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त्रिंशत् पुतली जयलक्ष्मी: सार्वभौम त्याग का महा-यज्ञ, सुवर्ण-वेदी और निर्धन भिक्षुक की विजय

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

त्रिंशत् पुतली जयलक्ष्मी: सार्वभौम त्याग का महा-यज्ञ, सुवर्ण-वेदी और निर्धन भिक्षुक की विजय

The Thirtieth Statue: Jayalakshmi & The Sarvamedha Sacrifice

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दृश्य 1

तीसवाँ सूर्योदय और जयलक्ष्मी का प्रबोधन

The Thirtieth Dawn & Jayalakshmi
Morning sunlight streams across the sandstone colonnade onto the 32-step golden throne

तीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
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King Bhoja in sacred saffron silks approaches the thirtieth step of the throne

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से तीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
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The marble dais erupts with brilliant diamond-gold and emerald-green radiance

जैसे ही राजा का चरण तीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी हीरक-स्वर्णिम और विजय-मरकत दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

Panel 3
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The thirtieth carved statue Jayalakshmi opens her glowing diamond eyes, laughing musically
पुतली जयलक्ष्मी
ठहरो, राजा भोज! इस तीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

तीसवीं कांस्य-पुतली—जयलक्ष्मी—की हीरक-नयन खुले और वह सुवर्ण-जय-पद्म व यज्ञ-स्रुवा हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली जयलक्ष्मी

ठहरो, राजा भोज! इस तीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja halts in deep reverence with folded hands, gazing at the living bronze maiden
राजा भोज
हे जयलक्ष्मी देवि! विक्रमादित्य के किस सार्वभौम त्याग और महा-यज्ञ के अमर सत्कार की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और जय-पद्म धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे जयलक्ष्मी देवि! विक्रमादित्य के किस सार्वभौम त्याग और महा-यज्ञ के अमर सत्कार की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Jayalakshmi speaks: 'Do you possess the supreme renunciation of Vikramaditya?'
पुतली जयलक्ष्मी
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा सर्वस्व-त्याग का अगाध तेज है, जब सर्वमेध महा-यज्ञ की पूर्णाहूति पर सम्पूर्ण स्वर्ण-प्रासाद, राजकोष के भण्डार और अपना राजमुकुट एक निर्धन भिक्षुक को बिना पलक झपकाए दान कर दिया?

जयलक्ष्मी ने सुवर्ण-जय-पद्म उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली जयलक्ष्मी

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा सर्वस्व-त्याग का अगाध तेज है, जब सर्वमेध महा-यज्ञ की पूर्णाहूति पर सम्पूर्ण स्वर्ण-प्रासाद, राजकोष के भण्डार और अपना राजमुकुट एक निर्धन भिक्षुक को बिना पलक झपकाए दान कर दिया?

Panel 6
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दृश्य 2

शिप्रा तट का सर्वमेध महा-यज्ञ और सुवर्ण-मण्डप

The Monumental Sarvamedha Yajna of Ujjayini
Along the sacred Shipra river in Ujjayini, hundreds of thousands gather for the Sarvamedha Yajna

उज्जयिनी के पावन शिप्रा-तट पर सम्राट विक्रमादित्य ने आर्यावर्त के समस्त राजाओं और लाखों नागरिकों की उपस्थिति में 'सर्वमेध महा-यज्ञ' का आयोजन किया।

Panel 7
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In the center stands a magnificent golden pavilion with twelve jewel-encrusted altars

यज्ञ-भूमि के केन्द्र में बारह रत्न-जड़ित वेदियों वाला एक अलौकिक सुवर्ण-प्रासाद निर्मित था, जो सूर्य के समान दमक रहा था!

Panel 8
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Mountains of pearls, silk bales, chests of rubies, and ten million gold coins surround the arena

वेदी के चारों ओर मोतियों के पर्वत, रेशम के थान, मणियों के संदूक और एक करोड़ स्वर्ण-मुद्राओं के भण्डार दान हेतु रखे थे।

Panel 9
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Sage Vedagarbha stands before the sacred fire, chanting Vedic mantras
महर्षि वेदगर्भ
ॐ स्वाहा! सार्वभौम चक्रवर्ती विक्रमादित्य के इस महा-यज्ञ की जय हो!

प्रधान कुलगुरु महर्षि वेदगर्भ ने वेदमन्त्रों का उच्च स्वर में घोष करते हुए पूर्णाहूति की तैयारी की।

महर्षि वेदगर्भ

ॐ स्वाहा! सार्वभौम चक्रवर्ती विक्रमादित्य के इस महा-यज्ञ की जय हो!

Panel 10
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Vikramaditya in royal ceremonial brocade and crown presides over the final oblation

सम्राट विक्रमादित्य राजसी मुकुट और स्वर्ण-कवच धारण कर पूर्णाहूति हेतु यज्ञ-कुण्ड के सम्मुख खड़े थे।

Panel 11
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At the outer barrier, a ragged wandering beggar in tree bark rags approaches the guards

तभी यज्ञ-शाला के बाह्य द्वार पर फटे वल्कल वस्त्र पहने, नंगे पाँव काँपता हुआ एक निर्धन भिक्षुक—दीनबन्धु—प्रकट हुआ।

Panel 12
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दृश्य 3

पूर्णाहूति के समय भिक्षुक की माँग और राजा का सत्कार

The Destitute Beggar at the Final Oblation
Imperial guards lower their spears to push Dinabandhu away from the golden enclosure

राज-रक्षकों ने भालों से उस मैले-कुचैले भिक्षुक को पवित्र सुवर्ण-मण्डप से बाहर धकेलने का प्रयास किया।

Panel 13
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Vikramaditya raises his hand: 'A sacrifice is incomplete if one hungry soul is turned away!'
सम्राट विक्रमादित्य
भिक्षुक को ससम्मान भीतर आने दो!

विक्रमादित्य ने तुरन्त पुकारा: 'रुक जाओ! यदि एक भी भूखी आत्मा द्वार से लौट जाए, तो यह महा-यज्ञ निष्फल हो जाएगा!'

सम्राट विक्रमादित्य

भिक्षुक को ससम्मान भीतर आने दो!

Panel 14
•
Vikramaditya steps down from the golden dais, walking barefoot across the dusty ground

सम्राट स्वयं सुवर्ण-वेदी से नीचे उतरे और नंगे पाँव यज्ञ की धूल में चलकर भिक्षुक के समक्ष पहुँचे।

Panel 15
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The Emperor of Aryavarta bows with folded hands before the ragged beggar
सम्राट विक्रमादित्य
कहो, भद्र पुरुष! विक्रमादित्य के इस महा-यज्ञ से तुम्हें क्या चाहिए?

आर्यावर्त के चक्रवर्ती राजा ने हाथ जोड़कर भिक्षुक के चरणों में शीश झुकाया और जल का पात्र आगे बढ़ाया।

सम्राट विक्रमादित्य

कहो, भद्र पुरुष! विक्रमादित्य के इस महा-यज्ञ से तुम्हें क्या चाहिए?

Panel 16
•
Dinabandhu looks into the King's eyes: 'Give me this entire golden palace and your crown!'
भिक्षुक दीनबन्धु
यदि सच्चे महादानी हो, तो यह सब मुझे दे दो!

भिक्षुक दीनबन्धु ने राजा की परीक्षा लेते हुए दुस्साहस से कहा: 'मुझे यह सम्पूर्ण सुवर्ण-प्रासाद, चारों ओर रखे खजानों के संदूक और आपके सिर का राजमुकुट चाहिए!'

भिक्षुक दीनबन्धु

यदि सच्चे महादानी हो, तो यह सब मुझे दे दो!

Panel 17
•
Surrounding kings and ministers gasp in fury, urging Vikramaditya to reject the demand
सामन्त राजा
यह भिक्षुक पागल है! इसे कारागार में डालिए, महाराज!

उपस्थित सामन्तों और राजाओं में क्रोध की लहर दौड़ गई; सबने इस धृष्टता पर भिक्षुक को दण्डित करने की माँग की।

सामन्त राजा

यह भिक्षुक पागल है! इसे कारागार में डालिए, महाराज!

Panel 18
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दृश्य 4

सर्वस्व-त्याग का संकल्प, मुकुट का समर्पण और सङ्कल्प-जल

The Supreme Renunciation & Gift of Empire
Vikramaditya smiles with radiant spiritual peace: 'What belongs to God cannot be withheld!'
सम्राट विक्रमादित्य
यह सब आज से तुम्हारा है, विप्रवर!

विक्रमादित्य के मुख पर त्याग का दिव्य आनन्द खिल उठा: 'जो ईश्वर की दी हुई सम्पदा है, वह ईश्वर की सन्तान को देने में संकोच कैसा!'

सम्राट विक्रमादित्य

यह सब आज से तुम्हारा है, विप्रवर!

Panel 19
•
Vikramaditya gently removes his diamond-inlaid gold crown, placing it in the beggar's hands
सम्राट विक्रमादित्य
यह मुकुट भी तुम्हारा है, भाई!

सम्राट ने अपने शीश से हीरों से जड़ा सुवर्ण-मुकुट उतारा और स्नेहपूर्वक भिक्षुक के हाथों में रख दिया।

सम्राट विक्रमादित्य

यह मुकुट भी तुम्हारा है, भाई!

Panel 20
•
Taking a golden pitcher, the Emperor pours holy water over the beggar's hands, sealing the gift

सुवर्ण-झारी से पावन शिप्रा-जल भिक्षुक की हथेलियों पर प्रवाहित कर सम्राट ने सम्पूर्ण सुवर्ण-प्रासाद और खजानों के दान का सङ्कल्प पूर्ण किया।

Panel 21
•
Vikramaditya places the golden keys of all forty treasure vaults into the beggar's palms
सम्राट विक्रमादित्य
सुखी रहो, भाई! अब तुम्हारे जीवन में कभी दरिद्रता की छाया न पड़ेगी।

सम्राट ने चालीस राजकोषों की सुवर्ण-कुंजियाँ भी भिक्षुक को सौंप दीं, बिना पीछे मुड़े या एक क्षण भी मोह किए!

सम्राट विक्रमादित्य

सुखी रहो, भाई! अब तुम्हारे जीवन में कभी दरिद्रता की छाया न पड़ेगी।

Panel 22
•
All assembled kings, sages, and warriors stand utterly speechless at such renunciation

उपस्थित सभी राजा, महर्षि और योद्धा इस अकल्पनीय त्याग को देखकर अवाक् रह गए; इतिहास में ऐसा सम्राट कभी न हुआ था!

Panel 23
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Stripped of all jewels, Vikramaditya stands in a simple white linen tunic, glowing with divine light

बिना किसी आभूषण और मुकुट के, केवल सादे श्वेत वस्त्रों में खड़े विक्रमादित्य का मुखमण्डल साक्षात् ब्रह्मर्षि के समान दमक रहा था!

Panel 24
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दृश्य 5

भिक्षुक का आत्म-ज्ञान, देवों की पुष्प-वर्षा और लोक-कल्याण

Beggar
Overwhelmed by the King's pure soul, Dinabandhu falls to his knees in tears of spiritual awakening
भिक्षुक दीनबन्धु
क्षमा करें, हे राजर्षि! मैं तो केवल आपकी कीर्ति की परीक्षा लेने आया था!

सम्राट के इस निष्काम त्याग को देखकर भिक्षुक दीनबन्धु की आत्मा जाग उठी; वह अश्रुओं से सम्राट के चरणों में गिर पड़ा!

भिक्षुक दीनबन्धु

क्षमा करें, हे राजर्षि! मैं तो केवल आपकी कीर्ति की परीक्षा लेने आया था!

Panel 25
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The beggar proclaims: 'Let this palace become a free hospital and university!'
भिक्षुक दीनबन्धु
यह धन सम्पूर्ण आर्यावर्त के अनाथों और रोगियों की सेवा करेगा!

दीनबन्धु ने घोषणा की: 'जब सम्राट ने साम्राज्य का मोह त्याग दिया, तो मैं इस सोने को कैसे रखूँ? यह सम्पूर्ण स्वर्ण-प्रासाद निर्धनों हेतु चिकित्सालय और विश्वविद्यालय बनेगा!'

भिक्षुक दीनबन्धु

यह धन सम्पूर्ण आर्यावर्त के अनाथों और रोगियों की सेवा करेगा!

Panel 26
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Lord Indra, Varuna, and Agni appear in the sacred Yajna smoke, showering Parijata flowers

यज्ञ के पावन धूम्र से देवराज इन्द्र, वरुण और अग्नि देव प्रकट हुए और सम्राट विक्रमादित्य पर पारिजात पुष्पों की वर्षा की!

Panel 27
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The hundred thousand citizens and vassal kings erupt in ecstatic cheers

लाखों नागरिकों और राजाओं का जयघोष गूँज उठा: 'त्याग-शिरोमणि सम्राट विक्रमादित्य की जय! धर्म-सम्राट की जय!'

Panel 28
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Stone masons transform the golden pavilion into a free public hospital and academy

उस स्वर्ण-मण्डप के स्थान पर आर्यावर्त का सबसे विशाल निःशुल्क आयुर्वेद चिकित्सालय और ज्ञान-गुरुकुल स्थापित हुआ।

Panel 29
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Sages, citizens, and kings join hands in celebration, honoring the conquest of ego

समस्त राष्ट्र में त्याग का दिव्य प्रकाश फैल गया; संसार ने जाना कि सच्ची विजय धन जोड़ने में नहीं, वरन् अहंकार और लोभ को भस्म करने में है!

Panel 30
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दृश्य 6

जयलक्ष्मी का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Jayalakshmi
Back in Dharanagari palace, Jayalakshmi looks directly at King Bhoja with diamond-gold eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली जयलक्ष्मी ने राजा भोज को गम्भीर हीरक-नयनों से देखा।

Panel 31
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Jayalakshmi challenges: 'Have you ever given away your golden palace and crown to a beggar?'
पुतली जयलक्ष्मी
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी महा-यज्ञ की पूर्णाहूति पर अपना सम्पूर्ण स्वर्ण-प्रासाद, राजकोष के भण्डार और अपना राजमुकुट किसी भिक्षुक को बिना पलक झपकाए दान किया है? यदि ऐसा सर्वस्व-त्याग तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

जयलक्ष्मी ने तीसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:

पुतली जयलक्ष्मी

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी महा-यज्ञ की पूर्णाहूति पर अपना सम्पूर्ण स्वर्ण-प्रासाद, राजकोष के भण्डार और अपना राजमुकुट किसी भिक्षुक को बिना पलक झपकाए दान किया है? यदि ऐसा सर्वस्व-त्याग तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

Panel 32
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King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's renunciation
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसा सर्वस्व-त्याग, राजमुकुट और स्वर्ण-प्रासाद को तृण के समान दान करने की अनासक्ति और अहंकार को भस्म करने का शील नहीं है, देवि। मैं इस तीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसा सर्वस्व-त्याग, राजमुकुट और स्वर्ण-प्रासाद को तृण के समान दान करने की अनासक्ति और अहंकार को भस्म करने का शील नहीं है, देवि। मैं इस तीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
•
King Bhoja steps down from the thirtieth step, ordering free public universities established

राजा भोज तीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में निःशुल्क चिकित्सालय, लोक-कल्याण गुरुकुल और राजसी सम्पत्ति पर सीमा लगाने के आदेश दिए।

Panel 34
•
King Bhoja issues royal proclamations establishing free public hospitals

राज्य-भर में निर्धनों और विद्यार्थियों हेतु स्थायी लोक-सेवा न्यासों की स्थापना हुई।

Panel 35
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Twilight conches echo across Dharanagari as Jayalakshmi smiles and freezes back into silent bronze

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और जयलक्ष्मी मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का तीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

Panel 36
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The final two celestial statues gleam in the evening torchlight, awaiting the thirty-first test

अन्तिम दो कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, इकतीसवीं पुतली (कौशल्या-सुलक्षणा) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

Panel 37
•
King Bhoja departs the throne hall in quiet contemplation, inspired by Vikramaditya's renunciation
राजा भोज
"कल प्रातःकाल हम इकतीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और इकतीसवीं पुतली की अमर गाथा सुनेंगे!"

राजा भोज सर्वस्व-त्याग के परम सत्य को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।

राजा भोज

"कल प्रातःकाल हम इकतीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और इकतीसवीं पुतली की अमर गाथा सुनेंगे!"

Panel 38
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