चतुर्विंशति पुतली करुणावती: चेदि देश का महा-अकाल, राज-अन्नागार का त्याग और सम्राट की अन्तिम ग्रास-रोटी
The Twenty-Fourth Statue: Karunavati & The Seven Famines of Chedi
चौबीसवाँ सूर्योदय और करुणावती का प्रबोधन
The Twenty-Fourth Dawn & Karunavati
चौबीसवें प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने धारानगरी के राजप्रासाद को आलोकित किया, जहाँ राजा भोज ने तीसरे खण्ड (सीज़न ३) के समापन हेतु अपनी साधना पूर्ण की।

केसरिया परिधान धारण कर राजा भोज विनीत चरणों से चौबीसवीं सीढ़ी की ओर बढ़े।

जैसे ही राजा का चरण चौबीसवीं सीढ़ी के निकट पहुँचा, मणिक वेदी मुक्ता-धवल और पद्म-स्वर्णिम दिव्य प्रकाश से प्रदीप्त हो उठी!

चौबीसवीं कांस्य-पुतली—करुणावती—की मुक्ता-नयन खुले और वह सुवर्ण-धान्य-मञ्जरी व अन्न-पात्र हाथ में लिए दिव्य हँसी के साथ सजीव हो उठी!
ठहरो, राजा भोज! इस चौबीसवीं सीढ़ी पर कदम रखने का दुस्साहस मत करो!

राजा भोज ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और धान्य-मञ्जरी धारण की हुई पुतली की ओर देखा।
हे करुणावती देवि! विक्रमादित्य के किस महा-त्याग और अकाल-पीड़ितों के उद्धार की गाथा आज आप मुझे सुनाना चाहती हैं?

करुणावती ने सुवर्ण-धान्य-मञ्जरी उठाकर गम्भीर वाणी में कहा:
क्या तुममें विक्रमादित्य जैसा महा-करुणा का तेज है, जब चेदि देश के सात वर्षीय महा-अकाल में उन्होंने अपने सारे राज-अन्नागार खोल दिए, कुश की चटाई पर सोकर उपवास किया और अपने मुख की अन्तिम जौ-रोटी एक अनाथ अंधी बालिका को खिला दी?
चेदि देश का महा-अकाल, शरणार्थियों की पुकार और मन्त्रियों का संकोच
The Seven-Year Famine of Chedi & The Border Crisis
पड़ोसी चेदि जनपद में लगातार सात वर्षों से वर्षा की एक बूँद न गिरी थी; नदियाँ सूखकर दरारें बन चुकी थीं और फसलें जलकर राख हो गई थीं।

लाखों भूखे, प्यासे और असहाय शरणार्थी अपने बच्चों को कन्धों पर उठाए उज्जयिनी की सीमाओं की ओर अन्न की भीख माँगते हुए आ रहे थे।
महाराज विक्रमादित्य के द्वार खोलो! हमारे बच्चे भूख से मर रहे हैं!

उज्जयिनी के कुछ स्वार्थी धनी व्यापारियों ने अपने भूमिगत गोदामों में ताले जड़ दिए और अनाज के दाम पचास गुना बढ़ाकर अकाल से लाभ कमाने का षड्यन्त्र रचा।
जब अनाज का एक-एक दाना सोने के भाव बिकेगा, तब हम तिजोरियाँ खोलेंगे!

राजसभा में मन्त्रियों ने विक्रमादित्य को परामर्श दिया: 'महाराज! सीमाओं पर लोहे के फाटक बन्द कर दीजिए, अन्यथा उज्जयिनी में भी अन्न का संकट आ जाएगा!'
चेदि का अकाल हमारा नहीं है, महाराज! हमें अपनी प्रजा की रक्षा करनी चाहिए!

विक्रमादित्य ने क्रोध में अपनी मुट्ठी सिंहासन पर मारी: 'यह वसुधा परमात्मा की है, सीमाओं की नहीं! जब तक विक्रमादित्य जीवित है, भारत-भूमि पर कोई मनुष्य भूख से नहीं मरेगा!'
जो राजा भूखे पड़ोसी को देखकर द्वार बन्द कर ले, वह सम्राट नहीं, कायर है!

राज-रक्षकों ने तत्काल जमाखोर व्यापारियों के भूमिगत गोदामों के ताले तोड़ डाले और सारा जमा अनाज जन-कल्याण हेतु जब्त कर लिया।
चालीस राज-अन्नागारों का उद्घाटन और सम्राट का अन्न-त्याग व्रत
Opening the Imperial Granaries & The Emperor
विक्रमादित्य ने स्वयं जाकर उज्जयिनी के सभी चालीस विशाल भूमिगत राज-अन्नागारों की राज-मुहरें तोड़ दीं।

सैकड़ों बैलगाड़ियों में कनक, चावल और दालें भरकर राजमार्गों पर शरणार्थियों के शिविरों तक भेजी जाने लगीं।
सम्राट का आदेश है—प्रत्येक शरणार्थी परिवार को बिना किसी मूल्य के अनाज दिया जाए!

शिप्रा और नर्मदा के तटों पर विशाल 'अन्न-सत्र' स्थापित हुए, जहाँ प्रतिदिन पचास हज़ार से अधिक भूखों को गरम भोजन परोसा जाने लगा।
गरम भोजन तैयार है! कोई भी व्यक्ति भूखा न लौटे!

महाकाल मन्दिर में विक्रमादित्य ने कठोर प्रजा-व्रत का संकल्प लिया: 'जब तक चेदि की भूमि हरी नहीं होती और अन्तिम शरणार्थी तृप्त नहीं होता, मैं दिन में केवल एक सूखी जौ की रोटी खाऊँगा और कुश की चटाई पर सोऊँगा!'
प्रजा के भूखे रहते सम्राट को मिष्ठान्न का अधिकार नहीं है!

स्वर्ण-पलंग का त्याग कर सम्राट राजप्रासाद के फर्श पर कुश की सादी चटाई बिछाकर सोने लगे।

व्रत के इक्कीसवें दिन लू के थपेड़े चल रहे थे; सम्राट स्वयं भोजनालयों का निरीक्षण करने नंगे पाँव नगर-द्वार की ओर निकले।
सूखे वटवृक्ष की छाँव, अंधी अनाथ बालिका और अन्तिम ग्रास का दान
The Roadside Beggar & The Final Crust of Bread
साधारण सूती वस्त्रों में विक्रमादित्य शिविरों में घूम-घूम कर प्रत्येक दुखी की सुध ले रहे थे।

सन्ध्या समय परिचारक ने सम्राट का दैनिक आहार प्रस्तुत किया—एक सूखी छोटी जौ की रोटी और एक कटोरा कुएँ का शीतल जल।

जैसे ही सम्राट ने रोटी मुँह के पास की, मार्ग किनारे सूखे वटवृक्ष के नीचे से एक मन्द सिसकी सुनाई दी—आठ वर्षीय अंधी अनाथ बालिका कल्याणी तप्त धूल में बेसुध पड़ी थी!

कंकाल-समान बालिका ने अपने काँपते हाथ फैलाए: 'पानी... एक टुकड़ा रोटी... मेरी माँ मर चुकी है... मुझे भूख से बचा लो...'
कोई है जो मुझे रोटी का एक तिनका दे दे?...

बिना एक क्षण गँवाए विक्रमादित्य तप्त धूल में घुटनों के बल बैठ गए और उस मरणासन्न बालिका को अपनी गोद में समेट लिया।

सम्राट ने अपनी पूरे दिन की एकमात्र सूखी रोटी के टुकड़े तोड़कर और जल की बूँदें उस बालिका के सूखे होठों में अपने हाथों से खिलाईं; पिता के समान अश्रु सम्राट की दाढ़ी पर बह रहे थे!
खाओ, मेरी बच्ची! तुम्हारा पिता विक्रमादित्य तुम्हारे पास है!
वरुण देव का मेघ-वर्षण, अमृत-वृष्टि और चेदि देश का पुनरुद्धार
The Miraculous Rains of Varuna & Rebirth of Chedi
रोटी और जल पाते ही बालिका के नयनों में चेतना लौट आई; उसने कृतज्ञता से सम्राट की उँगलियों को थाम लिया।

उसी क्षण आकाश में प्रचण्ड मेघ-गर्जना हुई; एक नश्वर सम्राट के इस अलौकिक आत्म-त्याग को देखकर स्वर्ग के देव-कपाट खुल गए!

वरुण देव की कृपा से मूसलाधार शीतल अमृत-वृष्टि आरम्भ हो गई; सात वर्षों से प्यासी चेदि और मालवा की धरती तृप्त हो उठी!

हज़ारों किसान, शरणार्थी और बच्चे वर्षा के जल में आनन्द से नाचने लगे; हाहाकार का स्थान विजय-उत्सव ने ले लिया!
वर्षा आ गई! सम्राट विक्रमादित्य के आत्म-त्याग से हमारी धरती फिर जी उठी!

विक्रमादित्य ने चेदि के पुनर्निर्माण हेतु पचास हज़ार बैल, हल और उत्तम बीज उपहार में दिए, बिना एक इंच भूमि पर अधिकार जमाए!

हरे-भरे खेतों के ऊपर सतरंगी इन्द्रधनुष खिल उठा; विक्रमादित्य की महा-करुणा ने अकाल और मृत्यु को सदा के लिए पराजित कर दिया!
करुणावती का निर्णय और सीज़न ३ का भव्य समापन
Karunavati
धारानगरी के सभा-भवन में सजीव पुतली करुणावती ने राजा भोज को गम्भीर मुक्ता-नयनों से देखा।

करुणावती ने चौबीसवीं सीढ़ी और सीज़न ३ के समापन की चुनौती दी:
अब कहो, राजा भोज—क्या तुमने कभी विदेशी अकाल-पीड़ितों हेतु अपने सारे राज-अन्नागार खाली किए हैं? क्या स्वयं कुश की चटाई पर भूखे रहकर अपनी अन्तिम रोटी किसी अंधी अनाथ बालिका को खिलाई है? यदि ऐसा असीम आत्म-बलिदान और वात्सल्य तुममें है, तो कदम बढ़ाओ! अन्यथा लौट जाओ!

राजा भोज ने लज्जा और श्रद्धा से सिर झुका लिया:
मुझमें विक्रमादित्य जैसा देव-तुल्य आत्म-त्याग, पराये दुःख को अपना मानकर स्वयं भूखे रहने का व्रत और अन्तिम ग्रास का दान देने का शील नहीं है, देवि। मैं इस चौबीसवीं सीढ़ी के भी योग्य नहीं हूँ।

राजा भोज चौबीसवीं सीढ़ी से नीचे उतरे और धारानगरी तथा पूरे मालवा में आपातकालीन अकाल-अन्नागार, निःशुल्क अन्न-सत्र और सीमा-शरणार्थी आश्रय गृह स्थापित करने की आज्ञा दी।

राज्य-भर में अन्न-सुरक्षा न्यास और अनाथ पुनर्वास केन्द्रों का गठन हुआ।

संध्याकाल के शंख गूँज उठे और करुणावती मन्द मुस्कान के साथ पुनः मौन कांस्य-प्रतिमा बन गई। **सिंहासन बत्तीसी का सीज़न ३ (सप्तदश से चतुर्विंशति पुतली) भव्य रूप से सम्पन्न हुआ!**

शेष आठ कांस्य-पुतलियाँ सन्ध्या की मशालों में जगमगाती रहीं, अन्तिम सीज़न ४ (परम-सोपान शिखर — पञ्चविंशति से द्वात्रिंशत् पुतली) के आरम्भ की प्रतीक्षा करते हुए।

राजा भोज महा-करुणा और आत्म-त्याग के अमर सत्यों को हृदय में संजोकर मौन भाव से राजसभा से प्रस्थान कर गए।
"कल प्रातःकाल हम पच्चीसवीं सीढ़ी पर कदम रखेंगे और अन्तिम सीज़न ४ का शुभारम्भ करेंगे!"