विंशति पुतली ज्ञानवती: देव-अश्व का विवाद, खुर-चिह्न परीक्षण और प्रज्ञाचक्षु का निष्पक्ष न्याय
The Twentieth Statue: Jnanavati & The Disputed Stallion
बीसवाँ सूर्योदय और ज्ञानवती का प्रबोधन
The Twentieth Dawn & Jnanavati
बीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से बीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण बीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी नील-मणि और प्रखर स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

बीसवीं कांस्य-पुतली—ज्ञानवती—की नील-नयन खुले और वह सुवर्ण-अश्व-लगाम व न्याय-पत्र हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस बीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और अश्व-लगाम धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे ज्ञानवती देवि! विक्रमादित्य के किस न्याय-कौशल और प्राणी-विज्ञान के परीक्षण की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

ज्ञानवती ने सुवर्ण-अश्व-लगाम उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म न्याय-विवेक और प्राणी-मनोविज्ञान की दृष्टि है, जब पचास झूठे धनी गवाहों और जाली दस्तावेजों के जाल से उन्होंने एक निर्धन चरवाहे के देव-अश्व को नेत्र-पट्टी बाँधकर सत्य से छुड़ा लिया?
उज्जयिनी की राजसभा, श्वेत अश्व और सामन्त का षड्यन्त्र
The Disputed Celestial Stallion & Fifty False Witnesses
उज्जयिनी के सभागार में सम्राट विक्रमादित्य के सम्मुख एक अभूतपूर्व और जटिल विवाद प्रस्तुत हुआ।

सभागार के मध्य में दूध जैसा श्वेत, चाँदी जैसी अयाल वाला एक अलौकिक सिन्धी अश्व 'श्वेतकेतु' खड़ा था, जिसकी चाल पवन से भी तीव्र थी।

धनी सामन्त वृषभदत्त ने जाली वंशावली पत्र और स्वर्ण-काठी दिखाते हुए दावा किया कि यह अश्व उसके निजी अस्तबल से चुराया गया है।
महाराज! यह उच्च कुलीन अश्व मेरे अस्तबल की धरोहर है; इस कंगाल चरवाहे ने इसे चुराया है!

सामन्त के पक्ष में पचास धनी जागीरदारों और नगर-सेठों ने झूठी शपथ ली कि उन्होंने इस घोड़े को सामन्त के बाड़े में पलते देखा है।
हम सब शपथ लेते हैं कि यह घोड़ा सामन्त वृषभदत्त का ही है!

फटेहाल अठारह वर्षीय अनाथ चरवाहा सोमका फूट-फूट कर रो पड़ा: 'महाराज! मैंने इसे लावारिस बछड़े के रूप में बकरी का दूध पिलाकर और जंगली घास खिलाकर पाला है!'
मेरे पास धनवान् गवाह नहीं हैं, पर मेरा घोड़ा मुझे पहचानता है!

न्यायाधीश कागजी मुहरों और पचास गवाहों के दबाव में आकर चरवाहे को कारागार और कोड़े लगाने का दण्ड सुनाने ही वाले थे।
शालिहोत्र अश्व-शास्त्र और सम्राट का सूक्ष्म परीक्षण
The Emperor
सम्राट विक्रमादित्य ने अपना हाथ उठाकर न्यायाधीशों को रोका और स्वयं सिंहासन से नीचे उतरकर अश्व के समीप पहुँचे।
रुकिए! जहाँ पचास मनुष्य धन के लोभ में सत्य को ढक सकते हैं, वहाँ मूक पशु का हृदय कभी असत्य नहीं बोलता!

विक्रमादित्य ने प्राचीन शालिहोत्र अश्व-शास्त्र के अनुसार घोड़े के खुरों, नथुनों और श्वास की गति का सूक्ष्म निरीक्षण किया।

घोड़ा सामन्त के इत्र और चाबुक की गन्ध से घृणा में पीछे हट रहा था, परन्तु सोमका के धीमी सीटी बजाते ही उसके कान आदर से खड़े हो जाते थे!

विक्रमादित्य ने घोषणा की: 'राजप्रासाद के खुले प्रांगण में इस अश्व की आँखों पर पट्टी बाँधकर परीक्षा होगी!'
जो इसका वास्तविक स्वामी होगा, अंधा होने पर भी यह अश्व उसी के चरणों में मस्तक झुकाएगा!

राज-रक्षकों ने धूप से चमकते प्रांगण में एक विशाल गोलाकार अखाड़ा तैयार किया।

हज़ारों नागरिक और दरबारी रेलिंग के चारों ओर दम साधे खड़े हो गए; न्याय की अनोखी परीक्षा आरम्भ होने वाली थी।
नेत्र-पट्टी परीक्षा और मूक पशु का सत्य
The Blindfold Equine Behavior Trial
अश्वपालकों ने 'श्वेतकेतु' की आँखों पर काली रेशमी पट्टी बाँध दी और उसकी दिशा भ्रष्ट करने हेतु उसे तीन बार गोल घुमाया।

सामन्त वृषभदत्त ने अखाड़े में कदम रखकर कड़क आवाज में पुकारा और चाबुक लहराया; पट्टी बँधा अश्व क्रुद्ध होकर पिछले पैरों पर खड़ा हो गया और हवा में दुलत्ती चलाई!
ऐ दुष्ट घोड़े! पहचान अपने स्वामी को!

सामन्त भयभीत होकर धूल में पीछे गिर पड़ा; घोड़े ने उसे लगभग कुचल ही दिया था!

अब विक्रमादित्य के आदेश पर निर्धन सोमका नंगे पाँव अखाड़े में उतरा और बिना छुए अपनी पुरानी देहाती धुन में सीटी बजाई।

सीटी सुनते ही अंधे बने अश्व का सारा क्रोध शान्त हो गया; उसने मन्द हिनहिनाहट के साथ सिर झुकाया और धीरे-धीरे सोमका की ओर बढ़ा!
देखो! पट्टी बँधा घोड़ा अपने सच्चे बालक की ओर बढ़ रहा है!

अश्व ने अपना मस्तक सोमका के सीने से सटा दिया और रोते हुए बालक के हाथों को चाटने लगा; मूक प्राणी का असीम प्रेम देखकर पूरी राजसभा की आँखें भर आईं!
मेरा श्वेतकेतु! तू मुझे कभी नहीं भूल सकता!
अन्न-परीक्षण, सामन्त का अपराध-स्वीकार और सत्य का जयकार
The Feeding Test & Justice Restored
अन्तिम संशय मिटाने हेतु विक्रमादित्य ने दो थाल मँगवाए: एक में सामन्त का मधु-मिश्रित दाना था और दूसरे में सोमका की पहाड़ी हरी घास।

अश्व ने सामन्त के महँगे दाने को मुँह भी नहीं लगाया और सोमका के हाथों से पहाड़ी घास को बड़े प्रेम से खा लिया!

पशु के अकाट्य साक्ष्य के सामने सामन्त वृषभदत्त थर-थर काँपने लगा और सम्राट के चरणों में गिरकर सारा षड्यन्त्र स्वीकार कर लिया।
क्षमा करें, महाराज! इसके तेज को देखकर मेरे मन में लोभ आ गया था!

विक्रमादित्य ने सामन्त की जागीर जब्त कर उस पर दस हज़ार स्वर्ण-दीनार का जुरमाना लगाया और वह सारी धनराशि सोमका को क्षतिपूर्ति में दिलवाई!
न्याय में निर्धन का एक सच्चा आँसू पचास धनवानों के स्वर्ण-पत्रों से भारी होता है!

सम्राट ने निष्कपट सोमका को उज्जयिनी के राज-अस्तबलों का महा-अश्वाध्यक्ष नियुक्त किया।

हज़ारों नागरिकों के जयघोष के बीच सोमका ने अपने श्वेत अश्व पर विजय-सवारी की; धर्म और सत्य की विजय हुई!
ज्ञानवती का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Jnanavati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली ज्ञानवती ने राजा भोज को गम्भीर नील-नयनों से देखा।

ज्ञानवती ने बीसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी पचास धनवान् झूठे गवाहों और जाली दस्तावेजों के जाल को भेदकर मूक पशु के मनोविज्ञान से किसी निर्धन चरवाहे को न्याय दिलाया है? यदि ऐसी वैज्ञानिक न्याय-दृष्टि तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा सूक्ष्म प्राणी-विज्ञान, जाली गवाहों के षड्यन्त्र को पशु-व्यवहार से भेदने की दृष्टि और निर्धनों की रक्षा का साहस नहीं है, देवि। मैं इस बीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज बीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में झूठी गवाही देने वालों के विरुद्ध कठोर दण्ड और किसान-पशुधन संरक्षण न्यायालय स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में निर्धन चरवाहों और किसानों के पशुधन की सुरक्षा हेतु विशेष न्याय-मण्डलों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और ज्ञानवती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का बीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष बारह कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, इक्कीसवीं पुतली (चन्द्रज्योति) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज पशु-प्रेम, निष्पक्ष न्याय और सत्य की शक्ति को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम इक्कीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और इक्कीसवीं पुतली—चन्द्रज्योति—की अमर गाथा सुनेंगे!"