एकोनविंशति पुतली रूपरेखा: रेशमी चित्र-पट, गान्धार की लुप्त राजकुमारी और निष्काम रक्षा-धर्म
The Nineteenth Statue: Ruparekha & The Painted Silk Scroll
उन्नीसवाँ सूर्योदय और रूपरेखा का प्रबोधन
The Nineteenth Dawn & Ruparekha
उन्नीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से उन्नीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण उन्नीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी मरकत-हरित और गुलाब-स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

उन्नीसवीं कांस्य-पुतली—रूपरेखा—की मरकत-नयन खुले और वह सुवर्ण-तूलिका व रेशमी चित्र-पट हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस उन्नीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और चित्र-पट धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे रूपरेखा देवि! विक्रमादित्य के किस निष्काम रक्षा-धर्म और गान्धार-पराक्रम की अमर गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

रूपरेखा ने रेशमी चित्र-पट खोलकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा निष्काम रक्षा-धर्म और क्षत्रिय-तेज है, जब एक चित्र-पट देखकर वे बर्फीले तूफानों को चीरते हुए गान्धार की बन्दी राजकुमारी को दस्युओं के दुर्ग से छुड़ा लाए और बिना किसी पुरस्कार या विवाह के उसे पिता को सौंप दिया?
गान्धार के चित्रकार चित्रसेन का आगमन और रेशमी चित्र-पट
The Master Painter & The Wondrous Silk Scroll
उज्जयिनी के वसन्तोत्सव के राज-दरबार में गान्धार के सुप्रसिद्ध चित्रकार चित्रसेन अपनी फटी चादर में लिपटा एक रेशमी बक्सा लेकर सम्राट के सम्मुख उपस्थित हुए।

चित्रसेन ने सभा के सम्मुख एक अलौकिक रेशमी चित्र-पट खोला, जिस पर गान्धार की परम सुन्दरी राजकुमारी चन्द्रमुखी का सजीव चित्र बना था।
महाराज! यह गान्धार-नरेश सिंहवर्धन की पुत्री राजकुमारी चन्द्रमुखी का साक्षात् रूप है!

चित्र में राजकुमारी के नयनों से अश्रु टपकते प्रतीत हो रहे थे; उसकी अलौकिक शोभा देखकर पूरी राजसभा मुग्ध हो गई।

चित्रकार ने रोते हुए व्यथा सुनाई कि छह मास पूर्व हिमवन्त पर्वत के क्रूर दस्युपति खड्गधर ने सीमा पर आक्रमण कर राजकुमारी का अपहरण कर लिया और अपने अभेद्य बर्फीले दुर्ग 'खड्ग-दुर्ग' में बन्दी बना रखा है!
महाराज सिंहवर्धन पुत्री के वियोग में मृत्यु-शय्या पर पड़े हैं और उत्तर का कोई राजा उस बर्फीले दर्रे को पार करने का साहस नहीं करता!

विक्रमादित्य ने सिंहासन से उठकर वज्र-समान स्वर में कहा: 'भारतवर्ष की किसी भी अबला कन्या का कारागार में तड़पना समस्त क्षत्रियों के लिए लज्जा का विषय है! मैं आज ही गान्धार के हिम-शिखरों पर प्रस्थान करूँगा!'
चित्रसेन! मुझे उस दुर्ग का मानचित्र दिखाओ; राजकुमारी अवश्य मुक्त होगी!

विक्रमादित्य ने चर्म-कवच धारण किया, वूट्ज़ तलवार कसी और अपने प्रसिद्ध काले अश्व 'मेघवर्ण' पर सवार होकर उत्तर दिशा की ओर कूच कर दिया।
हिमवन्त के बर्फीले दर्रे और सम्राट का अगाध दया-भाव
The Perilous Journey Through Frozen Passes
विक्रमादित्य और चित्रकार गान्धार की दुर्गम पर्वतमालाओं और आकाश चूमते हिमवन्त शिखरों में प्रविष्ट हुए।

अचानक भीषण हिम-तूफान आया; बर्फीली हवाओं और हिम-स्खलन (एवलांच) की गर्जना से संकीर्ण दर्रे काँप उठे!

चित्रकार चित्रसेन अत्यधिक ठण्ड और श्वास-कष्ट से मूर्च्छित होकर गहरी बर्फ में गिर पड़ा।
महाराज... मुझे यहीं छोड़ दें... आप आगे बढ़ें...

विक्रमादित्य ने अपना राजसी ऊनी लबादा उतारकर चित्रकार को लपेटा और उस मूर्च्छित व्यक्ति को अपने चौड़े कन्धों पर उठा लिया!
एक भी निर्दोष साथी को त्यागे बिना विजय प्राप्त करना ही सच्चा धर्म है!

एक प्राचीन शिव-गुहा में आश्रय लेकर विक्रमादित्य ने योग-अग्नि से काष्ठ प्रज्वलित किए और उष्ण जड़ी-बूटियों के रस से चित्रकार को नव-जीवन दिया।

मध्यरात्रि की चाँदनी में खड्ग-दुर्ग का बर्फीला शिखर सामने दिखाई दे रहा था; युद्ध का क्षण निकट आ चुका था।
खड्ग-दुर्ग पर आक्रमण, पाषाण-प्राचीर और दस्यु-संहार
The Infiltration of Khadga-Durg & The Icy Duel
खड्ग-दुर्ग एक सीधी बर्फीली चट्टान पर बना था, जिसके चारों ओर अगाध खाई और पहरेदार तैनात थे।

हिम-तूफान की ओट में विक्रमादित्य ने लोहे के अंकुशों और रस्सियों की सहायता से खड़ी बर्फीली प्राचीर को मूक गति से लाँघ लिया!

शीत-कक्ष में राजकुमारी चन्द्रमुखी लोहे की बेड़ियों में जकड़ी हुई एक पाषाण-शिवलिंग के सम्मुख रक्षा की प्रार्थना कर रही थी।

तभी दस्युपति खड्गधर अपने बीस खूंखार डाकुओं के साथ भारी कुल्हाड़े और बर्छियां लहराता हुआ कमरे में कूद पड़ा!
कौन है जो मेरी मांद में घुसने का साहस करता है?! इसे बर्फ में काट डालो!

बर्फीली प्राचीर पर विक्रमादित्य की वूट्ज़ तलवार बिजली की भाँति कौंधी; एक-एक कर डाकुओं के अस्त्र कटकर खाई में गिरने लगे!
अधर्म का दण्ड मृत्यु या आत्मसमर्पण है!

एक प्रचण्ड वार से विक्रमादित्य ने दस्युपति के भारी कुल्हाड़े को दो टुकड़ों में काट दिया और उसे घुटनों पर झुकाकर आत्मसमर्पण पर विवश कर दिया!
राजकुमारी की मुक्ति, गान्धार-राज का कृतज्ञ समर्पण और निष्काम शील
The Sacred Return & Supreme Renunciation
विक्रमादित्य ने तलवार की नोक से राजकुमारी की बेड़ियां काट दीं और अपना वस्त्र उनके कन्धों पर रखकर अभय दिया।
आप कौन देवपुरुष हैं जिन्होंने नरक से मेरी रक्षा की?!

सम्राट ने राजकुमारी और चित्रकार को अपने अश्व पर सुरक्षित बैठाकर गान्धार की राजधानी पुरुषपुर की ओर प्रस्थान किया।

पुरुषपुर के राजप्रासाद में अपनी जीवित और सुरक्षित पुत्री को देखकर गान्धार-नरेश सिंहवर्धन हर्ष के आंसुओं से रो पड़े और उनका रोग तत्काल दूर हो गया!

गान्धार-नरेश ने हाथ जोड़कर अपना आधा राज्य, मणियों का अपार खजाना और राजकुमारी चन्द्रमुखी का पाणिग्रहण करने का प्रस्ताव रखा।
यह राज्य और मेरी पुत्री दोनों आपके चरणों में समर्पित हैं, हे आर्यावर्त के सूर्य!

विक्रमादित्य ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े: 'धर्म-रक्षा क्षत्रिय का पावन कर्तव्य है, कोई व्यापार नहीं! राजकुमारी चन्द्रमुखी मेरी पुत्री के समान पूज्य हैं और यह खजाना गान्धार की प्रजा का है!'
मुझे एक भी मणिक या पुरस्कार नहीं चाहिए!

गान्धार की पूरी राजसभा उस निष्काम सम्राट के त्याग और शील के सम्मुख नतमस्तक हो गई; विक्रमादित्य बिना कोई कर लिए उज्जयिनी लौट पड़े।
रूपरेखा का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Ruparekha
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली रूपरेखा ने राजा भोज को गम्भीर मरकत-नयनों से देखा।

रूपरेखा ने उन्नीसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी चित्र-पट देखकर बर्फीले तूफानों को चीरते हुए किसी अबला कन्या की रक्षा की है, और राजकुमारी व आधे राज्य का प्रस्ताव बिना लोभ के लौटाया है? यदि ऐसा अदम्य शौर्य और निष्काम शील तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा निष्काम रक्षा-धर्म, हिम-शिखरों का अदम्य शौर्य और राजकुमारी व राज्य को तृणवत् लौटाने का पावन शील नहीं है, देवि। मैं इस उन्नीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज उन्नीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा मालवा के सीमांत क्षेत्रों में आपदा-राहत छावनियाँ, पर्वतीय आश्रय-गृह और महिला-रक्षा वाहिनी स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में स्त्रियों की सुरक्षा और पर्वतीय यात्रियों की सहायता हेतु विशेष सुरक्षा-कोष का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और रूपरेखा मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का उन्नीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष तेरह कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, बीसवीं पुतली (ज्ञानवती) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज निष्काम शील और पवित्र रक्षा-धर्म के अमर आदर्शों को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम बीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और बीसवीं पुतली—ज्ञानवती—की अमर गाथा सुनेंगे!"