एकविंशति पुतली चन्द्रज्योति: माया-गुहा का भ्रम, योगिनी का शाप और निष्काम आत्म-तेज
The Twenty-First Statue: Chandrajyoti & The Cave of Illusions
इक्कीसवाँ सूर्योदय और चन्द्रज्योति का प्रबोधन
The Twenty-First Dawn & Chandrajyoti
इक्कीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने पूर्ण निष्ठा से अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से इक्कीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण इक्कीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी चन्द्र-धवल और जामुनी-स्फटिक दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

इक्कीसवीं कांस्य-पुतली—चन्द्रज्योति—की चन्द्र-नयन खुले और वह सुवर्ण-चन्द्र-बिम्ब व स्फटिक-त्रिशूल हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस इक्कीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और चन्द्र-बिम्ब धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे चन्द्रज्योति देवि! विक्रमादित्य के किस मनोनिग्रह और माया-विजय की पावन गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

चन्द्रज्योति ने रजत-चन्द्र-बिम्ब उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा अचल मनोनिग्रह और आत्म-तेज है, जब माया-गुहा में कंचन, कामिनी और मृत्यु के त्रिविध भ्रमों को उन्होंने ध्यान-योग से भस्म कर पाषाण बने राजकुमार को नव-जीवन दिया?
अवन्ति के व्यापारी की व्यथा और माया-गुहा का रहस्य
The Weeping Merchant of Avanti & The Cursed Cavern
उज्जयिनी के सभागार में अवन्ति का वयोवृद्ध सेठ धनपाल और राज-पुरोहित आँखों में आँसू लिए सम्राट विक्रमादित्य के सम्मुख उपस्थित हुए।

सेठ ने बताया कि उसका एकमात्र कुल-दीपक—युवा राजकुमार चन्द्रसेन—विन्ध्याचल की अभिशप्त 'माया-गुहा' में प्रविष्ट होकर पाषाण-प्रतिमा बन चुका है!
महाराज! उस गुहा में जो भी गया, वह या तो धन और रूप के भ्रम में पागल हो गया या पत्थर का बुत बन गया!

गुहा के प्रवेश-द्वार पर अनेक योद्धा और राजा भय और लालच के वशीभूत होकर काले पाषाण में जम चुके थे।

गुहा के भीतर प्राचीन तांत्रिक योगिनी चण्डिकाप्रिया अपने कपाल-दण्ड और मायावी मन्त्रों से मनुष्यों के मन की कमजोरियों को अस्त्र बनाकर उन्हें पाषाण बनाती थी।

विक्रमादित्य ने सिंहासन से उठकर अचल स्वर में कहा: 'जहाँ आत्मा का दिव्य प्रकाश जलता है, वहाँ माया का कोई अन्धकार नहीं टिक सकता! मैं आज ही माया-गुहा में प्रवेश करूँगा!'
धैर्य रखें, श्रेष्ठि! आपका पुत्र अवश्य सजीव लौटकर आएगा!

साधारण योद्धा के परिधान में विक्रमादित्य अकेले अपने अश्व पर सवार होकर विन्ध्याचल के बीहड़ अरण्य की ओर बढ़ चले।
कंचन और कामिनी के मायावी भ्रम और सम्राट का वैराग्य
The Descent into the Labyrinth of Illusions
सन्ध्या के धुंधलके में विक्रमादित्य माया-गुहा के भयावह पाषाण-द्वार पर पहुँचे, जहाँ से विचित्र ध्वनियाँ गूँज रही थीं।

गुहा के भीतर हरी और जामुनी मायावी धुंध तैर रही थी, जिसमें सम्मोहक फुसफुसाहटें गूँज रही थीं।

प्रथम परीक्षा 'कंचन-माया' प्रकट हुई—गुहा की दीवारें शुद्ध स्वर्ण की बन गईं और हीरों-माणिक्यों के पर्वत बरसने लगे!
इस स्वर्ण-राशि को स्वीकार करो, राजन! तुम सम्पूर्ण पृथ्वी के चक्रवर्ती बन जाओगे!

विक्रमादित्य ने उन हीरों और स्वर्ण-राशियों को सूखे पत्तों के समान पैरों तले रौंदते हुए आगे कदम बढ़ाया; उनके मन में धन का रत्ती-भर भी लोभ न था!
मिट्टी का सोना आत्मा की स्वतंत्रता को नहीं खरीद सकता!

द्वितीय परीक्षा 'कामिनी-माया' प्रकट हुई—धुंध से रूपवती अप्सराएँ प्रकट हुईं और मादक गान गाते हुए प्रेम-आलिंगन का प्रलोभन देने लगीं।

विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर मातृ-भाव से नमन किया: 'हे देवियो! आप मेरी माता और भगिनी के समान पूज्य हैं।' उनका मन वासना से सर्वथा अछूता रहा!
वासना और लोभ नश्वर देह के बन्धन हैं; आत्मा इनसे परे है!
भय-माया का तांडव, ध्यान-योग और आत्म-ज्योति का विस्फोट
The Trial of Terror & The Unwavering Mind
लोभ और काम के विफल होने पर तृतीय परीक्षा 'भय-माया' का भीषण तांडव आरम्भ हुआ—गुहा में आग की लपटें भड़कीं और विकराल कंकाल-राक्षस दहाड़ते हुए झपटे!
तुम इस अग्नि में जलकर राख हो जाओगे!

धुएँ में उज्जयिनी के जलने और मन्त्रियों के आर्तनाद के मायावी दृश्य दिखाए गए, ताकि सम्राट का हृदय भय से काँप उठे।
यह भय मन का भ्रम है; सत्य अडिग है!

विक्रमादित्य ने विचलित हुए बिना एक नुकीले पाषाण पर पद्मासन लगाया और नेत्र मूँदकर गहन समाधि में लीन हो गए।

विक्रमादित्य ने गायत्री मन्त्र का उच्चारण किया; उनके हृदय से शुद्ध श्वेत आत्म-ज्योति का प्रचण्ड दिव्य प्रकाश-पुंज फूट पड़ा!
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

उस आत्म-तेज के स्पर्श से सारे मायावी राक्षस, आग की लपटें और भयानक दृश्य धुएँ के समान हवा में विलीन हो गए!

पूरी माया-गुहा एक शान्त, दिव्य स्फटिक-कन्दरा में परिवर्तित हो गई; माया का अज्ञान-जाल टूटकर बिखर चुका था!
योगिनी का आत्म-बोध, अमृत-सिंचन और राजकुमार का उद्धार
Confrontation with Yogini & Liberation
विक्रमादित्य गुहा के आन्तरिक मन्दिर में प्रविष्ट हुए, जहाँ योगिनी चण्डिकाप्रिया स्तब्ध होकर खड़ी थी।

योगिनी ने अपना कपाल-दण्ड नीचे कर लिया: 'हाड़-मांस का बना एक मनुष्य मेरी त्रिविध महा-माया को बिना किसी भय के कैसे भेद गया?!'
तुम कौन महायोगी हो, राजन?!

विक्रमादित्य ने मधुर वाणी में कहा: 'आत्मा नित्य, शुद्ध और भय-रहित है, देवि! भ्रम केवल अहंकार पर शासन करता है; जो सत्य में स्थित है, उसे माया स्पर्श नहीं कर सकती।'

सम्राट के वचनों से योगिनी का कड़वाहट-भरा शाप धुल गया; उसने अश्रु बहाते हुए कमण्डलु से पवित्र अमृत-तीर्थ उन पाषाण-मूर्तियों पर छिड़क दिया!

पाषाण की परतें टूटकर बिखर गईं; राजकुमार चन्द्रसेन और बीस बन्दी योद्धा जीवित होकर कृतज्ञता के अश्रुओं से सम्राट के चरणों में गिर पड़े!
आपने हमें पत्थर की मृत्यु से उबारकर नव-जीवन दिया, हे चक्रवर्ती देव!

योगिनी ने दिव्य 'चन्द्र-मणि' सम्राट को भेंट की; विक्रमादित्य ने वह अमूल्य मणि अपने पास रखने के बजाय राजकुमार को सौंप दी ताकि वह अपनी प्रजा का कल्याण कर सके।
चन्द्रज्योति का निर्णय और राजा भोज का संकोच
Chandrajyoti
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली चन्द्रज्योति ने राजा भोज को गम्भीर चन्द्र-धवल नयनों से देखा।

चन्द्रज्योति ने इक्कीसवीं सीढ़ी की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी अपने मन में कंचन, कामिनी और भय के त्रिविध भ्रमों को आत्म-तेज से भस्म कर किसी पाषाण बने प्राणी को नव-जीवन दिया है? यदि ऐसा अचल मनोनिग्रह और वैराग्य तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा अचल मनोनिग्रह, माया के त्रिविध प्रलोभनों को तृणवत् त्यागने की समाधि और आत्म-तेज से दूसरों का उद्धार करने की सिद्धि नहीं है, देवि। मैं इस इक्कीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज इक्कीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में वैदिक ध्यान-केन्द्र, मानसिक शान्ति आश्रम और दर्शन-अकादमियाँ स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में नागरिकों के आत्मिक उत्थान और मानसिक संतुलन हेतु साधना-न्यासों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और चन्द्रज्योति मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का इक्कीसवाँ दिन सम्पन्न हुआ!**

शेष ग्यारह कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, बाईसवीं पुतली (अनुरोधवती) की अमर गाथा की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज आत्म-विजय और निष्काम वैराग्य के दिव्य सत्यों को हृदय में धारण कर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम बाईसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और बाईसवीं पुतली—अनुरोधवती—की अमर गाथा सुनेंगे!"