त्रिंशत् पुतली जयलक्ष्मी: सार्वभौम त्याग का महा-यज्ञ, सुवर्ण-वेदी और निर्धन भिक्षुक की विजय
The Thirtieth Statue: Jayalakshmi & The Sarvamedha Sacrifice
तीसवाँ सूर्योदय और जयलक्ष्मी का प्रबोधन
The Thirtieth Dawn & Jayalakshmi
तीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से तीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण तीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी हीरक-स्वर्णिम और विजय-मरकत दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

तीसवीं कांस्य-पुतली—जयलक्ष्मी—की हीरक-नयन खुले और वह सुवर्ण-जय-पद्म व यज्ञ-स्रुवा हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस तीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और जय-पद्म धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे जयलक्ष्मी देवि! विक्रमादित्य के किस सार्वभौम त्याग और महा-यज्ञ के अमर सत्कार की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

जयलक्ष्मी ने सुवर्ण-जय-पद्म उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा सर्वस्व-त्याग का अगाध तेज है, जब सर्वमेध महा-यज्ञ की पूर्णाहूति पर सम्पूर्ण स्वर्ण-प्रासाद, राजकोष के भण्डार और अपना राजमुकुट एक निर्धन भिक्षुक को बिना पलक झपकाए दान कर दिया?
शिप्रा तट का सर्वमेध महा-यज्ञ और सुवर्ण-मण्डप
The Monumental Sarvamedha Yajna of Ujjayini
उज्जयिनी के पावन शिप्रा-तट पर सम्राट विक्रमादित्य ने आर्यावर्त के समस्त राजाओं और लाखों नागरिकों की उपस्थिति में 'सर्वमेध महा-यज्ञ' का आयोजन किया।

यज्ञ-भूमि के केन्द्र में बारह रत्न-जड़ित वेदियों वाला एक अलौकिक सुवर्ण-प्रासाद निर्मित था, जो सूर्य के समान दमक रहा था!

वेदी के चारों ओर मोतियों के पर्वत, रेशम के थान, मणियों के संदूक और एक करोड़ स्वर्ण-मुद्राओं के भण्डार दान हेतु रखे थे।

प्रधान कुलगुरु महर्षि वेदगर्भ ने वेदमन्त्रों का उच्च स्वर में घोष करते हुए पूर्णाहूति की तैयारी की।
ॐ स्वाहा! सार्वभौम चक्रवर्ती विक्रमादित्य के इस महा-यज्ञ की जय हो!

सम्राट विक्रमादित्य राजसी मुकुट और स्वर्ण-कवच धारण कर पूर्णाहूति हेतु यज्ञ-कुण्ड के सम्मुख खड़े थे।

तभी यज्ञ-शाला के बाह्य द्वार पर फटे वल्कल वस्त्र पहने, नंगे पाँव काँपता हुआ एक निर्धन भिक्षुक—दीनबन्धु—प्रकट हुआ।
पूर्णाहूति के समय भिक्षुक की माँग और राजा का सत्कार
The Destitute Beggar at the Final Oblation
राज-रक्षकों ने भालों से उस मैले-कुचैले भिक्षुक को पवित्र सुवर्ण-मण्डप से बाहर धकेलने का प्रयास किया।

विक्रमादित्य ने तुरन्त पुकारा: 'रुक जाओ! यदि एक भी भूखी आत्मा द्वार से लौट जाए, तो यह महा-यज्ञ निष्फल हो जाएगा!'
भिक्षुक को ससम्मान भीतर आने दो!

सम्राट स्वयं सुवर्ण-वेदी से नीचे उतरे और नंगे पाँव यज्ञ की धूल में चलकर भिक्षुक के समक्ष पहुँचे।

आर्यावर्त के चक्रवर्ती राजा ने हाथ जोड़कर भिक्षुक के चरणों में शीश झुकाया और जल का पात्र आगे बढ़ाया।
कहो, भद्र पुरुष! विक्रमादित्य के इस महा-यज्ञ से तुम्हें क्या चाहिए?

भिक्षुक दीनबन्धु ने राजा की परीक्षा लेते हुए दुस्साहस से कहा: 'मुझे यह सम्पूर्ण सुवर्ण-प्रासाद, चारों ओर रखे खजानों के संदूक और आपके सिर का राजमुकुट चाहिए!'
यदि सच्चे महादानी हो, तो यह सब मुझे दे दो!

उपस्थित सामन्तों और राजाओं में क्रोध की लहर दौड़ गई; सबने इस धृष्टता पर भिक्षुक को दण्डित करने की माँग की।
यह भिक्षुक पागल है! इसे कारागार में डालिए, महाराज!
सर्वस्व-त्याग का संकल्प, मुकुट का समर्पण और सङ्कल्प-जल
The Supreme Renunciation & Gift of Empire
विक्रमादित्य के मुख पर त्याग का दिव्य आनन्द खिल उठा: 'जो ईश्वर की दी हुई सम्पदा है, वह ईश्वर की सन्तान को देने में संकोच कैसा!'
यह सब आज से तुम्हारा है, विप्रवर!

सम्राट ने अपने शीश से हीरों से जड़ा सुवर्ण-मुकुट उतारा और स्नेहपूर्वक भिक्षुक के हाथों में रख दिया।
यह मुकुट भी तुम्हारा है, भाई!

सुवर्ण-झारी से पावन शिप्रा-जल भिक्षुक की हथेलियों पर प्रवाहित कर सम्राट ने सम्पूर्ण सुवर्ण-प्रासाद और खजानों के दान का सङ्कल्प पूर्ण किया।

सम्राट ने चालीस राजकोषों की सुवर्ण-कुंजियाँ भी भिक्षुक को सौंप दीं, बिना पीछे मुड़े या एक क्षण भी मोह किए!
सुखी रहो, भाई! अब तुम्हारे जीवन में कभी दरिद्रता की छाया न पड़ेगी।

उपस्थित सभी राजा, महर्षि और योद्धा इस अकल्पनीय त्याग को देखकर अवाक् रह गए; इतिहास में ऐसा सम्राट कभी न हुआ था!

बिना किसी आभूषण और मुकुट के, केवल सादे श्वेत वस्त्रों में खड़े विक्रमादित्य का मुखमण्डल साक्षात् ब्रह्मर्षि के समान दमक रहा था!
भिक्षुक का आत्म-ज्ञान, देवों की पुष्प-वर्षा और लोक-कल्याण
Beggar
सम्राट के इस निष्काम त्याग को देखकर भिक्षुक दीनबन्धु की आत्मा जाग उठी; वह अश्रुओं से सम्राट के चरणों में गिर पड़ा!
क्षमा करें, हे राजर्षि! मैं तो केवल आपकी कीर्ति की परीक्षा लेने आया था!

दीनबन्धु ने घोषणा की: 'जब सम्राट ने साम्राज्य का मोह त्याग दिया, तो मैं इस सोने को कैसे रखूँ? यह सम्पूर्ण स्वर्ण-प्रासाद निर्धनों हेतु चिकित्सालय और विश्वविद्यालय बनेगा!'
यह धन सम्पूर्ण आर्यावर्त के अनाथों और रोगियों की सेवा करेगा!

यज्ञ के पावन धूम्र से देवराज इन्द्र, वरुण और अग्नि देव प्रकट हुए और सम्राट विक्रमादित्य पर पारिजात पुष्पों की वर्षा की!

लाखों नागरिकों और राजाओं का जयघोष गूँज उठा: 'त्याग-शिरोमणि सम्राट विक्रमादित्य की जय! धर्म-सम्राट की जय!'

उस स्वर्ण-मण्डप के स्थान पर आर्यावर्त का सबसे विशाल निःशुल्क आयुर्वेद चिकित्सालय और ज्ञान-गुरुकुल स्थापित हुआ।

समस्त राष्ट्र में त्याग का दिव्य प्रकाश फैल गया; संसार ने जाना कि सच्ची विजय धन जोड़ने में नहीं, वरन् अहंकार और लोभ को भस्म करने में है!
जयलक्ष्मी का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Jayalakshmi
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली जयलक्ष्मी ने राजा भोज को गम्भीर हीरक-नयनों से देखा।

जयलक्ष्मी ने तीसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी महा-यज्ञ की पूर्णाहूति पर अपना सम्पूर्ण स्वर्ण-प्रासाद, राजकोष के भण्डार और अपना राजमुकुट किसी भिक्षुक को बिना पलक झपकाए दान किया है? यदि ऐसा सर्वस्व-त्याग तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा सर्वस्व-त्याग, राजमुकुट और स्वर्ण-प्रासाद को तृण के समान दान करने की अनासक्ति और अहंकार को भस्म करने का शील नहीं है, देवि। मैं इस तीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज तीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में निःशुल्क चिकित्सालय, लोक-कल्याण गुरुकुल और राजसी सम्पत्ति पर सीमा लगाने के आदेश दिए।

राज्य-भर में निर्धनों और विद्यार्थियों हेतु स्थायी लोक-सेवा न्यासों की स्थापना हुई।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और जयलक्ष्मी मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का तीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

अन्तिम दो कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, इकतीसवीं पुतली (कौशल्या-सुलक्षणा) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज सर्वस्व-त्याग के परम सत्य को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम इकतीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और इकतीसवीं पुतली की अमर गाथा सुनेंगे!"