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अष्टादश पुतली तारावती: तीन गूढ़ पहेलियाँ, निशीथ जागरण और अक्षय-स्वर्णपात्र का पावन दान

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

अष्टादश पुतली तारावती: तीन गूढ़ पहेलियाँ, निशीथ जागरण और अक्षय-स्वर्णपात्र का पावन दान

The Eighteenth Statue: Taravati & The City of Three Riddles

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दृश्य 1

अष्टादश सूर्योदय और तारावती का प्रबोधन

The Eighteenth Dawn & Taravati
Morning sunlight streams across the sandstone colonnade onto the 32-step golden throne

अठारहवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
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King Bhoja in sacred saffron silks approaches the eighteenth step of the throne

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से अठारहवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
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The marble dais erupts with brilliant diamond-starlight and ruby-golden radiance

जैसे ही राजा का चरण अठारहवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी हीरक-तारक और रक्त-स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

Panel 3
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The eighteenth carved statue Taravati opens her glowing diamond-starlight eyes, laughing musically
पुतली तारावती
ठहरो, राजा भोज! इस अठारहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

अठारहवीं कांस्य-पुतली—तारावती—की तारक-नयन खुले और वह सुवर्ण-अक्षय-पात्र व त्रिशूल-दण्ड हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली तारावती

ठहरो, राजा भोज! इस अठारहवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja halts in deep reverence with folded hands, gazing at the living bronze maiden
राजा भोज
हे तारावती देवि! विक्रमादित्य के किस निशीथ-साहस और अक्षय-दान की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और अक्षय-पात्र धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे तारावती देवि! विक्रमादित्य के किस निशीथ-साहस और अक्षय-दान की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Taravati speaks: 'Do you possess the fearless midnight courage of Vikramaditya?'
पुतली तारावती
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा तूफानी श्मशान में निशीथ जागरण करने का अदम्य साहस, मृत्यु की पहेलियाँ सुलझाने का विवेक और कामधेनु-समान अक्षय-पात्र को एक निर्धन भिक्षुक को सौंपने का वैराग्य है?

तारावती ने अक्षय-सुवर्णपात्र उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली तारावती

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा तूफानी श्मशान में निशीथ जागरण करने का अदम्य साहस, मृत्यु की पहेलियाँ सुलझाने का विवेक और कामधेनु-समान अक्षय-पात्र को एक निर्धन भिक्षुक को सौंपने का वैराग्य है?

Panel 6
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दृश्य 2

चन्द्रावती नगरी का संताप और मध्यरात्रि का राक्षस

The Plight of the Cursed Realm of Chandravati
Disguised as a wandering warrior, Vikramaditya arrives outside the gloomy city gates of Chandravati

साधारण क्षत्रिय योद्धा का वेश बनाकर विक्रमादित्य सूर्यास्त के समय चन्द्रावती नगरी के विशाल नगर-द्वार पर पहुँचे।

Panel 7
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The city streets are completely deserted, doors locked with heavy iron chains

नगर की सड़कें पूरी तरह वीरान थीं, दुकानों और घरों पर लोहे की भारी सांकलें चढ़ी थीं और नागरिक भय से खिड़कियों से झांक रहे थे।

Panel 8
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Inside a dimly lit tavern, an aged innkeeper explains the curse of the four-armed demon
सरायपाल
जो भी श्मशान में पहरा देने गया, वह या तो जलकर भस्म हो गया या पागल होकर लौटा!

एक पुरानी धर्मशाला में वृद्ध सरायपाल ने काँपते हुए बताया कि प्रत्येक अमावस्या की मध्यरात्रि को श्मशान से एक चार भुजाओं वाला भयानक राक्षस प्रकट होकर नगर के किसी युवक की बलि माँगता है!

सरायपाल

जो भी श्मशान में पहरा देने गया, वह या तो जलकर भस्म हो गया या पागल होकर लौटा!

Panel 9
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The local King of Chandravati weeps in his court, having no warrior capable of standing vigil
चन्द्रावती-नरेश
क्या कोई शूरवीर नहीं जो इस विनाशकारी राक्षस का सामना कर सके?!

चन्द्रावती के राजा अपने सिंहासन पर विलाप कर रहे थे; उनका कोई भी मन्त्री या सेनापति उस श्मशान में रात बिताने का साहस नहीं जुटा पा रहा था।

चन्द्रावती-नरेश

क्या कोई शूरवीर नहीं जो इस विनाशकारी राक्षस का सामना कर सके?!

Panel 10
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Vikramaditya stands up in the royal court, proclaiming: 'No youth shall perish while a Kshatriya lives!'
सम्राट विक्रमादित्य
नगर के द्वार बन्द रखें; कल प्रातःकाल यह भय सदा के लिए समाप्त हो जाएगा!

विक्रमादित्य ने राजसभा में उठकर सिंह-गर्जना की: 'जब तक धर्म का सेवक जीवित है, इस नगर का कोई भी निरपराध युवक बलि नहीं चढ़ेगा! आज की रात श्मशान का पहरा मैं दूँगा!'

सम्राट विक्रमादित्य

नगर के द्वार बन्द रखें; कल प्रातःकाल यह भय सदा के लिए समाप्त हो जाएगा!

Panel 11
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Under pitch-black storm clouds, Vikramaditya walks calmly toward the distant cremation ground

घने काले मेघों और गरजती बिजली के बीच विक्रमादित्य हाथ में वूट्ज़ तलवार लिए अकेले श्मशान भूमि की ओर बढ़ चले।

Panel 12
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दृश्य 3

तूफानी श्मशान, निशीथ जागरण और राक्षस का प्राकट्य

The Stormy Midnight Vigil & Demon Manifestation
A desolate cremation ground surrounded by ancient banyan trees, violent monsoon winds whipping rain

प्राचीन वट-वृक्षों से घिरा भयानक श्मशान, जहाँ मूसलाधार वर्षा और आँधी जलती हुई चिताओं के अंगारों को उड़ा रही थी।

Panel 13
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Vikramaditya sits in deep yogic meditation beside a crackling pyre

विक्रमादित्य एक प्रज्वलित चिता के समीप अचल पद्मासन लगाकर योग-साधना में लीन हो गए; उनके चारों ओर स्वर्णिम आभा का सुरक्षा-चक्र था।

Panel 14
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Thunder splits the sky; a towering four-armed shadow demon emerges from the smoke

आधी रात के ठीक बारह बजे बिजली कड़की और चिता के काले धुएँ से चार भुजाओं वाला, लाल आँखों वाला विशाल राक्षस प्रकट हुआ!

Panel 15
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The terrifying demon laughs, pointing his fiery club at the King
निशीथ राक्षस
आज तक कोई भी मानव मेरे इन तीन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सका!

राक्षस ने अट्टहास करते हुए अपनी जलती गदा लहराई: 'ओ नश्वर प्राणी! मेरी तीन पहेलियों का उत्तर दे, अन्यथा इस चिता में भस्म हो जा!'

निशीथ राक्षस

आज तक कोई भी मानव मेरे इन तीन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सका!

Panel 16
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Vikramaditya rises slowly, leaning on his sword with serene unshakeable composure
सम्राट विक्रमादित्य
पूछो, निशीथ देव! सत्य का उत्तर धर्म के प्रकाश से ही दिया जाएगा!

विक्रमादित्य मन्द मुस्कान के साथ उठे और तलवार की नोक पर हाथ टिकाकर अडिग खड़े हो गए।

सम्राट विक्रमादित्य

पूछो, निशीथ देव! सत्य का उत्तर धर्म के प्रकाश से ही दिया जाएगा!

Panel 17
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The massive demon towers over the calm mortal Emperor amidst flashing lightning

कड़कती बिजली और तूफानी बादलों के बीच दानवी माया और चक्रवर्ती सम्राट का अलौकिक संवाद आरम्भ हुआ!

Panel 18
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दृश्य 4

तीन गूढ़ पहेलियाँ और सम्राट का अचूक दार्शनिक निर्णय

The Three Cosmic Riddles & Sovereign Answers
The demon poses the first riddle: 'What travels faster than the swiftest wind?'
निशीथ राक्षस
बताओ, नश्वर! इसका भेद क्या है?!

राक्षस ने प्रथम पहेली पूछी: 'वह क्या है जो तीव्रतम आँधी से भी तेज उड़ता है और किसी भी लोहे के पिंजरे में बन्दी नहीं बनाया जा सकता?'

निशीथ राक्षस

बताओ, नश्वर! इसका भेद क्या है?!

Panel 19
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Vikramaditya answers with a smile: 'The human mind (Manas)!'
सम्राट विक्रमादित्य
मन से तीव्र गति इस त्रिलोकी में किसी की नहीं है!

विक्रमादित्य ने उत्तर दिया: 'वह मनुष्य का **मन** है! मन एक क्षण में ब्रह्माण्ड लाँघ जाता है और कोई भी जंजीर उसे बाँध नहीं सकती!'

सम्राट विक्रमादित्य

मन से तीव्र गति इस त्रिलोकी में किसी की नहीं है!

Panel 20
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The demon poses the second riddle: 'What burns hotter than fire, yet leaves zero ashes?'
निशीथ राक्षस
सोच-समझकर बोलना, राजन! एक त्रुटि और तुम भस्म हो जाओगे!

राक्षस ने द्वितीय पहेली रखी: 'वह क्या है जो दावानल से भी अधिक प्रचंड जलता है, परन्तु जिसकी कोई राख शेष नहीं बचती?'

निशीथ राक्षस

सोच-समझकर बोलना, राजन! एक त्रुटि और तुम भस्म हो जाओगे!

Panel 21
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Vikramaditya answers: 'The hidden remorse and grief (Shoka) burning in a repentant heart!'

विक्रमादित्य ने उत्तर दिया: 'वह पापी के हृदय में धधकने वाला **शोक और पश्चाताप** है! यह अन्तरंग को भस्म कर देता है परन्तु बाहर कोई भस्म नहीं दिखती!'

Panel 22
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The demon asks the third riddle: 'What is the only treasure that grows when shared?'

राक्षस ने तृतीय पहेली पूछी: 'संसार का वह एकमात्र धन कौन सा है जो बाँटने पर बढ़ता है और संचय करने पर विष बन जाता है?'

Panel 23
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Vikramaditya proclaims: 'Sacred wisdom and selfless charity (Vidya & Dana)!'
सम्राट विक्रमादित्य
यही अमर धर्म का शाश्वत सत्य है!

विक्रमादित्य ने सिंह-नाद किया: 'वह **पवित्र विद्या और निष्काम दान** है! इसे जितना लुटाओ, यह उतना ही अनन्त रूप में बढ़ता है!'

सम्राट विक्रमादित्य

यही अमर धर्म का शाश्वत सत्य है!

Panel 24
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दृश्य 5

यक्ष का उद्धार, अक्षय-सुवर्णपात्र और निर्धन भिक्षुक को दान

The Golden Vessel & Supreme Charity
The ancient demonic curse shatters; the demon transforms into a celestial Yaksha

तीनों उत्तर सुनते ही भयानक राक्षस की तामसिक काया फट गई और वह स्वर्णिम दिव्य वस्त्रों में सुशोभित देव-यक्ष निशीथ के रूप में प्रकट हुआ!

Panel 25
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The grateful Yaksha presents the miraculous Inexhaustible Golden Vessel
यक्ष निशीथ
आपने मुझे मुक्ति दी, हे चक्रवर्ती देव! यह दिव्य पात्र स्वीकार करें!

यक्ष ने हाथ जोड़कर सम्राट के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और अलौकिक **अक्षय-सुवर्णपात्र** भेंट किया, जिससे मनोवांछित अन्न और धन अनवरत प्रवाहित होता था।

यक्ष निशीथ

आपने मुझे मुक्ति दी, हे चक्रवर्ती देव! यह दिव्य पात्र स्वीकार करें!

Panel 26
•
At sunrise, the gates of Chandravati swing open; joyful citizens shower flower petals

सूर्योदय के साथ चन्द्रावती के कपाट खुले और नागरिकों ने पुष्प-वर्षा कर सम्राट विक्रमादित्य का महा-जयघोष किया।

Panel 27
•
Outside the gates, a destitute shivering beggar with three starving orphan children weeps

नगर-द्वार के बाहर एक फटेहाल, ठिठुरता हुआ भिक्षुक अपने तीन भूखे अनाथ बच्चों को सीने से लगाए अन्न के लिए तड़प रहा था।

Panel 28
•
Without hesitation, Vikramaditya hands the Inexhaustible Golden Vessel into the beggar's hands
सम्राट विक्रमादित्य
राजा वही है जो देवताओं के वरदान को प्रजा के आंसुओं को पोंछने में समर्पित कर दे!

बिना एक क्षण का संकोच किए विक्रमादित्य ने वह कामधेनु-समान अक्षय-सुवर्णपात्र उस भिक्षुक की झोली में रख दिया: 'इस पात्र से अपने बच्चों का पेट भरो और इस मार्ग के हर भूखे यात्री को अन्न बाँटो!'

सम्राट विक्रमादित्य

राजा वही है जो देवताओं के वरदान को प्रजा के आंसुओं को पोंछने में समर्पित कर दे!

Panel 29
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The weeping beggar feeds his starving children as golden rice overflows from the vessel

पात्र से सुगन्धित खीर और फल फूट पड़े; रोते हुए भिक्षुक ने बच्चों को तृप्त किया और पूरा नगर विक्रमादित्य के चरणों में नतमस्तक हो गया।

Panel 30
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दृश्य 6

तारावती का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Taravati
Back in Dharanagari palace, Taravati looks directly at King Bhoja with diamond-starlight eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली तारावती ने राजा भोज को गम्भीर तारक-नयनों से देखा।

Panel 31
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Taravati challenges: 'Have you ever stood a midnight vigil in a storm, and gifted an Akshaya Patra?'
पुतली तारावती
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी तूफानी श्मशान में निशीथ जागरण कर मृत्यु की पहेलियाँ सुलझाई हैं, और देवताओं के दिए अक्षय-पात्र को किसी निर्धन भिक्षुक को सौंप दिया है? यदि ऐसा अदम्य साहस और निष्काम दान-भाव तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

तारावती ने अठारहवीं सीढ़ी की चुनौती दी:

पुतली तारावती

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी तूफानी श्मशान में निशीथ जागरण कर मृत्यु की पहेलियाँ सुलझाई हैं, और देवताओं के दिए अक्षय-पात्र को किसी निर्धन भिक्षुक को सौंप दिया है? यदि ऐसा अदम्य साहस और निष्काम दान-भाव तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

Panel 32
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King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's courage
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसा निशीथ-साहस, गूढ़ पहेलियों को भेदने का दार्शनिक विवेक और अक्षय-पात्र जैसी अमूल्य निधि को सहजता से त्यागने की उदारता नहीं है, देवि। मैं इस अठारहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसा निशीथ-साहस, गूढ़ पहेलियों को भेदने का दार्शनिक विवेक और अक्षय-पात्र जैसी अमूल्य निधि को सहजता से त्यागने की उदारता नहीं है, देवि। मैं इस अठारहवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
•
King Bhoja steps down from the eighteenth step, ordering nocturnal safety squads established

राजा भोज अठारहवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में रात्रि-सुरक्षा दस्तों, निःशुल्क आश्रय-गृहों और सार्वजनिक अन्न-क्षेत्रों का विस्तार करने की आज्ञा दी।

Panel 34
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King Bhoja issues royal proclamations establishing public charity kitchens

राज्य-भर में कोई भी यात्री या दीन-दुखी भूखा न सोए, इसके लिए अन्न-वितरण न्यासों का गठन हुआ।

Panel 35
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Twilight conches echo across Dharanagari as Taravati smiles and freezes back into silent bronze

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और तारावती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का अठारहवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

Panel 36
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The remaining fourteen celestial statues gleam in the evening torchlight

शेष चौदह कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, उन्नीसवीं पुतली (रूपरेखा) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

Panel 37
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King Bhoja departs the throne hall in quiet contemplation, inspired by Vikramaditya's courage
राजा भोज
"कल प्रातःकाल हम उन्नीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और उन्नीसवीं पुतली—रूपरेखा—की अमर गाथा सुनेंगे!"

राजा भोज भय-मुक्ति और निष्काम दान के दिव्य आदर्शों को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।

राजा भोज

"कल प्रातःकाल हम उन्नीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और उन्नीसवीं पुतली—रूपरेखा—की अमर गाथा सुनेंगे!"

Panel 38
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