्कान के साथ उठे और तलवार की नोक पर हाथ टिकाकर अडिग खड़े हो गए।
पूछो, निशीथ देव! सत्य का उत्तर धर्म के प्रकाश से ही दिया जाएगा!

कड़कती बिजली और तूफानी बादलों के बीच दानवी माया और चक्रवर्ती सम्राट का अलौकिक संवाद आरम्भ हुआ!
तीन गूढ़ पहेलियाँ और सम्राट का अचूक दार्शनिक निर्णय
The Three Cosmic Riddles & Sovereign Answers
राक्षस ने प्रथम पहेली पूछी: 'वह क्या है जो तीव्रतम आँधी से भी तेज उड़ता है और किसी भी लोहे के पिंजरे में बन्दी नहीं बनाया जा सकता?'
बताओ, नश्वर! इसका भेद क्या है?!

विक्रमादित्य ने उत्तर दिया: 'वह मनुष्य का **मन** है! मन एक क्षण में ब्रह्माण्ड लाँघ जाता है और कोई भी जंजीर उसे बाँध नहीं सकती!'
मन से तीव्र गति इस त्रिलोकी में किसी की नहीं है!

राक्षस ने द्वितीय पहेली रखी: 'वह क्या है जो दावानल से भी अधिक प्रचंड जलता है, परन्तु जिसकी कोई राख शेष नहीं बचती?'
सोच-समझकर बोलना, राजन! एक त्रुटि और तुम भस्म हो जाओगे!

विक्रमादित्य ने उत्तर दिया: 'वह पापी के हृदय में धधकने वाला **शोक और पश्चाताप** है! यह अन्तरंग को भस्म कर देता है परन्तु बाहर कोई भस्म नहीं दिखती!'

राक्षस ने तृतीय पहेली पूछी: 'संसार का वह एकमात्र धन कौन सा है जो बाँटने पर बढ़ता है और संचय करने पर विष बन जाता है?'

विक्रमादित्य ने सिंह-नाद किया: 'वह **पवित्र विद्या और निष्काम दान** है! इसे जितना लुटाओ, यह उतना ही अनन्त रूप में बढ़ता है!'
यही अमर धर्म का शाश्वत सत्य है!
यक्ष का उद्धार, अक्षय-सुवर्णपात्र और निर्धन भिक्षुक को दान
The Golden Vessel & Supreme Charity
तीनों उत्तर सुनते ही भयानक राक्षस की तामसिक काया फट गई और वह स्वर्णिम दिव्य वस्त्रों में सुशोभित देव-यक्ष निशीथ के रूप में प्रकट हुआ!

यक्ष ने हाथ जोड़कर सम्राट के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और अलौकिक **अक्षय-सुवर्णपात्र** भेंट किया, जिससे मनोवांछित अन्न और धन अनवरत प्रवाहित होता था।
आपने मुझे मुक्ति दी, हे चक्रवर्ती देव! यह दिव्य पात्र स्वीकार करें!

सूर्योदय के साथ चन्द्रावती के कपाट खुले और नागरिकों ने पुष्प-वर्षा कर सम्राट विक्रमादित्य का महा-जयघोष किया।

नगर-द्वार के बाहर एक फटेहाल, ठिठुरता हुआ भिक्षुक अपने तीन भूखे अनाथ बच्चों को सीने से लगाए अन्न के लिए तड़प रहा था।

बिना एक क्षण का संकोच किए विक्रमादित्य ने वह कामधेनु-समान अक्षय-सुवर्णपात्र उस भिक्षुक की झोली में रख दिया: 'इस पात्र से अपने बच्चों का पेट भरो और इस मार्ग के हर भूखे यात्री को अन्न बाँटो!'
राजा वही है जो देवताओं के वरदान को प्रजा के आंसुओं को पोंछने में समर्पित कर दे!

पात्र से सुगन्धित खीर और फल फूट पड़े; रोते हुए भिक्षुक ने बच्चों को तृप्त किया और पूरा नगर विक्रमादित्य के चरणों में नतमस्तक हो गया।
तारावती का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Taravati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली तारावती ने राजा भोज को गम्भीर तारक-नयनों से देखा।

तारावती ने अठारहवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी तूफानी श्मशान में निशीथ जागरण कर मृत्यु की पहेलियाँ सुलझाई हैं, और देवताओं के दिए अक्षय-पात्र को किसी निर्धन भिक्षुक को सौंप दिया है? यदि ऐसा अदम्य साहस और निष्काम दान-भाव तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा निशीथ-साहस, गूढ़ पहेलियों को भेदने का दार्शनिक विवेक और अक्षय-पात्र जैसी अमूल्य निधि को सहजता से त्यागने की उदारता नहीं है, देवि। मैं इस अठारहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज अठारहवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में रात्रि-सुरक्षा दस्तों, निःशुल्क आश्रय-गृहों और सार्वजनिक अन्न-क्षेत्रों का विस्तार करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में कोई भी यात्री या दीन-दुखी भूखा न सोए, इसके लिए अन्न-वितरण न्यासों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और तारावती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का अठारहवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष चौदह कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, उन्नीसवीं पुतली (रूपरेखा) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज भय-मुक्ति और निष्काम दान के दिव्य आदर्शों को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम उन्नीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और उन्नीसवीं पुतली—रूपरेखा—की अमर गाथा सुनेंगे!"