षष्ठ पुतली प्रभावती: अन्धा महर्षि, विषैला सरोवर और संजीवनी मुकुट का पावन त्याग
The Sixth Statue: Prabhavati & The Poisoned Lake
षष्ठ सूर्योदय और प्रभावती का प्रबोधन
The Sixth Dawn & Prabhavati
षष्ठ प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के प्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से छठी सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण छठी सीढ़ी के निकट पहुँचा, संगमरमर का फर्श सूर्य-कान्त और स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से धधक उठा!

छठी कांस्य-पुतली—प्रभावती—की सूर्य-समान आँखें खुलीं और वह स्वर्ण-कमल कलश हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस छठी सीढ़ी पर पैर धरने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और स्वर्ण-कलश धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे प्रभावती देवि! विक्रमादित्य के किस अलौकिक साहस और त्याग की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

प्रभावती ने स्वर्ण-कमल कलश उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा अदम्य साहस है, जब उन्होंने मरते हुए तीर्थयात्रियों की औषधि परखने के लिए स्वयं प्राणघाती विष पी लिया था, और अमरता का संजीवनी मुकुट एक अंधे तपस्वी को दान कर दिया था?
नीलगिरि का विषैला सरोवर और अन्धे महर्षि का क्रन्दन
The Poisoned Pilgrim Lake of Mount Nilgiri
नीलगिरि पर्वत की तलहटी में स्थित पावन सरोवर पाताल के महा-नाग 'कालसर्प' के विष से उबलकर बैंगनी और प्राणघाती हो चुका था।

सैकड़ों दीन तीर्थयात्री, नारियाँ और संन्यासी उस विषैले जल को पीकर तीव्र दाह-ज्वर से तट पर तड़प रहे थे।

तट पर नब्बे वर्षीय वृद्ध अन्धे महर्षि सोमप अश्रु बहाते हुए अपने काँपते हाथ उठाकर ईश्वर से रक्षा की गुहार लगा रहे थे।
हे जगदीश्वर! इन निर्दोष भक्तों के प्राणों की रक्षा करो! मेरी देह ले लो, परन्तु इनका संहार रोको!

उसी क्षण श्वेत अश्व पर तीव्र गति से सम्राट विक्रमादित्य हिमालयी दिव्य जड़ी-बूटियों की थैलियाँ लेकर पहुँचे।

विक्रमादित्य ने अन्धे मुनि के चरणों में बैठकर तड़पते तीर्थयात्रियों की नब्ज जाँची।

महर्षि सोमप ने चेतावनी दी:
इस जल को मत छूना, वीर! पाताल के कालसर्प का विष इतना तीव्र है कि एक बूँद दस श्वासों में रक्त जमा देती है!
धैर्य रखें, महर्षि! धर्म की शक्ति विष से अधिक बलवान है!
सम्राट का निर्भय विष-पान और सोमवल्लरी का प्रभाव
The King
विक्रमादित्य ने अदम्य संकल्प लिया: 'धर्मात्मा राजा अपनी प्रजा को कभी ऐसी औषधि नहीं देता जिसे उसने पहले अपने शरीर पर न परखा हो!'

विक्रमादित्य ने पीतल का पात्र उस उबलते विषैले जल में डुबोया और बिना एक पल हिचकिचाए पूरा विष कण्ठस्थ कर लिया!

तीव्र हलाहल शिराओं में दौड़ गया; सम्राट की देह नीली पड़ने लगी और दृष्टि धुँधला गई, परन्तु वे पद्मासन लगाकर प्राणायाम में लीन हो गए।

गम्भीर योग-समाधि में विक्रमादित्य ने स्वर्णिम 'सोमवल्लरी' जड़ी-बूटी को हाथ से निचोड़कर उसका दिव्य रस पी लिया।

हृदय-चक्र से प्रखर सौर-अग्नि प्रज्वलित हुई जिसने विष के प्रभाव को क्षण-भर में भस्म कर शरीर को पुनः स्वर्ण-समान कान्तिमान बना दिया!

सम्राट विक्रमादित्य तेजस्वी नयनों के साथ उठ खड़े हुए; उन्होंने औषधि की अचूक मात्रा और प्रभाव स्वयं सिद्ध कर दिया था!
औषधि सिद्ध हो चुकी है! अब एक भी तीर्थयात्री काल के गाल में नहीं समाएगा!
सरोवर का शुद्धिकरण और कालसर्प की पराजय
The Lake Purified & The Serpent Subdued
विक्रमादित्य ने बड़े मिट्टी के घड़ों में औषधि घोलकर पर्वत के झरनों में प्रवाहित कर दी और हर मरणासन्न भक्त को अमृत-घूँट पिलाया।
यह दिव्य संजीवनी रस ग्रहण करो, भाइयो! अमृत का प्रभाव विष को नष्ट कर देगा!

सैकड़ों मरते हुए भक्त आँखें खोलकर उठ बैठे और अश्रु बहाते हुए नव-जीवन का आनन्द मनाने लगे!
ईश्वर की कृपा! हमारा दाह-ज्वर शान्त हो गया!

विष निष्प्रभावी होते देख क्रुद्ध चालीस हाथ लम्बा महा-नाग 'कालसर्प' जल फाड़कर बाहर निकला!

विक्रमादित्य ने हवा में छलांग लगाई और अपनी वूट्ज़ खड्ग से बिना वध किए नाग का विषैला मणि-शृंग काट दिया!

सम्राट के धर्म-तेज से नतमस्तक होकर नाग ने फन झुका लिया और पाताल में लौट गया।

सरोवर का जल स्फटिक जैसा निर्मल हो गया और आकाश से पुष्प-वर्षा के मध्य अमरता का दिव्य 'संजीवनी मुकुट' तट पर प्रकट हुआ!
धर्म के रक्षक को स्वर्ग का अमर मुकुट प्राप्त हो!
संजीवनी मुकुट का पावन दान और महर्षि का दिव्य चक्षु
The Gift to the Blind Sage
कृतज्ञ तीर्थयात्रियों ने हाथ जोड़कर विक्रमादित्य से अमरता का वह दिव्य मुकुट धारण करने की विनती की।
महाराज! आप इस अमर मुकुट को धारण कर युगों-युगों तक इस पृथ्वी पर शासन करें!

विक्रमादित्य ने मन्द मुस्कान से अस्वीकार किया: 'सच्ची अमरता धर्म के आचरण से प्राप्त होती है, मुकुटों से नहीं!'

विक्रमादित्य उस नब्बे वर्षीय वृद्ध अन्धे महर्षि सोमप के पास गए और वह दिव्य मुकुट उनके मस्तक पर रख दिया!
यह मुकुट आपके तपोबल और करुणा का सम्मान है, महर्षि!

मुकुट का स्पर्श होते ही महर्षि का अन्धापन मिट गया, उनकी झुर्रियाँ लुप्त होकर देह तेजस्वी युवा जैसी हो गई और दिव्य ज्ञान-नेत्र खुल गए!

दिव्य दृष्टि पाते ही महर्षि ने उस महापुरुष को पहचाना और चरणों में गिर पड़े: 'आप उज्जयिनी के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हैं—साक्षात् धर्म के अवतार!'
सम्राट होकर भी आपने दीन भक्तों के लिए विष पिया और अमरता का मुकुट मुझे दे दिया!

सम्राट विक्रमादित्य मुनि को प्रणाम कर गोधूलि वेला में मौन भाव से लौट आए; पर्वत पर शान्ति और आरोग्य का प्रकाश फैल चुका था।
प्रभावती का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Prabhavati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली प्रभावती ने राजा भोज को गम्भीर सूर्य-नयनों से देखा।

प्रभावती ने अन्तिम चुनौती प्रस्तुत की:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी प्रजा के कल्याण हेतु विष-पान कर औषधि सिद्ध की है, और अमरता का मुकुट किसी अंधे मुनि को बिना स्वार्थ दान दिया है? यदि ऐसा साहस है, तो कदम बढ़ाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अदम्य साहस और अमरता को ठुकराने वाला त्याग नहीं है, देवि। मैं इस छठी सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज छठी सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा के प्रत्येक गाँव में शुद्ध पेयजल के जलाशय और औषधालय खुदवाने का आदेश दिया।

राज्य-भर में आरोग्य-कूपों और वानस्पतिक उद्यानों का निर्माण आरम्भ हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और प्रभावती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का छठा दिन सम्पन्न हुआ!**
कल प्रातःकाल मैं सातवीं सीढ़ी पर चरण रखूँगा और सातवीं पुतली—कौशल्या—की अमर गाथा सुनूँगा!