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एकविंशति पुतली चन्द्रज्योति: माया-गुहा का भ्रम, योगिनी का शाप और निष्काम आत्म-तेज

सिंहासन बत्तीसी (३२ पुतलियों की अमर गाथा)• katha

एकविंशति पुतली चन्द्रज्योति: माया-गुहा का भ्रम, योगिनी का शाप और निष्काम आत्म-तेज

The Twenty-First Statue: Chandrajyoti & The Cave of Illusions

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दृश्य 1

इक्कीसवाँ सूर्योदय और चन्द्रज्योति का प्रबोधन

The Twenty-First Dawn & Chandrajyoti
Morning sunlight streams across the sandstone colonnade onto the 32-step golden throne

इक्कीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

Panel 1
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King Bhoja in sacred saffron silks approaches the twenty-first step of the throne

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से इक्कीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

Panel 2
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The marble dais erupts with brilliant moonlight-silver and amethyst radiance

जैसे ही राजा का चरण इक्कीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी चन्द्र-धवल और जामुनी-स्फटिक दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

Panel 3
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The twenty-first carved statue Chandrajyoti opens her glowing moonlight-silver eyes, laughing musically
पुतली चन्द्रज्योति
ठहरो, राजा भोज! इस इक्कीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

इक्कीसवीं कांस्य-पुतली—चन्द्रज्योति—की चन्द्र-नयन खुले और वह सुवर्ण-चन्द्र-बिम्ब व स्फटिक-त्रिशूल हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!

पुतली चन्द्रज्योति

ठहरो, राजा भोज! इस इक्कीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

Panel 4
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King Bhoja halts in deep reverence with folded hands, gazing at the living bronze maiden
राजा भोज
हे चन्द्रज्योति देवि! विक्रमादित्य के किस मनोनिग्रह और माया-विजय की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और चन्द्र-बिम्ब धारण की हुई पुतली की ओर देखा।

राजा भोज

हे चन्द्रज्योति देवि! विक्रमादित्य के किस मनोनिग्रह और माया-विजय की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

Panel 5
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Chandrajyoti speaks: 'Do you possess the unwavering mind and spiritual mastery of Vikramaditya?'
पुतली चन्द्रज्योति
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा अचल मनोनिग्रह और आत्म-तेज है, जब माया-गुहा में कंचन, कामिनी और मृत्यु के त्रिविध भ्रमों को उन्होंने ध्यान-योग से भस्म कर पाषाण बने राजकुमार को नव-जीवन दिया?

चन्द्रज्योति ने रजत-चन्द्र-बिम्ब उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:

पुतली चन्द्रज्योति

क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा अचल मनोनिग्रह और आत्म-तेज है, जब माया-गुहा में कंचन, कामिनी और मृत्यु के त्रिविध भ्रमों को उन्होंने ध्यान-योग से भस्म कर पाषाण बने राजकुमार को नव-जीवन दिया?

Panel 6
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दृश्य 2

अवन्ति के व्यापारी की व्यथा और माया-गुहा का रहस्य

The Weeping Merchant of Avanti & The Cursed Cavern
In the grand audience hall of Ujjayini, Vikramaditya listens to an emotional plea

उज्जयिनी के सभागार में अवन्ति का वयोवृद्ध सेठ धनपाल और राज-पुरोहित आँखों में आँसू लिए सम्राट विक्रमादित्य के सम्मुख उपस्थित हुए।

Panel 7
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The merchant weeps, recounting how Prince Chandrasena was lured into the Maya-Guha
सेठ धनपाल
महाराज! उस गुहा में जो भी गया, वह या तो धन और रूप के भ्रम में पागल हो गया या पत्थर का बुत बन गया!

सेठ ने बताया कि उसका एकमात्र कुल-दीपक—युवा राजकुमार चन्द्रसेन—विन्ध्याचल की अभिशप्त 'माया-गुहा' में प्रविष्ट होकर पाषाण-प्रतिमा बन चुका है!

सेठ धनपाल

महाराज! उस गुहा में जो भी गया, वह या तो धन और रूप के भ्रम में पागल हो गया या पत्थर का बुत बन गया!

Panel 8
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Flashback shot of the yawning mouth of the dark cavern surrounded by petrified stone warriors

गुहा के प्रवेश-द्वार पर अनेक योद्धा और राजा भय और लालच के वशीभूत होकर काले पाषाण में जम चुके थे।

Panel 9
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Inside the cave, Yogini Chandika-Priya raises her skull staff, turning travelers into stone

गुहा के भीतर प्राचीन तांत्रिक योगिनी चण्डिकाप्रिया अपने कपाल-दण्ड और मायावी मन्त्रों से मनुष्यों के मन की कमजोरियों को अस्त्र बनाकर उन्हें पाषाण बनाती थी।

Panel 10
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Vikramaditya stands up: 'Where true spiritual light shines, no shadow of illusion can endure!'
सम्राट विक्रमादित्य
धैर्य रखें, श्रेष्ठि! आपका पुत्र अवश्य सजीव लौटकर आएगा!

विक्रमादित्य ने सिंहासन से उठकर अचल स्वर में कहा: 'जहाँ आत्मा का दिव्य प्रकाश जलता है, वहाँ माया का कोई अन्धकार नहीं टिक सकता! मैं आज ही माया-गुहा में प्रवेश करूँगा!'

सम्राट विक्रमादित्य

धैर्य रखें, श्रेष्ठि! आपका पुत्र अवश्य सजीव लौटकर आएगा!

Panel 11
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Vikramaditya mounts his black charger, riding alone into the misty gorges of the Vindhyas

साधारण योद्धा के परिधान में विक्रमादित्य अकेले अपने अश्व पर सवार होकर विन्ध्याचल के बीहड़ अरण्य की ओर बढ़ चले।

Panel 12
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दृश्य 3

कंचन और कामिनी के मायावी भ्रम और सम्राट का वैराग्य

The Descent into the Labyrinth of Illusions
Vikramaditya arrives at the forbidding, moss-covered entrance of the Maya-Guha

सन्ध्या के धुंधलके में विक्रमादित्य माया-गुहा के भयावह पाषाण-द्वार पर पहुँचे, जहाँ से विचित्र ध्वनियाँ गूँज रही थीं।

Panel 13
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Inside the subterranean cavern, eerie green and violet mists swirl with whispering voices

गुहा के भीतर हरी और जामुनी मायावी धुंध तैर रही थी, जिसमें सम्मोहक फुसफुसाहटें गूँज रही थीं।

Panel 14
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The cavern walls turn to solid gold, raining mountains of rubies, emeralds, and diamonds
मायावी वाणी
इस स्वर्ण-राशि को स्वीकार करो, राजन! तुम सम्पूर्ण पृथ्वी के चक्रवर्ती बन जाओगे!

प्रथम परीक्षा 'कंचन-माया' प्रकट हुई—गुहा की दीवारें शुद्ध स्वर्ण की बन गईं और हीरों-माणिक्यों के पर्वत बरसने लगे!

मायावी वाणी

इस स्वर्ण-राशि को स्वीकार करो, राजन! तुम सम्पूर्ण पृथ्वी के चक्रवर्ती बन जाओगे!

Panel 15
•
Vikramaditya steps over the piles of glittering diamonds without glancing
सम्राट विक्रमादित्य
मिट्टी का सोना आत्मा की स्वतंत्रता को नहीं खरीद सकता!

विक्रमादित्य ने उन हीरों और स्वर्ण-राशियों को सूखे पत्तों के समान पैरों तले रौंदते हुए आगे कदम बढ़ाया; उनके मन में धन का रत्ती-भर भी लोभ न था!

सम्राट विक्रमादित्य

मिट्टी का सोना आत्मा की स्वतंत्रता को नहीं खरीद सकता!

Panel 16
•
Shimmering celestial Apsaras appear from the mist, singing enchanting melodies of romance

द्वितीय परीक्षा 'कामिनी-माया' प्रकट हुई—धुंध से रूपवती अप्सराएँ प्रकट हुईं और मादक गान गाते हुए प्रेम-आलिंगन का प्रलोभन देने लगीं।

Panel 17
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Vikramaditya folds his hands in serene reverence as if greeting his own mothers and sisters
सम्राट विक्रमादित्य
वासना और लोभ नश्वर देह के बन्धन हैं; आत्मा इनसे परे है!

विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर मातृ-भाव से नमन किया: 'हे देवियो! आप मेरी माता और भगिनी के समान पूज्य हैं।' उनका मन वासना से सर्वथा अछूता रहा!

सम्राट विक्रमादित्य

वासना और लोभ नश्वर देह के बन्धन हैं; आत्मा इनसे परे है!

Panel 18
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दृश्य 4

भय-माया का तांडव, ध्यान-योग और आत्म-ज्योति का विस्फोट

The Trial of Terror & The Unwavering Mind
The cavern erupts into a fiery nightmare: towering skeletal demons and giant serpents lunge
मायावी राक्षस
तुम इस अग्नि में जलकर राख हो जाओगे!

लोभ और काम के विफल होने पर तृतीय परीक्षा 'भय-माया' का भीषण तांडव आरम्भ हुआ—गुहा में आग की लपटें भड़कीं और विकराल कंकाल-राक्षस दहाड़ते हुए झपटे!

मायावी राक्षस

तुम इस अग्नि में जलकर राख हो जाओगे!

Panel 19
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Illusions of burning cities and screaming citizens appear in the smoke
सम्राट विक्रमादित्य
यह भय मन का भ्रम है; सत्य अडिग है!

धुएँ में उज्जयिनी के जलने और मन्त्रियों के आर्तनाद के मायावी दृश्य दिखाए गए, ताकि सम्राट का हृदय भय से काँप उठे।

सम्राट विक्रमादित्य

यह भय मन का भ्रम है; सत्य अडिग है!

Panel 20
•
Vikramaditya sits calmly in lotus posture on a jagged rock amidst the swirling phantom fire

विक्रमादित्य ने विचलित हुए बिना एक नुकीले पाषाण पर पद्मासन लगाया और नेत्र मूँदकर गहन समाधि में लीन हो गए।

Panel 21
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Vikramaditya chants sacred Vedic verses; a blinding white aura of pure spiritual light radiates
विक्रमादित्य (समाधि में)
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

विक्रमादित्य ने गायत्री मन्त्र का उच्चारण किया; उनके हृदय से शुद्ध श्वेत आत्म-ज्योति का प्रचण्ड दिव्य प्रकाश-पुंज फूट पड़ा!

विक्रमादित्य (समाधि में)

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

Panel 22
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The blinding spiritual light vaporizes the shadowy demons and phantom flames like smoke

उस आत्म-तेज के स्पर्श से सारे मायावी राक्षस, आग की लपटें और भयानक दृश्य धुएँ के समान हवा में विलीन हो गए!

Panel 23
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The labyrinth returns to quiet crystal stone, the triple illusions of Maya totally conquered

पूरी माया-गुहा एक शान्त, दिव्य स्फटिक-कन्दरा में परिवर्तित हो गई; माया का अज्ञान-जाल टूटकर बिखर चुका था!

Panel 24
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दृश्य 5

योगिनी का आत्म-बोध, अमृत-सिंचन और राजकुमार का उद्धार

Confrontation with Yogini & Liberation
Vikramaditya walks into the inner glowing sanctum where Yogini Chandika-Priya stands

विक्रमादित्य गुहा के आन्तरिक मन्दिर में प्रविष्ट हुए, जहाँ योगिनी चण्डिकाप्रिया स्तब्ध होकर खड़ी थी।

Panel 25
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The sorceress lowers her skull staff in astonishment: 'How has a mortal conquered my illusions?!'
योगिनी चण्डिकाप्रिया
तुम कौन महायोगी हो, राजन?!

योगिनी ने अपना कपाल-दण्ड नीचे कर लिया: 'हाड़-मांस का बना एक मनुष्य मेरी त्रिविध महा-माया को बिना किसी भय के कैसे भेद गया?!'

योगिनी चण्डिकाप्रिया

तुम कौन महायोगी हो, राजन?!

Panel 26
•
Vikramaditya speaks with gentle spiritual wisdom about the eternal soul

विक्रमादित्य ने मधुर वाणी में कहा: 'आत्मा नित्य, शुद्ध और भय-रहित है, देवि! भ्रम केवल अहंकार पर शासन करता है; जो सत्य में स्थित है, उसे माया स्पर्श नहीं कर सकती।'

Panel 27
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Moved to tears of spiritual repentance, the Yogini sprinkles sacred Amrita water over the statues

सम्राट के वचनों से योगिनी का कड़वाहट-भरा शाप धुल गया; उसने अश्रु बहाते हुए कमण्डलु से पवित्र अमृत-तीर्थ उन पाषाण-मूर्तियों पर छिड़क दिया!

Panel 28
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The grey stone cracks open, and Prince Chandrasena and twenty warriors awaken to warm life
राजकुमार चन्द्रसेन
आपने हमें पत्थर की मृत्यु से उबारकर नव-जीवन दिया, हे चक्रवर्ती देव!

पाषाण की परतें टूटकर बिखर गईं; राजकुमार चन्द्रसेन और बीस बन्दी योद्धा जीवित होकर कृतज्ञता के अश्रुओं से सम्राट के चरणों में गिर पड़े!

राजकुमार चन्द्रसेन

आपने हमें पत्थर की मृत्यु से उबारकर नव-जीवन दिया, हे चक्रवर्ती देव!

Panel 29
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The Yogini presents the wish-granting Chandra-Mani gem; Vikramaditya gifts it to the prince

योगिनी ने दिव्य 'चन्द्र-मणि' सम्राट को भेंट की; विक्रमादित्य ने वह अमूल्य मणि अपने पास रखने के बजाय राजकुमार को सौंप दी ताकि वह अपनी प्रजा का कल्याण कर सके।

Panel 30
•
दृश्य 6

चन्द्रज्योति का निर्णय और राजा भोज का संकोच

Chandrajyoti
Back in Dharanagari palace, Chandrajyoti looks directly at King Bhoja with moonlight-silver eyes

धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली चन्द्रज्योति ने राजा भोज को गम्भीर चन्द्र-धवल नयनों से देखा।

Panel 31
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Chandrajyoti challenges: 'Have you ever conquered the triple illusions of wealth, lust, and terror?'
पुतली चन्द्रज्योति
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी अपने मन में कंचन, कामिनी और भय के त्रिविध भ्रमों को आत्म-तेज से भस्म कर किसी पाषाण बने प्राणी को नव-जीवन दिया है? यदि ऐसा अचल मनोनिग्रह और वैराग्य तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

चन्द्रज्योति ने इक्कीसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:

पुतली चन्द्रज्योति

अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी अपने मन में कंचन, कामिनी और भय के त्रिविध भ्रमों को आत्म-तेज से भस्म कर किसी पाषाण बने प्राणी को नव-जीवन दिया है? यदि ऐसा अचल मनोनिग्रह और वैराग्य तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

Panel 32
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King Bhoja lowers his head in deep humility and introspection, acknowledging Vikramaditya's mastery
राजा भोज
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अचल मनोनिग्रह, माया के त्रिविध प्रलोभनों को तृणवत् त्यागने की समाधि और आत्म-तेज से दूसरों का उद्धार करने की सिद्धि नहीं है, देवि। मैं इस इक्कीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:

राजा भोज

मुझमें विक्रमादित्य जैसा अचल मनोनिग्रह, माया के त्रिविध प्रलोभनों को तृणवत् त्यागने की समाधि और आत्म-तेज से दूसरों का उद्धार करने की सिद्धि नहीं है, देवि। मैं इस इक्कीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

Panel 33
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King Bhoja steps down from the twenty-first step, ordering meditation academies established

राजा भोज इक्कीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में वैदिक ध्यान-केन्द्र, मानसिक शान्ति आश्रम और दर्शन-अकादमियाँ स्थापित करने की आज्ञा दी।

Panel 34
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King Bhoja issues royal proclamations establishing spiritual wellness retreats

राज्य-भर में नागरिकों के आत्मिक उत्थान और मानसिक संतुलन हेतु साधना-न्यासों का गठन हुआ।

Panel 35
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Twilight conches echo across Dharanagari as Chandrajyoti smiles and freezes back into silent bronze

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और चन्द्रज्योति मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का इक्कीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

Panel 36
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The remaining eleven celestial statues gleam in the evening torchlight

शेष ग्यारह कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, बाईसवीं पुतली (अनुरोधवती) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

Panel 37
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King Bhoja departs the throne hall in quiet contemplation, inspired by Vikramaditya's mind-mastery
राजा भोज
"कल प्रातःकाल हम बाईसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और बाईसवीं पुतली—अनुरोधवती—की अमर गाथा सुनेंगे!"

राजा भोज आत्म-विजय और निष्काम वैराग्य के दिव्य सत्यों को हृदय में धारण कर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।

राजा भोज

"कल प्रातःकाल हम बाईसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और बाईसवीं पुतली—अनुरोधवती—की अमर गाथा सुनेंगे!"

Panel 38
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